दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Monday, June 11, 2007

अश्क का दश्क


उपन्यासकार ओपिन्द्रानाथ अश्क
हिन्दी उचार्नों की करते रहे मश्क
घूम आये दूर-दूर
देस लौटे थके चूर
ग़लत, हाय! गल्त रहा बीत गया दश्क !

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