दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Friday, May 19, 2017

जामुन का पेड़ | कृशनचन्दर

रात को बड़े ज़ोर का झक्कड़ चला। सेक्रेटेरियट के लाॅन में जामन का एक दरख़्त गिर पड़ा। सुबह जब माली ने देखा तो इसे मा'लूम पड़ा कि दरख़्त के नीचे एक आदमी दबा पड़ा है।
माली दौड़ा-दौड़ा चपरासी के पास गया। चपरासी दौड़ा-दौड़ा क्लर्क के पास गया। क्लर्क दौड़ा-दौड़ा सुपरिन्टेन्डन्ट के पास गया। सुपरिन्टेन्डन्ट दौड़ा-दौड़ा बाहर लॉन में आया। मिनटों में गिरे हुए दरख़्त के नीचे दबे हुए आदमी के गिर्द मज़मा' इकट्ठा हो गया।
"बेचारा! जामुन का पेड़ कितना फलदार था।" एक क्लर्क बोला।
"इस की जामुन कितनी रसीली होती थीं।" दूसरा क्लर्क बोला।
"मैं फलों के मौसम में झोली भर के ले जाता था। मेरे बच्चे इस की जामुनें कितनी ख़ुशी से खाते थे।" तीसरे क्लर्क ने तक़रीबन आबदीदा हो कर कहा।
"मगर ये आदमी?" माली ने दबे हुए आदमी की तरफ़ इशारा किया।
"हां, यह आदमी!" सुपरिन्टेन्डन्ट सोच में पड़ गया।
"पता नहीं ज़िन्दा है कि मर गया!" एक चपरासी ने पूछा।
मर गया होगा। इतना भारी तना जिनकी पीठ पर गिरे, वह बच कैसे सकता है!दूसरा चपरासी बोला।
नहीं मैं ज़िन्दा हूँ!दबे हुए आदमी ने बामुश्क़िल, कराहते हुए कहा।
ज़िन्दा है!एक क्लर्क ने हैरत से कहा।
दरख़्त को हटा कर इसे निकाल लेना चाहिये। माली ने मशविरा दिया।
मुश्क़िल मा'लूम होता है। एक काहिल और मोटा चपरासी बोला। दरख़्त का तना बहुत भारी और वज़नी है।
क्या मुश्क़िल है?” माली बोला। अगर सुपरिन्टेन्डन्ट साहब हुक़्म दे तो अभी पन्द्रह-बीस माली, चपरासी और क्लर्क ज़ोर लगा कर दरख़्त के नीचे से दबे आदमी को निकाल सकते हैं।
माली ठीक कहता है। बहुत-से क्लर्क एक साथ बोल पड़े। लगाओ ज़ोर, हम तयार हैं।
एकदम बहुत से लोग दरख़्त को काटने पर तैयार हो गये।
ठहरो!”, सुपरिन्टेन्डन्ट बोला, “मैं अन्डर-सेक्रेटरी से मशविरा कर लूँ।
सुपरिन्टन्डन्ट अन्डर-सेक्रेटरी के पास गया। अन्डर-सेक्रेटरी डेप्युटी सेक्रेटरी के पास गया। डेप्युटी सेक्रेटरी जॉइन्ट सेक्रेटरी के पास गया। जॉइन्ट सेक्रेटरी चीफ़ सेक्रेटरी के पास गया। चीफ़ सेक्रेटरी ने जॉइन्ट सेक्रेटरी से कुछ कहा। जॉइन्ट सेक्रेटरी ने डेप्युटी सेक्रेटरी से कुछ कहा। डेप्युटी सेक्रेटरी ने अंडर सेक्रेटरी से कुछ कहा। एक फ़ाइल बन गयी। फ़ाइल चलने लगी। फ़ाइल चलती रही। इसी में आधा दिन गुज़र गया।
दोपहर को खाने पर दबे हुए आदमी के गिर्द बहुत भीड़ हो गयी थी। लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। कुछ मनचले क्लर्कों ने मामले को अपने हाथ में लेना चाहा। वह हुक़ूमत के फ़ैसले का इन्तज़ार किये बग़ैर दरख़्त को ख़ुद से हटाने का तहय्या कर रहे थे कि इतने में सुपरिन्टेन्डन्ट फ़ाइल लिये भागा-भागा आया, बोला – "हम लोग ख़ुद से इस दरख़्त को यहाँ से हटा नहीं सकते। हम लोग महक़मा तिज़ारत से मुताल्लक़ हैं और यह दरख़्त का मामला है जो महकमा-ए-ज़िराअत की तहवील में है। इसलिए मैं इस फ़ाइल को अरज़न्ट मार्क कर के मुहक़मा-ए-ज़िराअत में भेज रहा हूँ। वहाँ से जवाब आते ही इस को हटवा दिया जायेगा।
दूसरे दिन महक़मा-ए-ज़िराअत से जवाब आया कि दरख्त हटवाने की ज़िम्मेदारी महकमा-ए-तिज़ारत पर आईद होती है।
यह जवाब पढ़कर महक़मा-ए-तिज़ारत को ग़ुस्सा आ गया। उन्हों ने फ़ौरन लिखा कि पेड़ों को हटवाने या न हटवाने की ज़िम्मेदारी महक़मा-ए-ज़िराअत पर आईद होती है। महक़मा-ए-तिज़ारत का इस मामले से कोई ता'ल्लुक़ नहीं है।
दूसरे दिन भी फ़ाइल चलती रही। शाम को जवाब भी आ गया। हम इस मआमले को हॉरटीकल्चरल डिपार्टमेंट के सुपुर्द कर रहे हैं क्योंकि यह एक फलदार दरख़्त का मामला है और एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट सिर्फ़ अनाज और खेतीबाड़ी के मामलों में फ़ैसला करने का मजाज़ है। जामुन का पेड़ एक फलदार पेड़ है इसलिये पेड़ हॉरटीकल्चरल डिपार्टमेन्ट के दाइरये-अख़्तियार में आता है।
रात को माली ने दबे हुए आदमी को दाल-भात खिलाया हालाँकि लॉन के चारों तरफ़ पुलिस का पहरा था कि कहीं लोग क़ानून को अपने हाथ में ले के दरख़्त को ख़ुद से हटवाने की कोशिश न करें। मगर एक पुलिस काॅन्स्टेबल को रहम आ गया और इसने माली को दबे हुए आदमी को खाना खिलाने की इजाज़त दे दी।
माली ने दबे हुए आदमी से कहा, “तुम्हारी फ़ाइल चल रही है। उम्मीद है कि कल तक फ़ैसला हो जायेगा।
दबा हुआ आदमी कुछ न बोला।
माली ने पेड़ के तने को ग़ोर से देखकर कहा, "हैरत गुज़री कि तना तुम्हारे कुल्हे पर गिरी। अगर कमर पर गिरती तो रीढ़ की हड्डी टूट जाती।"
दबा हुआ आदमी फिर भी कुछ न बोला।
माली ने फिर कहा, "तुम्हारा यहाँ कोई वारिस हो तो मुझे इस का अतापता बताओ। मैं इसे ख़बर देने की कोशिश करूँगा।"
"मैं लावारिस हूँ।" दबे हुए आदमी ने बड़ी मुश्क़िल से कहा।
माली अफ़सोस ज़ाहिर करता हुआ वहाँ से हट गया।
तीसरे दिन हाॅरटिकल्चरल डिपार्टमेंट से जवाब आ गया। बड़ा कड़ा जवाब था, और तंज़आमेज़। हाॅरटिकल्चरल डिपार्टमेंट का सेक्रेटरी अदबी मिजाज़ का आदमी मालूम होता था। इसने लिखा था : "हैरत है, इस समय जब 'दरख़्त उगाओ' इस्कीम बड़े पैमाने पर चल रही हैं, हमारे मुल्क़ में ऐसे सरकारी अफ़सर मौज़ूद हैं जो दरख़्त काटने का मशवरा देते हैं, वह भी एक फलदार दरख़्त को! और फिर जामुन के दरख़्त को! जिस की फल अवाम बड़ी रग़बत से खाते हैं!! हमारा महक़मा किसी हालत में इस फलदार दरख़्त को काटने की इज़ाजत नहीं दे सकता।"
अब क्या किया जाय?“ एक मनचले ने कहा। अगर दरख़्त काटा नहीं जा सकता तो इस आदमी को काट कर निकाल लिया जाय! यह देखिये, इसी आदमी ने इशारे से बताया। अगर इस आदमी को बीच में से यानी धड़ के मकाम से काटा जाय तो आधा आदमी इधर से निकल आयेगा और आधा आदमी उधर से बाहर आ जायेगा, और दरख्त वहीं का वहीं रहेगा।
मगर इस तरह से तो मैं मर जाऊँगा!दबे हुए आदमी ने एहतजाज़ किया।
"यह भी ठीक कहता है!" एक क्लर्क बोला।
आदमी को काटने वाली तजवीज़ पेश करने वाले ने पुर-ज़ोर एहतजाज़ किया, "आप जानते नहीं हैं। आजकल प्लास्टिक सरज़री के ज़रिये धड़ के मुक़ाम पर इस आदमी को फिर से जोड़ा जा सकता है।"
अब फ़ाइल को मेडिकल डिपार्टमेंट में भेज दिया गया। मेडिकल डिपार्टमेंट ने फ़ौरन इस पर एक्शन लिया और जिस दिन फ़ाइल इस महक़मे का सब से क़ाबिल प्लास्टिक सर्जन तहकिकात के लिये भेज दिया। सर्जन ने दबे हुए आदमी को अच्छी तरह टटोल कर, इस की सेहत देखकर, ख़ून का दबाओ, साँस की आमदो-रफ़्त, दिल और फेफड़ों की जांच कर के रिपोर्ट भेज दी कि, "इस आदमी का प्लास्टिक सरज़री का ऑपरेशन तो हो सकता है, और ऑपरेशन कामयाब भी हो जायेगा, मगर आदमी मर जायेगा।"
लिहाज़ा यह तज़वीज़ भी रद्द कर दी गयी।
रात को माली ने दबे हुए आदमी के मुँह में खिचड़ी के लुकमे डालते हुए इसे बताया, “अब मामला ऊपर चला गया है। सुना है कि सेक्रेटेरियट के सारे सेक्रेटेरियों की मीटिंग होगी। इसमें तुम्हारा केस रखा जायेगा। उम्मीद है सब काम ठीक हो जाएगा।
दबा हुआ आदमी एक आह भरकर आहिस्ते से बोला - हमने माना कि तग़ाफुल न करोगे लेकिन ख़ाक़ हो जायेंगे हम, तुमको ख़बर होने तक!
माली ने अचम्भे से मुँह में उंगली दबायी। हैरत से बोला, “क्या तुम शायर हो?”
दबे हुए आदमी ने आहिस्ते से सर हिला दिया।
दूसरे दिन माली ने चपरासी को बताया। चपरासी ने क्लर्क को, और क्लर्क ने हेड-क्लर्क को। थोड़े ही अरसे में सेक्रेटेरियट में यह अफ़वाह् फैल गयी कि दबा हुआ आदमी शायर है। बस फिर क्या था। लोग जोक-दर-जोक शायर को देखने के लिये आने लगे। इस की ख़बर शहर में फैल गयी। और शाम तक मुहल्ले-मुहल्ले से शायर जमाअ होना शुरु हो गये। सेक्रेटेरियट का लॉन भांत-भांत के शायरों से भर गया। सेक्रेटेरियट के कई क्लर्क और अन्डर-सेक्रेटरी तक, जिन्हें अदब और शायर से लगाओ था, रुक गये। कुछ शायर दबे हुए आदमी को अपनी ग़ज़लें और नज़में सुनाने लगे। कई क्लर्क इससे अपनी ग़ज़लों पर इसलाह् लेने के लिए मुसिर होने लगे।
जब यह पता चला कि दबा हुआ आदमी शायर है तो सेक्रेटेरियट की सब-कमिटी ने फ़ैसला किया कि चोंकि दबा हुआ आदमी एक शायर है लिहाज़ा इस फ़ाइल का ताल्लुक़ न एग्रिकल्चरल डिपार्टमेंट से है, न हाॅरटिकल्चरल डिपार्टमेंट से बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ कलचरल डिपार्टमेंट से है। पहले कलचरल डिपार्टमेंट से इसतदा की गयी कि जल्द से जल्द इस मामले का फ़ैसला कर के बदनसीब शायर को इस शजरे-सायादार से रिहाई दिलायी जाय।
फ़ाइल कलचरल डिपार्टमेंट के मुख़्तलिफ़ शुआबों से गुज़रती हुई अदबी अकाडमी के सेक्रेटरी के पास पहुँची। बेचारा सेक्रेटरी इसी वक़्त अपनी गाड़ी में सवार हो कर सेक्रेटेरियट पहुँचा और दबे हुए आदमी से इन्टरव्यू लेने लगा।
तुम शायर हो?” इसने पूछा।
जी हाँ। दबे हुए आदमी ने जवाब दिया।
क्या तख़ल्लुस करते हो?”
अवस।
अवस!सेक्रेटरी ज़ोर से चीखा। क्या तुम वही हो जिस का मजमुआ-ए-कलाम-ए-अवस के फूल हाल ही में शाये' हुआ है?”
दबे हुए शायर ने इस बात में सर हिलाया।
क्या तुम हमारी अकाडमी के मेम्बर हो?” सेक्रेटरी ने पूछा।
नहीं!
"हैरत है!" सेक्रेटरी ज़ोर से चीखा। "इतना बड़ा शायर! 'अवस के फूल' का मुसन्निफ़!! और हमारी अकाडमी का मेम्बर नहीं है! ऊफ़, ऊफ़ कैसी ग़लती हो गयी हम से! कितना बड़ा शायर और कैसे गोशिआ-ए-ग़ुमनामी में दबा पड़ा है!"
गोशिया-ए-गुमनामी में नहीं बल्कि एक दरख़्त के नीचे दबा हुआ... बराहे-क़रम मुझे इस पेड़ के नीचे से निकालिये।
अभी बन्दोबस्त करता हूँ। सेक्रेटरी फ़ौरन बोला और फ़ौरन जा कर इसने अपने महकमे में रिपोर्ट पेश की।
दूसरे दिन सेक्रेटरी भागा-भागा शायर के पास आया और बोला, “मुबारक़ हो, मिठाई खिलाओ, हमारी सरकारी अकाडमी ने तुम्हें अपनी मर्क़ज़ी कमिटी का मेम्बर चुन लिया है। यह लो परवाना-ए-इन्तख़ाब!
मगर मुझे इस दरख़्त के नीचे से तो निकालो। दबे हुए आदमी ने करहा कर कहा। इस की साँस बड़ी मुश्क़िल से चल रही थी और इस की आँखों से मा'लूम होता था कि वह शदीद तशन्नुज और करब में मुब्तला है।
यह हम नहीं कर सकते। सेक्रेटरी ने कहा। जो हम कर सकते थे वह हमने कर दिया है। बल्कि हम तो यहाँ तक कर सकते हैं कि अगर तुम मर जाओ तो तुम्हारी बीवी को वज़ीफा दिला सकते हैं। अगर तुम दरख़्वास्त दो तो हम यह भी कर सकते हैं।
मैं अभी ज़िन्दा हूँ। शायर रुक-रुक कर बोला। मुझे ज़िन्दा रखो।
मुसीबत यह है,” सरकारी अकाडमी का सेक्रेटरी हाथ मलते हुए बोला, “हमारा महक़मा सिर्फ़ कल्चर से मुताल्लुक़ है। इसके लिए हमने 'फ़ाॅरेस्ट डिपार्टमेन्ट' को लिख दिया है। 'अर्जन्ट' लिखा है।
शाम को माली ने आ कर दबे हुए आदमी को बताया कि कल फ़ाॅरेस्ट डिपार्टमेन्ट के आदमी आकर इस दरख़्त को काट देंगे और तुम्हारी जान बच जायेगी।
माली बहुत ख़ुश था कि गो दबे हुए आदमी की सेहत जवाब दे रही थी मगर वह किसी-न-किसी-तरह अपनी ज़िन्दगी के लिए लड़े जा रहा है। कल तक... सुबह तक... किसी न किसी तरह इसे ज़िन्दा रहना है।
दूसरे दिन जब फ़ाॅरेस्ट डिपार्टमेन्ट के आदमी आरी-कुल्हाड़ी ले कर पहुँचे तो इनको दरख़्त काटने से रोक दिया गया। मा'लूम यह हुआ कि मुहकमा-ए-ख़ारज़ा से हुक़्म आया कि इस दरख़्त को न काटा जाय, वजह यह थी कि इस दरख़्त को दस साल पहले हुकूमते पिटोनिया के वज़ीरे-आज़म ने सेक्रेटेरियट के लॉन में लगाया था। अब यह दरख़्त अगर काटा गया तो इस उमर का शदीद अन्देशा था कि हुकूमते-पिटोनिया से हमारे ताल्लुक़ात हमेशा के लिए बिगड़ जायेंगे।
मगर एक आदमी की जान का सवाल है!एक क्लर्क ग़ुस्से से चिल्लाया।
दूसरी तरफ़ दो हुक़ूमतों के ताल्लुक़ात का सवाल है। दूसरे क्लर्क ने पहले क्लर्क को समझाया। और यह भी तो समझो कि हुक़ूमते-पिटोनिया हमारी हुकूमत को कितनी इमदाद देती है। क्या हम इन की दोस्ती की ख़ातिर एक आदमी की ज़िन्दगी को भी क़ुरबान नहीं कर सकतें?”
शायर को मर जाना चाहिये।
बिलाशुबाह्।
अन्डर सेक्रेटरी ने सुपरिन्टेन्डन्ट को बताया। आज सुबह वज़ीरे-आज़म बाहर-मुल्कों के दौरे से वापस आ गये हैं। आज चार बजे महकमा-ए-ख़ार्जा इस दरख़्त की फ़ाइल उन के सामने पेश करेगा। जो वह फ़ैसला देंगे वही सब को मंज़ूर होगा।
शाम पांच बजे ख़ुद सुपरिन्टेन्डन्ट शायर की फ़ाइल ले कर उस के पास आया। सुनते हो?” आते ही ख़ुशी से फ़ाइल हिलाते हुए चिल्लाया, “वज़ीरे-आज़म ने दरख़्त को काटने का हुक़्म दे दिया है और इस वाक़िये की सारी बैनुल्-अक़्वामी ज़िम्मेदारी अपने सर पर ले ली है। कल वह दरख़्त काट दिया जायेगा और तुम इस मुसीबत से छुटकारा हासिल कर लोगे।
सुनते हो? आज तुम्हारी फ़ाइल मुक़म्मल हो गयी!सुपरिन्टन्डन्ट ने शायर के बाजू को हिला कर कहा। मगर शायर का हाथ सर्द था। आँखों की पुतलियाँ बेजान थीं और च्योंटियों की एक लम्बी क़तार इस के मुँह में जा रही थी।

उसकी ज़िन्दगी की फ़ाइल भी मुक़म्मल हो चुकी थी।
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अगर कोई मालिक नहीं होगा तो मुझे काम कौन देगा? | कुछ सीधी-सादी समाजवादी सच्चाइयाँ

मज़दूर : लेकिन अगर कोई मालिक नहीं होगा तो मुझे काम कौन देगा?
समाजवादी : यह सवाल मुझसे अक्सर ही पूछा जाता है; चलो इसका पता लगायें। काम के लिए तीन चीज़ों की ज़रूरत पड़ती है एक वर्कशॉप, मशीनें, और कच्चा माल।
मज़दूर : ठीक है।
समाजवादी : वर्कशॉप कौन बनाता है?
मज़दूर : मिस्त्री।
समाजवादी : मशीनें कौन बनाता है?
मज़दूर : इंजीनियर।
समाजवादी : कपास कौन उगाता है जिससे तुम कपड़े बुनते हो, भेड़ों से ऊन कौन निकालता है जिसे तुम्हारी पत्नी कातती है, खदानों से खनिज कौन निकालता है जिसे तुम्हारा बेटा भट्टी में ढालता है?
मज़दूर : किसान, चरवाहे, खदान मज़दूर मेरे जैसे मज़दूर।
समाजवादी : इस तरह, तुम, तुम्हारी पत्नी, और तुम्हारा बेटा केवल इसीलिए काम कर सकते हैं क्योंकि तमाम अन्य मज़दूरों ने तुम्हें भवन, मशीन और कच्चे माल की आपूर्ति कर रखी है।
मज़दूर : लेकिन बात यह है; मैं कपास और करघे के बिना सूती कपड़ा नहीं बुन सकता।
समाजवादी : ठीक है, तो तुम्हें काम देने वाला पूँजीपति अथवा मालिक नहीं है, बल्कि मिस्त्री, इंजीनियर, किसान है। क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे मालिक ने तुम्हारे काम के लिए आवश्यक उन सभी चीज़ों को कैसे हासिल किया?
मज़दूर : उसने उन्हें ख़रीदा।
समाजवादी : उन्हें रुपये किसने दिये?
मज़दूर : मुझे क्या पता। उसके पिता ने उसके लिए थोड़े पैसे छोड़े होंगे; आज वह करोड़पति है।
समाजवादी : क्या उसने करोड़ों रुपये अपनी मशीनों पर काम करके और कपड़े की बुनाई करके कमाये
मज़दूर : ठीक ऐसे तो नहीं; हमसे काम करवाकर उसने करोड़ो रुपये अर्जित किये।
समाजवादी : तो वह बिना कोई काम किये धनी बन गया; क़ि‍स्मत बनाने का यही एकमात्र तरीक़ा है। जो काम करते हैं उन्हें मात्र उतना मिलता है जिससे वे जीवित रह सकें। लेकिन, मुझे बताओ, अगर तुम और तुम्हारे सहकर्मी मज़दूर काम नहीं करें, तो क्या तुम्हारे मालिक की मशीनों में जंग नहीं लग जायेगा, और उसके कपास कीड़े-मकोड़े चट नहीं कर जायेंगे
मज़दूर : यदि हम काम नहीं करें तो वर्कशॉप की सभी चीज़ें जर्जर और बरबाद हो जायेंगी।
समाजवादी : इस तरह, काम करके तुम अपने श्रम के लिए आवश्यक मशीनों और कच्चे माल की रक्षा कर रहे हो।
मज़दूर : यह सच है; मैंने इस बारे में कभी नहीं सोचा।
समाजवादी : क्या तुम्हारा मालिक अपने वर्कशॉप में होने वाले काम की देखभाल करता है
मज़दूर : ज़्यादा नहीं; वह हमारे कार्यस्थल पर हमें देखने के लिए रोज़ आता है, लेकिन अपने हाथ गन्दे होने की डर से वह उन्हें अपनी जेबों में रखता है। कताई मिल में, जहाँ मेरी पत्नी और बेटी काम करती हैं, मालिक कभी नहीं आता, हालाँकि वहाँ चार मालिक हैं; ऐसी ही स्थिति फ़ाउण्ड्री में भी है, जहाँ मेरा बेटा काम करता है; मालिक वहाँ कभी नहीं देखे जाते न ही उन्हें कोई जानता है; यहाँ तक कि वर्कशॉप की तीन चौथाई आबादी ने उनकी परछाई तक नहीं देखी जब कि काम की मालिक कम्पनी का यह एक सीमित उत्तरदायित्व है। मान लीजिये आप और मैं बचत करके पाँच सौ फ्रैंक इकट्ठा कर लेते हैं, हम एक शेयर ख़रीद सकते हैं, और मालिकों में से एक बन जाते हैं, चाहे कभी कार्यस्थल पर क़दम भी नहीं रखा हो, अथवा वहाँ जाते भी नहीं हों।
समाजवादी : तब, शेयरधारक मालिकों की इस जगह पर, और तुम्हारे एक मालिक की तुम्हारे वर्कशॉप पर काम को निर्देशित और उसकी निगरानी कौन करता है, यह देखते हुए कि वहाँ कभी मालिक नहीं आता, अथवा इतनी आज़ादी है इसका कोई असर नहीं पड़ता?
मज़दूर : मैनेजर और फ़ोरमैन।
समाजवादी : लेकिन यदि मज़दूरों ने वर्कशॉप बनायें, मशीनें बनायीं, और कच्चे माल का उत्पादन किया; यदि मज़दूर ही मशीनों को चलाते हैं, और मैनेजर तथा फ़ोरमैन काम को निर्देशित करते हैं, तो फिर मालिक क्या करता है
मज़दूर : कुछ नहीं, बस बैठे-ठाले मौज करता है।
समाजवादी : यदि यहाँ से चाँद तक रेल जाती, हम मालिकों को वहाँ भेज सकते थे, बिना वापसी के टिकट के, और तुम्हारी कपड़े की बुनाई, तुम्हारी पत्नी का चरखा, और तुम्हारे बेटे का ढलाई का काम पहले की तरह चलता रहेगा तुम्हें पता है कि पिछले साल तुम्हारे मालिक को कितना मुनाफ़ा हुआ था
मज़दूर : हमने गणना की है कि उसे एक लाख फ्रैंक मिला होगा।
समाजवादी : उसने पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मिलाकर कुल कितने मज़दूरों को रोज़गार दे रखा है?
मज़दूर : एक सौ।
समाजवादी : उन्हें कितनी पगार मिलती है?
मज़दूर : औसतन, लगभग एक हज़ार फ्रैंक, मैनेजरों और फ़ोरमैनों के वेतन को जोड़कर।
समाजवादी : इस प्रकार काम में लगे सौ कर्मचारी कुल मिलाकर पगार के रूप में एक लाख फ्रैंक पाते हैं, जो मात्र इतना है कि वे भूख से नहीं मरें, जबकि तुम्हारा मालिक बिना कुछ किये एक लाख फ्रैंक अपनी जेब में रख लेता है। ये दो लाख फ्रैंक आते कहाँ से हैं?
मज़दूर : आसमान से तो नहीं; मैंने कभी भी फ्रैंक की बारिश होते नहीं देखा।
समाजवादी : अपने काम में लगे वे मज़दूर ही हैं जिन्होंने उन्हें पगार के रूप में मिले एक लाख फ्रैंक पैदा किया, और, इसके अलावा, उस मालिक के एक लाख फ्रैंक के मुनाफ़े को भी पैदा किया, जिसने नयी मशीनें ख़रीदने के लिए उनके एक हिस्से को रोज़गार दे रखा है।
मज़दूर : इस बात से इनकार नहीं है।
समाजवादी : इस प्रकार मज़दूर ही वो रुपये पैदा करते हैं जो मालिक उन्हें काम करने के लिए नयी मशीनें ख़रीदने में लगाता है; उत्पादन को निर्देशित करने वाले मैनेजर और फ़ोरमैन, आपकी तरह ही वैतनिक गुलाम होते हैं; तब, मालिक कहाँ आता है वह किस काम के लिए अच्छा है?
मज़दूर : श्रम के शोषण के लिए।

समाजवादी : हम कह सकते हैं, श्रमिकों को लूटने के लिए; यह स्पष्ट और ज़्यादा सटीक है।
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पॉल लफ़ार्ग (द सोशलिस्ट, सितम्बर 1903 में प्रकाशित) 
अनुवाद : संजय श्रीवास्तव

Monday, March 13, 2017

कम्युनिटी हेल्थ में एक अद्भुत नाम डॉक्टर सुभाष

 किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ से 1969 में MBBS करने के बाद डॉक्टर नरेश त्रेहन अमरीका चले गए और उनके साथ पढ़े डॉक्टर सुभाष चन्द्र दुबे गुरुसहायगंज। 
गुरसहायगंज कन्नौज जिले का एक छोटा सा क़स्बा है जो जीटी रोड पर दिल्ली से क़रीब 300 किमी और कानपुर से 100 किमी दूर है। क़रीब 25 साल तक जनरल फीजीशियन डॉक्टर सुभाष ने गुरुसहायगंज और आसपास के प्रायमरी हेल्थ सेंटर्स में सरकारी नौकरी की और आखिरकार 1994 में वीआरएस लेकर वे अब गुरसहायगंज में प्रायवेट प्रैक्टिस करते हुए स्थायी रूप से रहते हैं। 
डॉक्टर सुभाष ने अपने लंबे क्लीनिकल अनुभव और लोगों के लिए सेवाभाव से इलाक़े में जो ख्याति अर्जित की है, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। 

1950 से 1970 के दौरान पूरे फर्रुखाबाद जिले में चिकित्सा सुविधाएं न के बराबर थीं। यहां बमुश्किल 3 डॉक्टरों पर इलाक़े की जनता इलाज के लिए निर्भर थी। इनमें डॉक्टर पी एन टंडन और डॉक्टर मोहनलाल प्रमुख थे। इन डॉक्टरों की दो मान्यताएं प्रमुख थीं - एक तो यह कि आप पैसे के पीछे मत भागिए, आप सेवा कीजिये पैसा खुद ही आपके पीछे भागेगा। और दूसरी यह कि आप अधिक से अधिक सीरियस होकर काम कीजिये दूसरों की सेवा के लिए, क्योंकि आराम करके मरना है और काम करके भी मरना है। इन डॉक्टरों से मिली यह सीख डॉ सुभाष ने अपने जीवन में गांठ की तरह बांध ली और काम शुरू किया। डॉक्टर मोहनलाल उनके सगे ताऊ थे जिनके बारे में कहा जाता है की छिबरामऊ में वो अपनी मृत्यु के ठीक पहले तक मरीज़ देखकर ही उठे थे। 


डॉक्टर सुभाष पिछले लगभग 50 बरसों से इलाक़े की जनता के बीच लगातार प्रैक्टिस करते हुए यहां के गरीब, मेहनतकश और मामूली लोगों के जीवन में एक अनिवार्य उपस्थिति हैं। लोगो का विश्वास है कि अगर कोई बीमारी जगह-जगह दौड़ने पर भी ठीक न हो तो डॉक्टर सुभाष ही आख़िरी सहारा हैं। उनके अपने घर और नर्सिंग होम पर सुबह से लेकर देर रात तक मरीजों की कतारें लगी रहती हैं और इनमें से वो लोग खुद को सौभाग्यशाली समझते हैं जिन्हें डॉक्टर देख लेते हैं। बेहद नाउम्मीद होकर आए मरीज भी डॉक्टर का स्पर्श पाकर नया जीवन पाते हैं और उनके रिश्तेदार यही मानते हैं कि  मरने से पहले डॉक्टर सुभाष एक अंतिम पड़ाव हैं। 
डॉक्टर सुभाष को बिना थके 12 से 14 घंटे रोज काम करते देखना किसी को भी हैरान कर देनेवाला है। यह काम वो अपने किसी निजी लाभ और व्यवसाय के लिए नहीं बल्कि पूरी तरह सेवा और समर्पण के भाव से करते हैं।  


सुभाष नर्सिंग होम में कदम रखते ही आपको यह पता चल जाता है कि यह एक अस्पताल नहीं बल्कि भरोसे की जगह ज़्यादा है। जहां मरीज को  इलाज करा सकने का बल मिलता है। पहली नजर में यह नर्सिंग होम आपके लिए एक शॉक की तरह लगेगा क्योंकि यहां ऐसा कुछ भी नही है जो आपके देखे किसी नर्सिंग होम से मेल खाता हो। लकड़ी की बेंचें और तखत यहां मरीजों के तीमारदारों और खुद मरीजों के लिए बिछे हैं। एक डिस्पेंसरी है, एक्स रे की मशीन और  के लिए प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की अधखुली बोरियां वगैरह। दो तीन कम्पाउंडर दवा और दूसरी जरूरतों के लिए तीन शिफ्टों में काम करते हैं। बीच का अहाता जहां हाल ही में शेड पड़ गया है, पहले खुला हुआ ही था, यहां मरीज छाते लेकर बारिश या धूप में खड़े रहते थे। अस्पताल में बीड़ी-सिगरेट पीने या पान-गुटखा खाने और थूकने की आज़ादी भी एक ऐसा जनतांत्रिक स्पेस रचती है जिससे  इस पूरी दुनिया के साथ आत्मीय रिश्ता बन जाता है। यह एक ऐसी जगह है जहां आना किसी भी तरह से डराने वाला अनुभव नहीं है।  न डॉक्टर, न स्टाफ, न फीस और न ही माहौल ऐसा है कि डर लगे। अपने साथ अपना ओढ़ना-बिछौना और चना-चबेना लाकर इलाज कराना जैसे घर में ही इलाज कराने का दूसरा नाम है। ऊपर से  डॉक्टर  ऐसा जो सिर्फ इलाज ही नहीं करेगा बल्कि बेहद अपनापे से पेश भी आएगा।    




















डॉक्टर सुभाष आज दूर-पास के मरीजों के लिए ईश्वर जैसी आस्था का केन्द्र हैं और उनके बारे में यहां के लोगों के बीच कई तरह की किंवदंतियां मशहूर हैं।  डॉक्टर सुभाष का सबसे छोटा पुत्र खुद एक कुशल दन्त चिकित्सक है और दिल्ली में कार्यरत है।  पिता के समर्पण और सेवाभाव से प्रेरित वह खुद भी हफ्ते में दो दिन अपने पिता के नर्सिंग होम में अपनी सेवाएं देने के लिए हाजिर हो जाता है।
लोगों को विशवास है कि जब तक डॉक्टर सुभाष जीवित हैं तब तक उनके जीवन में स्वस्थ हो सकने की उम्मीद ज़िंदा है। 
खुद डॉक्टर सुभाष दो बातों पर पक्का विशवास रखते हैं - एक तो यह कि अपने से ऊपर जाने का लक्ष्य  रखो और अपने से ऊंचे जाने की हमेशा तमन्ना रखो।  और दूसरी यह कि अपने से नीचे देख कर सैटिस्फाइड रहो। जन-जीवन में व्याप्त यह विशवास ही उन्हें जीवनी शक्ति देता है कि लोग तीन लोगों की दक्षिणा कभी नहीं रोकते - एक तो मल्लाह, दूसरा गुरु और तीसरा वैद्य। 


डॉक्टर सुभाष इलाज के दौरान फीस और दवाइयों का फैसला अपने मरीजों की आर्थिक और सामाजिक हैसियत से काटकर कभी नहीं करते और यही बात उन्हें विशाल जन समूह का पारिवारिक डॉक्टर बनाती है। 
देश के अनेक ऐसे इलाक़े स्वास्थ्य की सुविधाओं से वंचित होकर भी संजीवनी पा रहे हैं तो इसमें डॉक्टर सुभाष जैसे समर्पित और कुशल डॉक्टरों का निस्वार्थ जीवन ही प्रमुख रोल निभाता है जिन्होंने लोभ और व्यक्तिगत लाभ के सामने अपने लोगों की भलाई को प्रमुखता दी है। 

यही कारण है कि पिछले हफ्ते अपने ही सहपाठी के अस्पताल मेदांता से अपने पैर का सफल ऑपरेशन कराकर लौटे  डॉक्टर सुभाष का स्थानीय जनता ने गर्म जोशी से स्वागत किया।