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Sunday, March 27, 2016
नाहीं अंगना तोहार ओंजरार मितवा...
Thursday, March 26, 2015
Saturday, April 19, 2008
अज़ान: मानव-कंठ का संगीत

कल भाई अज़दक के ज़ख़ीरे से कुछ और संगीत सुन रहा था तो उसमें आज़ान का यह ट्रैक मिला. इसमें विवरण इस प्रकार लिखा है-
Turkey:The Sacred Quran
Azhan(Calling to Prayer)
Artist: Islamic chants of the Ottoman
Album title: Best world sounds 100 6CD-Box
Dur: 06:03
Friday, April 18, 2008
Thursday, April 17, 2008
Monday, April 14, 2008
Its a male-male world और बप्पी लहरी की लीद

दिल्ली के पंचशील कमर्शियल सेंटर में यूटीवी का डबिंग डिवीज़न है जहाँ नेशनल ज्योग्रफिक चैनेल, द हिस्ट्री चैनेल, हंगामा, बिंदास वग़ैरह चैनलों के लिये विदेशी भाषाओं से हिंदी में डबिंग होती है. काम जब तक मज़ेदार लगता है, यार लोग मज़े लेकर काम करते हैं और जब चटने लगते हैं तो बाहर ऐसी महफिलें जम उठती हैं. अब ये महफिलें रेयर हैं वरना डबिंग डायरेक्टर, साउंड इंजीनियर और वॉयस ओवर आर्टिस्ट्स समेत मैनेजर और दूसरे विभागों के लोग भी शामिल हो जाया करते थे. तीन साल पुरानी ये रिकॉर्डिंग ऐसी ही एक शाम की झलक देती है. तब राजदीप भी थे.
Monday, December 31, 2007
Saturday, December 29, 2007
एक ही जैसे दु:खद प्रसंग हैं...
Monday, October 29, 2007
ब्लॊगलिखी की पॊडलिखी
काग़ज़ पर छपे हुए शब्दों से ब्लॊग पर छपे शब्दों तक बहुत कुछ है जिस पर कभी हमारी नज़र पड़ती है तो कभी नहीं. इधर हिंदी ब्लॊग्स में थोड़ी हलचल शुरू हुई तो प्रिंट पब्लिकेशंस का ध्यान इस ओर भी गया.आज कोई आधा दर्जन महत्वपूर्ण प्रिंट पब्लिकेशंस ब्लॊग्स राउंड अप छाप रहे हैं. अपने अविनाश भाई के जी की जलन तो प्रिंट से लेकर ब्लॊग तक और टीवी से लेकर पॊडकास्ट तक, बुझाए नहीं बुझती.
सच है ऐसी ही रेस्टलेस सोल्स बिगड़ी बनाती हैं.
वो जनसत्ता में भी इधर कुछ हफ़्तों से ये बताने में लगे हैं कि ब्लॊग कितने कमाल का माध्यम है. मुझे भी यह रोग उन्होंने ही लगाया है. मैं उनका आभारी हूं और यह पोस्ट उनके उपकारों के प्रति एक श्रंद्धांजलि भी है.
विवरण में बस एक सुधार यह है कि मैंने अफ़लातून भाई की मांग पर ठीक वही गीत नहीं बल्कि उसी के पासपड़ोस का गीत पेश किया था.
रही बात नौटंकी की, तो मैं अभी पिछले हफ़्ते नौटंकी की ज़मीन से होकर ही लौटा हूं. कहते हैं कि गुलाब बाई की शोहरत के नीचे नंबरादार, तिर्मोहन, बांके और परसुराम भी दब गये. आप गुलाबबाई को तो जानते हैं लेकिन कृष्णाबाई को नहीं. जबकि गुलबिया-किसनिया वैसा ही शब्द-युग्म था जैसे आज लता-आशा. क़न्नौज के मकनपुर ने जो नौटंकियां देखी हैं उनके आगे आज की नौटंकियां थूकने के क़ाबिल भी नहीं हैं, ये बात मैं नहीं बीस साल तक तिरमोहन की नौटंकी कंपनी मे फ़रहाद का रोल कर चुके जुम्मन क़साई का कहना है जो अब बस दुनिया की बरबादियों पर हिक़ारत से मुंह फेर लेते हैं.
बहरहाल लीजिये ्सुनिये कि आज जनसत्ता में अपने नियमित कॊलम ब्लॊगलिखी में अविनाश भाई ने क्या लिखा है...आवाज़ हमारे परम मित्र मुनीष की है जिन्हें आप अज़दक से बात करते हुए पहले यहीं सुन चुके हैं.
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