दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Sunday, March 27, 2016

नाहीं अंगना तोहार ओंजरार मितवा...


बस बैठे-बैठे अचानक आज न जाने क्यों नरेंद्र श्रीवास्तव की याद आ गयी। इलाहबाद यूनिवर्सिटी के छात्र जीवन में जिन बड़े ही रोचक व्यक्तियों की यादें अमिट हैं , नरेंद्र भाई उनमें से एक थे। कब और क्यों उनके साथ नियमित मुलाक़ातें होने लग गयी थीं अब याद नहीं आता लेकिन थोडा सा इसरार करते ही उनका गाने के लिए तैयार हो जाना बहुत अच्छी तरह याद है। खुद का लिखा बड़े मनोयोग से गाते थे, जबकि उस दौर में हम उनकी गायकी की शैली का मज़ाक़ भी बना लिया करते थे। फैज़ाबाद या रायबरेली से वो इलाहाबाद आये थे और हम लोगों से सीनियर ही थे लेकिन छोटे बड़े का एहसास उनके साथ कभी नहीं हुआ। दारागंज के जिस कमरे में वो रहते थे उसमें जाने का मुझे दो एक बार संयोग हुआ और उन्हें बहुत सादा जीवन जीता हुआ ही मैंने पाया। गर्मियों में भी उनको मोटे जूट के कमीज पतलून पहने देखा जा सकता था। एक खादी का थैला बग़ल में दबाए नरेंद्र भाई हॉस्टल आ जाते तो उनसे कुछ पत्रिकाएं हाथ लग जाती थीं और उनकी गवनई का आनद भी। ब्योरा तो नहीं याद पर बताते हैं बड़े ही नाटकीय घटनाक्रम में करीब बीस साल पहले उनका देहांत हुआ। शायद उनका कोई काव्य संग्रह भी मौजूद हो लेकिन संतोष होता है कि मेरे पास उनके उस गीत की रिकॉर्डिंग है जो उनकी पहचान सा बन गया था।

Thursday, March 26, 2015

Saturday, April 19, 2008

अज़ान: मानव-कंठ का संगीत


कल भाई अज़दक के ज़ख़ीरे से कुछ और संगीत सुन रहा था तो उसमें आज़ान का यह ट्रैक मिला. इसमें विवरण इस प्रकार लिखा है-

Turkey:The Sacred Quran
Azhan(Calling to Prayer)
Artist: Islamic chants of the Ottoman
Album title: Best world sounds 100 6CD-Box
Dur: 06:03

Friday, April 18, 2008

निस्तब्ध खडी हूँ मैं!


यारों ये गाना किसने बनाया है? बताएँ और मेरी जानकारी बढाएँ.

Thursday, April 17, 2008

डीजे वकील की दलील!


एक सरसरी नज़र डालिये कुछ गानों पर।

Monday, April 14, 2008

Its a male-male world और बप्पी लहरी की लीद


दिल्ली के पंचशील कमर्शियल सेंटर में यूटीवी का डबिंग डिवीज़न है जहाँ नेशनल ज्योग्रफिक चैनेल, द हिस्ट्री चैनेल, हंगामा, बिंदास वग़ैरह चैनलों के लिये विदेशी भाषाओं से हिंदी में डबिंग होती है. काम जब तक मज़ेदार लगता है, यार लोग मज़े लेकर काम करते हैं और जब चटने लगते हैं तो बाहर ऐसी महफिलें जम उठती हैं. अब ये महफिलें रेयर हैं वरना डबिंग डायरेक्टर, साउंड इंजीनियर और वॉयस ओवर आर्टिस्ट्स समेत मैनेजर और दूसरे विभागों के लोग भी शामिल हो जाया करते थे. तीन साल पुरानी ये रिकॉर्डिंग ऐसी ही एक शाम की झलक देती है. तब राजदीप भी थे.

Saturday, December 29, 2007

एक ही जैसे दु:खद प्रसंग हैं...



...आइये सुनें मशहूर पाकिस्तानी शायरा फ़हमीदा रेयाज़ की एक और नज़्म.


नोट: साल के इन बचे हुए दिनों में टूटी हुई बिखरी हुई पर बस यही होगा.

वो लड़की

Monday, October 29, 2007

ब्लॊगलिखी की पॊडलिखी


काग़ज़ पर छपे हुए शब्दों से ब्लॊग पर छपे शब्दों तक बहुत कुछ है जिस पर कभी हमारी नज़र पड़ती है तो कभी नहीं. इधर हिंदी ब्लॊग्स में थोड़ी हलचल शुरू हुई तो प्रिंट पब्लिकेशंस का ध्यान इस ओर भी गया.आज कोई आधा दर्जन महत्वपूर्ण प्रिंट पब्लिकेशंस ब्लॊग्स राउंड अप छाप रहे हैं. अपने अविनाश भाई के जी की जलन तो प्रिंट से लेकर ब्लॊग तक और टीवी से लेकर पॊडकास्ट तक, बुझाए नहीं बुझती.
सच है ऐसी ही रेस्टलेस सोल्स बिगड़ी बनाती हैं.

वो जनसत्ता में भी इधर कुछ हफ़्तों से ये बताने में लगे हैं कि ब्लॊग कितने कमाल का माध्यम है. मुझे भी यह रोग उन्होंने ही लगाया है. मैं उनका आभारी हूं और यह पोस्ट उनके उपकारों के प्रति एक श्रंद्धांजलि भी है.


तो भाइयो पेश है अविनाश जी की ब्लॊगलिखी की पॊडलिखी. इसलिये कि इंग्लैंड में बैठे अनामदास और कनाडा में रहे उड़न तश्तरी के लिये तो छोडिये लखनऊ में भाई प्रभात और हल्द्वानी में भाई अशोक तक नहीं जान सके होंगे कि आज जनसत्ता में क्या ब्लॊग राउंड अप क्या छपा. और इससे भी बड़ी बात यह है कि यह अविनाश जी का लिखा एक ऐसा लेख है जिससे गुज़रे ज़माने के मेलों की संस्कृति का एक झरोखा हम पर खुलता है. मैं जब स्कूल में था तो हमें सोनपुर के मेले से जुड़ा एक पाठ पढ़ाया जाता था. सो जब बिहार पहुंचा तो उसी साल पड़े सोनपुर के मेले में जा धमका. इस मेले की मेरी भी कई रोमांचक स्मृतियां है. सुनिये और कहिये क्या ये सिर्फ़ ब्लॊगलिखी है या ब्लॊग्स से उनकी अपेक्षाओं का आईना भी?
विवरण में बस एक सुधार यह है कि मैंने अफ़लातून भाई की मांग पर ठीक वही गीत नहीं बल्कि उसी के पासपड़ोस का गीत पेश किया था.
रही बात नौटंकी की, तो मैं अभी पिछले हफ़्ते नौटंकी की ज़मीन से होकर ही लौटा हूं. कहते हैं कि गुलाब बाई की शोहरत के नीचे नंबरादार, तिर्मोहन, बांके और परसुराम भी दब गये. आप गुलाबबाई को तो जानते हैं लेकिन कृष्णाबाई को नहीं. जबकि गुलबिया-किसनिया वैसा ही शब्द-युग्म था जैसे आज लता-आशा. क़न्नौज के मकनपुर ने जो नौटंकियां देखी हैं उनके आगे आज की नौटंकियां थूकने के क़ाबिल भी नहीं हैं, ये बात मैं नहीं बीस साल तक तिरमोहन की नौटंकी कंपनी मे फ़रहाद का रोल कर चुके जुम्मन क़साई का कहना है जो अब बस दुनिया की बरबादियों पर हिक़ारत से मुंह फेर लेते हैं.

बहरहाल लीजिये ्सुनिये कि आज जनसत्ता में अपने नियमित कॊलम ब्लॊगलिखी में अविनाश भाई ने क्या लिखा है...आवाज़ हमारे परम मित्र मुनीष की है जिन्हें आप अज़दक से बात करते हुए पहले यहीं सुन चुके हैं.