ये शब्द हैं उस नाटक के मुख्य पात्र भगवान के, जो भारत रंग महोत्सव, दिल्ली में कल शाम खेला जाएगा और आप में से ज़्यादातर लोग इस अभूतपूर्व नाटक को नहीं देख सकेंगे.नाटक है इल्हाम और इसे लेकर आया है बंबई का एक थियेटर ग्रुप. मानव कौल नाम के युवा अभिनेता और नाटककार की यह रचना कई मायनों में यह हक़ रखती है कि आप इसे देखें और उन बदक़िस्मत लोगों में न गिने जाएँ जिन्हें अपनी तीन-तिकडमों से फुर्सत नहीं मिलती.हालाँकि दिल्ली का थियेटर सीन पिछ्ले कुछ बरसों से ऐसा नहीं रह गया हि कि कोई नाटक रिकमंड किया जाय. ख़ासकर एनएसडी ने जिस तरह संसाधनों और अपनी प्रिविलेज्ड पोज़ीशन का दुरुपयोग जारी रखा है उससे और भी मन खट्टा होता है.आपमें से जिन कई लोगों ने नाट्य सभागारों से मुँह फेर लिया है उसकी वजह भी यही सुनी जाती है कि स्कूल के नाटक संस्कृत और अंग्रेज़ी नाटकों के हज़ार बार फचीटे हुए एडैप्टेशंस हैं और उनमें समय के प्रश्न नहीं उठाए जाते.ये लोग जब इन बासी क्लासिकी प्रस्तुतियों से थक जाते हैं तो मदारी के करतब और गिमिक शुरू कर देते हैं. इस माहौल में इल्हाम एक बिल्कुल नई- समय के प्रश्नों और अद्यतन संवेदनाओं से पगी प्रस्तुति है.
यह एक मध्यवय के बैंक कर्मचारी की कहानी है. इसका नाम है-भगवान. भगवान उम्र के इस पडाव पर अपने होने के सवालों से जूझ रहा है. उसके इर्द-गिर्द मौजूद दुनिया, अपनी ही रफ़्तार में चली जा रही है जबकि उसे लगने लगता है कि वह उस रफ्तार में और अधिक अकेला होता जा रहा है.
"भीतर पानी साफ था...साफ़ ठंडा पानी...कुएँ की तरह. जब हम पैदा हुए थे...जैसे-जैसे हम बडे होते गये...हमने अपने कुएँ में खिलौने फेंके,शब्द फेंके, किताबें, लोगों की अपेक्षाओं जैसे भारी पत्थर और इंसान जैसा जीने के ढेरों खाँचे...और अब जब हमारे कुएँ में पानी की जगह नहीं बची है तो हम कहते हैं ये तो सामान्य बात है."
इस तरह भगवान सामान्य हो चली चीज़ों पर संदेह और यूँ होता तो क्या होता की एक सतत क़वायद में है. वह अपने बैंक में पेंशन लेने आनेवाली एक बूढी औरत को हर बार पाँच सौ रुपये ज़्यादा दे देता है क्योंकि उसने उसकी आह सुनी है. कहानी में हम भगवान को अक्सर देर से घर लौटते देखते हैं और बताया जाता है कि वह आजकल बैंक के पास ही एक पार्क में बैठता है, जहाँ बहुत से बच्चों को वो कहानियाँ सुनाता है, एक चाचा से बातें करता है और रोने जैसी धुनों पर नाचता है. इधर कई दिनों से वो घर नहीं लौटा है क्योंकि उसे डर है-
"...तृप्ति का डर...हाँ तृप्त हो जाने का डर...पापा कह रहे थे कि वो तृप्त हैं.जिस तृप्ति में सारी वजहें,इच्छाएँ ख़त्म हो जाती हैं.वो कह रहे थे -कोई भी वजह नहीं बची है...सिवाय एक वजह के कि मुझे वापस घर आना है...रोज़..."
भगवान अपने इर्द-गिर्द की ख़ूबसूरती पर भी हैरान है-
"...पर हम क्या करेंगे इतनी ख़ूबसूरती का...मैं कभी-कभी अपना सबसे ख़ूबसूरत सपना याद करता हूँ...मेरा सबसे ख़ूबसूरत सपना भी कभी बहुत ख़ूबसूरत नहीं था.मेरे सपने भी थोडी सी ख़ुशी में, बहुत सारे सुख चुगने जैसे हैं. जैसे कोई चिडिया अपना खाना चुगती है...पर जब उसे पूरी रोटी मिलती है तो भी वह उस पूरी रोटी को नहीं खाती...वो उस रोटी में से रोटी चुग रही होती है. बहुत बडे आकाश में हम अपने हिस्से का आकाश चुग लेते हैं...देखने के लिये हम बडा खूबसूरत आसमान देख सकते हैं पर जीने के लिये हम उतना ही आकाश जी पाएँगे जितने आकाश को हमने अपनी खिडकी से जीना सीखा है."
बदलते दौर में ये सब बातें तेज़ी से पागलपन की निशानी मानी जाने लगी हैं. अगर आप 'तृप्ति प्राप्त करने की होड' से बाहर हैं तो आपको विमहैंस का दरवाज़ा दिखाया जाएगा.
नाटक में कुमुद मिश्रा भगवान की भूमिका बडी ही सूझबूझ से निभा रहे हैं जबकि हर अभिनेता अपनी ख़ास उपस्थिति दर्ज कराता है. सेट्स बहुत सादा हैं और इसके सभी नाटकीय तत्व कथ्य को गरिमा देते हैं. जब तक मानव कौल जैसे लेखक-निर्देशक हैं तब तक हम जैसे लोग नाटक से निराश हो-होकर वापस आएँगे.
एक बेहद असहज करने वाला यह सर्वथा प्रासंगिक नाटक कल शाम देखा जा रहा होगा.
इल्हाम
एनएसडी का भारत रंग महोत्सव
17 जनवरी 2008
स्थान: बहुमुख, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भगवानदास रोड, मंडी हाउस, नई दिल्ली (मेट्रो स्टेशन भी है)
शाम: छः बजे
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...कौन सी दुनिया इंतज़ार कर रही है
उन दरवाज़ों के उस तरफ़ जिन्हें
मैं कभी खोल नहीं पाया...
तभी मैंने एक अजीब सी चीज़ देखी
मैंने देखा मेरे माथे पर कुछ रेखाएँ बढ गयी हैं..अचानक...
अब ये रेखाएँ क्या हैं...क्या इनकी भी कोई नियति है अपने दरवाज़े हैं?...
नहीं...इनका कुछ भी नहीं है ये मौन की रेखाएँ हैं
मौन उन रेखाओं का जो मेरे हाथों में उभरी थीं
पर मैं उनके दरवाज़े कभी खोल ही नहीं पाया
सच ...मैने देखा है जब भी कोई रेखा मेरे हाथों से ग़ायब हुई है
मैने उसका मौन अपने माथे पर महसूस किया है.
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-नाटक "इल्हाम "से