दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Sunday, November 13, 2011

शोहरत एक क़िस्म का मर्ज़ भी है...


मोईन अख़्तर: आपने इंडस्ट्री को जहां अपनी अदाकारी के बेहतरीन नमूने पेश किये, वहां आपने सबसे उम्दा बात ये बताई कि इंसान को महज़ एक्टर ही नहीं रहना चाहिये बल्कि उम्दा और मुकम्मल इंसान होते हुए इंसानियत की ख़िदमत करना चाहिए...तो मैं ये पूछना चाहूंगा कि इस तरफ़ आपका ध्यान कैसे आया कि आप इतने डेडिकेटेड हो गये हैं कि चैरिटी शोज़ के लिये पूरी दुनिया में वक़्त निकालते जाते हैं.

दिलीप कुमार :आपके सवाल में ही आपके सवाल का जवाब छुपा हुआ है.
फ़िल्म में नाम और शोहरत जो मिलती है... और ख़ास तौर से कमउमर लोगों को, उमररसीदा लोगों को भी मिल जाय...तो वो भी अपने हवास खो बैठते हैं.
शोहरत एक क़िस्म का मर्ज़ भी है. फ़िल्म फ़ेम, फ़िल्म ग्लैमर...ये देखने में तो बहुत चमकता-दमकता सिलसिला है जिससे आंखें चौंध जाती हैं लोगों की लेकिन इसके पीछे कुछ ऐसे अमराज़ हैं जो इंसान के दिमाग़ में उसकी सेहत में नश्र-ओ-नुमा होती हैं. आपने देखा होगा मर्लिन मनरो इतनी शोहरत पाने के बावजूद ज़हर खाके उसने अपनी जान ले ली. हमारे साथी थे हमारे अज़ीज़ दोस्त गुरुदत्त साहब ने भी...मेरे दोस्त थे लेकिन आम तौर पर वो अपनी शोहरत से ही इस क़दर ख़ाएफ़ और मुतास्सिर थे...उन्हों ने भी ज़हर खाके जान दी. ज़मीन से पांव उठ जाते हैं आपने देखा होगा फ़िल्मों में अक्सर लोग जब शोहरत पाते हैं, आते जाते ऐसा लगता है कि ये ज़मीन की सतह से ज़रा ऊपर हवा-हवा में चल रहे हैं और उसके साथ उनका ज़ेहन और उनका दमाग़...(उन्हें) चाहिये कि ज़मीन के ऊपर उनका पांव जमा रहे और ज़मीन से लगा रहे. इंसानियत के मरकज़ से और उन क़द्रों से इंसान हटे नहीं, अपनी शोहरत से ख़ुद ही मुतास्सिर न हो जाये."
इसलिये मैंने तो अपने तो अपने मर्ज़ के इलाज में मदावा किया उसका कि मैं जो हूं जाके अंधों की एसोसिएशन जो है उनकी इम्दाद की या मेंटली रिटार्डेड जो बच्चे हैं उनकी इम्दाद के लिये मैं उसमें शामिल हो गया. अंधों को देखकर आपको ये एहसास होगा जब अंधा बच्चा आपको देखता है, आपकी बातें सुनता है. आप सोचते हैं कि अल्लाहमियां ने मुझको आंखें दी हैं...कोई धड़ कटा हुआ है किसी बच्चे का, वो टोकरी में बैठा हुआ है, हंस-हंस के बात कर रहा है...इंसान को ख़ुदा का ख़ौफ़ दिल में पैदा होता है और इस बात का एहसास होता है कि नहीं...इंसानी जज़्बा बरक़रार रहे...ये इब्तेदा थी, धीरे-धीरे बात का बतंगड़ बनता गया और जहां इस तरह का कोई सिलसिला हो, मैं चला जाता था, मेरा यहां भी आना उसी से वाबस्ता है.