मोईन अख़्तर: आपने इंडस्ट्री को जहां अपनी अदाकारी के बेहतरीन नमूने पेश किये, वहां आपने सबसे उम्दा बात ये बताई कि इंसान को महज़ एक्टर ही नहीं रहना चाहिये बल्कि उम्दा और मुकम्मल इंसान होते हुए इंसानियत की ख़िदमत करना चाहिए...तो मैं ये पूछना चाहूंगा कि इस तरफ़ आपका ध्यान कैसे आया कि आप इतने डेडिकेटेड हो गये हैं कि चैरिटी शोज़ के लिये पूरी दुनिया में वक़्त निकालते जाते हैं.
दिलीप कुमार :आपके सवाल में ही आपके सवाल का जवाब छुपा हुआ है.
फ़िल्म में नाम और शोहरत जो मिलती है... और ख़ास तौर से कमउमर लोगों को, उमररसीदा लोगों को भी मिल जाय...तो वो भी अपने हवास खो बैठते हैं.
इसलिये मैंने तो अपने तो अपने मर्ज़ के इलाज में मदावा किया उसका कि मैं जो हूं जाके अंधों की एसोसिएशन जो है उनकी इम्दाद की या मेंटली रिटार्डेड जो बच्चे हैं उनकी इम्दाद के लिये मैं उसमें शामिल हो गया. अंधों को देखकर आपको ये एहसास होगा जब अंधा बच्चा आपको देखता है, आपकी बातें सुनता है. आप सोचते हैं कि अल्लाहमियां ने मुझको आंखें दी हैं...कोई धड़ कटा हुआ है किसी बच्चे का, वो टोकरी में बैठा हुआ है, हंस-हंस के बात कर रहा है...इंसान को ख़ुदा का ख़ौफ़ दिल में पैदा होता है और इस बात का एहसास होता है कि नहीं...इंसानी जज़्बा बरक़रार रहे...ये इब्तेदा थी, धीरे-धीरे बात का बतंगड़ बनता गया और जहां इस तरह का कोई सिलसिला हो, मैं चला जाता था, मेरा यहां भी आना उसी से वाबस्ता है.