दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Wednesday, June 13, 2007

भरे प्यालों की ऊब



वे पेट पीट रहे हैं
तुम गोटें पीट रहे हो
वे कंद-मूल खोद रहे हैं
तुम भाषा की जडें खोद रहे हो !

उन की घुटन में राम को पुकारा जाता है
और तुम्हारी घुटन में
राम को, हुक्काम को, इस उस तमाम को
काग़ज़ी दंगल में पछाडा जाता है.

उन का हुलास
उन की सूखी फ़सल के साथ डूब गया है

तुम्हारा हुलास
तुम्हारे फिर-फिर भरते प्यालों के साथ ऊब गया है.

उन का दुख? वे छिपा सकते तो छिपा जाते
पर वह उन के चेहरे की झुर्रियों में अंका हुआ है.
तुम्हारा दुख? तुम छपा सको तो छ्पा लोगे
यों भी वह तुम्हारी आस्तीन पर टंका हुआ है.

वे जन हैं--जो अपने को नागरिक भी नहीं जानते,
तुम नागरिक, नागर, जो अपने को जनकवि हो मानते.

धर्म = शून्य


धरम का दिन है- छुट्टी करो. धरम का दिन है -आज कोई काम मत करो! धरम का दिन है- आज तो भगवान ने भी विश्राम किया था !
अर्थात ? धर्म = अकर्मण्यता !
इतना ही क्यों ? जब भगवान भी विश्राम करते हैं तो धर्म भी कहां रहा- उसका चक्र भी तो थमा हुआ है !
अतः धर्म = शून्य !!

Monday, June 11, 2007

अश्क का दश्क


उपन्यासकार ओपिन्द्रानाथ अश्क
हिन्दी उचार्नों की करते रहे मश्क
घूम आये दूर-दूर
देस लौटे थके चूर
ग़लत, हाय! गल्त रहा बीत गया दश्क !

Sunday, June 10, 2007

Humpty dumpty हिंदी में




डीवार पर बोइठा ठा हम्प्टी-डम्प्टी,


गिरा अउर टूट गिया, इडर जास्टी उडर कम्प्टी,


राजा बोला: "मुर्डे को माफ़ क्रो


बट रास्टा जल्डी साफ़ क्रो--


मेक श्योर हाइवे पर ट्राफ़िक नेई ठम्प्टी !