
वे पेट पीट रहे हैं
तुम गोटें पीट रहे हो
वे कंद-मूल खोद रहे हैं
तुम भाषा की जडें खोद रहे हो !
उन की घुटन में राम को पुकारा जाता है
और तुम्हारी घुटन में
राम को, हुक्काम को, इस उस तमाम को
काग़ज़ी दंगल में पछाडा जाता है.
उन का हुलास
उन की सूखी फ़सल के साथ डूब गया है
तुम्हारा हुलास
तुम्हारे फिर-फिर भरते प्यालों के साथ ऊब गया है.
उन का दुख? वे छिपा सकते तो छिपा जाते
पर वह उन के चेहरे की झुर्रियों में अंका हुआ है.
तुम्हारा दुख? तुम छपा सको तो छ्पा लोगे
यों भी वह तुम्हारी आस्तीन पर टंका हुआ है.
वे जन हैं--जो अपने को नागरिक भी नहीं जानते,
तुम नागरिक, नागर, जो अपने को जनकवि हो मानते.


