दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Monday, January 13, 2014

नया साल

नये साल, न आना हमारे घर हम एक प्रेतलोक की प्रतिध्वनियां हैं छोड़ दिया है हमें लोगों ने हमें रात और अतीत निकल चुके हैं हमारे हाथों से नियति ने भुला दिया है हमें कोई प्रतीक्षा नहीं, न कोई उम्मीद हमारे पास न कोई स्मृति है, न कोई सपना. हमारे शांत चेहरे खो चुके हैं अपना रंग अपनी दमक. नाज़िक अल-मलैका अरबी कवयित्री, बग़दाद (शेष कुछ और अंश) ... नये साल चलते रहो कोई गुंजाइश नहीं है हमारे जागने की सरकंडे की बनी हैं हमारी नसें क्रोध ने छोड़ दिया है बहना हमारे खून में.