दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Sunday, January 27, 2008

ज़ाहिर का 'ज' और पिज्जा का 'ज़' उर्फ़ तेरा नुक़्ता नुक़्तेबाज़ी -मेरा नुक़्ता ट्रेंडी

एक बार एक आदमी जंगल से गुज़र रहा था. रास्ते में उसे बहुत ज़ोर की प्यास लगी. थोडी दूर चलने पर उसे एक कुटिया दिखाई दी. कुटिया के पास पहुँच कर उसने आवाज़ लगाई तो संसार से निर्लिप्त एक साधूबाबा बाहर आए. आदमी ने उनसे पानी माँगा. साधूबाबा ने आदमी से बैठने को कहा और स्वयं भी आसन ग्रहण किया.
अब साधूबाबा आदमी को पानी की उत्पत्ति, उससे जुडी मिथकीय मान्यताओं, पानी के अनुष्ठान, पानी का प्रागैतिहास, आधुनिक पानी की प्रासंगिकता, पानी की प्राचीनता, पानी के बारे में पाणिनि और चरक-सुश्रुत और ओशो के विचार बताते रहे. वे और भी बहुत कुछ बताते रहे लेकिन आदमी ध्यान से सुन नहीं पा रहा था क्योंकि पानी की कमी से उसकी चेतना साथ नहीं दे रही थी. अंत में साधू ने यह कहकर आदमी को पानी देने से इंकार कर दिया कि पानी माँगने से पहले पानी का इतिहास जानना ज़रूरी है.

लता मंगेश्कर एक पुरानी गायिका हैं और उनके गाये गीतों में शब्दों का उच्चारण सटीक होता है. वे किसी मुसलमानी बिंदी को साथ में लेकर पैदा नहीं हुई हैं. वे हिंदी-उर्दू की गंगा पट्टी में भी पैदा नहीं हुईं है. कृपया बताएँ कि वे अपने भाषिक उच्चारण को लेकर इतनी सचेत क्यों रहती हैं? अस्सी के दशक तक लगभग सभी गायक-गायिकाएँ भाषा का सौंदर्य बरक़रार रखते आए हैं और व्यापक लोग उनके उच्चारण से सीखते हैं और बोल भले न पाते हों सही और ग़लत का भेद कर लेते हैं. दिनमान में शमशेर बहादुर सिंह देवनागरी में उर्दू के पाठ क्यों लिखते रहे जिन्हें रघुवीर सहाय धारावाहिक अध्यायों के रूप में लंबे समय तक छापते रहे? क्यों बडे-बडे बाबू साहब लोग एक ज़माने तक अपने दुलरुओं को तवायफ़ों के पास तहज़ीब और तलफ़्फ़ुज़ सीखने के लिये भेजते रहे?

असल में समय गुज़रने के साथ भाषिक सौंदर्य मुसलमानों के साथ जोड दिया गया है जबकि मार खाया और भगाया हुआ मुसलमान भी कैसी भाषा बोल सकता है...यारों को अब नुक़्ते का इस्तेमाल नुक़्तेबाज़ी लगता है और इसी लिये महान सूफ़ी गायक कैलाश खेर का पहला ही हिट गाना टूटा-टूटा एक परिदा ऐसे टूटा कि फ़िर जुड न पाया...एडिटिंग टेबल से फ़ाइनल होकर बाज़ार में पहुँच जाता है. आप जानते हैं कि म्यूज़िक कुक करना एक टाइमटेकिंग प्रॉसेस है और वह किसी एक आदमी की व्हिम पर नहीं चलता. उदाहरण के लिये आप गायत्री मंत्र की सीडी कुक कर रहे हों तो आप संस्कृत की अदायगी ठीक हुई है या नहीं इस पर जानकारों की राय ले लेते हैं. कैलाश खेर या उनके समकालीनों के केस में अब या तो जानकार हैं नहीं या फिर राय लेने ज़रूरत नहीं समझी जाती ...और जिस तरह की दलीलें यहाँ ब्लॉग विमर्श में सुन रहा हूँ उससे तो यही लगता है कि ख़ामियों को छुपाने के सुविधाजनक तर्क गढे जा रहे हैं. बक़ौल अजित "एक हिन्दी चैनल के कर्ता-धर्ता जो अक्सर एंकरिंग करने लगते हैं, बार-बार दोनो हथेलियों को रगड़ते हुए ज़ाहिर को जाहिर है, जाहिर है बोलते चले जाने की वजह से काफी शोहरत पा चुके हैं।" वे ज़ भले ही ज़ाहिर बोलते हुए बोलना न चाहें क्योंकि वह मुसलमानी बिंदी है लेकिन पिज़्ज़ा ज़रूर बोल लेते हैं. कभी आपने किसी ग़ैरनुक़्तेबाज़ को Pijja बोलते हुए सुना है?

Wednesday, January 23, 2008

यूँ तो आप मानेंगे नहीं लेकिन फिर भी कहता हूँ


यारों को ग़लत लिखने में अब कोई शर्म नहीं आती और जगह-बेजगह नुक़्तेबाज़ी करते हैं. नुक़्ता कहाँ हो, कहाँ न हो इस पर पहले भी ब्लॉगमहोपाध्यायों ने विचार किया है और आगे भी उन्हें कौन रोक सकता है!

दिल्ली का एक एफ़एम रेडियो-जॉकी नुक़्ते के मारों का दर्द समझते हुए उनका मनोबल बढाता है. उसी के शब्दों में-"मैं नुक्ते आपकी तरफ उछालता हूँ, जहाँ मर्जी आये लगा लीजियेगा."
यहाँ बीबीसी की तरफ़ से अचला शर्मा द्वारा संचालित एक पुस्तक से परिशिष्ट पेश कर रहा हूँ शायद काम आए.बडा करके देखने के लिये यहाँ मौजूद पृष्ठ की छवि पर दो बार क्लिक करें.