मुनीश external services division की हिंदी सेवा के एक युवा ब्रॉड्कास्टर हैं और दिल्ली में रहते हैं.देशी-विदेशी फ़िल्मों और साहित्य के अलावा उन्हें सैर और शराब का ख़ासा शौक़ है.अभिनय वे स्वाभाविक रूप से करते हैं-मंच पर और मंच से परे भी.हमारी दोस्ती की वजह यह सहमति है कि आजकल-शान के लोग दुनिया में कम रह गये,
एक तुम रह गये एक हम रह गये.
अज़दक के बारे में आप जो जानते हैं, उससे अलग बस इतना कहूंगा कि तेइस साल पहले मेरी उनसे मुलाक़ात हुई थी.( उसी दौर की उनकी एक तस्वीर यहां पेश कर रहा हूं) इलाहाबाद की सांस्कृतिक हलचलों के बीच मैंने उनसे बहुत कुछ सीखने की कोशिश की है और आज भी कर रहा हूं. लंबे समय तक विमलभाई और प्रमोदभाई(पढ़ें अज़दक) का इलाहाबाद के सोहबतिया बाग़ का कमरा मेरा दूसरा घर रहा. गर्मियों की कई ख़ामोश दोपहरें याद करूं तो याद आता है साइकिल चलाते हुए मेरा सोबतिया बाग़ पहुंचना. आज सोचूं तो लगता है कि कोई और जगह थी, कोई और जनम थाजहां मैं इतना चार्ज्ड माहौल पाया करता था. और सोचूं कि क्या मुझे विमलभाई-प्रमोदभाई के डेरे पहुंचने में कोई प्रयास करना होता था? क्या मैं आंख मूंदकर भी साइकिल चलाऊं तो सोबतिया बाग़ नहीं पहुंच सकता था? विमलभाई-प्रमोदभाई नाम युग्म कुछ अब्दुलभाई-सत्तारभाई इतरवाले या राजन-साजन मिश्र जैसा लगता है.इस बातचीत के दौरान मुझे कई बार इलाहाबाद फ़िल्म सोसायटी में साथ-साथ फ़िल्में देखने के बाद यूनिवर्सिटी रोड पर चाय टकराते हुए हुई सरगर्म चर्चाएं याद हो आई.बहरहाल, आपको अपनी भावुकता(ऐसा ही प्रमोदभाई कहते हैं)से बोर नहीं करते हुए छोड़ता हूं इस बातचीत के साथ.
Recorded on 5th October 2007, 7:30PM, New Delhi
============================
============================
============================
============================
============================
============================