इनमें से एक हैं सुप्रकाश नाथ। 33 वर्षीय सुप्रकाश पिछले पाँच साल से दिल्ली में हैं। वो बंगाल के 24 परगना में काँचरापाडा के रहने वाले हैं। कला की कोई औपचारिक शिक्षा उन्होंने नहीं ली है और वो उनमें से हैं जिन्हें सेल्फ़ टॉट कहा जाता है. सुप्रकाश रंगों और आकृतियों के माहिर खिलाडी हैं और दिल्ली आते ही उनकी इस एक्सपर्टीज़ को ब्रेक मिला एक बॉलीवुड के एक जाने-माने अभिनेता के दामाद द्वारा. सुप्रकाश को इन दामाद महोदय की जींस पर कलाकृतियाँ बनानी थीं और ये काम उन्हें उनके घर या वर्कशॉप पर ही करना था. इस काम को सुप्रकाश ने ऐसे जादुई ढंग से किया कि ये डिज़ाइनर जींसें टॉक ऑफ़ द टाउन बन गईं. सुप्रकाश का मन न तो तब इस काम में लगता था और न अब लगता है. उन्हें तो मौलिक अमूर्त चित्रों में अपनी दुनियाँ उकेरनी है और अब वो इस काम में जुट भी गये हैं. बहरहाल शुरुआती दिनों में एक्ज़िस्टेंस की लडाई में जो काम हाथ आया था उसने सुप्रकाश को इतनी ही मदद की कि उन्हें हारकर वापस बंगाल नहीं जाना पडा. भाषा आज भी उनके व्यावसायिक संघर्ष में बाधा है और वो ख़ुद को वैसे नहीं बेच पाते जैसे दिल्ली के औसत प्रतिभा वाले आंतर्प्रेन्योर्स बेचकर अँगूठा दिखाते हुए आगे बढते जाते हैं. इस बीच इतना ज़रूर हुआ है कि दामाद के साथ डिज़ाइनर जींस बनाने का जो काम शुरू हुआ था उसे शोहरत मिली है और उपरोक्त दामाद का कोई मित्र इस काम को एक एंटरप्राइज़ के तौर पर शुरू कर चुका है. पीनट्स ही सही इन लोगों को मिल जाते हैं जिनसे घर ख़र्च चलता रहता है और मौलिक करने की इच्छाएँ कोई रुकावट नहीं देखतीं. हाल ही में दिल्ली के ब्रिटानिया चौक पर सुप्रकाश और साथियों को म्यूरल्स और सजावट का दूसरा ठेका भी मिला जिसकी झलक अन्य तस्वीरों के साथ यहाँ पेश की जा रही है.ध्यान रहे कि तस्वीरों को सुप्रकाश अपनी प्रतिनिधि छवियाँ नहीं कहते.
