दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
Showing posts with label एमएस सुब्बालक्ष्मी. Show all posts
Showing posts with label एमएस सुब्बालक्ष्मी. Show all posts

Wednesday, August 13, 2008

क्यों खींचता है ये भजन बार-बार मुझे!


कोई साल भर पहले अपनी पसंद के संगीत की शृंखला में मैंने यह भजन आपसे शेयर किया था. पता नहीं क्यों आज फिर दिल कर रहा है कि इसे आपसे साझा करूँ. सुनिये-


Tuesday, September 11, 2007

मेरी पसंद के गीत- आठ

आज मैं इज़हार नहीं कर सकता कि पॉडकास्टिंग ने मुझे जो मौक़ा दिया है उससे मैं आप तक इस भजन को पहुंचा कर कितना खुश हूं.
जब तक मैंने एमएस की ये रचना नहीं सुनी थी तब तक मैं यही समझता था कि भक्ति की रागात्मकता घुरमा छूटने के साथ ही वहीं छूट गयी है. 1991 में अपने मद्रास प्रवास के दौरान भाई आर विद्यासागर के सानिध्य में थोड़ा सा कर्नाटक म्यूज़िक मेरे हिस्से में भी आया यानी कर्नाटक संगीत की दुनिया में मेरी खिड़की खुली.वहीं मुझे एम.एस.सुब्बुलक्ष्मी का यह भजन सुनने को मिला था और मेरे संग्रह में सहेजकर रखा हुआ है.
इस रचना के आनंद के बीच में मैं अपनी मूर्खतापूर्ण संगीत व्याख्याओ को लाकर आपकी गालियों का हिस्सेदार नहीं बनना चाहता इसलिये पेश करता हूं यह भजन.
बस इतना कहने से ख़ुद को नहीं रोक पा रहा हूं कि अगर इस क़िस्म की आराध्यरम्यता मैं स्वयं में विकसित कर पाऊं तो यक़ीन मानिये आज ही नास्तिकता की पटरी से उतर कर आस्तिकों की क़तार में खड़ा हो जाऊं. दिल पर हाथ रखकर कहिये कि माता के जागरणों-जगरातों में जो संगीत होता है, हमारे मंदिरों में कीर्तनों का जो रूप 'अब' जड़ें जमा चुका है और जिस ओउम भूर्भुव: स्व: की "महान" प्रातः श्रवणीय संगीत प्रस्तुति से पूरा हिंदी समाज अपना सीना फुलाए घूमता है, उसे इस रचना को सुनकर शर्मिंदा नहीं होना चाहिये?