इब्नबतूता का इंडिया ट्रैवेल शो - दो
कोल(अलीगढ) आने पर खबर मिली कि शहर से सात मील की दूरी पर जलाली नाम के क़स्बे के हिंदुओं ने बग़ावत कर दी है. वहां के लोग हिंदुओं का सामना तो कर रहे थे लेकिन अब उनकी जान पर आ बनी थी. हिंदुओं को हमारे आने की ख़बर न थी. हमने हमला कर के सभी हिंदुओं को मार डाला, यानी तीन हज़ार सवार और एक हज़ार पैदल को मार कर उनके घर और हथियार वग़ैरह सब क़ब्ज़े में ले लिये...इस वाक़ये की ख़बर सुल्तान को देकर हम जवाब के इंतज़ार में इसी शहर में ठहर गये.
पहाडों से निकलकर हिंदू रोज़ जलाली क़स्बे पर हमला किया करते थे और हमारी तरफ से भी 'अमीर' हम सब को साथ लेकर उनका सामना करने जाया करता था.
एक दिन मैं सबके साथ घोडों पर सवार होकर बाहर गया. गर्मियों का महीना, हम एक बाग़ में घुसे ही थे कि शोर सुनाई दिया और हम गांव की तरफ़ मुड पडे. इतने में कुछ हिंदू हमारे ऊपर आ टूटे. लेकिन जब हमने सामना किया तो उनके पांव न टिके. ये देख हमारे साथियों ने अलग-अलग दिशाओं में उनका पीछा करना शुरू किया. मेरे साथ उस वक़्त सिर्फ़ पांच आदमी थे. मैं भी भगेडुओं का पीछा कर रहा था कि अचानक एक झाडी में से निकल कर कुछ सवार और पदातियों ने मुझ पर हमला किया. गिनती में कम होने की वजह से हमने अब भागना शुरू कर दिया, दस आदमी हमारा पीछा कर रहे थे. हम बस तीन थे, ज़मीन पथरीली थी और राह दिखाई न देती थी.मेरे घोडे की अगली टांगें तक पत्थरों में अटक गईं. लाचार होकर मै नीचे उतरा, उसके पैर निकाले और फिर सवार होकर चला.
इस मुल्क में दो तलवारें रखने का रिवाज है. एक जीन में लटकाई जाती है जिसको 'रकाबी' कहते हैं और दूसरी कमर में लटकाई जाती है.
मैं कुछ ही आगे बढा था कि मेरी रकाबी म्यान से निकल कर गिर पडी. उसकी मूठ सोने की थी इसलिये मैं फिर नीचे उतरा और उसे ज़मीन से उठाकर जीन में रखा और चल पडा.दुश्मन मेरा पीछा अब भी कर रहे थे.मैं एक गड्ढा देख उसी में उतर गया और उनकी नज़रों से ओझल हो गया.
गड्ढे के बीच से एक राह जाती थी. यह न जानते हुए भी वो कहां को जाती है, मैं उसी पर हो लिया. लेकिन अभी कुछ ही दूर गया होऊंगा कि अचानक चालीस आदमियों ने मुझे घेर लिया, उनके हाथों में तीर-धनुष थे. मेरे बदन पर कवच नहीं था इसलिये मैं भागा नहीं वरना तीरों से मुझे छलनी कर दिया जाता. मैं ज़मीन पर लेट गया, ताकि वो जान जायें कि मैं उनका क़ैदी हूं. ऐसा करनेवाले को ये कभी नहीं मारते हैं. लबादा, पैजामा और क़मीज़ के अलावा ये मेरे सारे कपडे उतार कर मुझे एक झाडी के भीतर ले गये. इसी जगह पेडों से घिरे एक तालाब के किनारे ये ठहरे हुए थे.
यहां पहुंचकर इन्होंने मुझे उरद की रोटी दी. खाने के बाद मैने पानी पिया.
उनके साथ दो मुसलमान भी थे जिन्होने फ़ारसी ज़बान में मेरा तार्रुफ़ पूछा. मैंने अपने बारे में सब कुछ बता दिय लेकिन ये न बताया कि मैं सुल्तान का ख़ादिम हूं.
(आगे है अभी कि किस तरह इब्नबतूता को मौत की सज़ा सुनाई गयी.)
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Saturday, July 7, 2007
Friday, July 6, 2007
इब्नबतूता का इंडिया ट्रैवेल शो
बदाऊं में मैने दादा शेख़ फ़रीदउद्दीन बदाऊंनी की मज़ार पर ज़ेयारत की. दरगाह से लौटने पर देखता क्या हूं कि जिस जगह पर हमने ख़ेमे गाडे थे उस तरफ़ से लोग भागे चले आते हैं.इनमें हमारे आदमी भी थे. पूछ्ने पर उन्होंने बताया कि एक हिंदू मर गया है, चिता तैयार के गयी है और उसके साथ उसकी बीवी भी जलेगी. उन दोनों के जलाए जाने के बाद हमारे साथियों ने लौटकर कहा कि वो औरत तो लाश से चिपट कर जल गयी.
एक बार मैंने भी एक औरत को बनाव-सिनंगार किये घोडे पर चढ कर जाते हुए देखा था. हिंदू और मुसलमान इस औरत के पीछे चल रहे थे.आगे-आगे नौबत बजती जाती थी, और ब्राह्मण साथ-साथ थे. हाकिम की इजाज़त मिलने पर यह औरत जलाई गई.
एक वाक़या और याद आया. तब मैं 'अबरही' नगर में था, जहां के ज़्यादातर लोग हिंदू थे लेकिन हाकिम मुसलमान था. इस इलाक़े के कुछ हिंदू ऐसे थे जो हमेशा बादशाह की हुक्मउदूली किया करते थे. एक बार इन लोगों ने छापा मारा तो अमीर हिंदू-मुसलमानों को लेकर इनका सामना करने गया. लडाई हुई और हिंदू रियाया में से सात अफराद हलाक हुए. इनमें से तीन की औरतें भी थीं.और उन्होंने सती होने का इरादा ज़ाहिर किया.हिंदुओं में हर विधवा के लिये सती होना ज़रूरी नहीं है लेकिन शौहर के साथ औरत के जल जाने से खानदान की इज़्ज़त बढ जाती है. औरत को भी पतिव्रता गिना जाने लगता है. सती न होने पर विधवा को मोटे-मोटे कपडे पहनकर बेहद तकलीफ़ज़दा ज़िंदगी जीनी पडती है और उसे पतिपरायण भी नहीं समझा जाता.

हां, तो फिर इन तीनों औरतों ने तीन दिन तक ख़ूब गाया-बजाया और तरह-तरह के खाने खाये, जैसे ये दुनिया से विदा ले रही थीं.इनके इर्द-गिर्द चारों तरफ की औरतों का जमघट लगा रहता था. चौथे दिन इनके पास ग़्होडे लाये गये और ये तीनों बनाव-सिंगार कर, ख़ुशबुएं लगा कर तैयार हो गईं. उनके दाहिने हाथ में एक नारियल था, जिसको ये बराबर उछाल रही थीं और बाऎ हाथ में एक आईना था जिसमें ये अपना चेहरा देखती थीं. चारों तरफ ब्राहमणों और रिश्तेदारों की भीड लग रही थी. आगे-आगे नगाडे और नौबत बजती जाती थी. हर हिंदू आकर अपने मृत मां-बाप-भाई-बहन और नातेदारों-दोस्तों के लिये इनसे प्रणाम कहने को कह देता था और ये 'हां-हां' कहती और हंसती चली जाती थीं. मैं भी दोस्तों के साथ यह देखने को चल दिया कि ये किस तरह से जलती हैं. तीन कोस तक जाने के बाद हम एक ऐसी जगह पर पहुंचे जहां बहुत पानी था, घने पेड थे और इसलिये अंधेरा छाया हुआ था. यहां चार गुंबद बने थे और हरेक में एक-एक देवता की मूर्ति थी. इन चारों मंदिरों के बीच में एक ऐसा तालाब था जिस पर पेडों की घनी छाया होने की वजह से धूप नाम को भी न थी.
घने अंधेरे में ये जगह नरक जैसी लग रही थी. मंदिरों के पास पहुंचने पर ये औरतों नहाईं और इन्होंने कुंड में डुबकी लगाई. गहने और कपडे उतार कर रख दिये और उनकी जगह मोटी साडियां पहन लीं. कुंड के पास एक नीची जगह में आग दहकाई गई. सरसों का तेल डालने पर उसमें से ऊंची-ऊची लपटें निकलने लगीं. पंद्रह आदमियों के हाथ में लकडियों के गठ्ठे बंधे हुए थे और दस आदमी अपने हाथों में बडे-बडे लकडी के कुंदे लिये खडे थे. नगाडे-नौबत और शहनाई बजानेवाले औरतों के इंतज़ार में खडे थे. लोगों ने आग को एक रज़ाई की ओट में कर लिया था ताकि औरतों की नज़र उधर न पडे लेकिन इनमें से एक औरत ने रज़ाई को ज़बर्दस्ती खींचकर कहा कि क्या मैं जानती नहीं कि ये आग है, मुझे क्या डराते हो? इतना कहकर वो अग्नि को प्रणामकर फ़ौरन उसमें कूद पडी. बस नगाडे-ढोल-शहनाई और नौबत बजने लगी. आदमियों ने अपने हाथों की पतली लकडियां आग में डालनी शुरू कर दीं और फिर बडे-बडे कुंदे भी डाल दिये जिससे औरत की हरकत बंद हो जाये. वहां मौजूद लोग भी चिल्लाने लगे. मैं ये दिल दहलाने वाला मंज़र देखकर बेहोश हो घोडे से गिरने ही को था कि मेरे दोस्तों ने मुझे संभाल लिया और मेरा मुंह पानी से धुलवाया. आपे में आनेपर मैं वहां से लौट आया.
(इब्नबतूता की भारत यात्रा...पृष्ठ 25)
इब्नबतूता अरब देश से 14वीं शताब्दी में भारत आया था. भारत में मौलाना बदरुद्दीन और दूसरे पूर्वी देशों में शेख़ शम्सुद्दीन कहे जानेवाले इस इतिहास-प्रसिद्ध यायावर का असली नाम अबू अब्दुल्ला मोहम्मद था. ये जब 22 साल का था तो दुनिया की ख़ाक छानने निकल पडा था और लगातार 30 साल तक घूमता ही रहा था. उस ज़माने में कोई 75000 मील का सफर आसान न था एक बार तो भारतीय समुद्री डाकुओं ने उसे ऐसा लूटा कि उसकी कुछ महत्वपूर्ण पांडुलिपियां भी जाती रहीं. 73 साल की उम्र में वह अपने देश में ही मरा. दुनिया में वो घुमक्कडों का सुल्तान माना जाता है.
एक बार मैंने भी एक औरत को बनाव-सिनंगार किये घोडे पर चढ कर जाते हुए देखा था. हिंदू और मुसलमान इस औरत के पीछे चल रहे थे.आगे-आगे नौबत बजती जाती थी, और ब्राह्मण साथ-साथ थे. हाकिम की इजाज़त मिलने पर यह औरत जलाई गई.
एक वाक़या और याद आया. तब मैं 'अबरही' नगर में था, जहां के ज़्यादातर लोग हिंदू थे लेकिन हाकिम मुसलमान था. इस इलाक़े के कुछ हिंदू ऐसे थे जो हमेशा बादशाह की हुक्मउदूली किया करते थे. एक बार इन लोगों ने छापा मारा तो अमीर हिंदू-मुसलमानों को लेकर इनका सामना करने गया. लडाई हुई और हिंदू रियाया में से सात अफराद हलाक हुए. इनमें से तीन की औरतें भी थीं.और उन्होंने सती होने का इरादा ज़ाहिर किया.हिंदुओं में हर विधवा के लिये सती होना ज़रूरी नहीं है लेकिन शौहर के साथ औरत के जल जाने से खानदान की इज़्ज़त बढ जाती है. औरत को भी पतिव्रता गिना जाने लगता है. सती न होने पर विधवा को मोटे-मोटे कपडे पहनकर बेहद तकलीफ़ज़दा ज़िंदगी जीनी पडती है और उसे पतिपरायण भी नहीं समझा जाता.
हां, तो फिर इन तीनों औरतों ने तीन दिन तक ख़ूब गाया-बजाया और तरह-तरह के खाने खाये, जैसे ये दुनिया से विदा ले रही थीं.इनके इर्द-गिर्द चारों तरफ की औरतों का जमघट लगा रहता था. चौथे दिन इनके पास ग़्होडे लाये गये और ये तीनों बनाव-सिंगार कर, ख़ुशबुएं लगा कर तैयार हो गईं. उनके दाहिने हाथ में एक नारियल था, जिसको ये बराबर उछाल रही थीं और बाऎ हाथ में एक आईना था जिसमें ये अपना चेहरा देखती थीं. चारों तरफ ब्राहमणों और रिश्तेदारों की भीड लग रही थी. आगे-आगे नगाडे और नौबत बजती जाती थी. हर हिंदू आकर अपने मृत मां-बाप-भाई-बहन और नातेदारों-दोस्तों के लिये इनसे प्रणाम कहने को कह देता था और ये 'हां-हां' कहती और हंसती चली जाती थीं. मैं भी दोस्तों के साथ यह देखने को चल दिया कि ये किस तरह से जलती हैं. तीन कोस तक जाने के बाद हम एक ऐसी जगह पर पहुंचे जहां बहुत पानी था, घने पेड थे और इसलिये अंधेरा छाया हुआ था. यहां चार गुंबद बने थे और हरेक में एक-एक देवता की मूर्ति थी. इन चारों मंदिरों के बीच में एक ऐसा तालाब था जिस पर पेडों की घनी छाया होने की वजह से धूप नाम को भी न थी.
घने अंधेरे में ये जगह नरक जैसी लग रही थी. मंदिरों के पास पहुंचने पर ये औरतों नहाईं और इन्होंने कुंड में डुबकी लगाई. गहने और कपडे उतार कर रख दिये और उनकी जगह मोटी साडियां पहन लीं. कुंड के पास एक नीची जगह में आग दहकाई गई. सरसों का तेल डालने पर उसमें से ऊंची-ऊची लपटें निकलने लगीं. पंद्रह आदमियों के हाथ में लकडियों के गठ्ठे बंधे हुए थे और दस आदमी अपने हाथों में बडे-बडे लकडी के कुंदे लिये खडे थे. नगाडे-नौबत और शहनाई बजानेवाले औरतों के इंतज़ार में खडे थे. लोगों ने आग को एक रज़ाई की ओट में कर लिया था ताकि औरतों की नज़र उधर न पडे लेकिन इनमें से एक औरत ने रज़ाई को ज़बर्दस्ती खींचकर कहा कि क्या मैं जानती नहीं कि ये आग है, मुझे क्या डराते हो? इतना कहकर वो अग्नि को प्रणामकर फ़ौरन उसमें कूद पडी. बस नगाडे-ढोल-शहनाई और नौबत बजने लगी. आदमियों ने अपने हाथों की पतली लकडियां आग में डालनी शुरू कर दीं और फिर बडे-बडे कुंदे भी डाल दिये जिससे औरत की हरकत बंद हो जाये. वहां मौजूद लोग भी चिल्लाने लगे. मैं ये दिल दहलाने वाला मंज़र देखकर बेहोश हो घोडे से गिरने ही को था कि मेरे दोस्तों ने मुझे संभाल लिया और मेरा मुंह पानी से धुलवाया. आपे में आनेपर मैं वहां से लौट आया.
(इब्नबतूता की भारत यात्रा...पृष्ठ 25)
इब्नबतूता अरब देश से 14वीं शताब्दी में भारत आया था. भारत में मौलाना बदरुद्दीन और दूसरे पूर्वी देशों में शेख़ शम्सुद्दीन कहे जानेवाले इस इतिहास-प्रसिद्ध यायावर का असली नाम अबू अब्दुल्ला मोहम्मद था. ये जब 22 साल का था तो दुनिया की ख़ाक छानने निकल पडा था और लगातार 30 साल तक घूमता ही रहा था. उस ज़माने में कोई 75000 मील का सफर आसान न था एक बार तो भारतीय समुद्री डाकुओं ने उसे ऐसा लूटा कि उसकी कुछ महत्वपूर्ण पांडुलिपियां भी जाती रहीं. 73 साल की उम्र में वह अपने देश में ही मरा. दुनिया में वो घुमक्कडों का सुल्तान माना जाता है.
Monday, June 18, 2007
फूल का कहना सुनो

चार साल पहले मैंने कहानियों की एक किताब ले तो ली पर उसकी समीक्षा लिखके आज तक न दे सका. ऎसा मेरी काहिली से हुआ,ये मैं नहीं मानता. शायद इस काम से मिलनेवाले पैसों की बनिस्बत ज़्यादा पैसोंवाले काम को मैने तरजीह दी.इसका कोई मलाल भी नहीं है कि मैने समीक्षा क्यों नहीं लिखी; और सच तो यह है कि पृथ्वी को चन्द्रमा की कहानियां मेरे सौन्दर्यबोध का हिस्सा नहीं थीं इसलिये एक पाठ्यक्रमीय दबाव के तहत पढ तो गया लेकिन एक कॉंस्टेंट रेज़िस्टेंस बना हुआ था. बहरहाल अब उस वाक़ये को याद करने का अभी क्या तुक है.
इस संग्रह में एक बच्ची के ऑब्ज़र्वेशंस फूल का कहना सुनो नाम से दर्ज हैं और नौ उपशीर्षकों में उन्हें बांटा गया है. मैने अब तक इस किताब को ज़रूर ही किसी पढाकू पाठक के हवाले कर दिया होता. इसी फूल का कहना सुनो के लिये ये मेरे सरमाए का अब भी हिस्सा है. मैं चाहता हूं कि इसका एक टुकडा आप भी पढें. तो लीजिये पेश है-

बाज़ार में गुम तो गुम
घर से थोडी दूर पर किराना दुकान है. पर हमारे घर का सामान वहां से नहीं आता. हमारे घर का बहुत सा सामान वहां नहीं मिलता. वह दुकान कच्चे घरों के लिये है. मेन रोड तक बाहर निकलो तो और दुकानें हैं...उनसे और आगे बढो तो और दुकानें हैं. आगे बढते-बढते गोल बाज़ार पहुंच जाओ तो इतनी दुकानें हैं...इतनी दुकानें हैं कि उनके बीच घूमते-घूमते थक जाओ.
गोल बाज़ार से बाएं जाओ तो नवीन बाज़ार है. गोल बाज़ार से दाएं जाओ तो शास्त्री बाज़ार है. बाज़ार में ज़मीन की ओर उतरो तो भी दुकानें हैं...आकाश की ऊपर उठो तो भी दुकानें हैं...ओह! कितनी दुकानें! मुझे बाज़ार घूमना अच्छा लगता है.
शास्त्री बाज़ार में एक 'सुपर मार्केट' है- हम वहां से सामान ख़रीदते हैं. वहान सब मिलता है. वहां जाना मुझे अच्छा लगता है. वहान जाना मां को भी अच्छा लगता है. हम एक ट्रॉली ले लेते हैं और उसे धकेलते सामान के बीच गुज़रते हैं. मेरे दोनों तरफ़- मेरे सिर से ऊपर तक सामान होते हैं. मैं सामान से बनी सुरंग में होती हूं...रंग-बिरंगी सुरंग...
थोडी-थोडी देर में जिसकी ख़ुशबू बदल जाती है. मुझे सामान को देखने के लिये उचकना पडता है. कई बार वे अपने आप मेरे ऊपर गिरते हैं और मां हडबडा जाती हैं. वे ज़मीन से उठाकर उन्हें अपनी जगह जमाने लगाती हैं. दुकान का लड्का आसपास रहता है तो लपकता हुआ पास आता है. तब मां छोड देती हैं गिरे हुए सामान को और आगे बढ जाती हैं. पीछे दुकान का लड्का उन्हें तुरत-फुरत जमा देता है. ऎसा हर बार होता है कि 'सुपर मार्केट' में मेरे ऊपर सामान गिरते हैं. मां खीझती हैं, पर मैं क्या करूं? मैं उन्हें नहीं गिराती, वे अपने आप मेरे ऊपर गिरते हैं.
पापा मेरे साथ रहते हैं तो ऊपर के सामान को देखने के लिये मैं उनकी गोद में जा सकती हूं. मैं पापा की गोद में रहती हूं तो मेरा सिर उनके सिर से भी ऊपर आ जाता है. ऊपर से देखो तो सब बदल जाता है. नीचे से देखो - जैसा ऊपर से नहीं दिखता. पर ऊपर से देखो तो नीचे रखे सामान नहीं दिखते--साफ़-साफ़, इसीलिये मां को नीचे झुकना पडता है. वे जब झुकती हैं, शर्माते हुए झुकती हैं. वे सामान को हाथ से उठाकर ऊपर लाती हैं- अपनी ऊंचाई तक, फिर उसे देखती हैं ग़ौर से. क़ीमत देखती हैं...देखती हैं कि उसमें कोई इनाम-विनाम है या नहीं.
चाय-पत्ती हमने वह ली--जिसके पैकेट पर 'दिन दहाडे लूट' छपा था. दो साबुन ख़रीदने पर एक मुफ़्त नहाने का साबुन हमने खरीदा. बर्तन मांजने के 'बार' के भीतर 'कार' निकलने का 'चांस' था. पाउडर हमने वह लिया जो एक ख़रीदने पर एक मुफ़्त मिल गया. सभी चीज़ों के भीतर इनाम छिपे रहते हैं. मां कहती हैं--भाग्य है तो किसी दिन कार भी मिल सकती है...नहीं तो वाशिंग मशीन तो मिल ही सकती है. कभी-कभी जब कामवाली बाई नहीं आती है तो मां को कपडा धोना पडता है...कितनी परेशानी होती है!
'सुपर मार्केट' में पांच सौ का सामान ख़रीदने पर एक कूपन मिलता है. कूपन को स्क्रैच करो तो तुरंत इनाम निकलता है. हम इतना सामान हर महीने ख़रीदते हैं कि कम-से-कम तीन कूपन हमें मिल जाते हैं. कभी-कभी तीसरे कूपन के लिये मां को सौ-दो-सौ का सामान और ख़रीदना पडता है. टोकनी से दो कूपन मैं चुनती हूं...एक मां चुनती हैं. 'स्क्रेच' तीनों को मैं ही करती हूं. मुझे स्क्रेच करना अच्छा लगता है. इनाम में कभी पोहे का पैकेट, कभी पाउडर का छोटा डिब्बा, कभी नमक का पैकेट, कभी कोई क्रीम निकलती है. जो चीज़ इनाम में निकलती है वो हम पहले खरीदे रहते हैं तो मां दुखी होती हैं कि अरे अब इसका क्या करेंगे? 'सुपर मार्केट' में रखे इनामी टीवी और वाशिंग मशीन अब तक किसी कूपन से नहीं निकले हैं...पर किसी दिन निकल सकते हैं.
घर में वापस आते ही हम उन सब चीज़ों को खोल डालते हैं, जिनके भीतर इनाम छिपे होते हैं. चाय-पत्ती को जार में उलट डालते हैं कि एक कूपन दिख जाये, जिससे मां सोने की दुकान से अपनी पसंद के गहने, एक मिनट के भीतर, दौड-दौडकर उठा सके. मां सोचती हैं कि एक मिनट में वे इतने गहने उठा लेंगी कि गहनों से लद जाएंगी. हमारे यहां रखे साबुनों के रैपर खुले रहते हैं.

आनंद हर्षुल की इस किताब के प्रकाशक हैं मेधा बुक्स. पता है- एक्स-11, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110 032 और इनका फ़ोन नंबर है- 011-22116672
क़ीमत-125/ पृष्ठ-125 हार्डबाउंड
Tuesday, June 12, 2007
नसुडी को चाहिये नई भवानी
कोई छै साल पहले नसुडी यादव की जब मौत हुई तब भी और आज तक मैं उनके प्रति श्रद्धांजलि के दो शब्द न पढ सका न लिख सका. बिरहा प्रेमियों ने आहत मन से इस सच्चाई को स्वीकार किया होगा. बिरहा गायकी की एक बिल्कुल अनूठी शख्सियत की अनुपस्थिति हमेशा महसूस की जायेगी. वो मिर्ज़ापुर की ग़ल्लामंडी पल्लेदारी करते थे और साथी गायकों की अवहेलना और दुष्प्रचार के जवाब में इस तथ्य को पेश करते हुए दूने आत्मसम्मान का अनुभव करते थे.
हालांकि खुद नसुडी जहां भी होंगे, मेरी उपरोक्त पंक्तियां पढ्कर ज़रूर ही चिढ जाएंगे और बेसाख़्ता बोल उठेंगे "सरऊ जीतेजी तोहके नहीं बुझाइल, अब मरले बाद सोहरावत हउवा?"
नसुडी अपनी विशिष्ट शैली और बेबाकी के लिये जितने लोकप्रिय हुए उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है. कहते हैं कि नसुडी के आयोजनों में भारी पुलिस बंदोबस्त और प्रशासनिक मुस्तैदी से काम लिया जाता था. हाल के बरसों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के इलाक़ों में बदलते जातीय समीकरण और दलितों-पिछडों में बढती राज्नीतिक-सामाजिक जागरूकता और नसुडी की लोकप्रियता में संबंध तलाशा जाना चाहिये. हर सामाजिक आंदोलन के गायक होते हैं, शायद नसुडी भी ऐसी ही उथल-पुथल भरी सामाजिक-राजनैतिक परिस्थिति में एक परिघटना की तरह उभरे. ब्राह्मणवाद-विरोध और वर्चस्वशाली जातियों-वर्गों पर तीखे हमले नसुडी के सांस्कृतिक अजेंडा का अभिन्न हिस्सा हैं.
यहां पेश है नसुडी के एक नाइट लॉंग परफ़ोर्मेंस का आंशिक ट्रांस्क्रिप्शन----
मंदिर बनावेवाला आप, महजिद बनावेवाला आप. मुर्ती बनावेवाला आप. चंदा लगा के मुर्ती लेआवेवाला आप. ओम्मे बइठवला तोहहीं. अउर तोहहीं ऊ मुर्ती के नाम रखला कि फलना बाबा. औ पूजा करबा, चढइबो करबा, परसादियो रखबा, फिर चढा-ओढा के अपना खाऊ जाबा. त के तोसे महान बा? सारी सक्ती तोहरे में बा. औ जाए लगबा त दरवाजा बंद कर देबा, कहबा अब तू एही में रहा. अब हम जात हई घरे.
(सह गायक पूछता है): अउर एकाध दिन भुला जाएं, न बंद करें तब ?
नसुडी: तब कुक्कुर मूती बे ! कवन उपाय बा ? दरवाजा खुलल रही त कुक्कुर मूती. त सोचा! जब ऊ कुकुरे से मुतवावत ह मुहें में त तोहार मदद करी ? ओके कहेके चाही--मत मूता रे एही में हम हई. जब ऊ आपन मुंह नाही बचावत हौ, त तोहार मदद करी ऊ ? हम कहीला बइठावे के बइठाय द हर घरे में लेकिन मुर्ति क बात बतावत हई कि मदद करी त मानव करी. ई कहना बा--
तोहसे हौ ना महान कोई अरे दुनिया में
बेहडा पार लागी मानव के सरनियां में
त भइया, संसार में सबसे बडा नाम होला. जेतना बडा नाम भगवान का ओतना बडा नाम घुरहू का. दुन्नो नाम बराबर होला. भगवान कतल करिहें त भगवान के फांसी होई अउर घुरहू कतल करिहें त घुरहू के फांसी होई. वल्दियत से काम चलेवाला नाहीं हौ, कि तू कहला हम राम क लडिका हईं त छमा कई द? ई छमा-वमा वाला बात न रही. जे गलती करी तेकर फांसी होई. 302 के मुल्जिम होई.
आया है सो गया नहीं
राजा रंक फकीर
ना कोई को बिवाय मिले
ना कोई को लगे जंजीर!
त भइया ! आप लोग के आसिर्वाद के हमको भरोसा बा. आप लोग आसिर्वाद दे देइहैं त ई काया अगर रोड पर मर जाई तब्बौ एक गज कफन मिल जाई. अउर कवनो मंदिली में जाके मर जाईं त हम्मे कफन न मिली. औ भगवान-भगवान करी तब्बौ न मिली. तहार सब के संगत रही त हम्मे कुल चीज मिल जाई. एह से हमार मानव से जादा प्रेम रहेला. औ हम्मे भगवान-ओगवान के फेर नाहीं रहत कि हम्में भगवान मिल जइहें त खियइहें. तू मिलबा त खिया देबा, ऊ पट्ठा न खियाई. ऊ त दांत चियरले हौ मंदिर में. ऊ त खुदै हमार खात हौ, ऊ का खियाई ? जे चहिबा ओके तू खियइबा, महानता तोहरे में हौ के ओकरे में?
हालांकि खुद नसुडी जहां भी होंगे, मेरी उपरोक्त पंक्तियां पढ्कर ज़रूर ही चिढ जाएंगे और बेसाख़्ता बोल उठेंगे "सरऊ जीतेजी तोहके नहीं बुझाइल, अब मरले बाद सोहरावत हउवा?"
नसुडी अपनी विशिष्ट शैली और बेबाकी के लिये जितने लोकप्रिय हुए उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है. कहते हैं कि नसुडी के आयोजनों में भारी पुलिस बंदोबस्त और प्रशासनिक मुस्तैदी से काम लिया जाता था. हाल के बरसों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के इलाक़ों में बदलते जातीय समीकरण और दलितों-पिछडों में बढती राज्नीतिक-सामाजिक जागरूकता और नसुडी की लोकप्रियता में संबंध तलाशा जाना चाहिये. हर सामाजिक आंदोलन के गायक होते हैं, शायद नसुडी भी ऐसी ही उथल-पुथल भरी सामाजिक-राजनैतिक परिस्थिति में एक परिघटना की तरह उभरे. ब्राह्मणवाद-विरोध और वर्चस्वशाली जातियों-वर्गों पर तीखे हमले नसुडी के सांस्कृतिक अजेंडा का अभिन्न हिस्सा हैं.
यहां पेश है नसुडी के एक नाइट लॉंग परफ़ोर्मेंस का आंशिक ट्रांस्क्रिप्शन----
मंदिर बनावेवाला आप, महजिद बनावेवाला आप. मुर्ती बनावेवाला आप. चंदा लगा के मुर्ती लेआवेवाला आप. ओम्मे बइठवला तोहहीं. अउर तोहहीं ऊ मुर्ती के नाम रखला कि फलना बाबा. औ पूजा करबा, चढइबो करबा, परसादियो रखबा, फिर चढा-ओढा के अपना खाऊ जाबा. त के तोसे महान बा? सारी सक्ती तोहरे में बा. औ जाए लगबा त दरवाजा बंद कर देबा, कहबा अब तू एही में रहा. अब हम जात हई घरे.
(सह गायक पूछता है): अउर एकाध दिन भुला जाएं, न बंद करें तब ?
नसुडी: तब कुक्कुर मूती बे ! कवन उपाय बा ? दरवाजा खुलल रही त कुक्कुर मूती. त सोचा! जब ऊ कुकुरे से मुतवावत ह मुहें में त तोहार मदद करी ? ओके कहेके चाही--मत मूता रे एही में हम हई. जब ऊ आपन मुंह नाही बचावत हौ, त तोहार मदद करी ऊ ? हम कहीला बइठावे के बइठाय द हर घरे में लेकिन मुर्ति क बात बतावत हई कि मदद करी त मानव करी. ई कहना बा--
तोहसे हौ ना महान कोई अरे दुनिया में
बेहडा पार लागी मानव के सरनियां में
त भइया, संसार में सबसे बडा नाम होला. जेतना बडा नाम भगवान का ओतना बडा नाम घुरहू का. दुन्नो नाम बराबर होला. भगवान कतल करिहें त भगवान के फांसी होई अउर घुरहू कतल करिहें त घुरहू के फांसी होई. वल्दियत से काम चलेवाला नाहीं हौ, कि तू कहला हम राम क लडिका हईं त छमा कई द? ई छमा-वमा वाला बात न रही. जे गलती करी तेकर फांसी होई. 302 के मुल्जिम होई.
आया है सो गया नहीं
राजा रंक फकीर
ना कोई को बिवाय मिले
ना कोई को लगे जंजीर!
त भइया ! आप लोग के आसिर्वाद के हमको भरोसा बा. आप लोग आसिर्वाद दे देइहैं त ई काया अगर रोड पर मर जाई तब्बौ एक गज कफन मिल जाई. अउर कवनो मंदिली में जाके मर जाईं त हम्मे कफन न मिली. औ भगवान-भगवान करी तब्बौ न मिली. तहार सब के संगत रही त हम्मे कुल चीज मिल जाई. एह से हमार मानव से जादा प्रेम रहेला. औ हम्मे भगवान-ओगवान के फेर नाहीं रहत कि हम्में भगवान मिल जइहें त खियइहें. तू मिलबा त खिया देबा, ऊ पट्ठा न खियाई. ऊ त दांत चियरले हौ मंदिर में. ऊ त खुदै हमार खात हौ, ऊ का खियाई ? जे चहिबा ओके तू खियइबा, महानता तोहरे में हौ के ओकरे में?
Sunday, June 10, 2007
रामदेवरा का मेला
रामदेवरा का मेला एक विशाल मेला है. लाखों की संख्या में लोग यहां जुटते हैं. यहां पहुंचने वालों में ज़्यादातर वो लोग होते हैं जिन्हें नीची जात का कहा जाता है. इनमें मेघवाल, चमार, भांभी, भील, भाट, बंजारे और कामद होते हैं. ये मेला जैसलमेर के पास कहीं लगता है. रेलों में भीड देखने लायक़ होती है. 
सितंबर के पहले पखवाडे में राजस्थान का हर रास्ता रामदेवरा को जा रहा होता है. रामदेवरा के बारे में लोककला मंडल उदयपुर से पता चलता है कि 'वे तंवर राजपूत थे, उनका समय 1404 से 1458 है. उन्हें रामदेव बाबा, राम सा पीर, रुणेजा रो धणी और धोती धजा रो धणी भी कहा जाता है. यह मेला जैसलमेर के रुणेजा / रामदेवरा में लगता है.राजस्थान के अलावा गुजरात और मध्य प्रदेश से भी लोग यहां पहुंचते हैं.' रमेश थानवी के मुताबिक़ ये रामसा पीर कोई मुस्लिम संत है, रामदेवरा में उसकी मज़ार है.
लोकमान्यता है कि रामदेवरा जाने के लिये ट्रेन के दो टिकट लेने चाहिये, यानी एक अपना और एक रामदेव बाबा का. कुछ लोग रामदेव के घोडे का भी टिकट लेकर चलते हैं.जैसलमेर के पास किसी छोटे से गांव में रामदेव के घोडे की रुई या कपडे की नन्हीं प्रतिकृतियां बनती हैं और लोग एक नन्हां घोडा खरीद कर रामदेव या रामसापीर की मज़ार पर चढाते हैं.
यहां रामदेवरा जानेवाली एक ट्रेन का फोटो है जिस पर दो बार चट-चट करने से ये ठीक से देखा जा सकेगा.फोटो सात साल पहले सितंबर में राजस्थान के एक स्थानीय अख़बार में छपा था.

सितंबर के पहले पखवाडे में राजस्थान का हर रास्ता रामदेवरा को जा रहा होता है. रामदेवरा के बारे में लोककला मंडल उदयपुर से पता चलता है कि 'वे तंवर राजपूत थे, उनका समय 1404 से 1458 है. उन्हें रामदेव बाबा, राम सा पीर, रुणेजा रो धणी और धोती धजा रो धणी भी कहा जाता है. यह मेला जैसलमेर के रुणेजा / रामदेवरा में लगता है.राजस्थान के अलावा गुजरात और मध्य प्रदेश से भी लोग यहां पहुंचते हैं.' रमेश थानवी के मुताबिक़ ये रामसा पीर कोई मुस्लिम संत है, रामदेवरा में उसकी मज़ार है.
लोकमान्यता है कि रामदेवरा जाने के लिये ट्रेन के दो टिकट लेने चाहिये, यानी एक अपना और एक रामदेव बाबा का. कुछ लोग रामदेव के घोडे का भी टिकट लेकर चलते हैं.जैसलमेर के पास किसी छोटे से गांव में रामदेव के घोडे की रुई या कपडे की नन्हीं प्रतिकृतियां बनती हैं और लोग एक नन्हां घोडा खरीद कर रामदेव या रामसापीर की मज़ार पर चढाते हैं.
यहां रामदेवरा जानेवाली एक ट्रेन का फोटो है जिस पर दो बार चट-चट करने से ये ठीक से देखा जा सकेगा.फोटो सात साल पहले सितंबर में राजस्थान के एक स्थानीय अख़बार में छपा था.
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