हम कुछ ऐसे तेरे दीदार में खो जाते हैं जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते हैं “मुनव्वर राना”

Tuesday, January 28, 2014

ब्रेख्त-4

इस तरह मैं
खुद पर यकीन नहीं करने देता किसी को
हर एक यकीन अस्वीकार कर देता हूं
मैं ऐसा करता हूं
क्योंकि मुझे पता है: इस शहर के हालात ने
यकीन करना कर दिया है नामुमकिन.


II ब्रेख्त II

ब्रेख्त-3

मुझसे कहा जाता है: खा और पी. मौज कर, कि है तेरे पास
पर कैसे खाऊं और पियूं

खाऊं उस भूखे से छीना हुआ?
और पियूं उसके गिलास में जो मर रहा प्यास से वहां
फिर भी मैं खाता और पीता हूं.


II ब्रेख्त II

ब्रेख्त-2

हाय रे हम
जो बनाना चाहते थे आधार मित्रता का
खुद ही नहीं बन पाये मित्रवत


II ब्रेख्त II

ब्रेख्त-1

क्यों दर्ज करता हूं मैं केवल यह
कि चालीस साल की देहातिन
झुकी हुई चलती है?
लड़कियों के स्तन सदा की तरह गर्म हैं!
क्यों दर्ज करता हूं मैं केवल यह


II ब्रेख्त II

बीसवीं सदी

एक ताबूत-
किसी बच्चे का चेहरा जिस पर
एक किताब किसी कौए के पेट पर लिखी
एक हिंस्र पशु छुपा हुआ किसी फूल में

एक चट्टान
किसी पागल के फेफड़ों से सांस लेती हुई

ये है वह
बीसवीं सदी.


एडोनिस (अली अहमद सईद) सीरिया

Related Posts with Thumbnails

BlogBuddhi