हम कुछ ऐसे तेरे दीदार में खो जाते हैं जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते हैं “मुनव्वर राना”

Thursday, August 7, 2014

मत हंसो... कि तुम्हारी हंसी से कोई हारता है


प्यारे लाल शर्मा (लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल) भले ही यह कहें कि उन्होंने अपने गुरु एंथनी गोंसाल्वेस के प्रति कृतज्ञता स्वरूप एक सस्ते से गाने में अपने गुरू का नाम डलवाया लेकिन बात कुछ जंचती नहीं है. दिल पर हाथ रखकर कहिये कि तुलसीदास के शिष्य ने ऐसी कोई श्रंद्धांजलि उन्हें दी होती तो क्या आपको मंज़ूर होता? रवींद्रनाथ टैगोर को 'माय नेम इस रवींद्रनाथ टैगोर' कहकर एक बड़े से दुर्गापूजा पंडाल से बाहर आता देखना कैसा लगता? अज्ञेय के लिये ये बात शायद माक़ूल होती लेकिन तब वात्स्यायन की चटपटी पहचान में भी वह खटकती. जो लोग भी अमर अकबर एंथनी की कहानी और उसमें आए इस गाने से परिचित हैं जिसमें एंथनी गोंसाल्वेस का नाम लिया गया, क्या वो कह सकते हैं कि उन्हें इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के 37 साल बाद भी एक स्वप्नदर्शी कम्पोज़र-अरेंजर एंथनी गोंसाल्वेस के बारे वैसा कुछ मालूम हो सका जिसके वो हक़दार हैं? वैसे तो एंथनी गोंसाल्वेस के शिष्य आर डी बर्मन भी थे लेकिन प्यारेलाल जैसा ओछा फ़ैसला उन्होंने नहीं लिया. पिछ्ले 9 वर्षों में मैं अपने मन को आश्वस्त नहीं कर सका हूं कि माय नेम इज़ एंथनी गोंसाल्वेज़... गाने ने मशहूर गोवानी म्यूज़ीशियन, विलक्षण अरेंजर एंथनी गोंसाल्वेस को इस पॉपुलर प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिये संगीत प्रेमियों से परिचित कराया. इसके उलट मेरा मानना है कि इस गाने को सुनते हुए ख़ुद एंथनी गोंसाल्वेस उस फ़िल्म म्यूज़िक की तरफ़ पीठ ही फेरते गये (इस गाने को उन्होंने 35 साल तक झेला होगा) जिससे उन्होंने अपना न सिर्फ़ करियर शुरू किया था बल्कि जिस अद्भुत संगीत संसार में उन्होंने मुंबई में भारतीय और पश्चिमी संगीत के अंतर्घुलन की भव्य प्रस्तुतियां कर दिखाई थीं. मैं यह भी मानता हूं कि बजाय कोई जिज्ञासा जगाने के, यह गीत एक 'वास्तविक' आदमी को 'फ़िक्शनल' ही सिद्ध करता गया. कोई अगर एंथनी गोंसाल्वेस के ब्रेनचाइल्ड सिम्फ़नी ऑर्केस्ट्रा ऑफ़ इंडिया के उन ब्रोशर्स को देखे जिनमें उन्होंने क़रीब डेढ सौ भारतीय और विदेशी वाद्यों के साथ अपनी प्रस्तुतियां की थीं तो दांतों तले उंगलियां दबाएगा. यहां एक और बात मेरे ज़ेहन में आती है, जितना मैं अमिताभ बच्चन को जानता हूं, कि अगर उन्हें यह मालूम होता कि जिस आदमी को उस गीत का खिलंदड़ हिस्सा बनाया जा रहा है, वो कितने सम्मान का हक़दार है, तो शायद वो प्यारेलाल की इस सायास और आनंद बख़्शी की इस लापरवाह स्कीम का हिस्सा न बनते. तो सवाल ये है कि 2 साल पहले तक जीवित रहे इस भारतीय नागरिक और संगीत के चितेरे के साथ हम सब ने मिलकर यह मज़ाक़ क्यों किया?

Tuesday, May 6, 2014

भाई बहुत मारता है

सेंट्रल सेक्रेटेरियट बस टर्मिनल पर वो हमें चाय पीता देखकर रुक गया था. आंखें चार हुईं तो बोला 'चाय पिला दो'. हमने खुशी-खुशी बिना एक पल भी सोचे उसके लिये चाय ऑर्डर कर दी. ये बस अभी चार घंटे पहले की बात है.
पत्थर के जिन टुकड़ों पर हरी बोरी  बिछी थी वहीं वो हमारी बगल में आकर  बैठ गया.
क्या नाम है? उसने भूपेंदर सिंह बताया।
मेरे पापा करोड़पति थे. हम दो भाई हैं और एक बहन. मेरा भाई बहुत मारता है. दारू पीता है. भाई-भाभी ने हमारी जायदाद हड़प ली. नारियल बेचता था मैं. अब कुछ नहीं करता। गुरद्वारे में लंगर खा के आ रहा हूँ।  ये मेरा पैर जल गया था, इंदिरा के बाद आग लगा दी थी उसी में. खाता हूं तो खाता चला जाता हूं. पानी पियूँगा तो पीता चला जाता हूं।  टट्टी हो जाती है पैंट में ही, पिसाब से पैंट खराब हो जाता है।  बहन धो देती है।  कहती है मैं नहीं करूंगी तो कौन करेगा ? वो कोठियों में बर्तन माँजती है. भाई उसे भी मारता है।  मुझे भी बहुत मारता है। पापा मेरे फ़ौज में थे।  मालूम है उनका नाम क्या था? जगतार सिंह।  सुल्तानपुरी में हमारी करोड़ों की प्रोपरटी थी।  सब बंट गयी और भाई सब बरबाद कर रहा है।
कितनी उमर है ?
'बीस साल' वो बोला।
हालांकि दाढ़ी के बीसियों सफ़ेद बाल इस बयान पर शक पैदा कर रहे थे. उसने बताया कि इंदिरा के टाइम पर वो छोटा था. उसने अपना जला पैर भी दिखाया। जिस्म से लंबा-तगड़ा था वैसे.
उसके सिर पर मैली सी लाल पगड़ी थी. दाढ़ी उलझी हुई और महीनों से धोई हुई नहीं लग रही थी. दाहिने हाथ की एक उंगली हमेशा के लिये टेढ़ी हो गयी थी. सफ़ेद कमीज़ अब मटियाली हो चुकी थी और पैंटकाली थी  जिसका रंग पहले जैसा नहीं रह गया था. पैरों के नाखून  कीचड़ और कालिख से काफ़ी सख्त हो चुके थे और वो जिन उंगलियों पर मढ़े थे उन्हे एक सैंडल ने थाम रखा था.
पिच्चर देखते हो?
नहीं मैंने कभी पिच्चर नहीं देखी.
क्यों ?
मेरा दांत टूट गया है ना ! उसने उंगली से मूँछे ऊपर कर के दांत दिखाने की कोशिश की.
अबे चूतिया ना बनाओ पिच्चर देखने का दांत से क्या लेना-देना ? कहकर हमारी मुलाक़ात पूरी हुई.

(फोटो साभार: गूगल सर्च)

रामजीत टैक्सी ड्राइवर का मन आज हरियर है !


चटनी : देवानंद

Sunday, May 4, 2014

साबरी ब्रदर्स -1

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