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Thursday, November 8, 2007
Saturday, October 20, 2007
धरती माता जागो

सुनिये दिनेश कुमार शुक्ल की एक और छंद सघन रचना खुद उनकी ही आवाज़ में.
दिनेश जी की तिलस्म और मालगाड़ी और बंदर चढ़ा है पेड़ पर भी यहां आप सुन चुके हैं.
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दिनेश कुमार शुक्ल,
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Sunday, October 7, 2007
इंतज़ार ख़त्म : अब अज़दक हैं आपके साथ, आज की फ़िल्मों से आपकी बेज़ारी बढाते हुए
हिंदी फ़िल्मों को लेकर अज़दक के पास कहने को बहुत कुछ है. परसों हमने उनकी बातों को रिकॉर्ड करके कोशिश की है कि उनकी राय आप तक उनकी आवाज़ में पहुंचे जिसमें उनका ख़ास अंदाज़ भी शामिल हो. तो वादे के मुताबिक़ पेश है सात छोटे-छोटे हिस्सो में पूरी बातचीत, इनमें से जिन दो छोटे हिस्सों को कल-परसों में मैं बतौर टीज़र सुना चुका हूं उन्हें सुनते हुए आप दोहराव के लिये मुझे माफ़ करेंगे. बातचीत की शुरुआत मुनीश ने की है जिसके आरंभ में मैं कुछ अदाकारी दिखा रहा हूं.
मुनीश external services division की हिंदी सेवा के एक युवा ब्रॉड्कास्टर हैं और दिल्ली में रहते हैं.देशी-विदेशी फ़िल्मों और साहित्य के अलावा उन्हें सैर और शराब का ख़ासा शौक़ है.अभिनय वे स्वाभाविक रूप से करते हैं-मंच पर और मंच से परे भी.हमारी दोस्ती की वजह यह सहमति है कि आजकल-
शान के लोग दुनिया में कम रह गये,
एक तुम रह गये एक हम रह गये.
अज़दक के बारे में आप जो जानते हैं, उससे अलग बस इतना कहूंगा कि तेइस साल पहले मेरी उनसे मुलाक़ात हुई थी.( उसी दौर की उनकी एक तस्वीर यहां पेश कर रहा हूं) इलाहाबाद की सांस्कृतिक हलचलों के बीच मैंने उनसे बहुत कुछ सीखने की कोशिश की है और आज भी कर रहा हूं. लंबे समय तक विमलभाई और प्रमोदभाई(पढ़ें अज़दक) का इलाहाबाद के सोहबतिया बाग़ का कमरा मेरा दूसरा घर रहा. गर्मियों की कई ख़ामोश दोपहरें याद करूं तो याद आता है साइकिल चलाते हुए मेरा सोबतिया बाग़ पहुंचना. आज सोचूं तो लगता है कि कोई और जगह थी, कोई और जनम थाजहां मैं इतना चार्ज्ड माहौल पाया करता था. और सोचूं कि क्या मुझे विमलभाई-प्रमोदभाई के डेरे पहुंचने में कोई प्रयास करना होता था? क्या मैं आंख मूंदकर भी साइकिल चलाऊं तो सोबतिया बाग़ नहीं पहुंच सकता था? विमलभाई-प्रमोदभाई नाम युग्म कुछ अब्दुलभाई-सत्तारभाई इतरवाले या राजन-साजन मिश्र जैसा लगता है.इस बातचीत के दौरान मुझे कई बार इलाहाबाद फ़िल्म सोसायटी में साथ-साथ फ़िल्में देखने के बाद यूनिवर्सिटी रोड पर चाय टकराते हुए हुई सरगर्म चर्चाएं याद हो आई.
बहरहाल, आपको अपनी भावुकता(ऐसा ही प्रमोदभाई कहते हैं)से बोर नहीं करते हुए छोड़ता हूं इस बातचीत के साथ.
Recorded on 5th October 2007, 7:30PM, New Delhi
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मुनीश external services division की हिंदी सेवा के एक युवा ब्रॉड्कास्टर हैं और दिल्ली में रहते हैं.देशी-विदेशी फ़िल्मों और साहित्य के अलावा उन्हें सैर और शराब का ख़ासा शौक़ है.अभिनय वे स्वाभाविक रूप से करते हैं-मंच पर और मंच से परे भी.हमारी दोस्ती की वजह यह सहमति है कि आजकल-शान के लोग दुनिया में कम रह गये,
एक तुम रह गये एक हम रह गये.
अज़दक के बारे में आप जो जानते हैं, उससे अलग बस इतना कहूंगा कि तेइस साल पहले मेरी उनसे मुलाक़ात हुई थी.( उसी दौर की उनकी एक तस्वीर यहां पेश कर रहा हूं) इलाहाबाद की सांस्कृतिक हलचलों के बीच मैंने उनसे बहुत कुछ सीखने की कोशिश की है और आज भी कर रहा हूं. लंबे समय तक विमलभाई और प्रमोदभाई(पढ़ें अज़दक) का इलाहाबाद के सोहबतिया बाग़ का कमरा मेरा दूसरा घर रहा. गर्मियों की कई ख़ामोश दोपहरें याद करूं तो याद आता है साइकिल चलाते हुए मेरा सोबतिया बाग़ पहुंचना. आज सोचूं तो लगता है कि कोई और जगह थी, कोई और जनम थाजहां मैं इतना चार्ज्ड माहौल पाया करता था. और सोचूं कि क्या मुझे विमलभाई-प्रमोदभाई के डेरे पहुंचने में कोई प्रयास करना होता था? क्या मैं आंख मूंदकर भी साइकिल चलाऊं तो सोबतिया बाग़ नहीं पहुंच सकता था? विमलभाई-प्रमोदभाई नाम युग्म कुछ अब्दुलभाई-सत्तारभाई इतरवाले या राजन-साजन मिश्र जैसा लगता है.इस बातचीत के दौरान मुझे कई बार इलाहाबाद फ़िल्म सोसायटी में साथ-साथ फ़िल्में देखने के बाद यूनिवर्सिटी रोड पर चाय टकराते हुए हुई सरगर्म चर्चाएं याद हो आई.बहरहाल, आपको अपनी भावुकता(ऐसा ही प्रमोदभाई कहते हैं)से बोर नहीं करते हुए छोड़ता हूं इस बातचीत के साथ.
Recorded on 5th October 2007, 7:30PM, New Delhi
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Sunday, September 16, 2007
एमएफ़ हुसेन को उनकी 92वीं सालगिरह पर मुबारकबाद

हमारे दौर के बड़े ही मक़बूल कलाकार हुसेन का आज जन्मदिन है. आजकल वो जलावतनी की ज़िंदगी जी रहे हैं और विकास की होड़ में 'आगे' बढ़ते देश को इस बात पर ज़रा भी शर्म नहीं है.
हुसैन एक मुकम्मल कलाकार हैं.
उनकी आत्मकथा सुनो एमएफ़ हुसेन की कहानी को सुनने के बाद आप एक बिलकुल नयी अनुभूति पर पहुंचते हैं.
इस आत्मकथा को मैंने उनके सहयोग से तैयार किया है. उनके लिखे एक भी शब्द के साथ मैंने छेड़छाड़ नहीं की है. यह उनकी आत्मकथा एमएफ़ हुसेन की कहानी अपनी ज़ुबानी की अविकल प्रस्तुति तो है ही, एक मायने में यह ऑडियो बुक उनकी बुक से अलग और अनोखी भी है, क्योंकि हुसेन साहब ने इस ऑडियो बुक के लिये पांच नये अध्याय ख़ास तौर पर लिखे हैं.
हैरत होती है कि एक नॉन राइटर ऐसा अच्छा गद्य लिख सकता है. एक बार इस ऑडियो बुक को आप सुन लें तो सरस्वती आदि प्रश्न आपको बचकाने और एक हद तक अहमक़ाना लगने लगेंगे.
एक-एक घंटे की इन पांच ऑडियो CDs के पहले वॉल्यूम से सुनिये वो दो हिस्से जिनमें वो अपने दादा को याद करते हैं.दादा जो उनके लिये सब कुछ थे. आइये हुसेन साहब के इस ख़ास तर्ज़े बयां को सुनते हुए उन्हें जन्मदिन की बधाइयां दें.
दादा की उंगली पकड़े एक लड़का

दादा की अचकन
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इस ऑडियो बुक से एक और ट्रैक सुनिये यहां
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सुनो एमएफ़ हुसेन की कहानी
तीसरी क़सम और शंकर-शंभू क़व्वाल

मेरी बहुत इच्छा है कि मैं शंकर-शंभू क़व्वाल भाइयों के बारे मे वो सब जानूं जो मिसाल की तौर पर अभिषेक बच्चन या जॉर्ज बुश के बारे मे जानता हूं.इमरान हाशमी कौनसा कुत्ता पालता है,मल्लिका शेहरावत किस ब्रांड के अंडरगार्मेंट्स पहनती है या हिमेश रेशमिया कौन सा साबुन लगाता है...
शंकर-शंभू क़व्वाल भाइयों के बारे में और अधिक जानने का हमारे पास क्या ज़रिया है?
इनके अलावा जिन नामों का ज़िक्र ऊपर किया गया है और जिन क़ाबिल-ए-ज़िक्र लोगों की तमाम हगी-मुती बातें हमें बताई जाती हैं,(उनकी तुलना में)बताने वालो के एजेंडे में शंकर-शंभू कभी शामिल नहीं होंगे.
उम्मीद है कि ऐन इसी वक़्त जब ये लाइनें लिखने के लिये मैं कीबोर्ड खटका रहा हूं उसी वक़्त कोई पीटर मैक्लुहान या कोई सिंडी जॉर्ज अपनी चप्पलें चटकाते हुए भारत की गलियों और लायब्रेरियों की ख़ाक छान रहे हों.
इसमें कोई हैरत नहीं होनी चाहिये कि इस जिस 'छोटी'सी बात के लिये मैं सिर धुन रहा हूं वो छोटीसी बात अमेरिकन और ब्रिटिश डैटासेंटरों मे आसानी से उपलब्ध हो. खैर...

शैलेंन्द्र की फ़िल्म तीसरी क़सम को कल जब मैंने FM पर पेश किया तो एक बार फिर उस गाने गाने को देख सुनकर मज़ा आ गया, जिसकी कल्पना और प्रस्तुति के पीछे शंकर-शंभू की मौजूदगी बरामद होती है.
आप जानते हैं कि शैलेंद्र ने इस फ़िल्म को किस फ़्रेमवर्क में कंसीव किया था. जब कहानी के अलावा संवाद भी खुद रेणुजी ही लिख रहे थे और भरसक कोशिश कर रहे थे कि अपने अनुभवों को फ़िल्मी परदे पर थोड़ी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया जाए तब जनाब राजकपूर उस पूरे डिक्शन और सेंसिबिलिटी का माठा करने में लगे हुए थे. बासु भट्टाचार्य बेचारे क्या करते एक ग्लॉस पैदा करने का दबाव तो उनपर व्यावसायिक ज़रूरतें भी बनाए हुए थीं. सुब्रतो मित्रा ज़रूर उस आउटडोर टेरेन में पसीना पोछते हुए हमारे आंसुओं को पोछने में लगे हुए थे और उन्होंने अपने स्टैंडर्ड का काम कर दिखाया. शंकर-जयकिशन ने बहुत ही मनोयोग से संगीत बनाया और उससे किसी को शिकायत नहीं है.कहते हैं कि उस इलाक़े के एथ्निक म्यूज़िक से बहुत वाक़िफ़ न होने के बावजूद उन्होंने परसनल इंटरेस्ट लेकर ज़रूरी रिसर्च की, और एक ऑर्गेनिक संगीत रचने में(बाद में मशहूर हुए संगीतकार) दत्ताराम और मशहूर गोआनी अरेंजर सेबास्टियन ने एड़ी-चोटी एक कर दी. ध्यान रहे कि ये दोनों शंकर-जयकिशन को असिस्ट कर रहे थे.
गुरु लच्छू महाराज ने एक नौटंकी के लिये अपनी कोरियोग्राफ़िक एक्सपर्टीज़ ऑफ़र करते हुए यह सिद्ध कर दिया कि क्लासिकल डांस उन्हें जीवन से ही मिला था.
फ़िल्म मे नौटंकी के सुपरवाइज़िंग डायरेक्टर शंकर-शंभू थे और जिस तरह की जीवंत स्थितियां उन्होंने अपनी सूझबूझ से पैदा की हैं वो हमेशा कन्विंसिग लगती हैं. उन्होंने लैला-मजनू उर्फ़ मकतब की मोहब्बत ड्रामे का एक टुकड़ा भी इस फ़िल्म में रीक्रियेट किया है जिसे फ़िल्म इतिहास में एक ख़ास जगह मिलनी चाहिये और थीमैटिक फ़िल्मों में आइटम कैसे डालें के पाठ्यक्रम नें इसे शामिल किया जाना चाहिये. हालांकि यह देखने से ताल्लुक़ रखता है लेकिन सुनिये
चलते-चलते: फ़िल्म में सिचुएशन ये है कि एक चंडूख़ाने में कुछ लोग गप्पें मार रहे हैं जिसमें फ़िल्मी दुनिया और नाच-नौटंकी को लेकर कुछ कुतूहल का माहौल है. इसी चंडूख़ाने में इस बातचीत का क्रमभंग करते हुए हीरामन एक लोटा चाय लेने पहुंचता है. रेणुजी ने जिस भाषा को तीसरी क़सम में चलाना चाहा होगा उसका एक नमूना सुनिये.
Tuesday, September 11, 2007
मेरी पसंद के गीत- आठ
आज मैं इज़हार नहीं कर सकता कि पॉडकास्टिंग ने मुझे जो मौक़ा दिया है उससे मैं आप तक इस भजन को पहुंचा कर कितना खुश हूं.
जब तक मैंने एमएस की ये रचना नहीं सुनी थी तब तक मैं यही समझता था कि भक्ति की रागात्मकता घुरमा छूटने के साथ ही वहीं छूट गयी है. 1991 में अपने मद्रास प्रवास के दौरान भाई आर विद्यासागर के सानिध्य में थोड़ा सा कर्नाटक म्यूज़िक मेरे हिस्से में भी आया यानी कर्नाटक संगीत की दुनिया में मेरी खिड़की खुली.वहीं मुझे एम.एस.सुब्बुलक्ष्मी का यह भजन सुनने को मिला था और मेरे संग्रह में सहेजकर रखा हुआ है.
इस रचना के आनंद के बीच में मैं अपनी मूर्खतापूर्ण संगीत व्याख्याओ को लाकर आपकी गालियों का हिस्सेदार नहीं बनना चाहता इसलिये पेश करता हूं यह भजन.
बस इतना कहने से ख़ुद को नहीं रोक पा रहा हूं कि अगर इस क़िस्म की आराध्यरम्यता मैं स्वयं में विकसित कर पाऊं तो यक़ीन मानिये आज ही नास्तिकता की पटरी से उतर कर आस्तिकों की क़तार में खड़ा हो जाऊं. दिल पर हाथ रखकर कहिये कि माता के जागरणों-जगरातों में जो संगीत होता है, हमारे मंदिरों में कीर्तनों का जो रूप 'अब' जड़ें जमा चुका है और जिस ओउम भूर्भुव: स्व: की "महान" प्रातः श्रवणीय संगीत प्रस्तुति से पूरा हिंदी समाज अपना सीना फुलाए घूमता है, उसे इस रचना को सुनकर शर्मिंदा नहीं होना चाहिये?
जब तक मैंने एमएस की ये रचना नहीं सुनी थी तब तक मैं यही समझता था कि भक्ति की रागात्मकता घुरमा छूटने के साथ ही वहीं छूट गयी है. 1991 में अपने मद्रास प्रवास के दौरान भाई आर विद्यासागर के सानिध्य में थोड़ा सा कर्नाटक म्यूज़िक मेरे हिस्से में भी आया यानी कर्नाटक संगीत की दुनिया में मेरी खिड़की खुली.वहीं मुझे एम.एस.सुब्बुलक्ष्मी का यह भजन सुनने को मिला था और मेरे संग्रह में सहेजकर रखा हुआ है.
इस रचना के आनंद के बीच में मैं अपनी मूर्खतापूर्ण संगीत व्याख्याओ को लाकर आपकी गालियों का हिस्सेदार नहीं बनना चाहता इसलिये पेश करता हूं यह भजन.
बस इतना कहने से ख़ुद को नहीं रोक पा रहा हूं कि अगर इस क़िस्म की आराध्यरम्यता मैं स्वयं में विकसित कर पाऊं तो यक़ीन मानिये आज ही नास्तिकता की पटरी से उतर कर आस्तिकों की क़तार में खड़ा हो जाऊं. दिल पर हाथ रखकर कहिये कि माता के जागरणों-जगरातों में जो संगीत होता है, हमारे मंदिरों में कीर्तनों का जो रूप 'अब' जड़ें जमा चुका है और जिस ओउम भूर्भुव: स्व: की "महान" प्रातः श्रवणीय संगीत प्रस्तुति से पूरा हिंदी समाज अपना सीना फुलाए घूमता है, उसे इस रचना को सुनकर शर्मिंदा नहीं होना चाहिये?
Monday, September 10, 2007
मेरी पसंद के गीत- सात

चड्ढी पहन के फूल खिला है...से पहले भी गुलज़ार ने बच्चों के लिये लिखकर अपनी इस प्रतिभा का परिचय दिया है. और किसी भी बात के लिये उनकी बुराई की जाये लेकिन इस गाने में उन्होंने तारीफ़ के क़ाबिल ही काम किया है. आर डी बर्मन ने बड़ी ही सरल सी धुन से इसे सजा दिया है. पेश है 1977 की फ़िल्म किताब से यह गाना. इसे और पिछले गाने झूम बराबर झूम को हम FM पर नहीं बजा सकते क्योंकि झूम वाले में शराब की बात है और इसमें प्रोडक्ट प्रमोशन का डर है और ये दोनों ही बातें ब्रॉडकास्टिंग कोड के अनुसार वर्जित हैं.
आवाज़ें शिवांगी और पद्मिनी कोल्हापुरे की हैं.
फ़्लैग्स
पॊडकास्ट,
पॊडकास्टिंग,
मास्टरजी की आ गयी चिट्ठी,
मेरी पसंद
Saturday, September 8, 2007
झूम-बराबर झूम शराबी
मेरी पसंद के गीत- छः

यूं तो मोहम्मद रफ़ी के गाये गीतों की यारों के दिल में बहुत जगह है लेकिन मेरे लिये उनका ये गीत उनके बहुत से गीतों पर भारी है.फ़िल्म ऊंचे लोग (1965)
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जाग दिल-ए-दीवाना रुत जागी वस्ल-ए-यार की
बसी हुई ज़ुल्फ़ में आयी है सबा प्यार की - २
जाग दिल-ए-दीवाना
दो दिल के कुछ लेके पयाम आयी है
चाहत के कुछ लेके सलाम आयी है - २
दर पे तेरे सुबह खड़ी हुई है दीदार की
जाग दिल-ए-दीवाना ...
एक परी कुछ शाद सी नाशाद सी
बैठी हुई शबनम में तेरी याद की - २
भीग रही होगी कहीं कली सी गुलज़ार की
जाग दिल-ए-दीवाना रुत जागी वस्ल-ए-यार की
बसी हुई ज़ुल्फ में आयी है सबा प्यार की
जाग दिल-ए-दीवाना
गीत: मजरूह सुल्तानपुरी---------------------------------------संगीत: चित्रगुप्त
मेरी पसंद के गीत - पांच
ये गीत है पाकिस्तान की फ़िल्म दुल्हन(1963) का. फ़िल्म में नय्यर सुल्ताना, दर्पण और रानी वग़ैरह हैं. गीत मालूम नहीं किसने लिखा है, संगीत रशीद अत्रे का है.

रशीद अत्रे
ये सब बातें न जाने क्यों मैं लिख गया. मुद्दे की बात ये है कि ये गाना मैंने 1984 में इलाहाबाद के कटरा मार्केट में जब पहली बार सुना तो न तो मुझे ये मालूम था कि ये फ़िल्मी गीत है और फ़िल्म पाकिस्तान की है. और न ही ये मालूम था कि ये आवाज़ नूरजहां की है. फिर इन सब बातों की ज़रूरत भी क्या थी!
मैं किसी दुकान के inaugural function में गया था और वहीं ये गाना बज रहा था. मैं तीन महीनों तक दुकानवाले के चक्कर काटता रहा था और आख़िरकार ये गाना मुझे मिल गया था. तब से इसे संजो कर रखे हुए हूं और आपके सामने पेश करता हूं.

रशीद अत्रे
ये सब बातें न जाने क्यों मैं लिख गया. मुद्दे की बात ये है कि ये गाना मैंने 1984 में इलाहाबाद के कटरा मार्केट में जब पहली बार सुना तो न तो मुझे ये मालूम था कि ये फ़िल्मी गीत है और फ़िल्म पाकिस्तान की है. और न ही ये मालूम था कि ये आवाज़ नूरजहां की है. फिर इन सब बातों की ज़रूरत भी क्या थी!
मैं किसी दुकान के inaugural function में गया था और वहीं ये गाना बज रहा था. मैं तीन महीनों तक दुकानवाले के चक्कर काटता रहा था और आख़िरकार ये गाना मुझे मिल गया था. तब से इसे संजो कर रखे हुए हूं और आपके सामने पेश करता हूं.
फ़्लैग्स
निगाहें मिलाकर बदल जानेवाले,
नूरजहां,
पॊडकास्ट,
पॊडकास्टिंग,
मेरी पसंद
Friday, September 7, 2007
मरना भी मोहब्बत में किसी काम न आया

सी.रामचंद्र ग़ज़ब के आदमी रहे होंगे. सुनिये क़व्वाली के ट्रेडीशनल फ़ॉर्म को किस ख़ूबसूरती से उन्होंने यहां पेश किया है. गायक भी उन्होंने ट्रेडीशनल ही लिये हैं. रघुनाथ जाधव क़व्वाल और साथियों को इस कंपोज़ीशन में गाना कितना सुकून दे रहा होगा, ये तो वही जानते रहे होंगे. एक बार फिर आज़ाद(1955),शब्द राजेंद्र कृष्ण.

मेरी पसंद के गीत- चार
Thursday, September 6, 2007
मेरी पसंद के गीत- तीन
Tuesday, September 4, 2007
मेरी पसंद के गीत- दो
Friday, August 31, 2007
पाकिस्तानी ब्लॉगरों से बातचीत

वॉयस ऑफ़ अमेरिका ने पिछले दिनों दुनिया भर में सक्रिय कुछ पाकिस्तानी ब्लॉगरों से बातचीत की.
यहां सुनिये.
यहां मौजूद फ़ोटो महज़ सजावटी है.
Thursday, August 30, 2007
आर.चेतनक्रांति की एक कविता
Wednesday, August 29, 2007
उदय प्रकाश की कविताएं: आख़िरी क़िस्त

एक लेखक दरबदर
मरना
वसंत
व्यवस्था
कुतुबमीनार की ऊंचाई
करीमन और अशरफ़ी
चंकी पांडे मुकर गया है
एक भाषा हुआ करती थी
उदय प्रकाश की कुछ और कविताएं

कल के वादे के मुताबिक़ पेश है उदय प्रकाश की कुछ और कविताए.
अनुकपुर जंक्शन
दिसंबर
खेल
किसका शव
कुछ बन जाते हैं
महापुरुष
पिंजड़ा
रात
तीली
तिब्बत के लामा
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