टूटी हुई बिखरी हुई
क्योंकि वो बिखरकर भी बिखरता ही नहीं
दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Tuesday, February 16, 2010
सहस्राब्दी के आरम्भ में हिन्दी क्षेत्रों में बसे साहित्यकार: खुद अपने स्वर में
Duration: Approx 45 Min
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