दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Wednesday, May 21, 2008

रेडियो रेड और क़िस्सागोई: सुनिये सियारामशरण गुप्त की एक क्लासिकल कहानी


हमारा साहित्य कई कालजयी रचनाओं से भरा पडा है. मानवता की करुण दास्तानें और उनकी निर्दोष अभिव्यक्तियों की बानगियाँ चप्पे-चप्पे पर दर्ज हैं. रेडियो रेड समय-समय पर इन्हीं रचनाओं का महत्व और उत्सव रेखांकित करता रहता है. इसी क्रम में आज पेश है सियारामशरण गुप्त की शॉर्ट स्टोरी काकी. आवाज़ है हमारी सहकर्मी राखी की.


अवधि: लगभग 5 मिनट

Sunday, February 24, 2008

सुनिये रघुवीर सहाय की कविता , किताब पढकर रोना

रोया हूं मैं भी किताब पढकर के
पर अब याद नहीं कौन-सी
शायद वह कोई वृत्तांत था
पात्र जिसके अनेक
बनते थे चारों तरफ से मंडराते हुए आते थे
पढता जाता और रोता जाता था मैं
क्षण भर में सहसा पहचाना
यह पढ्ता कुछ और हूं
रोता कुछ और हूं
दोनों जुड गये हैं पढना किताब का
और रोना मेरे व्यक्ति का

लेकिन मैने जो पढा था
उसे नहीं रोया था
पढने ने तो मुझमें रोने का बल दिया
दुख मैने पाया था बाहर किताब के जीवन से

पढ्ता जाता और रोता जाता था मैं
जो पढ्ता हूं उस पर मैं नही रोता हूं
बाहर किताब के जीवन से पाता हूं
रोने का कारण मैं
पर किताब रोना संभव बनाती है.





रघुवीर सहाय

आवाज़: इरफ़ान
........अवधि: लगभग डेढ मिनट

Sunday, November 18, 2007

रेडियो रेड और ज़िया मोहेद्दीन की रोशनी


ज़िया मोहीउद्दीन पाकिस्तान के मशहूर ऐक्टर और राइटर हैं.बुक रीडिंग की कला में वे इस उपमहाद्वीप में अद्वितीय हैं. उनकी दिल्ली यात्राओं के दौरान उनसे ग़ालिब के ख़ुतूत सुनकर यह भ्रम होता है कि ख़त ग़ालिब ही पढ रहे हैं.पाकिस्तान में तो उनकी यह कला बहुत प्रचलित है ही दुनिया भर में अपने इस हुनर का प्रदर्शन करते हुए वो एक जुनून से काम लेते हैं. हमारे लिये उनकी दिखाई रोशनी बडे हौसले बढानेवाली है. शेक्सपियर को उनसे सुनना एक अनुभव है.
आप भी सुनिये शेक्सपियर और मैं


Dur.8Min 22Sec

Friday, November 16, 2007

रेडियो रेड और ऑडियो बुक्स: सुनिये गोरख पांडेय की कविता ''बंद खिड़कियों से टकराकर"


सुनिये गोरखजी की यह कविता. इसे मार्च 2007 में जारी आएंगे अच्छे दिन नाम की ऒडियो बुक से उनकी 16 अन्य कविताओं के साथ सुना जा सकता है. प्राप्त करने के लिये नीचे कमेंट बॊक्स में लिखें या- gorakhpurkafilmfestival@gmail.com पर ईमेल करें. फ़ोन करना चाहें तो करें संजय जोशी को- 09811577426 पर. इस सीडी से एक कविता यहां पहले भी सुनाई जा चुकी है. इसमें गोरखजी की बोलती और महेश्वरजी की गाती आवाज़ें भी सुनी जा सकती हैं.



बंद खिड़कियों से टकराकर

------------------------------------पूनम श्रीवास्तव----Dur.2min43sec

Wednesday, November 14, 2007

रेडियो रेड और क़िस्सागोई: सुनिये इब्ने इंशा की 'उर्दू की आख़िरी किताब' से कुछ हिस्से...


इब्ने इंशा १९२७ में पंजाब के लुधियाना में पैदा हुए थे. शुरुआती पढ़ाई भी उन्होंने यहीं से की लेकिन जब पाकिस्तान बंटा तो वो उधर चले गये और फिर उधर ही रहे.
मां बाप ने उन्हें शेर मोहम्मद ख़ां नाम दिया था लेकिन वो जाने गये इब्ने इंशा के नाम से.
उर्दू के मशहूर शायर और व्यंग्यकार.
लहजे में मीर की ख़स्तगी और नज़ीर की फ़क़ीरी पाई जाती थी. हिंदी और उर्दू पर उनको बराबर की महारत हासिल थी. ज़बान की इसी खासियत के बल पर उन्हें ऒल इंडिया रेडियो में काम मिला था. बाद में वो क़ौमी किताबघर के डायरेक्टर रहे फिर पाकिस्तानी दूतावास में सांस्कृतिक मंत्री रहे और पाकिस्तान में यूनेस्को के प्रतिनिधि रहे.
११ जनवरी १९७८ को वो लंदन में कैंसर से मरे.
चांदनगर, इस बस्ती के इक कूचे में, आवारागर्द की डायरी, बिल्लू का बस्ता, दिल-ए-वहशी, चलते हो तो चीन को चलिये, नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर, ख़ुमार-ए-गंदुम,यह बच्चा किसका बच्चा है और उर्दू की आख़िरी किताब उनकी हरदिल अज़ीज़ किताबें हैं.
आइये आपको सुनाते हैं- उर्दू की आख़िरी किताब से कुछ हिस्से.



इत्तेफ़ाक़ में बरकत है
-----------------------------------------------------------------------मुनीश

चिड़ा और चिड़िया
-----------------------------------------------------------------------मुनीश

कछुआ और ख़रगोश
-----------------------------------------------------------------------मुनीश

प्यासा कौआ

-----------------------------------------------------------------------मुनीश

भैंस
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान

बकरी
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान

ऊंट
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान

आदमी
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान

इल्म बड़ी दौलत है
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान

अख़बार
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान

कपड़ेवाले के यहां
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान

जूतेवाले के यहां
param>----------------------------------------------------------------------इरफ़ान

खाने की चीज़ें
param>----------------------------------------------------------------------इरफ़ान

मक्खन

----------------------------------------------------------------------इरफ़ान

Sunday, September 16, 2007

एमएफ़ हुसेन को उनकी 92वीं सालगिरह पर मुबारकबाद


हमारे दौर के बड़े ही मक़बूल कलाकार हुसेन का आज जन्मदिन है. आजकल वो जलावतनी की ज़िंदगी जी रहे हैं और विकास की होड़ में 'आगे' बढ़ते देश को इस बात पर ज़रा भी शर्म नहीं है.
हुसैन एक मुकम्मल कलाकार हैं.
उनकी आत्मकथा सुनो एमएफ़ हुसेन की कहानी को सुनने के बाद आप एक बिलकुल नयी अनुभूति पर पहुंचते हैं.
इस आत्मकथा को मैंने उनके सहयोग से तैयार किया है. उनके लिखे एक भी शब्द के साथ मैंने छेड़छाड़ नहीं की है. यह उनकी आत्मकथा एमएफ़ हुसेन की कहानी अपनी ज़ुबानी की अविकल प्रस्तुति तो है ही, एक मायने में यह ऑडियो बुक उनकी बुक से अलग और अनोखी भी है, क्योंकि हुसेन साहब ने इस ऑडियो बुक के लिये पांच नये अध्याय ख़ास तौर पर लिखे हैं.
हैरत होती है कि एक नॉन राइटर ऐसा अच्छा गद्य लिख सकता है. एक बार इस ऑडियो बुक को आप सुन लें तो सरस्वती आदि प्रश्न आपको बचकाने और एक हद तक अहमक़ाना लगने लगेंगे.
एक-एक घंटे की इन पांच ऑडियो CDs के पहले वॉल्यूम से सुनिये वो दो हिस्से जिनमें वो अपने दादा को याद करते हैं.दादा जो उनके लिये सब कुछ थे. आइये हुसेन साहब के इस ख़ास तर्ज़े बयां को सुनते हुए उन्हें जन्मदिन की बधाइयां दें.

दादा की उंगली पकड़े एक लड़का









दादा की अचकन







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इस ऑडियो बुक से एक और ट्रैक सुनिये यहां