दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Tuesday, August 7, 2007

फ़िल्म पुतलीबाई की क़व्वाली


यहां जो क़व्वाली ट्रांस्क़्रिप्ट की शक्ल में पेश कर रहा हूं वो इन जनाब ज़फ़र गोरखपुरी की लिखी हुई है.आप गोरखपुर की बांसगाव तह्सील के एक गांव में 1935 में पैदा हुए. कई फिल्मों के लिये गाने लिखने से अलग सुनते हैं कि उर्दू शायरी में आपको बडी इज़्ज़त हासिल है. एक ज़माने में बेहद लोकप्रिय रही इस क़व्वाली में उपमाओं का जो संसार है वह ध्यान खींचता है.हमारे लिये ज़फ़र साहब को जानना महज़ इस लिये भी ज़रूरी है कि वो हमारी भाषा और बयान को ख़ालिस हिंदुस्तानी रंग देते हैं.
यूसुफ़ आज़ाद और रशीदा ख़ातून क़व्वाल अपने दौर की नामी शख़्सीयतें हैं. इनकी आवाज़ें इस उपमहाद्वीप की विविधता भरी गायकी और ख़ास मैनरिज़्म की तरफ़ इशारा करती हैं. भूलने के इस दौर-दौरे में आइये इस तरह के साहित्य और गायकी को याद करें.




फ़िल्म पुतलीबाई(1972), निर्देशक-अशोक राय, संगीत-जय कुमार, फ़िल्म में सुजीत कुमार,हीरालाल और भगवान आदि थे.

रशीदा ख़ातून:
कैसे बेशर्म आशिक़ हैं ये आज के
इनको अपना बनाना ग़ज़ब हो गया
धीरे-धीरे कलाई लगे थामने
इनको उंगली थमाना ग़ज़ब हो गया

यूसुफ़ आज़ाद क़व्वाल:
जो घर में सिल पे मसाला तलक न पीस सके
उन्हें ये नाज़ हमें ख़ाक में मिलायेंगे
कलाई देखो तो चूडी का बोझ सह न सके
और उसपे दावा कि तलवार हम उठायेंगे
फ़रेब-ओ-मग़्र में इनका नहीं कोई सानी
ये जिन को डंस लें वो मांगे न उम्र भर पानी
बडा अजीब है दस्तूर इनकी महफ़िल का
बुलाया जाता है इज़्ज़त बढाई जाती है
फिर उसके बाद वहीं क़त्ल करके आशिक़ को
बडी ही धूम से मैय्यत उठाई जाती है
ख़ता हमारी है जो हमने उनसे प्यार किया
बुरा किया जो हसीनों पे ऐतबार किया

भूल हमसे हुई इनके आशिक़ बने
पास इनको बुलाना ग़ज़ब हो गया
ठोकरों में थे जब तक तो सीधे थे ये
इनको सर पे बिठाना ग़ज़ब हो गया

रशीदा ख़ातून:
हम औरतों को नज़र से उतारने वालो
ख़बर भी है ये शेख़ी बघारने वालो
कि इस ज़मीन पे पुतली भी एक औरत है
कि जिसमें मर्द को ललकारने की हिम्मत है
पहन के सर पे दिलेरी का ताज बैठी है
जो घर में थी वो सिंहासन पे आज बैठी है
अगर झुके तो ये दिल क्या है जान भी दे दे
जो सर उठाये तो मर्दों की जान भी ले ले
अगरचे फूल का इक हार है यही औरत
जो ज़िद पे आये तो तलवार है यही औरत
ये पुतली बनके ज़माने को मोड सकती है
उठे तो मर्द का पंजा मरोड सकती है

तेरी हिम्मत पे पुतली हमें नाज़ है
तेरा मैदां में आना ग़ज़ब हो गया

यूसुफ़ आज़ाद क़व्वाल:
एक दिन बोले फ़रिश्ते करके ये दुनिया की सैर
या खुदा दुनिया तेरी सूनी है औरत के बग़ैर
उठ पडे हिकमत दिखाने के लिये क़ुदरत के हाथ
सोच ली मौला ने औरत को जनम देने की बात
इस तरह मालिक ने की कारीगरी की इब्तिदा
चांद से मांगा उजाला नूर सूरज से लिया
रूप सैयारों से मांगा रूप ऊषा से लिया
पंखडी से ली नज़ाकत और कलियों से अदा
शाम से काजल लिया और सुबह से ग़ाज़ा लिया
बिजलियों से क़हर मांगा आग से ग़ुस्सा लिया
हौसला चट्टान से और दर्द पंछी से लिया
आसमां से ज़ुल्म मांगा सब्र धरती से लिया
शाख़ से अंगडाइयां झरनों से इठलाना लिया
बुलबुले से नाज़ुकी नद्दी से बल खाना लिया
आईनें से हैरतें तस्वीर से ख़ामोशियां
लहर से अठख़ेलियां मांगीं पवन से शोख़ियां
आंख ली हरनी से और शबनम से आंसू ले लिया
बदलियों से ज़ुल्फ़ नज़्ज़ारों से जादू ले लिया
लाजवंती से शरम और रातरानी से हया
आबरू मोती से ली सूरजमुखी से ली वफ़ा
ज़हर नागिन से लिया और सांप से डसना लिया
काटना बिच्छू से मांगा तीर से चुभना लिया
लोमडी से मांग लीं ताउम्र की मक्कारियां
मक्खियों से शोर और मच्छर से लीं अय्यारियां

इतनी चीज़ें जमा होकर जब् लगीं मौला के हाथ
और इन सब को मिलाया जब ख़ुदा ने एक साथ
तब कहीं जाकर बडी मेहनत से इक मूरत बनी
बिलनशीं पैकर बला इक दिलरुबा सूरत बनी
देखकर अपनी कलाकारी को मौला हंस पडा
और उसी अनमोल शै का नाम औरत रख दिया
रख चुका जब नाम उसके बाद ये कहने लगा.. क्या?
मैं बना कर तुझे ख़ुद परेशान हूं
तुझको दुनिया में लाना ग़ज़ब हो गया

रशीदा ख़ातून:
जब मेरे मौला ने सोचा मर्द को पैदा करे
सबसे पहले ये सवाल आया कि क़ुदरत क्या करे
पत्थरों से संगदिली और बेरुख़ी तक़दीर से
क़हर तूफ़ानों से मांगा और ग़ज़ब शम्शीर से
ली गधे से अक़्ल कौवे से सवानापन लिया
और कुछ कुत्ते की टेढी दुम से टेढापन लिया
घात ली बिल्ली से और चूहे से मांगा भागना
और उल्लू से लिया रातों को इसका जागना
ले लिया तोते से आंखें फेर लेने का चलन
भेडिये से ख़ून पीने का लिया दीवानापन
ली गयी गिरगिट से हरदम रंग बदलने की अदा
जिससे औरत को दिया करता रहे धोका सदा
इसको नाफ़रमानियां बख़्शी गयीं शैतान की
झूट बोले ताकि ये खाकर क़सम भगवान की
लेके मिट्टी मे मसाला जब ये मिलवाया गया
फ़र्क़ उस दम मर्द की फ़ितरत में ये पाया गया
मर्द के पुतलों में जिस दम जान दौडाई गई
उसमें औरत की भी थोडी सी अदा पाई गयी
औरतों में मर्द की सूरत नहीं मिलती जनाब
पर इन्हीं मर्दों में मिलते हैं जनाने बेहिसाब

शक्ल मर्दों की तो आदत के ज़नाने हो गये
क्या ख़ुदा ने चाहा था और क्या न जाने हो गये
बन चुका जब मर्द तो मौला ने मेरे ये कहा.. क्या?
कि अच्छा-ख़ासा बनाया था मैने इसे
बन गया ये ज़नाना ग़ज़ब हो गया

यू.आ.-वाह रे पुतलीबाई क्या दिलेरी दिखाई
र.ख़ा.-तेरी हिम्मत के सदक़े तेरी जुर्रत के सदक़े
यू.आ.-अपनी शोहरत का झंडा तूने दुनिया मॆं गाडा
र.ख़ा.-अच्छे-अच्छों को तूने एक पल में पछाडा
यू.आ.-तू बहादुर तू निडर अक़्ल और होश तुझमें
र.ख़ा.-जिस्म औरत का लेकिन मर्द का जोश तुझमें
यू.आ.-जिसको समझे ना कोई वो उलटफेर है तू
र.ख़ा.-तेरी हिम्मत की क़सम वाक़ई शेर है तू
यू.आ.-नारी होकर भी तूने वाह क्या गुल खिलाया
र.ख़ा.-जो ना मर्दों से हुआ तूने वो कर दिखाया
यू.आ.-तेरे ऊंचे इरादे तेरा हर काम ऊंचा
र.ख़ा.-तूने औरत का जग मॆं कर दिया नाम ऊंचा
तूने जो कुछ भी मुंह से कहा कर दिया
यू.आ/र.ख़ा.-तूने जो कुछ भी मुंह से कहा कर दिया
तेरा कर के दिखाना ग़ज़ब हो गया.

Wednesday, July 11, 2007

आज़ादी की नुक्ती


कोई एक महीने बाद वो दिन आ जायेगा जब हम अपनी 'आज़ादी' की एक और सालगिरह मनाएंगे.
हमारी ही तरह कइयों के लिये हर दिन की तरह महज़ एक दिन की हैसियत रखनेवाला ये दिन इतनी टीस तो समोए हुए है कि हम अपनी ग़ुलामी का एह्सास कर सकें. हमारे प्रायमरी स्कूल में तब तीन दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो जाती थीं. हम पास की नदी के किनारे से बेहाया (बेहया या पामबेल) की टहनियां तोड-तोड कर स्कूल पहुंचाते और देर शाम तक उन डंडियो में झंडियां लगाते. ये तिरंगी झंडियां भी हम ही बनाते थे. गीत-नाटक और देश भक्ति के आइटम हफ्तों से तैयार होने लगते थे. प्रभात फेरी करते हुए हम 'वीर तुम बढे चलो, धीर तुम बढे चलो, सामने पहाड हो सिंह की दहाड हो' ज़ोर-ज़ोर से गाते और 'भारत माता की जय' 'महात्मा गांधी अमर रहें' 'स्वतंत्रता दिवस अमर रहे' के नारे लगाते.
राष्ट्रगान सुन कर लेटे से खडे हो जाना और रेडियो पर भी राष्ट्रधुन सुनते ही सावधान की मुद्रा में आ जाना लंबे समय तक चला. दस साल पहले जिस दिन् आज़ादी की पचासवीं सालगिरह मनाई जा रही थी, हम(मैं और मित्र संजय जोशी)एक सेकेंड हैंड साइकिल खरीदने ईस्ट ऑफ़ कैलाश जा रहे थे. हमने फ़्री ऎड्स में एक मुफ़्त विग्यापन छपवाया था कि एक साइकिल चाहिये. विग्यापन के जवाब में सुबह तब एक फ़ोन आया था जब लाल क़िले की प्राचीर से प्रधानमंत्री देश की उपलब्धियों की सूची गिनाने की तैयारी कर रहे थे. बहुत बार्गेनिंग के बाद साढे चार सौ रुपये की सायकिल खरीद कर हमने उस छुट्टी के दिन कहीं एक पंचरवाला ढूंढा था और हवा भरवाकर बारी बारी से एक दूसरे को बैठा कर हम सायकिळ चलाते हुए पटपडगंज तक आये थे.रास्ते में कई साइकिलों और रिक्शों पर लगे प्लास्टिक के तिरंगों की फडफडाहट हमें याद दिलाती रही कि हम आज़ाद हैं. उन्हीं दिनों बच्चों की कहानियों का एक संग्रह हमारे हाथ लगा जिसमें राजनारायण दुबे की लिखी एक कहानी हमें आज़ादी की सालगिरह पर हमारे जैसे कई लोगों की भावनाओं का प्रतिबिंब लगी. संग्रह एकलव्य,भोपाल ने प्रकाशित किया है. भाई अनामदास की बताई परतदार हक़ीक़तों को हवा देती ये कहानी आप भी पढिये.

आज़ादी की नुक्ती

15 अगस्त के कारण हमने एक दिन पहले से कपडे धो रखे थे. 15 अगस्त के दिन हमने सबेरे 5 बजे उठकर मुंह-हाथ धोए और नहाया. फिर हमने चाय पी और उसके बाद हम ड्रेस पहनकर, जूते-मोज़े पहनकर बढिया तैयार होकर स्कूल गये.
वहां हम थोडे घूमे-फिरे और फूटे खाये. इतने में सर आ गये और कहने लगे चलो लाइन में लगो. हम लाइन में लग गये. एक मोडा हमरी लाइन में लगो. हमने बाके दो-चार करारे हाथ जमाए. इत्ते में बो मास्साब के पास पहुंच गओ. मासाब से बा ने कही कि मासाब मोहे एक मोडा ने मार दओ. तब मासाब मेरे पीछे दौडे तई हमने भग दओ और सिंधी कालोनी की गलियों में घूमते रहे और बुद्धा के खेत में से हीट के गल्ले बाजार पहुंचे. भा पे भाषण भये. भाषण सुन-सुन के हमरो दिमाग पच गओ. भाषण खतम भये हम सब स्कूल आए. हम लाइन में लगे नुक्ती बंट रही थी.
फिर बोई मोडा मिल गओ. बो फिर हमसे उलझन लगो. हमने बाको इत्तो-मारो इत्तो-मारो कि बाहे बेहोश कर दओ. हमें एक पुडिया नुक्ती मिली. उत्तीसी नुक्ती के पीछे हम दिन भर परेशान रहे और नुक्ती खात-खात घर आ गए.

Tuesday, July 10, 2007

मैं अकेली नहीं हूं




मातृत्व: कुछ छवियां


पहाड की चोटियों से लेकर समुद्र तक
रात अकेली पडी हुई है
लेकिन मैं जो तुम्हारा पालना झुला रही हूं,
अकेली नहीं हूं.

समुद्र में चांद के डूब जाने के बाद
आसमान अकेला रह गया है
लेकिन मैं जो तुमसे जुडी हुई हूं,
अकेली नहीं हूं.

सारा संसार अकेला हो गया है
सब यातनाएं भुगत रहे हैं
लेकिन मैं जो अपनी गोद में
तुम्हें भरे हुए हूं अकेली नहीं हूं.

गैब्रिएला मिस्ट्राल
अनुवाद: स्नेहमयी चौधरी

Monday, July 9, 2007

बुन रही हूं एक शरीर




मातृत्व: एक छवि

अब मैं सडकों पर नहीं जा सकती
मेरी कमर मोटी हो गयी है,
आंखों के नीचे गहरे काले गड्ढे बन गये हैं
इन सब को देख मुझे शर्म आती है
लेकिन फूलों से भरी हुई एक डोलची ले आओ
और मेरे पास, बिल्कुल मेरे पास उसे रखो.
धीरे-धीरे बाजे पर कोई मधुर लय सुनाओ.
उसके लिये, सिर्फ़ उसके लिये




मैं संसार में डूब जाना चाहती हूं,
मैं अपने शरीर को गुलाब से सजाती हूं
और सोते हुए उसको सुनाती हूं शाश्वत गीत
बाग़ों में बैठ घंटों मैं संजोती हूं सूरज का ताप
कि मुझमें फलों के रस-सा
शहद घुल जाये.
चीड के वनों से आती हुई हवा
मुझे शीतल बना जाती है,

रोशनी और हवा मेरे रक्त को गाढा और
शुद्ध कर दे

उसे स्वच्छ बनाने के लिये मैं अब न तो
घृणा ही करूंगी और न गपशप. केवल प्रेम
क्योंकि इस निस्तब्धता में मैं
बुन रही हूं एक शरीर,
एक चेहरा, आंखें
और हृदय निष्पाप !
--------------
1954 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित चिली की कवयित्री गैब्रिएला मिस्ट्राल.
पेशे से अध्यापिका रही गैब्रिएला आजीवन अविवाहित रहीं. कविताओं का अनुवाद स्नेहमयी चौधरी ने किया है. मातृत्व पर उनकी छः कविताओं मे से एक यहां पेश की जाती है. यह डॉ भावना को दिल के दरम्यां और मुक्ता जी को सादर भेंट है.

Thursday, June 7, 2007

गा मेरे मन गा !

अंतरा चौधरी





जाएं तो जाएं कहां





जागृति





जीना यहां





जीना इसी का नाम है





ज्वेल थीफ़




ममता





मैं तुम्हारी हूं-एक





मैं तुम्हारी हूं-दो





मान अपमान





मीनू





मुनीमजी





मुक्ति

Sunday, June 3, 2007

घूम-घूम के नाचो आज






पिछले महीने 'कतरनें भी कुछ कहती हैं' में अपने वर्षों से संचित कबाड के लिये एक व्यवस्थित रैक बनाते हुए कुछ EPs और LPs के कवर्स हाथ आए थे. यारों ने उन्हें देखकर ज़रा कुतूहल में फ़ोटो खिंचाया तो हम भी इतराने लगे.
यहां सब EPs(Extended Play Records)के कवर्स ही हैं आज. इनकी वर्गाकृति 7" X 7.1" होती थी.रिकॉर्ड का व्यास 17 सेमी होता था. इनमें आम तौर पर दो-दो गाने दोनों तरफ़ होते थे यानी चार गाने.कभी-कभी एक ही गाना पहली तरफ़ ख़त्म होकर दूसरी तरफ शुरू हो जाता था. रख रखाव में ये रिकॉर्ड्स थोडी सावधानी की मांग ज़रूर करते हैं लेकिन बडे थेथर होते हैं. 80 के दशक में इनकी क़ीमत 10 रुपये से लेकर 16 रुपये तक होती थी. ईएमआई-एचएमवी, पॉलिडोर, कॉंकॉर्ड, फ़िलिप्स और हिन्दुस्तान रिकॉर्ड्स इस क्षेत्र के प्रमुख खिलाडी थे.90 के पूर्वार्द्ध तक भी ये चलन में बने हुए थे.मैने फिल्म याराना का एक रिकॉर्ड कनॉट प्लेस की ब्लू बर्ड दुकान से नब्बे रुपये का खरीदा था.बाद में और अब भी ये हमें दिल्ली के मशहूर कबाडी अड्डों से कौडियों के मोल मिलते रहे हैं.सुधी श्रोता और संग्राहक, भी अब धीरे-धीरे शायद ये मानते जा रहे हैं कि मैं इन रिकॉर्ड्स के लिये उपयुक्त पात्र हूं क्योंकि इनमें से कई मुझे फ़ोन करते हैं कि मै उनके संग्रह से अपने काम की चीज़ें ले जाऊं.जहां तक इनके कवर्स का सवाल है, तो आप ये देख ही रहे हैं कि इनमें डिज़ाइन की एक निजी शैली की छाप है.तब इतने विकसित डिज़ाइन सॉफ्ट्वेयर्स नहीं थे लेकिन हर डिज़ाइन की अपनी एटमॉस्फ़ेरिक फ़ील है.इनके डिज़ाइनर्स में मोहन मुरली और बानीब्रत के अलावा भाषा आर्ट प्रोमोशन के नाम खूब दिखाई देते हैं.मैं चाहता हूं कि अगर आप मोहनमुरली और बानीब्रत के बारे में ज़्यादा कुछ जानते हों तो हमें लिखें.


काला पानी






काग़ज़ के फूल






लव इन शिमला





कोई जीता कोई हारा





जोगन





जनता हवलदार





जलन






लुबना




लडाकू





लाखन






क़ुदरत




ख़ून पसीना





कटी पतंग




करवा चौथ

Saturday, May 26, 2007

कतरनें भी कुछ कहती हैं !

कहते हैं कि जब ढूंढो तो वो चीज़ वहां नहीं मिलती जहां उम्मीद होती है. साल दर साल सहेजी चीज़ों का शायद ये एक व्यवस्थित रैक साबित हो.

रामवृक्ष बेनीपुरी


राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह


सुमित्रानन्दन पंत



बनारसी दास चतुर्वेदी



शिवपूजन सहाय



वासुदेव शरण अग्रवाल




देविका रानी




भिखारी ठाकुर



अब्दुर्रब चऊश और रज़िया बानो




हबीब पेंटर



मंडी




शकीला बानो भोपाली-ईपी कवर



तीसरा पत्थर




उसने कहा था



यूसुफ़ आज़ाद और रशीदा खातून