एक बार मैं ट्रेन में सफ़र कर रहा था. सुबह जब आँख खुली और साथी मुसाफ़िर दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर थोडे अनौपचारिक होने लगे तो मेरे एक साथी मुसाफ़िर ने मुझसे पूछा "आपका नाम?" मैंने जवाब दिया "मुशीरुल हसन" वो छूटते ही बोला "कोई शेर सुनाइये!"
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती वर्ष में एक व्याख्यान के दौरान प्रख्यात इतिहासकार और विचारक प्रोफेसर मुशीरुल हसन ने ये दो दृष्टांत सुनाए थे.
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अलीगढ के नाट्यकर्मी राजेश कुमार का पिछले हफ़्ते फ़ोन आया कि वह कतरन अगर मेरे पास हो तो मैं उन्हें भेज दूँ, वो शायद इस संदर्भ में कोई नाटक लिख रहे हैं. ख़ैर इस कतरन को उन्हें भेजा तो याद आया कि आपमें से जिनकी नज़र इस संस्मरण पर न पडी हो उनसे भी यह अनुभव साझा करूँ. तो पेश है. इमेज पर डबल क्लिक करने से वह पढने लायक़ हो जाएगी.