सत्रह ब्लॉगरों के सत्ताइस दुखडे सुनने-पढने के बाद यह बात आपको भले ही अच्छी न लगे कि तीन ब्लॉगर तेरह दुखडे भी न रो सके। लेकिन यह हुआ साल के आग़ाज़ के साथ, और कल ही वो यादगार ब्लॉगर मीट ख़त्म हुई है जो पिछले पाँच दिनों से चल रही थी। इसमें अशोक पांडे, मुनीश और मेरे अलावा चौथा ब्लॉगर हिमालय था. अशोक पांडे के दो पुराने दोस्त अपने बाल-बच्चों के साथ थे. दोनों कमांडर हैं : एक मिसाइल विशेषज्ञ है एक ध्वनि तरंगों पर काम करता है. और साथ थे मनोज भट्ट, जो हल्द्वानी में कम्प्य़ूटर का छोटा मोटा काम करते हैं और एक निवेदन पर मदद करने को आतुर और तत्पर रहते हैं.
उत्तरांचल की हरी-भरी वादियों में यह मिलन नये साल और दोस्ती की नई रस्में सेलीब्रेट करने का भी था. कोई कह नहीं सकता था कि यहाँ जुटे लोग एक दूसरे से पहली बार भी मिल रहे थे. समुद्र तल से कोई दो हज़ार मीटर ऊपर बने आशीष के सोनापानी रिसॉर्ट में सुविधाओं की तारीफ करने से ज़्यादा ज़रूरी यह पाया गया कि इन पाँच दिनों की पाँच रातों को जीने में सदियों के रंग घोल दिये जाएँ .
सुनसान वादी के गुलज़ार माहौल में एक हज़ार एक क़िस्सों से भरी ये ब्लॉगर मीट अपनी कुछ अविस्मरणीय यादें छोड गई. इसमें तारों से भरे आसमान के नीचे रात भर जलते अलाव हैं और रवींद्र संगीत के शाना-ब-शाना मीर-ग़ालिब और सस्तों के शेर हैं। शिवॉस रीगल रॉयल सैल्यूट की चुस्कियाँ और छोटी बडी बोतलों के ख़ाली कार्टन। और अशोक पांडे का कहना कि अपन की ओल्ड मांक अब भी सबसे शानदार. सेब, संतरो, आडुओं और माल्टों के बाग़ हैं. सुबह की चटख़ धूप में सामने खडा आवाज़ लगाता हिमालय और कान लगाए चीड, बाँझ और बुराँस के पेड हैं. एक पगडंडी है जिस पर रुक-रुक कर चलते टट्टू और सिर पर सूखी लकडियों के गठ्ठर उठाए ठिठकी औरतें हैं. ज़माने की नासाज़ियाँ और उन पर कभी हँसने और कभी गहरी फ़िक्रों की छापें हैं. लोग हैं जो अपनी ग़ैरमौजूदगी में भी हँसते-बोलते नज़र आते हैं. साधू और शैतान हैं जो अपने एकाकीपन में वक़्त की कभी वैसी भी पहचान देते हैं जैसी नानी-दादियों की कहानियों में होती थी. सने हुए नीबुओं के चटख़ारे और सतरंगी अचार हैं. नेरूदा, शिंबोर्स्का और हिटलर भी हैं. पनडुब्बियां हैं और उनमें काम करते फौजी हैं, जिन्हें इसलिये ख़ामोश बैठे रहना है ताकि वो ऑक्सीजन की खपत के ज़िम्मेदार न बनें. मान-अपमान की कहानियाँ और उन पर नवेली राय है. माल्टों की गेंद से खेलते बच्चे और पहाडी कुतिया से इश्क़ लडाता एक शहरी कुत्ता भी है. औरतें इस कडाके की सर्दी में इस बात से खुश हैं कि चलो अच्छा है दिल्ली की सर्दी में घरेलू कामों से आज़ादी है. और दूर बैठे आशीष अरोडा हैं जो हर पल यह ख़बर रख रहे हैं कि हमें कोई दिक़्क़त न हो. उदय प्रकाश, आलोकधन्वा और वीरेन डंगवाल के फ़ोन हैं जिन्हें इस पहाडी निस्तब्धता में बहुत साफ सुना जा सकता है. एक क्रिकेट मैच है जो घाटी में किन्हीं दो टीमों के बीच चल रहा है और लाउडस्पीकरों पर होने वाली कमेंटरी भी. अनजानी मंज़िलों की खडी चढाइयाँ हैं और गहरी खाइयों के बीच नमी में नहाए जंगली पौधे. अनदेखी चिडियाँ हैं और भालू के पंजे भी. पर्वतारोहण के लोमहर्षक क़िस्सों के बीच अशोक पांडे और उनकी ऑस्ट्रियाई पत्नी सबीने भी. इसमें मनोज भट्ट के पिता भी हैं जो गीज़र के पानी से नहाने के बजाय घर के बाहर आग जलाकर अपना पानी गरम करते हैं. फिर गप्पें हैं ...और सबसे ज़्यादा ज़िक्र अशोक पांडे की मेहमाननवाज़ी का क्यों किया जाना चाहिये.
चढाई से ठीक पहले
गहन दार्शनिक चर्चा में मशग़ूल मुनीश और अशोक पांडे
गहन दार्शनिक चर्चा जो ख़त्म ही नहीं होती
रानीखेत क्लब में एक ऐतिहासिक हस्ती बहादुर सिंह के साथ अशोक पांडे
रानीखेत का ऐतिहासिक होम फार्म
लौटते हुए नैनीताल
सोनापानी की एक नर्म धूप और मुनीश
माल्टे और मुनीश
सोनापानी के अपने कॉटेज के सामने मुनीश
इरफ़ान और मनोज भट्ट
इरफ़ान के पीछे गहरी घाटियाँ
सोनापानी के पीछे का हिस्सा

सोनापानी के कॉटेज
सोनापानी पुकारता है
हिमालय पर बादलों के छँटने का इंतज़ार
चाय की चुस्की के बीच हिमालय की चोटियाँ
जहाँ चार यार मिल जाएँ
रानीखेत क्लब में डेढ सौ साल पुराना फायर प्लेस
लौटते हुए पिलाट्टिक के शहर नैनीताल में मनोज भट्ट
जन्मदिन पर केक भी
...और एक वीडियो झलक अशोक पांडे के दार्शनिक अंदाज़ की