दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Monday, June 30, 2008

छिब्बरजी अब बंबई में हैं!


विजय दीपक छिब्बर के साथ अभी पिछले हफ़्ते कोई सात बरसों से चला आ रहा लगभग रोज़ का सिलसिला टूट गया। वो अब ट्राँसफ़र होकर बंबई पहुँचे हैं और विविध भारती के साथ बतौर प्रोग्राम एग्ज़ीक्यूटिव काम करेंगे. इस तरह अब शायद हमारे आपके साथी ब्लॉगर यूनुस उनकी आगे की ख़बर हम तक पहुँचाएंगे. नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से प्रशिक्षित विजय दीपक छिब्बर फिल्मों-नाटकों और टीवी धारावाहिकों में काम करते हुए आख़िरकार जिस एक पायनियरिंग भूमिका के लिये याद किये जाएँगे, वो है नए एफ़एम रेडियो में प्रोग्रामिंग का सूत्रपात. उनके एक और सहयोगी दानिश इक़बाल इस काम में बराबर के हिस्सेदार हैं और इस तरह ये दो मूरतें तब तक जय और बीरू की तरह दिखती रहीं जब तक एफएम प्रसारण का नया मुहावरा गढ नहीं लिया गया. उसी नींव पर आज एफ़एम फल-फूल रहा है, ये अलग बात है कि प्रोग्रामिंग को बाज़ार ग़ैर-ज़रूरी मानता है.

कोई तीन साल पहले मैंने एक रिसर्च के सिलसिले में छिब्बरजी से एक लंबा इंटरव्यू किया था जिसे आज तक आपसे शेयर नहीं कर सका हूँ. कुछ तो शायद इसलिये कि इसे चापलूसी के ख़ाने में न रख दिया जाय और दूसरा इसलिये कि ब्लॉग और उसके ज़रिये शेयरिंग का मंच भी हाल ही की घटना है.
मैंने छिब्बरजी (यही हम उन्हें कहते आए हैं) के साथ काम करते हुए बहुत कुछ सीखा है और आगे भी ऐसे मौक़े हासिल करना चाहूँगा. ऐसा नहीं है कि उनसे हर बात पर सहमति ही रही हो, कई मौक़ों पर हम तीखी-बहसों में भी उलझे, जिनका मक़सद कभी प्रोग्राम तो कभी अपनी सोच में क्लैरिटी लाना रहा है.पिछले पुस्तक मेले में अशोक पांडे द्वारा अनूदित वैन गॉ की आत्मकथा से वो बडे प्रभावित हुए(अशोक ने अपनी मुलाक़ात के दौरान ये किताब उन्हें भेंट की थी) और अशोक तक अपनी बधाई भेजने को कहा, जो बधाई मैं इस पोस्ट के ज़रिये अशोक तक पहुँचाता हूँ. मुझे आज यह सोचते हुए अच्छा लगता है कि जब एफएम का दूसरा चैनेल देश में शुरू हुआ तो कई नये प्रोग्राम्स की सोच को अमली जामा पहनाने की ज़िम्मेदारी मुझे दी गई. मैं इस पोस्ट के ज़रिये छिब्बर जी की शख़्सियत और उनके निजी अनुभवों को सामने लाने के अलावा उनके उस विश्वास के प्रति सम्मान ज़ाहिर करना चाहता हूँ जो उन्होंने मुझ पर किया।




Part-1 12min


Part-2 7min


Part-3 18min


Part-4 7min


Part-5 4min


Part-6(Last) 27min

Tuesday, December 4, 2007

ख़्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त

घर से स्कूल उन दिनों बहुत दूर लगता था.

चलते-चलते नन्हें-नन्हें पाँव थक जाया करते थे.एक ख़ाब जो मैं अक्सर देखा करता था, वो ये था कि मेरे दोनों हाथों की जगह दो बडे-बडे पंख हैं और मैं उडता-उडता स्कूल पहुँच रहा हूँ.

एक लंबी कभी न ख़त्म होनेवाली पगडंडी मुझे ख़ूबसूरत पहाडों की तरफ़ ले जा रही है.रास्ते में ऊँचे घने पेड हैं, एक झरना वहाँ लगातार गिरता रहता है,चिडियों का एक झुंड अभी-अभी उडा है और एक चंचल हिरन कुलाँचे भरता हुआ सामने से गुज़र गया है. मैं हर रात ऐसे ही एक सपने में - घूमा किया - तब मैं बहुत छोटा था.


सपने में मैं बहुत अकेली होती हूँ और तभी एक जंगली भैंसा मुझे दौडाने लगता है, मैं भागने की कोशिश करती हूँ लेकिन मेरे पैर जैसे कहीं जम जाते हैं, मैं दौड नहीं पाती. Thanks God तभी मेरी आँख खुल जाती है - मैं पसीने से लथपत उठ बैठती हूँ.


मेरे तो exams हो रहे होते हैं और मैं अक्सर लेट पहुँचती हूँ. कभी-कभी ऐसा भी देखा कि पेपर कुछ और था और मैं तैयारी कुछ और करके आई...

बात जब ख़ाबों की शुरू हुई - और वो भी बचपन में आने वाले ख़ाबों की - तो कुछ इसी तरह से दोस्तों ने अपने सपनों को याद किया.


कुछ के लिये तो अब सपनों का ज़िक्र भी एक अटपटा प्रसंग है. यानी वर्तमान में इस तरह उलझा हुआ है मन कि लौटकर जाना और वो भी सपनों में, कठिन तो है ही, अप्रीतिकर भी है.


जो भी हो... ग़ौर किया तो पाया कि हर किसी की ज़िंदगी से जुडे हैं ख़्वाब - कभी रात की नींदों से आते हुए तो कभी दिन के उजालों में बुने जाते हुए.


कोई ख़ाब क्यों आया? उसकी ताबीर क्या है? मन कभी इस पर सोचता है, तो कभी इसके अहसास से घंटों, तो कभी हफ्तों लुत्फ़अंदोज़ होता रहता है.


अच्छा क्या था बुरा क्या? सही क्या था ग़लत क्या? ख़ाबों के नफ़े-नुक़सान की बातें - ये सब उम्र के एक पडाव पर ही तौले जाते हैं या कभी-कभी नहीं भी तौले जाते. बचपन से हम लडकपन में क़दम रखते हैं और फिर जवानी की सीढियाँ चढते हुए आज की ज़बान में कहें तो सीनियर सिटिज़ेन होते हैं - इस तरह ज़िंदगी का एक सफ़र:-

पाने की तमन्ना - पाने की कोशिश और पाए हुए की तफ्तीश करता हुआ अपने मक़ाम पर पहुँचता है.




इतवार का एक और दिन...

बहुत पीछे और बहुत आगे को खँगालने और explore करने का एक और अवकाश
एक मौक़ा ख़ुद से मुख़ातिब होने का...
कुछ लम्हे अपने लिये,


प्रोग्राम है रेडियो रविवार और मैं इरफ़ान
.


मेज़ पर ताश के पत्तों सी सजी है दुनिया
कोई खोने के लिये है कोई पाने के लिये
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बचपन के दिन - मस्ती और बेफ़िक्री के दिन.

हर रोज़ नए ख़ाब पलते हैं, दुनिया की सारी ख़ुशियाँ अपने दामन में समेट लेने का अहद होता है.


क्लासरूम में सबसे पूछा जा रहा था --

I want to become a great poet and writer.
मुँह से बेसाख़्ता निकला था.

मुझे ज़माने की भेडचाल पसंद नहीं. जिसे देखो वही डॉक्टर इंजीनियर, वकील, टीचर...


ठीक !


लेकिन अब सोचता हूँ तो poet and writer ठीक लेकिन ये great poet and writer? बात कुछ हज़म नहीं होती!

"बाप न मारे पेंडुकी बेटा तीरंदाज़" एक फ़िकरा कहीं से उडता हुआ आता है और टनाक से लगता है. सपने संकल्प का रूप लेते हैं.


क्या हुआ? क्या खोया? क्या पाया? - यानी ये सब जोड-गुणा के लिये भी एक उम्र की दरकार थी...और इस उम्र के ये ज़रूरी पडाव थे.

हर शै जैसे बिल्कुल नयी थी और जैसे हमने ही उसे पहली बार देखा था. किसी ने देखा भी था तो ये हमारे सरोकार का वैसा हिस्सा नहीं थी.


यानी ख्वाबों के चिराग़ दिल की परतों के नीचे रौशन हो रहे हों, पलकों पर सजे हर पल नयी रौशनियाँ बिखेर रहे हों या फिर ज़ाहिर होकर एक guiding force की तरह काम कर रहे हों --

हर रंग में और हर हाल में हमें इंसान होने का अहसास कराते हैं.

शायद यही हैं जो हमें थककर बैठने नहीं देते -
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एक ख़्वाब जो बहुत मेरा है, अज आपके साथ share करता हूँ.

इसमें एक बलखाती-मचलती नदी है, सर्दियों की गुनगुनी धूप है और मैं इस नदी की सतह पर पीठ किये लेटा हूँ. नदी जहाँ-जहाँ जा रही है मैं आसमान की तरफ मुँह किये हुए लेटा एक अनजाने सफर पर निकल पडा हूँ.

हक़ीक़त से कोसों दूर. कभी न पूरा हो सकने वाला ख़्वाब.

सवाल ये उठता है कि क्या ख़्वाब इसलिये होते हैं कि उन्हें पूरा होना है?

सवाल ये भी उठता है है कि क्या ख़्वाब देखना आपके बस में होता है? वग़ैरह-वग़ैरह.

सवाल समझदार लोग उठाते हैं. ये शायद उन्हीं की field है. फिर शायर उनसे हँस कर कह देता है -


दो और दो का जोड हमेशा चार कहाँ होता है
सोच समझ वालों को थोडी नादानी दे मौला.
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एक बात जो हमेशा दुहराई जाती है यानी जिसे हमने अभी या कभी ज़रूर सुन रखा है वो ये है कि यथार्थ की कठोर चट्टान से टकरा कर सपने टूट जाते हैं. बात ठीक है लेकिन इस बात का दिलचस्प पहलू ये है कि इसी यथार्थ को खरिज करते हुए, इसके घटाटोप से बाहर आने के किये स्वप्न एक ज़रूरी सामान रहे हैं और रहेंगे.

यथार्थ की एक ऐसी दुनिया में- जहाँ सब कुछ systematic और controlled है -- एक individual अपनी essential subjectivity assert करता है और इस तरह अपेक्षाओं और बने बनाए मानदंडों पर खरा न उतरने से बहिष्कृत कर दिये जाने से बच जाता है. इस तरह पराएपन के अहसास में जीने के बजाय वो अपनी एक निजी दुनिया चुन लेता है. जिसमें कुछ समय के लिये ही सही सुरक्षित और महफूज़ महसूस करता है.


शायद यही वजह है कि हम अक्सर कहीं पर होते हुए भी वहाँ नहीं होते हैं.
बहरहाल हम जहाँ भी होते हैं वहाँ हम वो तलाश कर रहे होते हैं जिसे हम दिल के बहुत नज़दीक पाते हैं.
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योजनाएँ बहुत देर तक बनती रहीं. उनमें से कुछ ज़मीन पर थीं तो कुछ हवा में.


आख़िर कब तक ख़ामोश रहते -- बालकनी में अख़बार से सिर जोड़कर बैठे दादाजी से रहा नहीं गया --

"तुम लोग बातें ज़्यादा करते हो, काम कम. कुछ करो तो समझ में आये कि हाँ कुछ हुआ. और याद रखो वक़्त से पहले और क़िस्मत से ज़्यादा किसी को नहीं मिलता.
"


बात ठीक होगी शायद क्योंकि बाल उन्होंने भी धूप में सफेद नहीं किये. सीख की बातें दे सकते हैं क्योंकि उन्होंने ज़माना देखा है.

लेकिन कोई इनसे पूछे कि यही बात जब आपके दादाजी कहते थे यानी जब आप हमारी उम्र के थे -- तो क्या आपने मानी थी.

ये शायद इंसानी फितरत है कि अनुभवों का एक ज़ख़ीरा उसमें वो आत्मविश्वास भरता है कि ख़ुद से पहले की पीढियों को वो बचकाना और कभी-कभी अहमक़ाना समझने लगती है.
हर चीज़ को, हर इंसान को उसके परिवेश में देखें तो हर बात समझ में आने लगती है लेकिन इस सबके बीच समय का फ़ासला निष्कर्षों को कभी ग़लत ठहराता है तो कभी सवाल छोड जाता है.

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जागती आँखों के ख़ाब एक लाइट हाउस की तरह होते हैं.
हर हार के बाद दिल को हौसला देते हुए. कभी-कभी ऐसा होता है कि हमारी इच्छाएं ही सपनों का रूप धारण कर लेती हैं.

हर इंसान की ज़िंदगी में उसकी युवावस्था उसकी सर्वाधिक ऊर्जा का और ड्राइव का समय होता है.

"अगर अब तक कुछ नहीं किया तो कब करोगे?" पूछा जाता है.
पैरों में एक रफ़्तार, दिल में एक उमंग और सब कुछ पा लेने का, समेट लेने का जज़्बा-

स्वामी विवेकानंद ने कहा -
"इच्छाओं का समुद्र अतृप्त रहता है. ज्यों-ज्यों उसकी मांगें पूरी की जाती हैं, त्यों-त्यों वो गर्जन करता है."
यानी एक बार फिर ज़िंदगी की जद्दोजहद का एक फ़लसफ़ाना निचोड़.

जो भी हो, जब तक दम-ख़म है, हारें क्यों?
बाद में क्या होगा, किसने जाना?
हर इंसान को एक ही जीवन मिला है और इसके सभी जौहर यहीं और इसी जीवन में सामने आने है‍-
सारी कोशिशों का निचोड़ यही है कि ख़ाब मुरझा न जाएं...कहीं रूठ न जाएं.
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जब हम छोटे होते हैं तो सपने देखते हैं
जब हम बड़े होते हैं तो सपने देखते हैं
सपनों का रूप बदलता रहता है और हम हर दौर में उन्हें अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं.
कहते हैं कि सपने हमारी अधूरी इच्छाओं को भी प्रतिबिंबित करते हैं.
फिर ऐसा पड़ाव भी आता है जब हम प्रौढ़ या कहें मैच्योर हो जाते हैं.
यानी सपनों की चीरफाड़ कर सकनेवाले.
लेकिन कोई दावे से नहीं कह सकता कि इस उम्र में सपने नहीं होते. वो तो होते हैं और उन्हें हम अपने जीते जी पूरा भले न कर पाएं - हम उन्हें सजा देते हैं - आनेवाली पीढ़ी की आंखों में --
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"मेरा नाम सृजित है. मेरा सपना था कि मैं एक बड़ा आदमी बनूं- जैसे कि पायलट, सायंटिस्ट या चित्रकार. असल में मेरे सायंस और ड्रॉइंग में अच्छे नम्बर आते थे. 12th में पता नहीं क्यों मेरे अच्छे नम्बर नहीं आए और कुछ बैड लक ऐसा रहा कि मेरा कोई सपना पूरा नहीं हो पाया.
आज मैं यहां दिल्ली में एक इंश्योरेंस एड्वाइज़र हूं यानी आप समझ लीजिये कि मेरी लाइन ही चेंज हो गयी. मेरा जो बचपन का सपना था वो तो अब मिट गया है.
मैं आज ज़्यादा प्रैक्टिकली सोचता हूं और अब जो मेरा सपना है मतलब अब जो मैं चाहता हूं वो ये कि मैं लाइफ़ को ठीक से फ़ेस करूं; कुछ पैसा कमाऊं. मेरी कुछ कमियां रही होंगी ज़रूर ही...लेकिन मुझे लगता है कि मुझमें कुछ अच्छाइयां भी हैं - अब उन्हीं अच्छाइयों को पहचानने में लगा हूं...और अब मैं कुछ स्पिरिचुअल भी हो रहा हूं."

ये शब्द हैं सत्ताइस वर्षीय सृजित के...जो उसने मुझसे कल रात कहे.

शायद इन शब्दों में आपको भी अपनी आवाज़ सुनाई दे -
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"ज़िंदगी में कोई दो ही मौक़े दुख से भरे होते हैं -
.....एक है इच्छाओं का पूर्ण हो जाना और
.....दूसरा इच्छाओं का अपूर्ण रहना."

ऐसा कहते हैं जॉर्ज बर्नाड शॉ .

सपनों को इच्छाओं का पर्यायवाची मान लें तो बर्नाड शॊ ने बड़ी असमंजस की स्थिति खड़ी कर दी है.

शायद इसी लिये एक जनाब का कहना है कि जिसे हम सपना कहते हैं उसे हमें जीवन के एक लक्ष्य के रूप में देखना चाहिये और जैसे ही ये लक्ष्य, ये मक़सद तय कर लिया जाएगा-- इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा कि वह पूरा हुआ या नहीं - उसको पूरा करने की कोशिश में लगे रहना, उसके लिये चलते रहना ही असली आनंद है...तो चलिये...चलते रहिये.
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Monday, December 3, 2007

दिल ने फिर याद किया : एफएम गोल्ड का ऐतिहासिक प्रोग्राम

जब कोई चार महीने पहले ये प्रोग्राम मुझे मिला तो मेरी बाँछें खिल गईं. वैसे भी एफ़एम गोल्ड, यानी दिल्ली में ऑल इंडिया रेडियो का 106.4 मैगा हर्ट्ज़ पर गोल्डेन इरा के म्यूज़िक का ख़ास चैनल, सुनने वालों के लिये एक अलग आकर्षण रखता है क्योंकि किसी भी घंटे में अगर आपको सन 50-60 का सुरीला-मधुर संगीत सुनना हो तो ये चैनेल आपको निराश नहीं करता. फिर पुराने दौर की फिल्मों और फिल्मी हस्तियों को बडे ही रोचक ढंग से यहाँ याद भी किया जाता है. ज़्यादातर प्रज़ेटर्स 25-30 साल के आयु वर्ग के हैं लेकिन अपने पैशन और चैनल की ज़रूरतों के मुताबिक़ हर क्षण कुछ नया जोड रहे होते हैं. इस तरह वर्तमान को अतीत की हलचलों से समृद्ध करने की एक सतत कार्रवाही यहां जारी है.

मेरे लिये इस चैनल पर प्रोग्राम करना हमेशा ही इसलिये भी एक्साइटिंग रहा है कि एक तो यहां कहने के लिये कुछ स्पेस है और दूसरे यहां प्ले किया जाने वाला म्यूज़िक मेरे निजी संग्रह से मेल भी खाता है. संगीत को लेकर मेरे दीवानेपन की अनेक कहानियाँ कही जाती हैं जिनमें कई अतिरंजना से भरी हुई हैं. मैं जब सचमुच संगीत प्रेमियों और संगीत संग्राहकों से अपने शो के दौरान बात करता हूं तो अहसास होता है कि मैं अपनी रुचियों और संग्रह की सीमाओं में किस क़दर क़ैद हूं.

बहरहाल जो भी टूटा-फूटा और सीमित संग्रह मैं कर सका हूं और कर रहा हूं उसका मज़ेदार पहलू यह है कि मेरे पास यह रोचक प्रोग्राम है जिसका नाम है दिल ने फिर याद किया. प्रोग्राम का संकल्प है कि इसमें फिल्म संगीत और फिल्म इतिहास के बीते दौर की यादें ताज़ा की जाएंगी. यहां तक तो ठीक है कि फिल्मों के इतिहास और व्यक्तियों के एनेक्डोटल इंस्टैंसेज़ किताबों और पत्र-पत्रिकाओं मे कुछ हद तक ढूंढे से मिल जाते हैं लेकिन इस तरह के शोज़ कोरैबोरेटिव गानों के बग़ैर क्या हो सकते हैं.
एक ख़ुशफ़हमी ये भी है कि कैसा भी फिल्म संगीत ऑल इंडिया रेडियो की रिकॉर्ड लायब्रेरी में तो होगा ही जबकि सच्चाई ये है कि यहां कुछ भी नहीं है. अगर हम मूक फिल्मों के दौर के फौरन बाद के कोई बीस बरसों के गाने तलाशें तो सिवाय निराशा के कुछ हाथ नहीं लगेगा. अपनी सघन यात्राओं के दौरान रिकॉर्ड बेचने की पुरानी दुकानों की खाक छानने और अपने पिता के संग्रह को सीने से लगाए घूमने का जुनून अब लगता है कि निरर्थक नहीं रहा. याद करूं तो हर गाने और हर कैसेट के पीछे एक मुख्तसर कहानी जुडी हुई है जो अब मेरे लिये एक दुर्लभ ऐतिहासिक महत्व की चीज़ है.

तो ख़ैर ... कल के दिल ने फिर याद किया शो में मैंने तक़दीर(1943), तानसेन(1943), सिंगार(1949),पगली(1950),ज़ीनत(1945),पुनर्मिलन(1940),शुक्रिया (1944), पृथ्वीवल्लभ(1943), विद्यापति(1937)और मुक़ाबला(1942) के कुछ गाने सुनाते हुए इन फिल्मों से जुडे कुछ नामों और फिल्मों का ज़िक्र किया तो सुनने वालों के फोन इस बात को रेखांकित करते रहे कि इन गानों से वो 60-65 साल पीछे छूट गये अपने बचपन और जवानी के दिनों में पहुँच गये. मेरठ के एक श्रोता संपूरण सिंह का कहना था कि पेशावर में उनकी क्लास का एक लडका बहुत चंचल था और दो पीरियड्स के बीच वो अक्सर बंसरी(1943) का यह गाना ज़ोर-ज़ोर से गाया पाया जाता था और लडके बडे मज़े से उसे सुनते थे. हाजी नूर मोहम्मद चार्ली उस ज़माने के बडे नामची न कॉमेडियन थे और साइलेंट इरा से लेकर बोलती-गाती फिल्मों के शुरुआती दौर तक फिल्मों में अपनी कॉमेडी के जौहर दिखाते रहे. वो अपने गाने खुद लिखते थे, खुद ऐक़्टिंग करते हुए उन्हें गाते थे और कई बार इन गानों को ख़ुद कंपोज़ भी करते थे. आप भी सुनिये बंसरी का वह गाना जिसे सुन कर संपूरण सिंह अपने पेशावर के दिनों की यादों में खो गये.
क्या आपको किशोर कुमार की याद आई?

आया करो इधर भी मेरी जाँ कभऊ-कभऊ...

Tuesday, September 4, 2007

मेरी पसंद के गीत- दो


ये है 1966 की फ़िल्म आख़िरी खत का गीत. आवाज़ भूपिंदर की है और गीत कैफ़ी आज़मी का. संगीत ख़ैयाम का है. मेरी पसंद श्रृंखला की दूसरी कड़ी.






Monday, June 25, 2007

दिल ने फिर याद किया !

साइलेंट इरा से साउंड इरा में क़दम रखते ही फ़िल्मों में गाने बजाने की एक ज़बर्दस्त दुनिया अंगडाई लेने लगी.
आज हम आसानी से कुछ पुराने गायकों, संगीतकारों और गीतकारों के नाम लेकर समझते हैं कि हमने अपनी फ़िल्म संगीत की विरासत से अपना वास्ता जोड लिया. केएल सहगल, कानन बाला, तिमिर बरन, केसी डे, पंकज मलिक, देविका रानी, नूरजहां, शमशाद बेगम, सुरैया और गीता दत्त होते हुए शायद आप उमा देवी तक का नाम ले लें. रफी, मुकेश, किशोर, मन्ना डे और लता, आशा, तलत तो नए में ही गिने जाते हैं.

गायिका सुशीला 1938


अब मैं नेमड्रॉपिंग का खतरा उठाऊंगा क्योंकि ये कुछ ऐसे नाम हैं जिनके बग़ैर फिल्म म्यूज़िक का ज़िक्र अधूरा रहता है. इन्हीं लोगों की यादों को समर्पित है एफएम गोल्ड के रेडियो मैटिनी तीन से छः का यह 'दिल ने फिर याद किया' सेक्शन. संडे की शाम 5 से 6 बजे तक आप सुन सकते हैं हिंदी फिल्मों के प्रारंभिक दौर का दुर्लभ संगीत और अब काल के गाल में लुप्त हो चुके महारथियों का ज़िक्र.

कुछ बिसरे गायक-
1. सुरेश
2. गोविंदराव टेम्बे
3. बिब्बो
4. सुरेंद्र
5. अरुण कुमार
6. विष्णु पगणीस
7. सरदार अख़्तर
8. इला घोष
9. रामदुलारी
10.ख़ान मस्ताना
11.श्याम
12.एस डी बातिश
13.जीएम दुर्रानी
14.चितलकर
15.कल्याणी
16.पारुल घोष
17.धनंजय भट्टाचार्या
18.अणिमा दासगुप्ता
19.सुलोचना कदम
20.अमृत लाल
21.माया बनर्जी
22.ज़ीनत बेगम
23................सूची जारी है!


गुनगुना सकें तो गुनगुनाइये...
फिल्म्-सफर का ये गीत्त "कभी याद करके गली पार करके चली आना हमारे अंगना......"
आवाज़ें हैं बीणापाणि मुखर्जी और चितलकर की.
गीत लिखा है अपने गोपाल सिंह नेपाली ने और धुन ज़ाहिर है चितलकर ने ही बनाई है यानी सी.रामचंद्र ने.
काश कि पॉडभारती वाले देबाशीष मुझे ये बता देते कि इस गीत को उसी तरह कैसे यहां चढाऊं जैसे वो अपने पॉड्भारती के साउंड चढाते हैं. मुझे कोई और प्लेयर पसंद नहीं.

Sunday, June 24, 2007

रेडियो मैटनी 3 से 6


दिल्ली में अब दस से ज़्यादा एफएम चैनल्स हैं जो 24x7 प्रसारण करते हैं.मैं इनमें से एक पर रेडियो जॉकी हूं. इसका नाम है एफएम-गोल्ड. इसे आप 106.4 मैगाहर्ट्ज़ पर दिल्ली और आसपास के इलाक़ों में सुन सकते है. जालंधर में ये आपको एफ़एम 107.2 मैगाहर्ट्ज़ पर सुनाई देता है जबकि हिन्दुस्तान के किसी भी कोने में आप इसे शॉर्टवेव 31 मीटर बैंड पर सुन पाते हैं. ये शॉर्टवेव पर कैसे पहुंचता है इसकी ख़बर प्रसारकों को भी नहीं है. श्रोताओं की चांदी है और टेक्निकल लोग इसका ये लीकेज रोक भी नहीं पा रहे हैं. कहा जाता है कि प्रायवेट चैनेल्स की तकनीकी प्रसारण गुणवत्ता के सामने यह कहीं नहीं ठहरता और यह भी उडती हुई ख़बरें सुनी जाती हैं कि इस चैनेल को सैबोटाज करने के लिये प्रशासनिक मशीनरी प्रायवेट ऑपरेटरों के साथ गहरी सांठगांठ में मुब्तिला है. सुदूर चीन और भारतीय उपमहाद्वीप से मिलनेवाली ईमेल्स और चिट्ठियां बताती हैं कि इस चैनेल की साख़ अच्छी है और वजह ये बताई जाती है कि इसकी पहचान अलग है क्योंकि बाक़ी सारे चैनेल एक जैसा ही संगीत बजाते हैं, एक को दूसरे से अलग कर पाना और पहचानना मुश्किल है. मुनाफ़े-टीआरपी के चक्कर में बेसिरपैर की प्रोग्रामिंग करते हैं. इसके उळट समाचारों और जानकारियों के साथ एक खास दौर का संगीत ही इस चैनेल पर सुनाई देता है. लोग नॉनस्टॉप-नॉनसेंस चैटिंग को एक सीमा तक ही झेलते हैं और वापस पुराने गानों और जानकारियों की दुनिया में लौट आते हैं.
इस परिचयात्मक नोट के लंबा खिंच जाने से मैं अभी तक अपनी बात शुरू नहीं कर पाया हूं जिस बात के लिये मैंने ये पोस्ट लिखने का मन बनाया इसलिए सीधे मुद्दे की बात पर आता हूं.
शनिवार और इतवार दोपहर तीन बजे से छः बजे तक का वक़्त एफएम पर जिस प्रोग्राम के लिये मुक़र्रर है उसका नाम है- 'रेडियो मैटिनी तीन से छः', इस प्रोग्राम में किसी फ़िल्म को लेकर उसके बारे में बात होती है और उस फ़िल्म का साउंडट्रैक बजाते हुए गाने और फ़िल्म की कहानी सुनाई जाती है. भारी संख्या में श्रोता इसमें फोन करके हिस्सा भी लेते हैं. इस प्रोग्राम का आखिरी घंटा पुराने और दुर्लभ गीतों को समर्पित है जिसका ज़िक्र जल्द ही करूंगा. तो रेडियो मटिनी में आम-तौर पर यह विवेच्य फिल्म पुरानी ही होती है. अब तक मैं इसमें प्रमुख रूप से 'अलबेला', 'आग', 'सूरज और चंदा', 'तीसरी क़सम', 'मंडी', 'दिले नादां', 'भूमिका' और 'कथा' फिल्में ले चुका हूं. आज मैने जो फ़िल्म उठाई थी वो थी 'सोने की चिडिया'.

"सोने की चिडिया" में मुझे कभी 'भूमिका' और कभी 'मेघे ढका तारा' की याद आती रही. हालांकि ये दोनों ही फ़िल्में 'सोने की चिडिया' के बाद बनीं हैं.
इसे लिखा और प्रोड्यूस किया है इस्मत चुग़ताई ने, निर्देशक शाहिद लतीफ़ हैं, संगीत ओपी नैयर का है, गीत साहिर लुधियानवी , मजरूह सुल्तानपुरी और कैफी आज़मी ने लिखे हैं. फ़िल्म 1958 में बनी थी. बॉक्स ऑफ़िस पर तब इसकी क्या रिपोर्ट रही,आप बताएंगे तभी हम जान पायेंगे. फ़िल्म में नूतन, तलत महमूद और बलराज साहनी प्रमुख कलाकार हैं. धूमल इसमें बन रही फ़िल्म के टिपिकल प्रोड्यूसर बने हैं जिन्हें बलराज साहनी एक प्रसंग में बेवक़ूफ़ बताते हैं.
गाने जिस क्रम में आते हैं वो इस प्रकार है---
1. बेकस की तबाही के सामान हज़ारों हैं/ आशा भोंसले
2. प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी/ तलत-आशा
3. छुक-4 रेल चले चुन्नू-मुन्नू आयें तो ये खेल चले/ आशा
4. सच बता तू मुझपे फ़िदा/ तलत-आशा
5. रात भर का है मेहमां अंधेरा किसके रोके रुका है सवेरा/ रफी
6. सइयां जब से लडी तोसे अंखियां/ आशा

इन गीतों के अलावा इसमें कैफ़ी आज़मी की मशहूर नज़्म भी है जिसका पार्श्व पाठ बलराज साहनी के लिये खुद कैफ़ी आज़मी ने किया है -

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फ़ुट्पाथ पे नींद आयेगी
सब उठो, मैं भी उठूं, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड्की इसी दीवार में खुल जायेगी.....

फिल्म में ये नज़्म पूरी रखी गई है, मैं इसके इतने अंश को जारी करते हुए उम्मीद करता हूं कि आगे तो आपको याद ही होगी. फिल्म में एक फिल्म का फ़ायनांसर-प्रोड्यूसर है जिसके सामने एक इंक़लाबी शायर श्रीकांत(बलराज साहनी) फिल्म के डायरेक़्टर की बात रखने के लिये ये नज़्म सुना रहा है. प्रोड्यूसर अपने बाल नोच रहा है और "कोई खिड्की इसी दीवार में खुल जायेगी" सुनने पर अपने कमरे की खिड्की को बडी चिंता के साथ देखता है.



'सोने की चिडिया' लछ्मी या लच्छो (नूतन) के जीवन की दुख भरी दास्तान है. लछ्मी एक युवती है जिसके मां-बाप मर चुके हैं और कोई भी उसे अपनाना नहीं चाहता. दूर की रिश्ते के मामा मामी उसे दूर के रिश्ते की काका-काकी के मत्थे मढ्कर चलते बनते हैं. काका कीमियागर है और सोना बनाने के प्रयोग में दिन-रात जुटा रहता है, आदमी वो दिल का अच्छा है. घर में कलह एक स्थाई भाव है. घर का बडा बेटा अपनी पत्नी के साथ घर छोड कर ससुराल जा बसता है. छोटा शराब और बदकारियों से घिरा क़र्ज़ में डूबता जाता है. जब क़र्ज़ चुकाने में वह अपने को बेबस पाता है तो एक रात लछ्मी को किसी बहाने से घर के बाहर भेजता है. दरअस्ल ये उसकी एक चाल होती है ताकि इस सौदे के एवज़ वह अपने क़र्ज़ से मुक्त हो जाये. जिन ग़ुंडों की सेवा में लछमी भेजी जाती है उनसे बचती-बचाती आखिरकार वो एक थियेटर में शरण पाती है जहां संयोग़ से उसे गीत गाता पडता है.

गाने और अभिनय से उसका चर्चा चारों तरफ चल निकलता है और जल्द ही वो फ़िल्मों में एक कामयाब हीरोइन बन जाती है. घर में अब लछ्मी कमाऊ 'सोने की चिडिया' साबित होती है. उसका निजी जीवन दासों जैसा ही है क्योंकि सारा हिसाब किताब उसका 'भाई' ही रखता है.

थॉडे समय के लिये उस्के जीवन में अमर(तलत महमूद) आता ज़रूर है लेकिन वह भी एक लोभी और मतलबपरस्त किरदार साबित होता है. प्यार में ठुकराई गयी लछ्मी एक मेंटल ट्रॉमा से गुज़रती है. हारकर वह आत्महत्या का फैसला करती है लेकिन "रात भर का है मेहमां अंधेरा किसके रोके रुका है सवेरा" सुनकर प्रेरित होती है और जीवन में वापस आ जाती है क्योंकि ये गीत और कोई नही, लछ्मी का पसंदीदा इंक़लाबी शायर श्रीकांत गा रहा होता है.

लछ्मी पहले अमर के साथ भी शादी करने के बाद बहुत सारे बच्चे पाने की तमन्ना रखती थी और वही इच्छा श्रीकांत के साम्ने भी ज़ाहिर करती है. श्रीकांत स्वाभिमानी और मूल्यों में विश्वास रख्नने वाला आदमी है और वह लछ्मी के कलाकार से सहमत नहीं है. तभी एक दिन उसे फ़िल्मों में काम करने वाले एक्स्ट्राओं के जीवन का भयावह अंधेरा दिखाई देता है. वह इन एक्स्ट्राओं के जीवन में थोडी खुशहाली लाने के लिये एक ऎसा समझौता करता है जिसे समझना मुश्किल है. क्या था वो समझौता? जानने के लिये देखिये सोने की चिडिया.
इस्मत चुग़ताई ने कहानी का ऐसा मार्मिक ताना बाना बुना है कि वह किसी फार्मूले की याद नहीं दिलाता. शाहिद लतीफ ने कुछ चालू डिवाइसेज़ का ऐसा इस्तेमाल किया है जिससे उनमें नयी ताक़त भर गयी है. फिल्म एक्स्ट्राओंवाले सीक्वेंस में तो आप भूल ही जाते हैं कि यह फीचर फिल्म है, यहां ये एक डॉक्युमेंट्री का काम करने लगती है. बलराज साहनी हमेशा की तरह एक अच्छे एक्टर नहीं बल्कि ज़िम्मेदार आदमी दिखाई दिये हैं.