
मेरी बहुत इच्छा है कि मैं शंकर-शंभू क़व्वाल भाइयों के बारे मे वो सब जानूं जो मिसाल की तौर पर अभिषेक बच्चन या जॉर्ज बुश के बारे मे जानता हूं.इमरान हाशमी कौनसा कुत्ता पालता है,मल्लिका शेहरावत किस ब्रांड के अंडरगार्मेंट्स पहनती है या हिमेश रेशमिया कौन सा साबुन लगाता है...
शंकर-शंभू क़व्वाल भाइयों के बारे में और अधिक जानने का हमारे पास क्या ज़रिया है?
इनके अलावा जिन नामों का ज़िक्र ऊपर किया गया है और जिन क़ाबिल-ए-ज़िक्र लोगों की तमाम हगी-मुती बातें हमें बताई जाती हैं,(उनकी तुलना में)बताने वालो के एजेंडे में शंकर-शंभू कभी शामिल नहीं होंगे.
उम्मीद है कि ऐन इसी वक़्त जब ये लाइनें लिखने के लिये मैं कीबोर्ड खटका रहा हूं उसी वक़्त कोई पीटर मैक्लुहान या कोई सिंडी जॉर्ज अपनी चप्पलें चटकाते हुए भारत की गलियों और लायब्रेरियों की ख़ाक छान रहे हों.
इसमें कोई हैरत नहीं होनी चाहिये कि इस जिस 'छोटी'सी बात के लिये मैं सिर धुन रहा हूं वो छोटीसी बात अमेरिकन और ब्रिटिश डैटासेंटरों मे आसानी से उपलब्ध हो. खैर...

शैलेंन्द्र की फ़िल्म तीसरी क़सम को कल जब मैंने FM पर पेश किया तो एक बार फिर उस गाने गाने को देख सुनकर मज़ा आ गया, जिसकी कल्पना और प्रस्तुति के पीछे शंकर-शंभू की मौजूदगी बरामद होती है.
आप जानते हैं कि शैलेंद्र ने इस फ़िल्म को किस फ़्रेमवर्क में कंसीव किया था. जब कहानी के अलावा संवाद भी खुद रेणुजी ही लिख रहे थे और भरसक कोशिश कर रहे थे कि अपने अनुभवों को फ़िल्मी परदे पर थोड़ी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया जाए तब जनाब राजकपूर उस पूरे डिक्शन और सेंसिबिलिटी का माठा करने में लगे हुए थे. बासु भट्टाचार्य बेचारे क्या करते एक ग्लॉस पैदा करने का दबाव तो उनपर व्यावसायिक ज़रूरतें भी बनाए हुए थीं. सुब्रतो मित्रा ज़रूर उस आउटडोर टेरेन में पसीना पोछते हुए हमारे आंसुओं को पोछने में लगे हुए थे और उन्होंने अपने स्टैंडर्ड का काम कर दिखाया. शंकर-जयकिशन ने बहुत ही मनोयोग से संगीत बनाया और उससे किसी को शिकायत नहीं है.कहते हैं कि उस इलाक़े के एथ्निक म्यूज़िक से बहुत वाक़िफ़ न होने के बावजूद उन्होंने परसनल इंटरेस्ट लेकर ज़रूरी रिसर्च की, और एक ऑर्गेनिक संगीत रचने में(बाद में मशहूर हुए संगीतकार) दत्ताराम और मशहूर गोआनी अरेंजर सेबास्टियन ने एड़ी-चोटी एक कर दी. ध्यान रहे कि ये दोनों शंकर-जयकिशन को असिस्ट कर रहे थे.
गुरु लच्छू महाराज ने एक नौटंकी के लिये अपनी कोरियोग्राफ़िक एक्सपर्टीज़ ऑफ़र करते हुए यह सिद्ध कर दिया कि क्लासिकल डांस उन्हें जीवन से ही मिला था.
फ़िल्म मे नौटंकी के सुपरवाइज़िंग डायरेक्टर शंकर-शंभू थे और जिस तरह की जीवंत स्थितियां उन्होंने अपनी सूझबूझ से पैदा की हैं वो हमेशा कन्विंसिग लगती हैं. उन्होंने लैला-मजनू उर्फ़ मकतब की मोहब्बत ड्रामे का एक टुकड़ा भी इस फ़िल्म में रीक्रियेट किया है जिसे फ़िल्म इतिहास में एक ख़ास जगह मिलनी चाहिये और थीमैटिक फ़िल्मों में आइटम कैसे डालें के पाठ्यक्रम नें इसे शामिल किया जाना चाहिये. हालांकि यह देखने से ताल्लुक़ रखता है लेकिन सुनिये
चलते-चलते: फ़िल्म में सिचुएशन ये है कि एक चंडूख़ाने में कुछ लोग गप्पें मार रहे हैं जिसमें फ़िल्मी दुनिया और नाच-नौटंकी को लेकर कुछ कुतूहल का माहौल है. इसी चंडूख़ाने में इस बातचीत का क्रमभंग करते हुए हीरामन एक लोटा चाय लेने पहुंचता है. रेणुजी ने जिस भाषा को तीसरी क़सम में चलाना चाहा होगा उसका एक नमूना सुनिये.







