सारा शगुफ़्ता (यहाँ एक ब्लॉगर ने परवीन शाकिर की एक कविता, जो कि सारा शगुफ्ता के लिये है, जारी की है) पाकिस्तान की विलक्षण कवियत्री थीं. उनके जीवन और कर्म पर आधारित एक नाटक "सारा का सारा आसमान" लिखा है दानिश इक़बाल ने. यह नाटक इस तुच्छ के पास उन्होंने पढने को भेजा है. दिल्ली में नाटक और ब्रॉडकास्टिंग के साथ दिलकश इंसानों की जानकारी रखने वालों के लिये दानिश इक़बाल किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. मुझे तो रश्क होता है कि कोई इंसान इतना हाज़िर-जवाब और हर वक़्त ज़िंदगी से लबरेज़ मुस्कुराता कैसे रहता है. शायद उनकी ज़िंदादिली के पीछे ज़माने की मुर्दादिली पर हँसने की उनकी ख़ास अदा हो.
बहरहाल. दानिश साहब के इस नाटक के कुछ हिस्से कपटकर आपके सामने रखता हूँ. यह नाटक अभी सिर्फ़ रीडिंग से गुज़र रहा है और इसका मंचन अभी शुरू नहीं हुआ है. स्त्री-स्वतंत्रता और मानवता की सीमाओं के प्रश्नों से जूझता यह नाटक कई अर्थों में एक बाग़ी पहलक़दमी है. अपने स्ट्रक्चर और भाषाई अभिव्यक्ति में इसे मैंने कवियत्री के जीवन जैसा ही जटिल और एक तरह से सरल पाया है. ज़्यादातर पंक्तियाँ सारा शगुफ़्ता की कविताओं से ही संवाद के रूप में गढी गई हैं और उनके समकालीनों और चर्चाओं से उनकी ज़िंदगी के सूत्रों को जोडा गया है.
नाटक से अंश-1
नाटक से अंश-2
नाटक से अंश-3
नाटक से अंश-4
नाटक से अंश-5
नाटक से अंश-6