दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Tuesday, June 12, 2007

नारद उवाच: नारद द्वारा कड़ी कार्यवाही

नारद उवाच: नारद द्वारा कड़ी कार्यवाही

8 comments:

dhurvirodhi said...

मैंने सुना है कि आपातकाल में कुछ अखबारों ने विरोध जताने के लिये अपना संपादकीय बिना कुछ लिखे छोड़ दिया था.

क्या आप भी कुछ एसा ही कहने जा रहे हैं?

बजार वाला said...

kya irfaan bhai... aap bhi...

Anonymous said...

लगे हाथो हम भी नहा ले हिट की गंगा मे...
आप तो ऐसे ना थे

अविनाश said...

ये आपलोगों को क्‍या हो गया है? हिंदी की हिमायत और हौसलाअफज़ाई के नाम पर क्‍या आप अपनी भाषा को विमर्श की पूरी परंपरा से बाहर करना चाहते हैं? जिस भाषा का प्रयोग राहुल उर्फ बजारवाला ने किया है, उसकी पूरी औघड़ परंपरा रही है। कोई क्राइम नहीं किया राहुल ने। अपनी बात कही। परेशान होकर। दुखी होकर। उसकी मंशा सांप्रदायिक ताक़तों को मदद पहुंचाने वाली ताक़तों के विरोध की रही है और ये एक पवित्र मंशा है। इस मंशा की अभिव्‍यक्ति को आप अपने डंडे से खामोश करना चाहते हैं... तो यक़ीन मानिए कि इस वक्‍त का इतिहास जो भविष्‍य में लिखा जाएगा, आप सब खलनायक साबित होंगे। जिस आधार पर आपने राहुल पर कार्रवाई की, उसी आधार पर आपको संजय बेंगाणी और पंगेबाज़ पर भी कार्रवाई करनी चाहिए। क्‍योंकि इनकी भाषा में राहुल से ज्‍यादा तिक्‍तताएं आ चुकी हैं। लेकिन आप सब लोग जिस ध्रुवीकरण के तहत लामबंद होकर राहुल के बजार नंबर एक को निकाल बाहर करना चाहते हैं, ज़ाहिर यही होता है कि आप सब सांप्रदायिक हैं और मोदी जैसी फसलों को इस देश में लहलहाते हुए देखना चाहते हैं। बेंगाणी बंधुओं के प्रति हमारी हमदर्दी है, लेकिन उनकी श्रेष्‍ठता इसी बात में निहित होगी कि वे व्‍यापक लोकतंत्र का सम्‍मान करते हुए बजार से प्रतिबंध के खिलाफ अपील करें। हम किसी हिटलरी अनुशासन के खिलाफ हैं... और नारद द्वारा की जाने वाली कड़ी कार्यवाही का पुरज़ोर विरोध करते हैं। इस विरोध में अपनी आवाज़ देने के लिए उन सबसे अपील करते हैं, जो व्‍यापक मनुष्‍यता के पक्षधर हैं। धुरविरोधी जी आपका धन्‍यवाद, कि आपने बजार से अपनी असहमतियों के बावजूद इस फैसले का विरोध करने की पहल की।

अनूप शुक्ला said...

भाई अविनाश, जिस औघड़पने की परंपरा की बात आप कर रहे हो उसका हमें भी कुछ अंदाजा है। और हम बेंगाणी बंधुओं का लिखा तब से पढ़ते आ रहे हैं जब आपने ब्लाग लिखना शुरू भी नहीं किया था। बाजार वाले राहुल जी ने जिस भाषा का उपयोग किया उसके बिना भी वो बेंगाणी बंधुओं के खिलाफ़ लिख सकते थे और ज्यादा बेहतर लिख सकते थे। लेकिन उनको औघड़पना ही पसंद है जिसे हम नहीं समझ पाये इसलिये उनके ब्लाग की पोस्ट को नारद में नहीं दिखाया जायेगा। नारद की कोई औकात नहीं है किसी के लिखने पर कोई प्रतिबंध लगाये। राहुल को जो मन आये वे लिखें आपको जो मन में आये वो लिखें। जिसको मन में आये वो पढ़ें भी। हम जिसको गली मोहल्ले की गंदगी समझते हैं, शायद अज्ञानतावश, उसको साफ़ न कर सकें लेकिन अपने दरवाजे बंद करने का हक तो हमें है। पवित्र मंशा है तो लिखने में भी कुछ पवित्र लहजा रखना चाहिये।
अगर इसे आप नारद के लोगों की तानाशाही मानते हैं तो मानिये लेकिन तानाशाही और हमारे अपने चुनाव के अधिकार में घालमेल मत करिये। नारद में किसी ब्लाग का रजिस्ट्रेशन हुआ बाद में वह निरस्त कर दिया गया। अब इसको अपवित्र मंशा समझते हो तो आपकी समझ में हम कौन होते हैं दखल देने वाले! बाकी अगर बाजार वाले राहुल अच्छा लिखते हैं तो उनको किसी नारद-फ़ारद का मोहताज होने की जरूरत नहीं है।
अब इसे चाहे हमारा छद्म समझो या कुछ और लेकिन सच है कि तमाम बेहतरीन लेखों (कल कर्मेंन्दु का बहुत अच्छा लेख था उसपर) के बावजूद हम मोहल्ले पर टिप्पणी करने से कतराते हैं। ऐसा नहीं है कि हम कोई वहां के लोगों से डरते हैं या घृणा करते हैं लेकिन जैसा मोहल्ले के परिचयात्मक लेखों का रुख रहा उसके चलते दूर से ही नमस्कार करना पसंद करते हैं। और जानकारी के लिये बता दें कि बहुसंख्यक ब्लागर इसीलिये मोहल्ले के लेख पढ़ते नहीं। अब आप इसे अगर तमाम ब्लागरों की कम अक्ली मानते हों तो मानते रहें और कामना करें कि प्रबुद्ध पाठक सामने आयें। बाजार या किसी और ब्लाग पर प्रतिबंध लगाकर न हमें कोई गद्दी मिल जायेगी न कोई रुतबा हासिल हो जायेगा। वस्तुत: यह बहुत अप्रिय निर्णय है जो हमें लेना पड़ा। नारद की इस निर्णय प्रक्रिया से संबद्ध होने के कारण मुझे इसका अफ़सोस है लेकिन यह जरूरी समझा गया इसलिये किया गया।

मैं फिर कह रहा हूं नारद केवल एक नोटिस बोर्ड है। वह इस प्रतिबंधित ब्लाग की पोस्टों की सूचना नहीं देगा। इसके अलावा न राहुल भाई के लिखने पर कोई बंदिश लगा सकता है नारद न उनको प्रतिक्रिया करने से रोक सकता है। पढ़ने के लिये आप उनका पता याद रखिये।

आपके विरोध की बात नोट की गयी। मैंने यथासंभव अपनी बात कहने का प्रयास किया। इसपर भी आपको लगता है कि यह तानाशाही तो आप कोई भी धारणा बनाने के लिये स्वतंत्र हैं।
इरफ़ान भाई हमें अफसोस है कि आपके ब्लाग पर इत्ती बड़ी टिप्प्णी करनी पड़ी क्योंकि इस पर मैं कोई पोस्ट लिखना नहीं चाहता।
शुभकामनाऒं सहित,
अनूप शुक्ल

masijeevi said...

हम भी इरफान भाई से क्षमा चाहते हैं कि टिप्‍पणी आपके यहॉं करनी पड़ रही है..ये पोस्‍ट बिना शब्‍द की पोस्‍ट पर हुई टिप्‍पणियों के लिए ही जानी जाएगी :)

हमें बाजारवाला को हटाने के निर्णय में कोई समझदारी नहीं दिखाई पड़ती- इस निर्णय को उलटवाने की बिसात तो नहीं पर अपनी बात कहने का अधिकार तो है ही। हमें कारण अविनाश वाले नहीं दिखाई पड़ते वरन वे दिखते हैं जो अनूप गिना रहे हैं- भई नारद एग्रीगेटर है- उसे पक्ष क्‍यों लेने ? निबटने दो राहुल को संजय से, अगर हमें राहुल पसंद नहीं तो हम या तो उन्‍हें पढ़ेंगे नहीं जैसे अनूप या दूसरे, मोहल्‍ला को नहीं पढ़ते या फिर लाव लश्‍‍कर लेकर संजय भाई के अपमान का विरोध करेंगे (व्‍यक्तिगत रूप से मुझे राहुल की पोस्‍ट का शीर्षक बेहद बदमजा औरा धिक्‍कारणीय लगा)। नारद टीम के सदस्‍य खुद ब्‍लॉगर भी तो हैं- एक ब्‍लॉगर की तरह निबटिए- दोस्‍ती/दुश्‍मनी निबाहिए।

अनूपजी ने कहा-
नारद केवल एक नोटिस बोर्ड है। वह इस प्रतिबंधित ब्लाग की पोस्टों की सूचना नहीं देगा। इसके अलावा न राहुल भाई के लिखने पर कोई बंदिश लगा सकता है नारद न उनको प्रतिक्रिया करने से रोक सकता है। पढ़ने के लिये आप उनका पता याद रखिये।

ठीक है जिसे राहुल को पढ़ना है याद रख लेगा पता किंतु इससे न तो नारद न ही बेंगाणी बंधुओं के सम्‍मान में वृद्धि होती है। बकवास करने वाले को बकवास करने का हक है- और हमें उसे न सुनने का लेकिन हवा ही कहने लगे कि वह तय करेगी कि क्‍या बकवास और क्‍या नहीं और वकबास का संवाहन रोक देगी- ये ठीक नहीं।

अंत में एक विनम्र टिप्‍पणी अनूप भाई-'अमुक आपके यहॉ आने से पहले लिख रहा है और पढ़ा जा रहा है इसलिए...'यह एक वैध तर्क नहीं है, है क्‍या ?

अनूप शुक्ला said...

मसिजीवीजी, अंत में एक विनम्र टिप्‍पणी अनूप भाई-'अमुक आपके यहॉ आने से पहले लिख रहा है और पढ़ा जा रहा है इसलिए...'यह एक वैध तर्क नहीं है, है क्‍या ?
यह तर्क नहीं इसलिये वैध भी नही है। वास्तव में यह सूचना है कि हम जानते हैं कि संजय बेंगाणी कैसा लिखते हैं। बस इतना ही।

Anonymous said...

मसिजीवी तुम्हें अपना उपनाम नारद रखना था, लगाई भगाई में तुम्हारा जवाब नहीं।