दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
Showing posts with label स्क्रिबलिंग पैड. Show all posts
Showing posts with label स्क्रिबलिंग पैड. Show all posts

Wednesday, April 23, 2008

डायरी के कुछ पन्ने-3

रास्ते के किनारे के लिये कुछ छायादार गाछ-

1. शिरीष
2. छातिम
3. देशी झाऊ
4. जारुल
5. देबदारू
6. अर्जुन
7. शागबान
8. शिशु
9. कृष्णचूडा

आम की क़लम-

1. आलफ़ांस
2. किशनभोग
3. कोहित्तूर
4. चांपा(चंपा की सुगंध)
5. क्षीरसा पाती
6. गुलाब ख़ास
7. फ़ज़ली
8. बम्बई काला
9. लंगडा बनारस
10. सफेदा लखनऊ
11. मालदही
12. हिमसागर
13. बारहमासा
14. तोतापरी

द ग्लोब नर्सरी, कलकत्ता- (ताज़ा बीज)
1. बंद गोभी
2. शालगम
3. फूलगोभी
4. गाँठगोभी
5. चुकंदर
6. गाजर
7. लेटुस
8. मिरचा
9. मूली
10. बैंगन
11. प्याज़
12. तम्बाकू
13. मटर
14. बीन फ़्रेंच
15. टमाटर
16. ख़रबूज़
17. खेडो
18. तरबूज़
19. पामकीन
20. राई
21. पपीता
22. स्कोयास
23. सिलेरी
24. सेम
25. उच्छे
26. करेला
27. कोहडा
28. चिचीडा(परोरा)
29. लौकी
30. ककडी
31. खीरा
32. गुढमी(काचरा)
33. घीयातरोई
34. बरबटो (बोरो)
34. रामतरोई (भिंडी)
35. शकरकंद
36. पालक
37. पालक
38. काटवा डाटा
39. चौलाई
40. लाल साग
41. पुई साग
42. नीबू
43. लीची
44. अमरूद
45. आम
46. केला
47. जामुन
48. बेर
49. सपेटा(चीकू)
29.

Monday, April 21, 2008

डायरी के कुछ पन्ने-2

इंडियन प्रेस, इलाहाबाद के मालिक बाबू गिरिजा कुमार घोष लाला पार्वती नंदन के नाम से लिखते रहे.

1901 से 1921 के बीच महिलाओं की कुछ पत्रिकाएँ: इंदु, स्त्री दर्पण, गृहलक्ष्मी और मर्यादा.

1951 से 1960 के बीच कुछ महिला लेखिकाएँ हिंदी की प्रचलित पत्रिकाओं में छपी हुई पाई गईं-

1. लीला अवस्थी
2. शोभा
3. शशि तिवारी
4. माया गुप्त
5. शचीरानी गुर्टू
6. इंदुमती
7. मदालसा अग्रवाल
8. सुप्तिमयी सिन्हा
9. कमलादेवी चौधरी
10. शीला शर्मा
--------------------------
मर्यादा: संपादक- कृष्णकांत मालवीय

प्रभा 1913 में खंडवा से शुरू हुई. संपादक: माखनलाल चतुर्वेदी

-------------------

मीर साहब रुला गये सबको

कल वो तशरीफ़ याँ भी लाए थे


न पूछो कुछ हमारे हिज्र की और वस्ल की बातें

चले थे ढूँढने जिसको सो वो ही आप हो बैठे


मैं किसी चीज़ का नहीं आदी

एक आदत है साँस लेने की

------------------------------------

रंग महलों से जसोदा का कन्हैया चल दिया

चाँदनी में मंज़िल-ए-इरफ़ाँ का ज़ोया चल दिया

(राष्ट्र भारती, 1956, सागर निज़ामी की गौतम बुद्ध नाम की नज़्म से)
-------------------

उच्चरित भाषा की विचित्रताएँ
---------------------
गया था करोलबाग़ के फर्नीचर मार्केट में बच्चों के लिये एक झूला ख़रीदने.झूलेवाले अरविंद ज़माने से ख़फ़ा थे और वो इन दिनों हिंदू धर्म का इतिहास पराजयों का इतिहास पढ रहे थे. उन्हों ने एक शेर सुनाया-

जवानी में अदम के वास्ते सामान कर ग़ाफिल

मुसाफ़िर शब से उठता है जो जाना दूर होता है

-इक़बाल

Monday, April 7, 2008

डायरी के कुछ पन्ने

ढूँढ उजडे हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें

तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नशा बढता है शराबें जो शराबों में मिलें

अब न वो मैं हूँ, न तू है न वो माज़ी है फ़राज़
जैसे दो साये तमन्ना के सराबों में मिलें


-अहमद फ़राज़

------------------

अब सुलगती ज़िंदगी के नाम अंगारे लिखो
दोस्तो आओ सडक पर और कुछ नारे लिखो


बाग़ में अपने उगाना चाहते हो गर गुलाब
सुर्ख़ स्याही से किसी मौसम को ख़त सारे लिखो


नागरिक सडकों पे यूँ बेकार ही फिरते नहीं
इस कहानी में इन्हें तुम सिर्फ़ बंजारे लिखो

-नामालूम
---------------------------

लोग अपने लिये औरों में वफ़ा ढूँढते हैं
इन वफ़ा ढूँढने वालों पे हँसी आती है


देखने वालो तबस्सुम को करम मत समझो
उन्हें तो देखनेवालों पे हँसी आती है

-सुदर्शन फ़ाक़िर

----------------------

हाथ दिया उसने मेरे हाथ में
मैं तो वली बन गया इक रात में


इश्क़ करोगे तो कमाओगे नाम
तोहमतें बँटती नही ख़ैरात में


हाथ में काग़ज़ की लिये छतरियाँ
घर से न निकला करो बरसात में


इश्क़ बुरी शै सही पर दोस्तो
दख़्ल न दो तुम मेरी हर बात में

------------------------

नज़्ज़ारे ने भी काम किया वाँ नक़ाब का
मस्ती से हर निगाह तेरे रुख़ पे बिखर गई


मारा ज़माने ने असदुल्ला ख़ाँ तुम्हें
वो वलवले कहाँ वो जवानी किधर गई

-------------------------

हिमाचली लोक गाथाएँ
वर्षा कटोच (Nagma Music)
--------------------------

ज़िंदगी कुछ भी नहीं फिर भी जिये जाते हैं
तुझपे ऐ वक़्त हम एहसान किये जाते हैं


कुछ तो हालात ने मुजरिम हमें ठहराया है
और कुछ आप भी इल्ज़ाम दिये जाते हैं

-------------------------

मैंने एक आशियाँ बनाया था
अब भी शायद वो जल रहा होगा


तिनके सब ख़ाक हो चुके होंगे
एक धुआँ सा निकल रहा होगा

----------------------

आप कहते थे कि रोने से न बदलेंगे नसीब,
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया.

--------------------


धर्मेंद्र सिंह पटेल
366/700 सिविल लाइन
कचहरी के पास
मस्जिद से उत्तर
फ़तेहपुर-212601



-----------------