दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Monday, June 18, 2007

फूल का कहना सुनो



चार साल पहले मैंने कहानियों की एक किताब ले तो ली पर उसकी समीक्षा लिखके आज तक न दे सका. ऎसा मेरी काहिली से हुआ,ये मैं नहीं मानता. शायद इस काम से मिलनेवाले पैसों की बनिस्बत ज़्यादा पैसोंवाले काम को मैने तरजीह दी.इसका कोई मलाल भी नहीं है कि मैने समीक्षा क्यों नहीं लिखी; और सच तो यह है कि पृथ्वी को चन्द्रमा की कहानियां मेरे सौन्दर्यबोध का हिस्सा नहीं थीं इसलिये एक पाठ्यक्रमीय दबाव के तहत पढ तो गया लेकिन एक कॉंस्टेंट रेज़िस्टेंस बना हुआ था. बहरहाल अब उस वाक़ये को याद करने का अभी क्या तुक है.
इस संग्रह में एक बच्ची के ऑब्ज़र्वेशंस फूल का कहना सुनो नाम से दर्ज हैं और नौ उपशीर्षकों में उन्हें बांटा गया है. मैने अब तक इस किताब को ज़रूर ही किसी पढाकू पाठक के हवाले कर दिया होता. इसी फूल का कहना सुनो के लिये ये मेरे सरमाए का अब भी हिस्सा है. मैं चाहता हूं कि इसका एक टुकडा आप भी पढें. तो लीजिये पेश है-


बाज़ार में गुम तो गुम

घर से थोडी दूर पर किराना दुकान है. पर हमारे घर का सामान वहां से नहीं आता. हमारे घर का बहुत सा सामान वहां नहीं मिलता. वह दुकान कच्चे घरों के लिये है. मेन रोड तक बाहर निकलो तो और दुकानें हैं...उनसे और आगे बढो तो और दुकानें हैं. आगे बढते-बढते गोल बाज़ार पहुंच जाओ तो इतनी दुकानें हैं...इतनी दुकानें हैं कि उनके बीच घूमते-घूमते थक जाओ.
गोल बाज़ार से बाएं जाओ तो नवीन बाज़ार है. गोल बाज़ार से दाएं जाओ तो शास्त्री बाज़ार है. बाज़ार में ज़मीन की ओर उतरो तो भी दुकानें हैं...आकाश की ऊपर उठो तो भी दुकानें हैं...ओह! कितनी दुकानें! मुझे बाज़ार घूमना अच्छा लगता है.
शास्त्री बाज़ार में एक 'सुपर मार्केट' है- हम वहां से सामान ख़रीदते हैं. वहान सब मिलता है. वहां जाना मुझे अच्छा लगता है. वहान जाना मां को भी अच्छा लगता है. हम एक ट्रॉली ले लेते हैं और उसे धकेलते सामान के बीच गुज़रते हैं. मेरे दोनों तरफ़- मेरे सिर से ऊपर तक सामान होते हैं. मैं सामान से बनी सुरंग में होती हूं...रंग-बिरंगी सुरंग...थोडी-थोडी देर में जिसकी ख़ुशबू बदल जाती है. मुझे सामान को देखने के लिये उचकना पडता है. कई बार वे अपने आप मेरे ऊपर गिरते हैं और मां हडबडा जाती हैं. वे ज़मीन से उठाकर उन्हें अपनी जगह जमाने लगाती हैं. दुकान का लड्का आसपास रहता है तो लपकता हुआ पास आता है. तब मां छोड देती हैं गिरे हुए सामान को और आगे बढ जाती हैं. पीछे दुकान का लड्का उन्हें तुरत-फुरत जमा देता है. ऎसा हर बार होता है कि 'सुपर मार्केट' में मेरे ऊपर सामान गिरते हैं. मां खीझती हैं, पर मैं क्या करूं? मैं उन्हें नहीं गिराती, वे अपने आप मेरे ऊपर गिरते हैं.

पापा मेरे साथ रहते हैं तो ऊपर के सामान को देखने के लिये मैं उनकी गोद में जा सकती हूं. मैं पापा की गोद में रहती हूं तो मेरा सिर उनके सिर से भी ऊपर आ जाता है. ऊपर से देखो तो सब बदल जाता है. नीचे से देखो - जैसा ऊपर से नहीं दिखता. पर ऊपर से देखो तो नीचे रखे सामान नहीं दिखते--साफ़-साफ़, इसीलिये मां को नीचे झुकना पडता है. वे जब झुकती हैं, शर्माते हुए झुकती हैं. वे सामान को हाथ से उठाकर ऊपर लाती हैं- अपनी ऊंचाई तक, फिर उसे देखती हैं ग़ौर से. क़ीमत देखती हैं...देखती हैं कि उसमें कोई इनाम-विनाम है या नहीं.
चाय-पत्ती हमने वह ली--जिसके पैकेट पर 'दिन दहाडे लूट' छपा था. दो साबुन ख़रीदने पर एक मुफ़्त नहाने का साबुन हमने खरीदा. बर्तन मांजने के 'बार' के भीतर 'कार' निकलने का 'चांस' था. पाउडर हमने वह लिया जो एक ख़रीदने पर एक मुफ़्त मिल गया. सभी चीज़ों के भीतर इनाम छिपे रहते हैं. मां कहती हैं--भाग्य है तो किसी दिन कार भी मिल सकती है...नहीं तो वाशिंग मशीन तो मिल ही सकती है. कभी-कभी जब कामवाली बाई नहीं आती है तो मां को कपडा धोना पडता है...कितनी परेशानी होती है!
'सुपर मार्केट' में पांच सौ का सामान ख़रीदने पर एक कूपन मिलता है. कूपन को स्क्रैच करो तो तुरंत इनाम निकलता है. हम इतना सामान हर महीने ख़रीदते हैं कि कम-से-कम तीन कूपन हमें मिल जाते हैं. कभी-कभी तीसरे कूपन के लिये मां को सौ-दो-सौ का सामान और ख़रीदना पडता है. टोकनी से दो कूपन मैं चुनती हूं...एक मां चुनती हैं. 'स्क्रेच' तीनों को मैं ही करती हूं. मुझे स्क्रेच करना अच्छा लगता है. इनाम में कभी पोहे का पैकेट, कभी पाउडर का छोटा डिब्बा, कभी नमक का पैकेट, कभी कोई क्रीम निकलती है. जो चीज़ इनाम में निकलती है वो हम पहले खरीदे रहते हैं तो मां दुखी होती हैं कि अरे अब इसका क्या करेंगे? 'सुपर मार्केट' में रखे इनामी टीवी और वाशिंग मशीन अब तक किसी कूपन से नहीं निकले हैं...पर किसी दिन निकल सकते हैं.
घर में वापस आते ही हम उन सब चीज़ों को खोल डालते हैं, जिनके भीतर इनाम छिपे होते हैं. चाय-पत्ती को जार में उलट डालते हैं कि एक कूपन दिख जाये, जिससे मां सोने की दुकान से अपनी पसंद के गहने, एक मिनट के भीतर, दौड-दौडकर उठा सके. मां सोचती हैं कि एक मिनट में वे इतने गहने उठा लेंगी कि गहनों से लद जाएंगी. हमारे यहां रखे साबुनों के रैपर खुले रहते हैं.


आनंद हर्षुल की इस किताब के प्रकाशक हैं मेधा बुक्स. पता है- एक्स-11, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110 032 और इनका फ़ोन नंबर है- 011-22116672
क़ीमत-125/ पृष्ठ-125 हार्डबाउंड

1 comment:

Rajaj Mishra said...

आप तो मार्केटिंग करने के कुशल खिलाडी लग रहे हैं.