दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Monday, May 19, 2008

हल

सत्रह जून के बलवे के बाद
लेखक संघ के सचिव ने
स्तालिन मार्ग पर पर्चे बंटवाए
जिनमें कहा गया था कि
जनता ने सरकार का विश्वास खो दिया है
और अब दुगने प्रयत्नों से ही
उसे पा सकती है. ऐसी हालत में
क्या सरकार के लिये ज़्यादा आसान नहीं होगा
कि वह इस जनता को भंग कर दे
और दूसरी चुन ले?
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बर्तोल्त ब्रेख़्त

Tuesday, September 25, 2007

कविता निजी मामला नहीं है

कविता आदमी का
निजी मामला नहीं है
एक दूसरे तक पहुंचने का पुल है

अब वही आदमी पुल बनाएगा
जो पुल पर चलते आदमी की
सुरक्षा कर सकेगा.
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कुमार विकल
एक छोटी सी लड़ाई

Sunday, September 23, 2007

चांद और लुच्चे

ये एक संकरा रास्ता था
जहां पहुंचने के
लिये कहीं से चलना
नहीं पड़ता था

या ये एक मंज़िल थी
समझो
आ जाती थी बस

फिर रात गहराती थी
और चांद की याद भी किसी को नहीं आती थी

एक दिन
जब धूल के बगूलों पर सवार
कुछ लुच्चे आये
(वो ऐसे ही आते-जाते हैं सब जगह बगूलों पर ही सवार)

बाल बिखरे हुए थे उनके

बोले-
नींद खुलने से पहले ही जागा करो...
और ऐसी ही कई बातें.

चांद उत्तर के थोड़ा पूरब होकर लटका हुआ था

किसी को परवाह भी न थी
उन्हें भी नहीं

छटनी में छांटे गये ये लुच्चे
बस छांद की थिगलियां
जोड़ते रहते हैं
रातों में.
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इरफ़ान
12 जनवरी 1994

कांटे और शहद

जब रात हुई
तो कुछ बात हुई
और बात भी कैसी
थोड़ी कंपकंपी थी
और उस जंगली घास
के असंख्य कांटों की बूदों
पर ठहरी ओस जैसी

और जैसे-जैसे हम
उंगलियों से
घास को छूते
गहरा और गाढ़ा शहद हमारे प्यालों में
टपकता जाता

क्या चखकर ही मिठास
जानी जा सकती है?
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इरफ़ान
3 जनवरी 1994

इरफ़ान के जन्मदिन पर

भाई चंद्रभूषण ने 13 मई 1994 को मेरे जन्मदिन पर यह कविता मेरे लिये लिखी

आओ आज रात
मारें धरती को एक लात
निकाल बाहर करें
इसे चकराते रहने की नियति से

आओ पकड़ें आज
एक किनारे से आसमान की चादर
लपेट लें उस पर लेटे ईश्वर को
ढकेल दें उसे छत के नीचे
आओ खड़ा करें
इस चुप-चुप दुनिया में
आज इतना भारी विवाद
कि कोई विवाद न रह जाए
आज के बाद.

आपस में बातें क्यों नहीं करनी चाहिये?

दो अजनबी
राजमार्ग पर
आमने-सामने से गुज़र रहे हैं

उन्हें आपस में बातें क्यों नहीं करनी चाहिये?
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वाल्ट ह्विट्मैन

त्रासदी का ख़ाका

चिड़िया नाम की नदी को
अपना असली रूप याद आता है
और एक शाम बस
वह उड़ जाती है

अंटोन नाम का एक आदमी
उसे अपने खेत पर
उड़ते देखता है
और अपनी बंदूक़ से बस
उसे मार गिराता है

चिड़िया नाम की प्राणी
अपनी स्वार्थी करतूत पर देर से पछताती है
(क्योंकि अचानक सूखा तो बस पड़ता ही है)

अंटोन नाम का एक आदमी
(अफ़सोस इसमें कुछ अजब नहीं)
गुनाह में अपनी हिस्सेदारी के बारे में बस बेख़बर है

अंटोन नाम का एक आदमी
(यह जान कर कुछ संतोष होता है)
वहां के हर आदमी की तरह बस
प्यास से मर जाता है.
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ख्रिश्टियान मोर्गेनश्टेर्न

पाठ

'ईश्वर', मैंने कहा,"सिर्फ़ एक आविष्कार है"------

और फ़ौरन क्लास के बच्चों ने दुहराया
'मोटर, हवाई जहाज़, टेलीविज़न, वीडियो, ईश्वर'
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डीटर लाइज़ेगांग

और मैंने हमेशा सोचा

और मैं ने हमेशा सोचा:
सबसे सादा शब्द ही काफ़ी रहेंगे

जब मैं बतलाता हूं कि चीज़ें कैसी हैं तो
हर एक का दिल छलनी-छलनी हो जाता होगा.
यह कि अगर तुम अपने वास्ते
ख़ुद खड़े न हुए तो
गिर जाओगे

बेशक यह तो तुम देखते ही होगे.
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बर्तोल्त ब्रेख़्त

आरामदेह गाड़ी में सफ़र

खुले इलाक़े में एक बरसाती सड़क पर
एक आरामदेह गाड़ी में सफ़र करते हुए
शाम को हमने एक फटेहाल आदमी को
कोर्निश करते हुए गाड़ी में बिठाल लेने का
इशारा करते हुए देखा

कार की छत थी और अंदर भी काफ़ी जगह थी और हम चलते रहे
और मैंने मुझे चिड़चिड़ी आवाज़ में कहते सुना: नहीं हम किसी को अपने साथ नहीं ले सकते

हमने काफ़ी सफ़र तय किया, शायद एक दिन के कूच का

कि अचानक मुझे अपनी उस आवाज़ से
अपने उस बर्ताव से
और इस पूरी दुनिया से धक्का लगा.

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बर्तोल्त ब्रेख़्त
1937

शीर्षकहीन कविता

अपने हाथों का तकिया बना लो.

आकाश अपने बादलों का
धरती अपने ढेलों का
और गिरता हुआ पेड़
अपने ही पत्तों का तकिया बना लेता है.

यही एकमात्र उपाय है
गीत को ग्रहण करने का
निकट से उस गीत को जो
पड़ता नहीं कान में,
जो रहता है कान में.
एकमात्र गीत जो दोहराया नहीं जाता.

हर व्यक्ति को चाहिये
एक ऐसा गीत जिसका
अनुवाद असंभव हो.

रोबर्तो हुआरोज़ अर्जेंटीना,1925
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अनुवाद:कृष्ण बलदेव वैद

कविता पाठ कोलतार बिछानेवालों के लिये

स्वागत कॉमरेड कवि
कब सुना सकेंगे हमें अपनी कविताएं

काम ख़त्म होने के बाद चलेगा

काम ख़त्म होने के बाद लोग
थके होते हैं
हड़बड़ी होती है उन्हें अपने घर पहुंचने की

सनीचर कैसा रहेगा

सनीचर को लोग काम निपटाते हैं
धोना-सीना करते हैं
और चिट्ठियां लिखते हैं--घर

इतवार को चलेगा

इतवार को लोग घरों से निकलते हैं
जवान लोग अपनी छोकरियों से मिलने
बुज़ुर्ग स्टेशनों को
अपनी रेलों का इंतज़ार करने के लिये

तो वक़्त नहीं है आपके पास कविता के लिये

वक़्त नहीं है हमारे पास देख ही रहे हो तुम
तो भी निकालेंगे मिलके अपन-तुपन.

वास्को पोपा
यूगोस्लाविया,1922
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अनुवाद: सोमदत्त