
गाँव-गाँव तक गाने-बजानेवाले मौजूद हैं. जितना ज़्यादा अपनी धरती और अपने लोगों के बारे में जान पाता हूँ, मन में उतनी ही ज़्यादा सहानुभूति और करुणा उन गायकों के लिये उभरती है जो बाज़ार में आकर खडे हो गये लेकिन समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें. मुज़फ़्फ़र अली, ज़िला ख़ान, कैलाश खेर, शुभा मुद्गल और कभी-कभी आबिदा परवीन भी जिस चमत्कार की नाकाम कोशिश करती हैं वो हिंदुस्तान की मिट्टी में खोया हुआ है.
कोई बीस साल पहले अपनी इसी खोजबीन में मुझे असीमुन बीबी हाथ लगी थीं जो उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ के किसी छोटे से गाँव में अपनी दो अन्य सहयोगी गायिकाओं के साथ उन दिनों घर-घर जाकर काज-परोजन में गाया करती थीं. बताया जाता है कि अवध की किसी रियासत से उनके तार जुडे हुए थे जहाँ वे महफ़िलों में गानेवाली ट्रेंड गायिका थीं. सादे से छोटे ढोलक और उतने ही छोटे अजीब दिखने वाले हारमोनियम गले में लटकाए वो पहुँच जाया करती थीं और आल्थी-पाल्थी मारकर गाने में जुट जाती थीं. वो घर के सदस्यों की तरह ही सम्मान और अपनेपन की हक़दार थीं. उनके कपडे और साज़ सभी हल्दी और लहसुन की ख़ुशबुओं से सने होते और उनकी आवाज़ में शास्त्रीयता और लोक की जटिल मिलावट पाई जाती. आपको सुनाता हूँ असीमुन बीबी के गाए दो छोटे टुकडे-
अरब में लाला हुए हैं...
सनन-नन-नन-नन-नन...
फ़ोटो: साभार रेशियोजूरिस