
रशीद अत्रे
ये सब बातें न जाने क्यों मैं लिख गया. मुद्दे की बात ये है कि ये गाना मैंने 1984 में इलाहाबाद के कटरा मार्केट में जब पहली बार सुना तो न तो मुझे ये मालूम था कि ये फ़िल्मी गीत है और फ़िल्म पाकिस्तान की है. और न ही ये मालूम था कि ये आवाज़ नूरजहां की है. फिर इन सब बातों की ज़रूरत भी क्या थी!
मैं किसी दुकान के inaugural function में गया था और वहीं ये गाना बज रहा था. मैं तीन महीनों तक दुकानवाले के चक्कर काटता रहा था और आख़िरकार ये गाना मुझे मिल गया था. तब से इसे संजो कर रखे हुए हूं और आपके सामने पेश करता हूं.