दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Saturday, January 18, 2014

हम बीस जन

तट छोड़ रहे हैं
नाव में बैठे हम बीस जन

मुहावरों में बीसियों लोग कहे जानेवाले
बीस जन कहे जायेंगे कविता में.

अब तक क्या करते थे ये बीस जन ?
बूढा बरगद बताता है "ये अपने होने का अर्थ तलाश रहे थे"

ये लड़का ध्वनियों के इस विराट जंगल में
अपने स्वर खो रहा है
तुम्हारे शब्दकोश में इसके लिये बदशक्ल
एक श्रेष्ठतम विशेषण रहा
शब्दकोश के पन्नों को एक-एक कर डुबाने का
उपक्रम चला रहे हैं
उसके दल के लोग

ये लड़की अपने पति के लिये बनाए रुमाल
पर कढाई आधी छोड़कर चली आई

यहाँ अटल गहराइयों पर डर का दामन छोड़
मेहदी हसन की ग़ज़ल में डूब उतरा रहे हैं ये बीस जन

तट पर खड़े तुम नहीं जान पाओगे
इन बीस जन के मन की बात.

(पटना, 10  अप्रेल, 1992 )

झाड़ियां- 4

एक दिन अचानक
ऐसा भी हुआ
कि जब मैं आईने के सामने
आया तो देखा
बाल सफ़ेद हो चुके हैं
और सांसों में घरघराहट है

दिन ऐसे गुज़रने लगे जब
किसी ख़त का कोई इंतेज़ार भी नहीं

शुक्र है कि
झाडियां पास हैं हवाओं को
संगीत देती हुई.

(ट्रेन, पटना से कानपुर, 28 फ़रवरी, 1991 )

झाड़ियां -3

जहां पेड़ नहीं हैं
वहाँ भी हैं - झाड़ियां
छुटपन में जब हम पेड़ पर चढ नहीं पाते थे
तब भी हम झाडियों से कुछ
टहनियां तोड़कर खेलते थे
और हमारी बकरी भी बहुत आसानी से
पिछली टांगों पर खड़ी होकर
पत्तियों का एक बड़ा हिस्सा खा जाया करती थी

और पेड़ों पर चढना तो हमेशा
असुरक्षित रहता था
पत्ते तोड़ते-तोड़ते गिरने का डर हमेशा

लेकिन झाडियों से
तीतर कई बार निकलकर
झुंडों में उड़ते देखे।

(ट्रेन, पटना से कानपुर, 28 फ़रवरी 1991 )  

झाडियां-1

और झाडियों के बारे में
इतना तो कह ही
सकता हूं कि
वे कम्बलों में दुबके लोग
ही हैं जो
झंडे की बंदरबांट में शामिल नहीं थे
उस रात जब
रेलों में लोग ढूंढ ढूंढ कर मारे गये,
ये अपने कंबलों में दुबक गये.

पेड़ों को तो ख़ैर तुम
आज भी नर्तन
की मुद्रा में देखते होगे
संसदों और सट्टाबाज़ारों में दो को चार बनाते.

(ट्रेन, पटना से कानपुर, 28 फ़रवरी 1991)

प्राथमिकताएं बदलो

ख़ुशियों और चिडियों की
बड़ी गड्डमड्ड होती छवियां हैं
मेरे मन में

वो जो कुछ मर रहा है
मेरे भीतर
ऑर्केस्ट्रा में सिंथेसाइज़र बजाते छोकरे की
जड़ छायाएं हैं
यहां चिडियों के परों को झुलसा देने वाली

घर रहने आई हैं चिडियां

उन्हें संगीत और हथेलियों के शोर से
बचाना है.

(पटना, दिसंबर 1991)

सड़क बनाने वाले

रोलर-आग
बजरी और कोलतार...

लो आ गये सड़क बनाने वाले !
बड़े बड़े वाहनों और आने जाने वालों की गालियों
से बचते हुए
लगे रहते हैं दिन रात

अक्सर सुबह जब हम जगते हैं
तो पाते हैं, सड़कें- चिकनी- काली-मज़बूत
बिछी हैं.
हल्की टूट-फूट पर भी लग जाते हैं
सड़क बनानेवाले

सड़क बनानेवाले
अपनी ज़िंदगी की टूट-फूट से बेखबर
हमारी सड़कें बनाते रहते हैं.

(गुरमा, 18 अप्रेल, 1988)

Monday, January 13, 2014

नया साल

नये साल, न आना हमारे घर हम एक प्रेतलोक की प्रतिध्वनियां हैं छोड़ दिया है हमें लोगों ने हमें रात और अतीत निकल चुके हैं हमारे हाथों से नियति ने भुला दिया है हमें कोई प्रतीक्षा नहीं, न कोई उम्मीद हमारे पास न कोई स्मृति है, न कोई सपना. हमारे शांत चेहरे खो चुके हैं अपना रंग अपनी दमक. नाज़िक अल-मलैका अरबी कवयित्री, बग़दाद (शेष कुछ और अंश) ... नये साल चलते रहो कोई गुंजाइश नहीं है हमारे जागने की सरकंडे की बनी हैं हमारी नसें क्रोध ने छोड़ दिया है बहना हमारे खून में.