दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Saturday, June 9, 2007

एक ख़ानाबदोश की याद में

नयी दिल्ली, 28 जून 2000. न्यू रोहतक रोड पर लिबर्टी सिनेमा के सामनेवाली गली में वयोवृद्ध साहित्यकार देवेंद्र सत्यार्थी का घर.एक बडी सी खुली-खुली रोशन और हवादार बैठक में एक बडी सी लकडी की कुर्सी पर सत्यार्थीजी बैठे अख़बार पढने की कोशिश कर रहे हैं.दीवार से लगी शीशे की अलमारी में किताबें भरी हैं--उर्दू, हिन्दी, अंग्रेज़ी और पंजाबी की-जिन्हें अर्से से किसी ने न पढा होगा. देश भर की पत्र पत्रिकाएं संपादक लोग सौजन्यवश भेज देते हैं.कुछ खुली और कुछ अब भी डाक के रैपर में बन्द पडी हैं.सामने एक छोटी सी मेज़ है, जिस पर तरह तरह के निमंत्रण पत्र और किताबें रखी हैं.यहीं एक रजिस्टर रखा है जिस पर सत्यार्थीजी आजकल कुछ लिखते हैं.
लाहौर का ज़िक्र करते करते पल भर में वो कलकत्ते पहुंच गये हैं, जहां उनकी मुलाक़ात रवींद्रनाथ टैगोर से होती है."हमें तब तक ये अक़ल नहीं आई थी कि हमारी मातृभाषा पंजाबी है.पंजाबी तो बस बोलने तक सीमित थी. गुरुदेव रवींन्द्र ने कहा क्या तुम अपनी ज़बान में लिख सकते हो?"...फिर लंबी चुप्पी. ऐसी चुप्पियों के बाद जब कुछ बोलने की याद आती है तो सिर्फ एक लंबी सांस भरते हुए कहते हैं--"संसार है." यहां वो 'सा' और 'है' को लंबा खींच देते हैं.



ऐसी ही जब कोई लंबी चुप्पी आती है तो मैं मेज़ पर पडा रजिस्टर उलटने-पुलटने लगता हूं--'फिर अमृतयान ने बापू से कहा कि'... पूरे रजिस्टर में मुश्किल से दस पन्ने हैं, लेकिन वह बाक़ायदा मोटा और भारी दिखता है.कुर्सी की बग़ल में एक छोटे से स्टूल पर एक कटोरी में तीन दिन पुरानी आटे की लेई रखी है और छोटी बडी दो क़ैंचियां भी.लिखने के लिये सत्यार्थीजी फाउंटेन पेन इस्तेमाल करते हैं, जिसे वहीं खुली रखी कैमेल की नीली रोशनाई में डुबोते हैं.लिखते हुए अगर कहीं ग़लत हो जाये तो काटते नहीं बल्कि उतनी ही लंबी काग़ज़ की पट्टी काटकर ग़लत पंक्ति पर चिपका देते हैं.ऐसा करते हुए कई जगहों पर बार-बार काग़ज़ चिपकाने से रजिस्टर मोटा और भारी हो गया है.
"मेरा बचपन
गुरुदेव की एक किताब, बुढापे में बचपन की याद. बात से बात चली, बचपन का जादू. शायद कुछ याद आया. अमृतयान गुनगुनाता रहा. 'देशकाल की वही पुरानी चाल. सुनी सुनाई कहता रहा, चेपी-चेपी काट-काटकर लिखता रहा, चेपी-चेपी नयी लिखावट काग़ज़ बन गया गत्ता. रचना ता अनुभव की बात, ना वेतन ना भत्ता. अपना अनुभव अपनी बात कनरस है अलबत्ता.नीलयक्षिणी बोल उठी ज़िंदा हाथी लाख का मरा हुआ सवा लाख का. गुरुदेव का जन्मस्थान कलकत्ता. अब चाहें तो लोग शांतिनिकेतन हो आयें-हाथ में हाथ सफ़र की तैयारी. जगाने से हौसला, ये क़हक़हे ये लतीफ़े."
सत्यार्थीजी की कमर झुक गयी है और सुनाई भी अब ऊंचा देता है.ज़्यादातर सवाल लिखकर पूछने पड रहे हैं.लंबी सफ़ेद दाढी के नीचे लग माइक खर-खर की आवाज़ हेडफ़ोन तक पहुंचाता है.बार -बार माइक की जगह बदलनी पड्ती है...बातें...बार-बार क्रमभंग का शिकार होती हैं....सं..साआआअ....र...हैऍऍऍऍऍ....
एक और टुकडे पर नज़र पडती है-
"मां का देव, देव गंधार.आजकल अमृतयान. बुढापे की शान. अहमद शाह बुख़ारी 'पितरस' ने बतौर डायरेक्टर जनरल ऑल इंडिया रेडियो, उससे कहा-"चुन चुन कर अलग-अलग भाषाओं के एक गीत् हज़ार हमें दे दीजिये. याद रहे रॉयल्टी मिलती रहेगी." रॉयल्टी ठुकराते हुए अमृतयान ने कहा "कॉपीराइट भारतमाता का." अब तो अम्रृतयान की आयु है नब्बे से तीन साल ऊपर.अब अमृतयान की नयी किताब होगी 'सत्यम,शिवम,सुंदरम'. आज से बहुत पहले छपी थी लाहौर से अमृतयान की एक किताब-मैं हूं खानाबदोश; हमसफ़र बीवी और बिटिया कविता.
एक अध्याय लंका देश है कोलंबो."

28 मई 1908 को पंजाब के संगरूर में पैदा हुए देवेन्द्र सत्यार्थी का नई दिल्ली में 12 फ़रवरी 2003 को निधन हो गया.माना जाता है कि भारतीय उपमहाद्वीप की ओरल हिस्ट्री से जुडा उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है. भारत सरकार ने लोकगीतों के संकलन के उनके भागीरथ प्रयत्नों के लिये 1976 में पद्मश्री से उन्हें सम्मानित किया. एक यायावर का जीवन जीते हुए उन्होंने भारी क़ुर्बानियां दीं. बताते हैं कि थोडा समय वे प्रकाशन विभाग की पत्रिका आजकल के संपादक भी रहे.उस समय आजकल उर्दू के संपादक जोश मलीहाबादी हुआ करते थे.

2 comments:

अनामदास said...

सत्यार्थी जी ने घूम घूम कर देश के लोकगीतों को रिकॉर्ड किया, कहा जाता है कि भारत के लोकगीतों पर उनसे बड़ा ज्ञाता कोई नहीं था. उन्होंने अपना पूरा जीवन एक खोज को समर्पित कर दिया था.
उनके संस्मरण पेश करने के लिए हार्दिक साधुवाद.

Pramod Singh said...

इस पोस्‍ट पर नज़र नहीं पड़ी थी. इस पोस्‍ट की, और सत्‍यार्थी जी के स्‍मरण की जय हो.