दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Sunday, June 29, 2008

आदमी का तीन बटा चार उर्फ़ तीन-चार आदमियों में मैं नहीं हूँ!


आदमी किसी आदमी की तरह नहीं था. उसे अपने आदमी होने पर शक से भी अधिक शक होता था. और जैसे-जैसे शक होता था, वह अपने थैले से गोबर निकाल कर फेंकता था. उत्तर में अक्सर दक्षिण से कभी फतुहावाली और कभी जगेसरी की भौजाई का आँचल सामने आ जाता था. का रे बउवा एही ठीं खरा है...खरे-खरे पिसाबौ नहीं किया? कुछ कर रे दइजरा! एतना सब छाँगुर, अछैबर और ननकू कुल अपन-अपना पतोहू के लेके चल गइलन...दू-दू गो, तिन-तिन गो छोहडा-छोहडी आँगन में टट्टी करता है....
...मन देखके जुडा जाता है.केतना निम्मन दिरिस्य देखाला.
आदमी हर बार इन बातों को हिंदी समाज के उडबुकाए-गबरचौथ का नाम देता और बदले में अपने बिग्यापोन से अपनी फोटो बदल देता. फोटो बदलकर जितना चैन उसे मिलता उतना ही चैन अनिस अंबानी को "सैस्वर्या राय की जाँघ" कहने में मिलता. कब-कहाँ और कैसे की तकलीफदेह पडताल में देह सबसे सार्थक ध्वनि थी जिसके आगे एक और फोटो था. फोटो का होना उसके न होने से बेहतर था/थी/थे और हिंदीवाले अपने नीम नशे में विभाग और पुरस्कार कर रहे थे. कभी-कभी कुछ कवि और विचारक अपने सुलझे विचारों को उलझाने में इतना प्राणायाम करते कि बथुआ का साग भी उन्हें उतना एनेर्जी नहीं देता था. गोभी-पोलाओ एक नई ईजाद था और उसे न खाने का अफ़सोस कभी गेलिसवाली पतलूनों और कभी सिगरेट जलाने की अदाओं से जुदा था.अब अदाकारी की कोई पप्पू ही सीमा तय कर सकता है और मैं भी पप्पू नहीं हूँ कि आप ही पप्पू नहीं हैं...इसे आप जाने न जानें...आदमी ज़रूर जानता है.

इस पोस्ट में गोभी पुलाओ का संदर्भ अज़दक से साभार है.

Thursday, June 26, 2008

मेरी ब्लॉग का नाम है- "गदगद" उर्फ़ हाय राम! आर्ट ऑफ़ रीडिंग वाले मेरा कोई पोस्ट काहेला नहीं चढाते?


अचकचाए हुए चिरगिल्ली मुस्कान माथा पर सजाए पहुँच तो गए सितामढी की लल्लन टाकिज में,लेकिन देखे छोहडा सब परसाद की आस में खडा है. पता नहीं कहाँ से मिर्जापुर और नबाबगंज से आ गया था सब. भऊजी ने बोलीं कि हम पकाए हैं बथुआ का साग, लेकिन हम कहे कि हम तो बस गोभी पुलाओ खाएँगे. माथा से पसीना पोछे तो निरंजन भी लगा नकल उतारने. हमको गुस्सा आ गया लेकिन हमहूँ कहे ससुर तुम हिदीवाले कभी सुधरोगे नहीं.सत्तू का बास मुंह से छोडा नहीं रहा है और चले हो मैक्डोनल का पीजा खाने? बिछौना पर अलाय-बलाय रख के जब दुलरुआ राहुलजी अपना नयका मर्सीडीज पर चलने लगे तो हम बोले कि भाई एतना हिलकोरी मत दिखाइये सिपाही दू डंटा लगाएगा और भित्तर ढुका देगा काहेकि पंजाब केसरी पढने में बस घर का अंदर निम्मन लगता है "ऎंड हाऊ योर कॉंशस एल्लाउइंग टु सिट इन अ मर्सिडीज विथाउट वोग? नेभर रीड पंजाब केसरी इन अ लक्झोरी कार."
लल्लन टाकीज वाला सब बुडबकै है. कितना बार कहे कि आप लोग इज्बान आउस्माकी, हेजीन कोबोल और जियोवानी इताल्लो का पिच्चर सब मंगवाइये इससे परगती का निसानी होता है लेकिन बुझाता उसको नहीं है.झोला में झालमुडी भर के लाता है और उसी का नस्ता करता है. परतीकवा भी उन्हीं के साथ हें-हें करता है और बारिस में बतकुन्नी का चुन्नी उढाता है. तुम्हरे बापौ ससुर खाए थे!जो तुम खाओगे? जाओ! उहाँ ईंटा पे बैठो और बिलॉग मत लिखना. देख नहीं रहे हो हम सुबह झाडा फिर के आए तभी से हाथ नहीं धोए हैं. काहे कि समय लगता है और ई हिंदी समाज हाथ धोने में इतना समय गँवा दिया कि उरभुल्ले से गुलगुल्ली भी निकल गया. हम तो जामवंत को भी खून माफ कर दिये, बलवर्द्धन को गले लगाए, बसंती और डेजी ऐसन से भी हमारा राउंड टेबल बिछाया हुआ है. फस्ट नम्बर पर भी हमारा नम्बर चल्ते रहता है. चरण वर्मा-फरण वर्मा मंटो-मंटू-मुंटू और गुप्ता पान भंडार, नाम्ग्याल, रसख्याल, फौज, इंशाअल्ला और त्रिभुवन कुमार शुक्ल को छोडायत हमारा लेखनी को तअज्जो भी नहीं देता ई सब. हम तो टट्टी वाला हाथ से भी बोलॉग लिखते हैं फिर नाम भी हम "गदगद" रखे अपने बिलॉग का. पर हाय राम आर्ट ऑफ़ रीडिंग वाले हमारा पोस्ट काहेला नहीं चढाते?

Wednesday, April 2, 2008

पहुँचना एक पापी का स्वामी के आश्रम में और पाना भभूत का अर्थात हृदय परिवर्तन संभव है और अनिवार्य भी...


तो भक्तो! कल-कलकर बहता पानी और छल-छलकर रहता प्राणी,अर्थात जल की द्रव्यता और मनुष्य की सभ्यता में परस्पर क्या संबंध है? हमारे गुरू स्वामी अडबडानंद प्रायः कहा करते हैं कि जल जीवन का आधार है तथा मनुष्य का जीवन सर्वोपरि है क्योंकि चौरासी हजार योनियों की यात्रोपरांत वह इस नश्वर संसार में अनश्वर आत्मा के वहन का वाहन बना है. तो मैं कह रहा था जीवन का आधार जल है और मनुष्य का आधार मल है अर्थात मूल है अर्थात योग में जिसे मूलाधार कहा जाता है. इस प्रकार यह निश्चित है कि व्यक्ति का मूलाधार यदि असंतुलित अथवा अव्याख्यायित है तो वह छल-छलकर ही छलना का पर्याय बनेगा.थाली का बैंगन इसीलिये लुढकता रहता है क्योंकि उसका मूलाधार नहीं है. निष्कर्ष यह है कि मनुष्य को इहलोक का जीवन शांत और शीतल बनाना है तो उसे कल की ही भाँति मार्गदर्शन और प्रवचन की बूटियों की आवश्यकता होगी. वह चाहे राग हो, विराग हो अथवा बिलॉग. मतिभ्रम की स्थिति में मनुष्य कतिपय भूलें और शब्दकोश आदि लिख मारता है परंतु जब जागे तभी सबेरा की सदासिद्ध उक्ति पर विश्वास रखते हुए वह स्वामियों के आश्रम में जाकर अपने पापों का प्रायश्चित कर सकता है और भभूत प्राप्त करके निर्मल मन से आनंदित होकर पुनर्जीवन प्राप्त कर सकता है. हृदय है तो परिवर्तन है उसी प्रकार जिस प्रकार मनुष्य है तो त्रुटियाँ हैं. सदाव्रत के मंचों की कभी कमी नहीं रही है भक्तो! बिलॉग में आकर आप स्वयं को असहाय और असमर्थ मत समझो , हर धर्म का गुरू हृदय परिवर्तन को स्वीकार करता है और तुम्हारा धर्म बिलॉग लेखन है और बेलाग लेखन तुम्हारा कर्म अतः हे भक्त! लिख-लिख और लिख.

Tuesday, March 4, 2008

आओ गाली-गाली न खेलें क्योंकि दस हज़ार लोगों की हवसी भीड से अच्छा है कि हमें एक ही भला मानुस पढे!


इधर तीन दिनों से गालियों का बाज़ार गर्म है.गर्म की बात आई तो "हॉट" एक ऐसा जादुई शब्द है जिसके बारे में इंटरनेट की वाइल्ड सर्च में जो बडे ही दिलचस्प आँकडे और तथ्य हैं उन्हें यशवंत सिंह ने गोरखपुर यूनिवर्सिटी के चुनावों के दौरान बताकर सबको चकित कर दिया था.सवाल ये है कि आज जबकि यशवंत से मेरी मुलाक़ात हुए भी बीस साल का समय गुज़र चुका है, और वे वहाँ आजकल क्या करते हैं यह भी ख़बर नहीं तो मुझे यह बात क्यों याद आ रही है? याद आ रही है इसलिये भी कि कल ब्लॉगबुद्धि वाले नौजवान विकास ने एक बार फिर वही सच्चाई उजागर की. उन्होंने लिखा है "...इसमें कोई दो मत नहीं है कि अब भी 80% इंटरनेट यूज़र्स पोर्न के लिये इंटरनेट पर आते हैं और सबसे ज़्यादा सर्च भी इसी शब्द को लेकर होते हैं."
इस पोस्ट के शीर्षक का बाद वाला हिस्सा भी इन्हीं विकास की बात के अगले हिस्से से लिया गया है.

इधर थोडे समय से हिंदी ब्लॉगर बडे मनोयोग और अपनी मेधा की ताक़त से इस काम में लगे हैं कि ताकाझाँकी में लोगों को कुछ ऐसा भी मिले जिससे उनके जीवन में कुछ रोशनी आए. यहाँ मैं ऐसी ही एक माला पिरोने की कोशिश कर रहा हूँ ताकि आपको मौजूदा ब्लॉगिंग के कुछ नायाब मोती दिखाए जा सकें.
यहाँ सुनिये मंटो की दो कहानियाँ बू और नंगी आवाज़ें. यहाँ प्रमोद सिंह के अज़दक में पढिये किताबों का शोकगीत. दिलीप मंडल क्या कहते हैं रिजेक्ट माल में यह तो क़ाबिले ग़ौर है ही, अनामदास कम झटके नहीं देते. हाशिये पर रेयाज़ुलहक़ एक ऐसा अभियान चलाते हैंकि एक बार आप वहाँ गये तो एक तरह का एडिक्शन हो जाएगा. अशोक पांडे ने ऐसा कबाड इकट्ठा किया है जो लपूझन्नत्व की सभी सीमाएँ पार कर जाता है. समकालीन जनमत अपनी निरंतर गंभीरता से आपको बाँधे रखता है. मोहल्ला तो ऐसी, ऐसी और ऐसी चीज़ों से आपको रूबरू कराता है कि क्या कहने! स्वप्नदर्शी ने जब इस पोस्ट को जारी किया तो एक नई बात पैदा की. आशीष महर्षि का क्या कुसूर जो उनका लिखा आप नहीं पढते? पहलू में चंद्रभूषण ने क्या कुत्तों की कम ख़बर ली? क़स्बे से होते हुए शहर की नई सडक पर रवीश के नये उपन्यास की शुरुआत आप स्वागत योग्य नहीं मानते? निर्मल आनंद में लीन अभय जब अपने मन की गाँठेंखोलते हैं तो क्या आप भी कुछ वैसा-वैसा नहीं सोचते? पारुल से आपको क्या कहना है? ज्ञानदत्त पाण्डेय के मन की हलचल को जानते हुए आप जब अजित वडनेरकर की शब्दों की दुनिया में पहुँचते हैं तो कैसे लौटते हैं नहीं मालूम. प्रत्यक्षा ने पिता का स्मरण किया तो सबका मन हुआ कि अपने पिता या आत्मीयजन पर ऐसा ही कुछ शब्दचित्र हो.यूनुस और विमल अपनी रेडियोवाणी और ठुमरी में जो गाने सुनवा रहे हैं उन्हें सुनकर उनकी सोना पर हमारी बिस्वास बढती जाती है. बंबई से बेदख़ल होकर इंदौर तक भी जो डायरी नए नए अनुभव दर्ज करती है उसे पढें या सस्ते शेर, समझ में नहीं आता.संदीप यहाँ कुछ ध्यानाकर्षित कर रहे हैं और प्रियंकर भवानी भाई को याद कर रहे हैं.घुघूती बासूती की यादें यहाँ हैं.मीनाक्षी को अपने अहम् से दो-दो हाथ करते यहाँ पढें और गाँव से क्यो नहीं भागे विजयशंकर? डॉ.प्रवीन चोपडा की खट-खुट यहाँ देखी जा सकती है.
जारी...

Wednesday, February 27, 2008

आइये जारी रखें अपनी शैतानियाँ


यार लोग सोचते होंगे कि कॉपीराइट का सवाल उठाकर उन्होंने कोई नई चीज़ की. ये सच नहीं है. कॉपीराइट एक ऐसा इश्यू है जिसके बारे में हम सभी जानते हैं. और सचेत हैं. मैंने दिनेशराय द्विवेदी की पोस्ट का हवाला देते हुए स्वप्नदर्शी से अपने पत्राचार को आपके साथ इसलिये शेयर किया कि एक तो इस पर आपकी राय जान ली जाय और दूसरे स्वप्नदर्शी भी जान सकें कि हिंदुस्तान में इस कॉपीराइट को लेकर क्या रवैया है. मुझे उम्मीद थी कि इस विषय में ब्लॉग और इंटरनेट के धुरंधर खिलाडी कुछ कहेंगे लेकिन उनकी हिलैरियस ख़ामोशी मुझे इस नतीजे पर पहुँचने को मजबूर कर रही है कि वे इस विषय पर विचार नहीं कर सके हैं और उनके पास भी इसका कोई जवाब नहीं है.

इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री, उसकी पुनर्प्रस्तुति, उपयोग और दुरुपयोग: कुछ विचारणीय प्रश्न

मैं इस मामले में ख़ुद को अनुपयुक्त व्यक्ति पाता हूँ क्योंकि इस सिलसिले में कोई आचार संहिता बनाई गई या नहीं, इस पर पुरानी बहसों या विमर्श को कहाँ सम अप किया गया! यह बात मेरे सामने स्पष्ट नहीं है. मैं ख़ुद इस क्षेत्र में नया हूँ और समझता हूँ कि जानकार इस दिशा में मेरा मार्गदर्शन करेंगे. जहाँ तक मेरा इंप्रेशन है- जो कुछ ओपेन सोर्स की शक्ल में हमें वाइल्ड सर्च से परिणाम मिलता है, वह सबके लिये प्रयोग में लाने योग्य है. यह मानकर चलने में क्या हर्ज है कि जिसने भी अपनी कृति यहाँ स्वतंत्र छोडी हुई है वह इस बात के लिये तैयार है या अवेयर है कि उस कृति को कोई दूसरा प्रयोग में ला सकता है, लाएगा ही. अगर स्रोत का ज़िक्र कर दे तो उसकी भलमनसाहत वरना न करे तो कोई ज़बर्दस्ती तो है नहीं. अगर ऐसी ही परेशानी है तो मैं पूछना चाहता हूं कि आपने इसे पब्लिक डोमेन में रखा ही क्यों? ख़ुद सोचिये उदाहरण के लिये आप अपनी पत्नी या किसी आत्मिक पारिवारिक क्षण का फ़ोटोग्राफ़ अगर पब्लिक डोमेन में न ले जाएँ तो उसका उपयोग-दुरुपयोग आपकी फैमिली अलबम से लेकर ही करना तो संभव होगा!


भारत में कॉपीराइट हासिल करना, उपयोग की अनुमति लेना या कृतिकार को उसका मानदेय पहुँचाना बहुत कठिन है

अगर आप किसी शरारत और दुरिच्छा से संचालित नहीं हैं और सचमुच चाहते हैं कि कृतिकार को उसका अभीष्ट मिले तो आइये एक खेल खेलें. अज़ीज़ नाज़ाँ क़व्वाल की यह मशहूर क़व्वाली मेरे ब्लॉग पर यहाँ मौजूद है. आपसे अनुरोध है कि बताएँ इस क़व्वाली के व्यावसायिक उपयोग की मंशा रखने वाले को वैधता का प्रमाणपत्र कैसे मिल सकता है? मैं आपको तीन साल का समय देता हूँ.


कूडे में पडी कृतियाँ और संरक्षण का सवाल

मेरे पास मेरी वर्षों की दीवानगी और अपनी धरोहर के प्रति मेरे जुनून ने ऐसा बहुत सा ज़ख़ीरा जमा कर दिया है जिसे हम कूडा समझ चुके हैं. सचमुच कूडेदान से बटोरे गये, कबाडियों से ख़रीदे गये और चोर बाज़ार से जुटाए गए माल में यह पता करना मुश्किल है कि इसका सोर्स क्या है. हमारे यहाँ एक अंधी दौड है जिसमें वह सब कुछ, जिसे लाभदायक और ट्रेंडी नहीं माना जाता उसे कूडेदान में डाल दिया जाता है. कोई डेढ सौ संगीतकारों-गायकों और गीतकारों का डाटाबेस मेरे ही पास है जिनके बारे में आप नहीं जानते लेकिन जिन्होंने एक ज़माने में रिकॉर्ड कंपनियों को मुनाफ़े का एक बडा हिस्सा दिलाया. आप नहीं जानते इसमें आपका कुसूर नहीं लेकिन वे रिकॉर्ड कंपनियाँ भी इनकी कोई ख़बर नहीं रखतीं. एक ज़माने के लोकप्रिय संगीतकार चरनजीत आहूजा जिन्होंने अंजन की सीटी में म्हारो मन डोले...जैसा यादगार गाना कम्पोज़ किया, वे दिल्ली के मुखर्जी नगर में रहते हैं और अब स्मृतिलोप-निराशा और गुमनामी का जीवन जी रहे हैं. मैने जब उनसे बात की तो लगा ही नहीं कि वो अपने किये किसी काम से पैशनेटली जुडे भी हैं. इसी गीत का ज़िक्र करें तो आपसे पूछने का मन होता है कि इस गीत के गीतकार अलाउद्दीन और गायिका रेहाना मिर्ज़ा के बारे में आप कभी जान भी पाएंगे या नहीं? रही बात इस गीत को सुनने की, तो इसके लिये आपको किसी सर्च इंजन से सिर टकराना होगा या फिर यह यूनुस के ब्लॉग पर यह मिलेगा.
ऐसा बहुत सा संगीत और साहित्य है जो हम अपने जीवन का अमूल्य समय बरबाद करते हुए, अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए आप तक पहुंचा रहे हैं. हम समझते हैं कि इस बात का महत्व समझते हुए दिनेश राय द्विवेदी जैसे क़ानूनी अध्यवसायी और दूसरे लोग इस महान उपक्रम को जारी रखने की क़ानूनी शक्ति बनेंगे वरना इसमें हमें कोई उज्र न होगा कि हमें अपनी लीगेसी के संरक्षण और विस्तार के दंडस्वरूप जेल आदि की सज़ा काटनी पडे. यहाँ यह स्पष्ट करना बेहतर होगा कि हम करेंसी संगीत और साहित्य को प्रसारित-प्रचारित करें तो अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए हमें उचित उल्लेख करना चाहिये और यह बता देना चाहिये कि सामग्री का स्रोत क्या है और इच्छुक व्यक्ति इस सामग्री को कहाँ से ख़रीद सकते हैं ताकि संबंधित व्यक्ति की व्यावसायिक हानि न हो.
कई दूसरे ब्लॉगर्स की तरह मैं भी यही सोचकर ख़ुद को नैतिक दृष्टि से संगत पाता हूँ कि मैं प्रचारित प्रसारित सामग्री का व्यावसायिक या निजी अर्थोपार्जन के लिये तो उपयोग नहीं कर रहा. दिलचस्प है कि मौजूदा सवाल हमारी साथी ब्लॉगर की तरफ़ से आया है जो अमरीका में रह रही हैं और इस सिलसिले के कई ज्वलंत मुद्दों से दो-चार हैं. हमें न यह कहकर छूट नहीं मिल सकती कि खुद नोटोरियस अमरीकी संस्थाएं एशियाई देशों और दुनियाभर के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स के साथ किस बलात्कार में मुलव्वस हैं और न यह कहकर कि वहाँ नागरिक चेतना और जीवनस्तर इस बात की इजाज़त देता है कि स्वत्वाधिकार आदि के प्रश्न को स्ट्रीमलाइन किया जा सका है. आप जानते हैं कि हमारे यहाँ लेखक बेचारा प्रकशक को पैसे देकर भी अपनी किताबें छपवाता है जबकि पूँजीवादी देशों और अधिकारसंपन्न देशों में लेखकों के लिटरेरी एजेंट प्रकाशकों की नाक की नकेल हैं. गायक-गायिकाओं और संगीत के धंधे के बाज़ लोग माफ़ियाओं और संगीत कम्पनियों के रहम-ओ-करम पर ज़िंदा हैं. ऐसे में हम किस रचनात्मक सम्मान और प्रेरोगेटिव की बात करते हैं.

बाज़ार और उससे जुडी नैतिकता

यहाँ ग़ौरतलब यह भी है कि हमारे ही साहित्य और प्रीरिकॉर्डेड संगीत पर बाज़ार फलफूल रहा है.विज्ञापन और टेलीविज़न मे‍ लाखों के पैकेज पर नौकरियाँ करनेवाले लोग जिस बेशर्मी से मूल रचनाओ‍ को अपने कौशल के साथ अपना बना लेते है‍ उसी के लिये अपनी दावेदारी और क्लेम चाहते है‍. इसलिये मामला उतना इकहरा और द्व‍द्वमुक्त नही‍ है जिसके लिये डरने और पने मौजूदा शग़ल से हाथ खींच लेने की नौबत आ जाए.


आइये जारी रखें अपनी शैतानियाँ.


इस लेख से जुडी हुई कडियाँ
क्या हम चोर हैं?
इरफ़ान की चिंताएँ हम सब की चिंताएँ हैं
कॉपीराइट ऐक्ट:कुछ फ़लसफ़े कुछ उल्झनें
कापी राइट का कानूनी पहलू एक वकील की कलम से
काँपीराइट को समझें, इस का उल्लंघन करने पर तीन साल तक की सजा, साथ में ढ़ाई लाख तक जुर्माना हो सकता है
कॉपीराइट उर्फ़ गंदा कॉलर-साफ़ कॉलर

Tuesday, February 26, 2008

कॉपीराइट उर्फ़ गंदा कॉलर-साफ़ कॉलर

वकील ने देख लिया था कि उनकी कमीज़ का कॉलर गंदा है और आज सुबह भी उन्होंने दही-चूडा खाया था. पहले तो वो बहुत देर तक मोबाइल पर बात करने का नाटक करता रहा लेकिन पिंड छूटता न देखकर उन्हें बाहर अरबिंद की चाय की दुकान पर ले आया. चाय को मजबूरी में सुडकते हुए वकील ने उन्हें बताया कि इस मामले में कुछ नहीं हो सकता है. अगर कुछ होना ही है तो बहुत पैसा खर्च होगा और टाइम भी बहुत लगेगा. पैसे की बात सुनकर वो उस तरफ़ देखने लगे थे जिधर लिखा था- अठारह वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को सिगरेट, तम्बाकू, पान-मसाला आदि बेचना दंडनीय अपराध है.

कई दिनों की दौडभाग के बाद उनके बेटे ने इस वकील से मुलाक़ात करवाई थी जिसे अग्रवाल समाज में बडी इज़्ज़त हासिल थी और लेखकों के साथ शराब पीने से उसमें लेखकीय लचक आ गई थी. कॉपीराइट को अब उसने अपनी रुचि का नया अड्डा बना लिया था लेकिन रोना यही था कि लेखक कंगला होता है उसके पास खरचने उतना भी नहीं होता कि....

उनकी एक कहानी, जिसने नई कहानी आंदोलन के दौर में उन्हें रातों-रात शिखर पर पहुंचा दिया था, को एक अमरीकी प्रकाशन ने अपनी एंथोलोजी में अंग्रेज़ी में अनुवाद करके छाप लिया था और अब तक इस एंथोलोजी के तीन संस्करण हो चुके थे. उन्होंने कई बार सोचा कि अगर छापना ही था तो मुझसे पूछ लेते...फिर यह सोच कर संतोष कर लिया कि मुझसे पूछते कैसे? पिछले कई साल से मेरा कोई स्थाई पता भी नहीं रहा...कभी बडे बेटे-बहू के साथ, कभी छोटे अनिमेष के साथ...कभी बेटी से मिलने चले गये तो कभी बिसनाथ के ऑरोवेलवाले आश्रम में नेचर क्योर में पडे हैं...जब घर पर भी हुए तो कभी डाकिया बाहर बैठे हारूनघडीसाज़ को चिट्ठी दे गया तो कभी बाहर डिब्बे में डाल गया और लौंडे उससे जहाज बनाकर उडा गये....

Monday, February 25, 2008

क्या हम चोर हैं?


पिछले कई दिनों से निजी पत्र व्यवहार में स्वप्नदर्शी यह चिंता व्यक्त कर रही हैं कि हम लोग अपने ब्लॉग्स पर जो साहित्य-संगीत आदि प्रकाशित-प्रसारित कर रहे हैं उस संदर्भ में हमने कॉपीराइट उल्लंघन के पहलुओं पर विचार किया है? आज ही दिनेशराय द्विवेदी की एक पोस्ट का हवाला देते हुए उन्होंने यह लिंक भेजा है जिसके अनुसार हम सब जो इस काम में लगे हैं उन्हें सोचना चाहिये। मैं इस दिशा में किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पा रहा हूँ। इसलिये इस पोस्ट को एक निवेदन की तरह लिया जाय। यह निवेदन ब्लॉग और इंटरनेट महारथियों से - रवि रतलामी, श्रीश, अविनाश, देबाशीश, मैथिली, सागर नाहर और जीतू चौधरी सहित उन तमाम लोगों से है जिन्होंने हमें चोरी की राह पर ढकेला है। मैं भाई यूनुस, विमल वर्मा, पारुल, अशोक पांडे, प्रमोद सिंह और उन सभी मित्रों से आग्रह करता हूँ जो पूर्व प्रकाशित साहित्य और प्री-रेकॉर्डेड म्यूज़िक अपने ब्लॉग्स या साइट्स पर अपलोड करते हैं, वे बताएं कि क्या हम सब चोर हैं? इस दिशा में क़ानूनी नुक़्तों के मद्देनज़र आप सभी अपने ब्लॉग प्रसारण और प्रकाशन की हलचलों के पक्ष में क्या दलीलें देते हैं.
जब तक इन चिंताओं पर कोई ठीक-ठाक पोज़ीशन नहीं ली जाती तब तक के लिये मैं अपने ब्लॉग पर या सामोहिक ब्लॉग्स पर अपनी ओर से ऐसी कोई भी सामग्री प्रसारित-प्रकाशित नहीं करूँगा जिसमें आइपीआर के निषेध का मसला जुडा हो.

Sunday, February 10, 2008

पुस्तक मेला, आवारगी और एक तट छोडती नाव

मैं इस वक़्त भी उसी जगह पर हूँ



मैं इस वक़्त भी उसी जगह पर हूँ

जहाँ मेरे दिल का समुंदर
तुम्हारे शानदार जहाज़ को रुख़्सत होते देखकर
ठिठक गया था


आसमान तब कुछ और नीचे उतर आया था

पहाडों ने तुम्हें जाने के लिये जगह दे दी थी

मैं अब भी उसी जगह पर हूँ

इस इंतज़ार में
कि जिस शहतूत के दरख़्त को
मैंने आँखों से ओझल होते देखा है

वह लौटते हुए कैसा लगेगा!
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पिछ्ला हफ़्ता महान अप्रत्याशाओं और सुखद आश्चर्यों से भरा गुज़रा. मेरी कुछ माँगी हुई मुरादें पूरी हुईं और बिनमाँगी हुई भी. भाई अशोक पांडे आए तो वो अपने साथ वह चेक भी लाए जिसने आपके साथ पिछले दिनों टूट गये रिश्ते को फिर से शुरू करने का ज़रिया बनाया. मैंने कहा था बिल अदा नहीं कर पा रहा हूँ और वो बोले "अच्छा" और जब वो बोले मैं अदा करता हूँ तो मैंने कहा "ठीक है".

बानगी सुनिये





लाए तो वो अपने साथ बहुत कुछ ऐसा थे जिसे मैं क्या कहूँ, आप मुनीश की ज़बानी पहले ही पढ चुके हैं. वो एक शानदार घुमक्कड और परले-दर्जे के आवारा हैं. आज उनका साथ छूट गया. और लगा कि शहर से आवारगी का मसीहा कूच कर गया. इस बीच कई और जाने-अनजाने दोस्तों ने मेरे बिल की अदायगी का प्रस्ताव रखा है जिनके प्रति मैं तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ.
मुनीश ने पुस्तक मेले और इसके बहाने जुटे कुछ ब्लॉगरों का हाल तो बताया ही है. इस बीच उन्होंने एक छापामार रिकॉर्डिंग भी कर डाली. सुनिये इसमें अशोक पांडे, मनीषा, मुनीश और मैं क्या-क्या फेंक रहे हैं-

Sunday, January 27, 2008

ज़ाहिर का 'ज' और पिज्जा का 'ज़' उर्फ़ तेरा नुक़्ता नुक़्तेबाज़ी -मेरा नुक़्ता ट्रेंडी

एक बार एक आदमी जंगल से गुज़र रहा था. रास्ते में उसे बहुत ज़ोर की प्यास लगी. थोडी दूर चलने पर उसे एक कुटिया दिखाई दी. कुटिया के पास पहुँच कर उसने आवाज़ लगाई तो संसार से निर्लिप्त एक साधूबाबा बाहर आए. आदमी ने उनसे पानी माँगा. साधूबाबा ने आदमी से बैठने को कहा और स्वयं भी आसन ग्रहण किया.
अब साधूबाबा आदमी को पानी की उत्पत्ति, उससे जुडी मिथकीय मान्यताओं, पानी के अनुष्ठान, पानी का प्रागैतिहास, आधुनिक पानी की प्रासंगिकता, पानी की प्राचीनता, पानी के बारे में पाणिनि और चरक-सुश्रुत और ओशो के विचार बताते रहे. वे और भी बहुत कुछ बताते रहे लेकिन आदमी ध्यान से सुन नहीं पा रहा था क्योंकि पानी की कमी से उसकी चेतना साथ नहीं दे रही थी. अंत में साधू ने यह कहकर आदमी को पानी देने से इंकार कर दिया कि पानी माँगने से पहले पानी का इतिहास जानना ज़रूरी है.

लता मंगेश्कर एक पुरानी गायिका हैं और उनके गाये गीतों में शब्दों का उच्चारण सटीक होता है. वे किसी मुसलमानी बिंदी को साथ में लेकर पैदा नहीं हुई हैं. वे हिंदी-उर्दू की गंगा पट्टी में भी पैदा नहीं हुईं है. कृपया बताएँ कि वे अपने भाषिक उच्चारण को लेकर इतनी सचेत क्यों रहती हैं? अस्सी के दशक तक लगभग सभी गायक-गायिकाएँ भाषा का सौंदर्य बरक़रार रखते आए हैं और व्यापक लोग उनके उच्चारण से सीखते हैं और बोल भले न पाते हों सही और ग़लत का भेद कर लेते हैं. दिनमान में शमशेर बहादुर सिंह देवनागरी में उर्दू के पाठ क्यों लिखते रहे जिन्हें रघुवीर सहाय धारावाहिक अध्यायों के रूप में लंबे समय तक छापते रहे? क्यों बडे-बडे बाबू साहब लोग एक ज़माने तक अपने दुलरुओं को तवायफ़ों के पास तहज़ीब और तलफ़्फ़ुज़ सीखने के लिये भेजते रहे?

असल में समय गुज़रने के साथ भाषिक सौंदर्य मुसलमानों के साथ जोड दिया गया है जबकि मार खाया और भगाया हुआ मुसलमान भी कैसी भाषा बोल सकता है...यारों को अब नुक़्ते का इस्तेमाल नुक़्तेबाज़ी लगता है और इसी लिये महान सूफ़ी गायक कैलाश खेर का पहला ही हिट गाना टूटा-टूटा एक परिदा ऐसे टूटा कि फ़िर जुड न पाया...एडिटिंग टेबल से फ़ाइनल होकर बाज़ार में पहुँच जाता है. आप जानते हैं कि म्यूज़िक कुक करना एक टाइमटेकिंग प्रॉसेस है और वह किसी एक आदमी की व्हिम पर नहीं चलता. उदाहरण के लिये आप गायत्री मंत्र की सीडी कुक कर रहे हों तो आप संस्कृत की अदायगी ठीक हुई है या नहीं इस पर जानकारों की राय ले लेते हैं. कैलाश खेर या उनके समकालीनों के केस में अब या तो जानकार हैं नहीं या फिर राय लेने ज़रूरत नहीं समझी जाती ...और जिस तरह की दलीलें यहाँ ब्लॉग विमर्श में सुन रहा हूँ उससे तो यही लगता है कि ख़ामियों को छुपाने के सुविधाजनक तर्क गढे जा रहे हैं. बक़ौल अजित "एक हिन्दी चैनल के कर्ता-धर्ता जो अक्सर एंकरिंग करने लगते हैं, बार-बार दोनो हथेलियों को रगड़ते हुए ज़ाहिर को जाहिर है, जाहिर है बोलते चले जाने की वजह से काफी शोहरत पा चुके हैं।" वे ज़ भले ही ज़ाहिर बोलते हुए बोलना न चाहें क्योंकि वह मुसलमानी बिंदी है लेकिन पिज़्ज़ा ज़रूर बोल लेते हैं. कभी आपने किसी ग़ैरनुक़्तेबाज़ को Pijja बोलते हुए सुना है?

Saturday, January 26, 2008

एक छोटी सी बात का इतना प्रचार?

कुछ टूटी हुई, कुछ बिखरी हुई
ब्लॉग-चर्चा में आज इरफान का ब्लॉगटूटी हुई बिखरी हुई ‍‍
-मनीषा पांडेय
25 जनवरी 2008, वेब दुनिया

आज ब्‍लॉग-चर्चा में हम जिस ब्लॉग को लेकर हाज़िर हुए हैं, वह कई मायनों में अब तक यहाँ चर्चित ब्लॉगों से भिन्‍न है। सबसे पहली बात तो यह कि ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ नाम का यह ब्लॉग सबसे कम उम्र का ब्लॉग है। इसे चलाते हैं - स्वतंत्र पत्रकार और मीडियाकर्मी इरफान। मई, 2007 में मोहल्‍ला फेम ब्‍लॉगर अविनाश की मदद से इरफान का ब्‍लॉग की दुनिया में पदार्पण हुआ और फिर प्रकाश में आया - ‘टूटी हुई, बिखरी हुई’। नाम पर न जाएँ, नाम भले टूटा-फूटा हो, ब्‍लॉग फिलहाल एकदम दुरुस्‍त है। इसीलिए आज इस कॉलम में आप सबसे रू-ब-रू है।

ब्‍लॉग का नाम जितना अजीब है, यूआरएल उससे भी ज्‍यादा पेचीदा। ब्‍लॉगस्‍पॉट के पहले अँग्रेजी के 21 अक्षर टाइप करने में ब्‍लॉग पढ़ने वाला खुद ही ‘टूटी हुई, बिखरी हुई’ हो जाता है। लेकिन एक बार ब्‍लॉग खुले तो फिर ऐसी जान लौटती है कि घंटों उस ब्‍लॉग पर कब बीते, पता ही नहीं चलता।
इरफान इसकी सफाई कुछ यूँ देते हैं, ‘मुझे तब यह नहीं मालूम था कि ब्लॉग टाइटिल और यूआरएल अलग-अलग भी हो सकते हैं। ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ हिंदी के प्रख्यात कवि स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह की एक कविता है। शमशेर की स्मृति को समर्पित यह ब्लॉग कविताओं का नहीं है। यह अलग बात है कि कविताएँ भी यहाँ हैं। ख़ुद शमशेर की उपरोक्त पूरी कविता अपने अँग्रेज़ी अनुवाद के साथ यहाँ एक स्थाई उपस्थिति बनाए हुए है।’
आज ब्‍लॉग-चर्चा में हम जिस ब्लॉग को लेकर हाज़िर हुए हैं, वह कई मायनों में अबतक यहाँ चर्चित ब्लॉगों से भिन्‍न है। सबसे पहली बात तो यह कि ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ नाम का यह ब्लॉग सबसे कम उम्र का ब्लॉग है। इसे स्वतंत्र पत्रकार और मीडियाकर्मी इरफान चलाते हैं।
इरफान दिल्ली में रहते हैं। उनका परिचय उनके ब्लॉग पर कुछ इन शब्‍दों में पढा जा सकता है, ‘मैं मिर्ज़ापुर के घुरमा मारकुंडी में पैदा हुआ। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ा और समकालीन जनमत के साथ पटना होता हुआ दिल्ली पहुँचा। यहाँ स्वतंत्र पत्रकारिता, लेखन और ऑडियो-विज़ुअल प्रोडक्शन्स में लगा हुआ हूँ।’ इरफान को आश्चर्य होता है कि उन्होंने दोस्तों से ज़्यादा दुश्मन बनाए हैं और अपने व्यवहार में हमेशा एक कटुता और मुँहफटपन लिए रहते हैं, फिर भी उनमें और उनके ब्लॉग में लोगों की जिज्ञासा क्यों है, जबकि उनके अनुसार उनके ब्लॉग में ऐसा कुछ है भी नहीं, जिसका इंतज़ार लोगों को हो।
वे कहते हैं, ‘मैंने तो मज़े-मज़े में इसे शुरू किया है और आइडिया यही है कि मैं अपनी बरसों से समेटी-सँजोई चीज़ों का एक व्यवस्थित रैक बनाऊँ। इसी क्रम में मैंने शुरुआती पोस्टें जारी कीं, जिनमें किसी की दिलचस्पी क्यों होती।
‘पुराने ईपी और एलपी के कवर्स, गुज़रे ज़माने के ब्रॉडकास्टर्स, फिल्मी लोग और साहित्यकारों की तस्वीरें.... मुझे जो कुछ भी दबा-छिपा मिल जाता, उसे मैं सँजोने लगा। सच पूछिए तो ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ पूरी तरह किसी भी एक विधा या फोकस का ब्लॉग नहीं है। वो ये भी है और वो भी है या कहें ये भी नहीं है और वो भी नहीं।’
इरफान आगे कहते हैं, ‘बहरहाल धीरे-धीरे मैंने कुछ लिखने की कोशिश की, जिसका बहुत ख़राब रिस्पांस देखकर लगा कि यहाँ समझदारी की बातें करना बेकार है। उसके बाद से मैं अब ज़्यादातर साउंड पोस्ट करने का काम करता हूँ। इसमें भी लालच यही रहता है कि जो कुछ मुझे सुनने के लायक लगता है, उसे दोस्तों के साथ शेयर करूँ। वैसे भी मेरा मौजूदा पेशा मुझे इस ओर उद्धत करता है कि खुद सुनने के अलावा मैं सुनाऊँ भी।’
इरफान रेडियो जॉकी भी हैं। वे कहते हैं, ‘सुनाने का एक बडा फोरम होने के बावजूद मेरे सामने कुछ बंदिशें भी हैं और एक ख़ास तरह का फिल्मी म्यूज़िक बजाने के अलावा मेरे सामने कोई रास्ता भी नहीं है। ऐसे में ब्लॉग ने मुझे यह अवसर दिया है कि मैं इस तरह का संगीत भी लोगों तक पहुँचा सकूँ। आलोक धन्‍वा, नरेश सक्सेना, उदय प्रकाश, इब्बार रब्बी, विनोद कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल और चंद्रकांत देवताले जैसे हिंदी के कवियों की उन्हीं के स्वर में कविताएँ हों, आम लोगों की बोलती गाती आवाज़ें हों, देवकीनंदन पांडे और ज़िया मोहिउद्दीन के नायाब पाठ हों या मेरी पसंद के गीत... इन सब चीज़ों के लिए एफएम रेडियो में स्थान नहीं है। मैं इस तरह ब्लॉग के माध्यम से एक वैकल्पिक रेडियो चलाने का भी आंशिक सुख लेता हूँ।’
ब्लॉग विधा के बारे में अपनी शुरुआती प्रतिक्रिया को याद करते हुए वे कहते है, ‘मुझे शुरू में लगता था और आज भी यही लगता है कि यह थोड़े से उन लोगों का शग़ल है, जिन्हें आत्म-प्रदर्शन पसंद है। मैं ख़ुद भी प्रदर्शनवादी हूँ तो यह मेरी दबी इच्छाओं का वाहन बना हुआ है।’
‘टूटी हुई बिखरी हुई’ की सैर करते हुए अचानक आपको गैब्रिएला मिस्‍त्राल की कविता दिख जाएगी, तो कहीं फहमीदा रियाज की कोई गुनगुनाती हुई-सी नज्‍म। पुराने लेखकों और साहित्‍यकारों की कुछ दुर्लभ तस्‍वीरें भी यहाँ देखी जा सकती हैं। इन्‍हीं सबके बीच कहीं इरफान की कविता से भी साबका पड़ता है -

चाँद और लुच्चे
ये एक सँकरा रास्ता था
जहाँ पहुँचने के लिए
कहीं से चलना
नहीं पड़ता था

या ये एक मंज़िल थी
समझो
जाती थी बस...
फिर रात गहराती थी
और चांद की याद भी किसी को नहीं आती थी

एक दिन
जब धूल के बगूलों पर सवार
कुछ लुच्चे आये
(वो ऐसे ही आते-जाते हैं सब जगह बगूलों पर ही सवार)

बाल बिखरे हुए थे उनके

बोले-
नींद खुलने से पहले ही जागा करो...
और ऐसी ही कई बातें.

चांद उत्तर के थोड़ा पूरब होकर लटका हुआ था

किसी को परवाह भी न थी
उन्हें भी नहीं

छटनी में छांटे गये ये लुच्चे
बस छांद की थिगलियां
जोड़ते रहते हैं
रातों में.
---------------------
इरफ़ान
12 जनवरी 1994


कहीं रुबर्तो हुआरोज की शीर्षकहीन कविता नजर आती है -

शीर्षकहीन कविता

अपने हाथों का तकिया बना लो.

आकाश अपने बादलों का
धरती अपने ढेलों का
और गिरता हुआ पेड़
अपने ही पत्तों का तकिया बना लेता है.

यही एकमात्र उपाय है
गीत को ग्रहण करने का
निकट से उस गीत को जो
पड़ता नहीं कान में,
जो रहता है कान में.
एकमात्र गीत जो दोहराया नहीं जाता.

हर व्यक्ति को चाहिये
एक ऐसा गीत जिसका
अनुवाद असंभव हो.

रोबर्तो हुआरोज़ अर्जेंटीना,1925
-----------------------
अनुवाद:कृष्ण बलदेव वैद



तो कहीं ब्रेख्‍त की आवाज सुन पड़ती है -

मैं सड़क के किनारे बैठा हूँ
ड्राइवर पहिया बदल रहा है

जिस जगह से मैं आ रहा हूँ वह मुझे पसंद नहीं
जिस जगह मैं जा रहा हूँ वह मुझे पसंद नहीं

फिर क्यों बेसब्री से मैं
उसे पहिया बदलते देख रहा हूँ.

इसके अलावा भारत एक खोज, सस्ता शेर और सिर्फ इरफान उनके ब्‍लॉग हैं। उनका पसंदीदा ब्‍लॉग अशोक पांडे द्वारा संचालित ब्‍लॉग ‘लपूझन्ना’ है। ब्‍लॉग पर क्‍या लिखते हैं, के जवाब में वे कहते हैं, ‘ब्लॉग पर लिखने के लिये विषयों का चुनाव ज़्यादातर परिस्थिति और मूडवश ही करता हूँ। कोई तयशुदा नियम नहीं है।’
हिंदी ब्‍लॉगिंग के बारे में इरफान कहते हैं, ‘हिंदी ब्लॉगिंग फिलहाल तैयारी और जुगुप्सा के दौर से गुजर रही है। टीवी या प्रिंट माध्यमों से इसमें एक ही भिन्नता है कि यह टीआरपी और सर्कुलेशन के दबावों से पूर्णत: मुक्त है।’
लेकिन इरफान ब्‍लॉगिंग को आने वाले समय की विधा नहीं मानते। वे कहते हैं, ‘आने वाले समय में चुनिंदा और विषय-भाव केंद्रित ब्लॉग ही सार्थक कर रहे होंगे। इसमें वो सब बुराइयाँ (ज़्यादा) और अच्छाइयाँ (कम) झलकेंगी, जो समाज में हैं, और निजी कैथार्सिस को रोकना कौन चाहेगा? ब्लॉगिंग से पत्रकारिता अपने लिए कच्चा माल लेगी।’
क्‍या आने वाले समय में इंटरनेट और ब्‍लॉगिंग इलेक्‍ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया पर भारी पड़ सकते हैं, के जवाब में इरफान कहते हैं कि ऐसा हो सकता है, जब गंभीर पत्रकार अपने प्रेस क्लबों से ब्लॉग का रुख़ करेंगे। ब्‍लॉगिंग से हिंदी भाषा का विकास भी होगा। ग्लोबलाइज़ेशन की बुराइयों पर सहमत लोग अपने दोस्तों को पहचान सकेंगे।

इरफान एक ऐसे ब्‍लॉग की भी कल्‍पना करते हैं, जहाँ उनके मोहल्ले का कूडा उठाने वाला भी स्थान पा सकेगा।

ब्‍लॉगिंग के माध्‍यम से इंटरनेट की दुनिया में जो खजाना तैयार हो रहा है, उसमें एक है, टूटी हुई बिखरी हुई । समय के सीमा में बँधी कोई प्रासंगिता इस ब्‍लॉग की विवशता नहीं है। यह ब्‍लॉग हर समय प्रासंगिक है। दुर्लभ चित्र, कविताएँ, दस्‍तावेज और गीत हमेशा प्रासंगिक हैं।

ब्‍लॉग - टूटी हुई बिखरी हुई
URL - http://tooteehueebikhreehuee.blogspot.com/

ब्‍लॉग - सस्‍ता शेर
URL -www.ramrotiaaloo.blogspot.com

ब्‍लॉग - सिर्फ इरफान
URL - www.sirfirf.blogspot.com

ब्‍लॉग - भारत एक खोज
URL - www.ekbanjaragaaye.blogspot.com

Friday, January 25, 2008

वेब-दुनिया की ब्लॉग चर्चा में आपकी टूटी हुई का ज़िक्र


रवींद्रनाथ टैगोर की एक दुर्लभ छवि

यहाँ आज वेब दुनिया की आज की ब्लॉग चर्चा में टूटी हुई बिखरी हुई को चर्चा का विषय बनाया गया है.

Thursday, January 17, 2008

टिप्पणी भी बताती है आपकी शख़्सीयत

पहलू के संचालक चंद्रभूषण ने एक पोस्ट पर टिप्पणी की है. इसे पढकर मन एक बार फिर इस बात से सहमत हुआ कि-

बोलिये तो तब जब बोलिबै की जानि परै,
नहिं तो मौन गहि चुप ह्वै रहिये.

पोस्ट भले ही वैसी गूढ हो जैसी मार्तिनोव ने प्लेखानोव को सरल बनाने में बना दी थी लेकिन टिप्पणी यहाँ पेश की जाती है-

फिर से जुड़ना एक ख्वाहिश है फकत,
जिससे कि हर बार अपना होना होता है।
बकौल शमशेर (मोर ऑर लेस)-

लौट धार
टूट मत ओ दर्द के पत्थर-
हृदय पर
लौट आ ओ फूल की पंखुड़ी
फिर फूल से लग जा...
(-चंद्रभूषण की टिप्पणी)

Thursday, December 20, 2007

"टूटी हुई बिख्ररी हुई" अब नये लुक में, उर्फ़ जय ब्लॉगबुद्धि


जिस दिन बंबइया ब्लॉगरों ने विकास को तलाशा उसी दिन मैंने विकास की ब्लॉगबुद्धि पर अपनी फरमाइश रख दी थी कि मैं अपने ब्लॉग का टेम्प्लेट इसी रंग विधान में कुछ बदलना चाहता हूँ. मैं असल में उस पेज के दोनों तरफ की पट्टियाँ हटाना चाह रहा था. विकास इस बीच अपनी ज़िंदगी की धुन में मगन हो गये शायद, हालाँकि उन्होंने मुझे एक नमूना अगले ही दिन दिखा दिया था...

रात उनका मेल मिला...":O मुझे लगा कि मैं आपको मेल कर चुका हूँ.

अभी थोड़ी देर में भेजता हूँ."


...और थोडी देर में उन्होंने जो भेजा उसी का नतीजा है- यह नया लुक. मुझे तो ठीक लग रहा है, बस बाईं पट्टी पर पहले से मौजूद फोटो थोडे दबने से बच जाएं और वह पट्टी एक स्थाई डिज़ाइन एलेमेंट की तरह अपना प्रभाव छोडती रहे तो मैं ख़ुश हूँ.

अब आप बताएँ यह बदलाव कैसा है. क्या अलग-अलग आकारों और रेज़ोल्यूशन के मॉनीटर इसका स्वागत कर रहे हैं?

Tuesday, December 11, 2007

उमा देवी: काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाय...


सुबह जब यूं ही नेट पर भटक रहा था तो नज़र पडी- काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाय...
कहा जाता है कि फ़िल्मी गाने आधुनिक जीवन के लोक गीत ‍हैं. इस कथन को पुष्ट करती यह पोस्ट देखें. १९४८ में महबूब की फ़िल्म अनोखी अदा ने कामयाबी के झंडे गाडे. सुरेन्द्र, नसीम बानो, प्रेम अदीब, कुक्कू, अडवाणी और नवाब इसमें प्रमुख भूमिकाओं मे थे. यह एक प्रेम कहानी थी. नौशाद के संगीत से सजी इस फ़िल्म के गाने बहुत मक़बूल हुए. इतने कि आज किन्हीं ब्लॊगर फ़ुरसतिया के मुताबिक़ लोकगीत बन गये. इसी पोस्ट में उन्होंने काहे जिया डोले के बोल थोडी अशुद्धियों के साथ जारी भी किये हैं और रचनाकार अज्ञात बताया है.
आप जानते हैं कि शकील बदायूनी कोई अज्ञात शायर नहीं हैं लेकिन कई बार स्मृतियों में कोई चीज़ ऐसी जगह बना लेती है जिसे तथ्य के बजाय मिथक मानना अच्छा लगता है.
अनोखी अदा में कुल बारह गाने थे जिनमें से कुछ अंजुम पीलीभीती ने लिखे थे. सुरेंद्र, मुकेश और शमशाद बेगम के अलावा इस फ़िल्म में उस ज़माने की उभरती हुई गायिका उमा देवी ने गाने गाये थे. यह काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाय... गाना भी उमा देवी का गाया है जिन्होंने १९४७ की फ़िल्म वामक़-अज़रा से अपनी फ़िल्मी पारी शुरू की थी और बाद में आप उन्हें टुनटुन की शक्ल में हास्य भूमिकाएं करते हुए देखते हैं. यहां आप सुनेंगे उमा देवी का गाया वामक़ अज़रा का वह गीत, जिससे उन्होंने शुरुआत की. आप वह गाना भी सुनिये जिससे मुझे यह पोस्ट लिखने की ज़रूरत जान पडी.
एक और गीत जिसका ज़िक्र श्री फ़ुरसतिया ने किया है - यानी छापक पेड... उसे मैं यहां पहले जारी कर चुका हूं.

दुनिया से मिटाएं मुझे या दिल से भुलाएं...फ़िल्म: वामक़ अज़रा


काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाय...फ़िल्म : अनोखी अदा

Friday, August 31, 2007

पाकिस्तानी ब्लॉगरों से बातचीत


वॉयस ऑफ़ अमेरिका ने पिछले दिनों दुनिया भर में सक्रिय कुछ पाकिस्तानी ब्लॉगरों से बातचीत की.
यहां सुनिये.



यहां मौजूद फ़ोटो महज़ सजावटी है.