दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Sunday, June 17, 2007

लाल किताब, हाफ़ पैंट और खडी चुंडी !


आज शाम जब रामपदारथ ने रामसनेही को एसएमएस किया तो साफ़ था कि ख़बर रामपदारथ तक पहुंच चुकी है. रामसनेही ने एसएमएस दबा लिया. लेकिन एक के बाद दूसरी मिस्ड कॉल्स से साफ़ था कि फ़ोन करना पडेगा. रामसनेही ने पुराने अड्डे के पास अर्चना सिनेमा के सामनेवाली सिगरेट की दुकान से फ़ोन किया, रामपदारथ ने बताया कि चाय का ऑर्डर दिया जा चुका है आ जाओ. दोनों दोस्त वहीं ज़मरूद्पुर की दुकान पर बतियाने लगे जहां उन्होंने बनावटी बातों पर पिछली बार चर्चा की थी.


रामसनेही: बात तो चल ही रही थी लेकिन इस बार गारद ने राहुल को दबोच लिया. फ़ोटो भी है.


(रामपदारथ फ़ोटो देखता है और कुछ अटपटे सवाल फ़्रेम करने लगता है लेकिन पूछ्ता कुछ और है)

रामपदारथ: लेकिन अभी तक तो आप ब्लॉग की दुनिया में जनतंत्र की बडी बात करते थे. यहां भी हल्का लाठीचारज होता दिख रहा है?

रामसनेही: असल में यहां बडी अच्छी-अच्छी बातें हुआ करती थीं. सब सहमत भी थे. लोग यह देख कर भी खुश थे कि पुराने नक्सली टाइप के लोग अब हैंडपंप आदि लगवाने की बातें करने लगे हैं. ख़ुशी का एक कारण यह भी था कि सरयू तट पर जमा भीड को इन हैंडपंपों से पानी पीपीकर दर्शन आदि की सुविधा रहेगी. फ़ोटो भी है.


रामपदारथ: यहां तक तो बात समझ में आई, लेकिन ये राहुल को दबोचा क्यों गया?

रामसनेही: कोई बहुत बडा रहस्य नहीं है. आप तो जानते हैं कि इन मिलन केंद्रों पर आम सहमति ये रही है कि समाजवाद आदि की बात करना, लकीर के फ़्कीर बने रहने का दूसरा नाम है. वामपंथियों को पहचानते ही यहां कौआरोर मच जाता है. मतलब यहां के ट्रैफ़िक साइनों में से ये बडा लोकप्रिय है. फ़ोटो देखिये.



रामपदारथ: तो क्या कुछ लोग लाल किताब लेकर पहुंच गये?


रामसनेही: नहीं ऐसा तो नहीं कहा जा सकता. और फिर राहुल टाइप के लोग भी क्या करें? अब गीता प्रेस की किताबों से तो अंश पोस्ट करेंगे नहीं. एक कहानी थी-- गुजरात में मुसलमानों की दुर्दशा पर. बस उखड पडे, कह सकते हैं चुंडी खडी हो गयी सबकी. एक का तो फ़ोटो भी है.



रामपदारथ: वैसे भी मुसलमानों की बात करना तो तुष्टीकरण माना जाता है, ऊपर से कहानी भी मुसलमान जैसे नामवाले लेखक की थी शायद?
रामसनेही: शायद क्या! थी ही. लेकिन इसकी बहुत चरचा नहीं होती कि हिंदी फ़िल्मों के सबसे अच्छे भजन मुसलमानों की टीम ने बनाए हैं? ...उदाहरणस्वरूप.. मोहम्मद रफी- नौशाद- शकील बदायूनी- के.आसिफ़ या महबूब...
रामपदारथ: नहीं ये तो ठीक है लेकिन आप विषयांतर कर रहे हैं.
रामसनेही: चलिये विषय पर ही आता हूं. माना जाता है कि इस तरह के विषयों पर उतनी देर ही बात की जानी चाहिये जितनी देर तक प्वॉइंटर हिलता रहे, मतलब किसी की तरफ रुके नहीं, बल्कि अच्छा तो ये हो कि सब बातें कर लेने के बाद हंसा जाए. गंभीर होने या गंभीर चर्चा का मतलब है कि अब आप राजनीति करने लगे.
रामसनेही:...और राजनीति तो सब गंदी हैं तो कपडे क्यों न साफ़ पहनें...हा..हा..हा.
रामपदारथ: हा..हा..हा..
रामसनेही: चलिये इस हंसी से लगा कि कुछ अच्छी शुरुआत हो रही है.
रामपदरथ: एक तरह से अच्छी शुरुआत तो होगी लेकिन एक और तरह से देखें तो गारद्पंथी कुछ बहुत अच्छे लेखकों की रचनाओं और अनुभवों के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो जायेंगे जोकि बुरी बात होगी.
रामसनेही: हां ये तो है. अब क्या करेंगे हाफ़ पैंट पहनकर अच्छी रचनाएं हो ही नहीं पातीं.
रामपदारथ: हाफ़ पैंट पहन कर अच्छी बातें सुनने का, पढ्ने का अभ्यास पता नहीं कब शुरू होगा? रामसनेही: अब तो नया एग्रीगेटर बनाने के लिये गोलबंदी भी सुनने में आ रही है. फ़ोटो देखिये.


रामपदारथ: इसमें आपका हाथ नहीं दिख रहा?
रामसनेही: आपकी पारखी नज़र को मान गये. हमारा हाथ अभी चाय का गिलास थामे हुए है. इससे फ़ुरसत मिलते ही इस शुभकार्य में शामिल होऊंगा.
रामपदारथ:चलिये अब चला जाए...ए लड्का! पैसा कितना हुआ रे!

Thursday, June 14, 2007

आईना दर आईना


अगर हम चीज़ों को उनके असली नाम से पुकार सकते होते तो देशप्रेम को हम युद्धोन्माद पुकारते, देश पर शहीद हो गये को हम कहते मासूम युवकों को बलि चढाया जा रहा है, अख़बार लिखता कि अमुक ने कथित रूप से हत्या की, तो हम पढते अमुक को बचाया जा रहा है

Sunday, June 3, 2007

चिट्ठाकारों का महाधिवेशन: प्रेस विज्ञप्ति

नई दिल्ली.3जून 2007. अगले महीने राजधानी में होने वाला ब्लागरों का महाधिवेशन फिलहाल अनिश्चित काल के लिये स्थगित कर दिया गया है.ब्लॉगरों को एक संगठित शक्ति में बदलने और सार्थक सामाजिक गतिविधियों में उतारने के लिये यह पहल राज्धानी की एक ग़ैरसरकारी संस्था मायामोहिनी ने की है.मायामोहिनी की एग्ज़ीक्युटिव डायरेक्टर अचानक विदेश दौरे पर चली गयीं इसलिये उनका पक्ष नहीं मिल सका लेकिन आयोजन की तैय्यारी समिति की एक आपातकालीन बैठक आज शाम यहां सम्पन्न हुई.
बैठक मे तैय्यारी समिति के अध्यक्ष स्वामी धकधकानंद की अनुपस्थिति संभावित थी और वही हुआ.उनका कहना था कि बार-बार अपने चिट्ठे पर जिस विशेष शैली का लेखन वे जारी कर रहे हैं उसे एक शैली के बतौर मान्यता मिलना तो दूर लोग उसका सौंदर्यबोधात्मक संज्ञान तक नहीं ले रहे हैं.तैयारी समिति में कई नामी और बेनाम सदस्य हैं लेकिन स्वामी जी पर सबका विश्वास गहरा है.मीटिंग में एक ऎडहॉक कमेटी बना दी गयी है और लगता है जल्द ही संकट पर क़ाबू पा लिया जाएगा.तय किया गया कि है अधिवेशन में "ब्लॉगिंग:समस्याऎ और समाधान" केंद्रीय विषय होगा.इसके अलावा "मेरा चुंतन" जैसे ब्लॉगनामावली को बढावा देने के लिये एक कोर कमेटी बनाई जाएगी.एक दूसरे के प्रति गाली गलौच के रवैय्ये पर चिंता तो व्यक्त की गयी लेकिन माना गया कि इससे स्वाभाविक और बिंदास माहौल बना रहता है. उन लोगों के प्रति उदासीन और अवहेलनात्मक रवैया बनाने पर सर्व सम्मति व्यक्त हुई जो 'यहां भी' अपने बासी और नक्सलाइट टाइप के विचार व्यक्त करते हैं.ब्लॉगलेखन एक नया क्षेत्र है और यद्यपि इसमें मर्यादाएं और नीति सुपरिभाषित नहीं हैं(हडबडी में की भी नहीं जानी चाहिये)फिर भी एक अव्यक्त सहमति इस बात पर है कि ब्लॉग लेखन को गंभीर कार्यवाही नहीं बनाना चाहिये.एक युवा ब्लॉगर इस विषय पर अपने साथ एक परचा भी लाये थे.परचा यहां अविकल प्रस्तुत है--
"लेखन कोई ऐसा कौशल नहीं है जिसके लिये व्यक्ति को जीवन के अन्य सभी क्षेत्रों का ज्ञान हासिल होना ज़रूरी हो, बल्कि कई बार तो जीवन के किसी भी क्षेत्र में कोई अनुभव न होने पर भी आप लेखक के तौर पर विकसित हो सकते हैं. क्या यह आवश्यक है कि लेखक व्यापक अनुभव का संग्रह करे और सत्य की खोजों में भाग ले? क्या लेखन के लिये बहुत कुछ पचाने, बहुत ज़्यादा जुड्ने,दुख सहने-झेलने की ज़रूरत है? मेरा विचार है कि लिखने के लिये आपको लिखना आना चाहिये बस."

Saturday, June 2, 2007

ये सब बनावटी बातें हैं !

एक शाम दो पुराने मित्र 'ज़मरूद्पुर में मिलना है' तय करके मिले. एक ऐसी चाय की दुकान खोजी, जहां देर तक बैठा जा सके और जहां चाय के साथ मट्ठी भी मिलती हो.
उनके बीच क्या बातचीत हुई ये तो हमें नहीं मालूम लेकिन जनता की भरपूर मांग की लाज रखते हुए यहां प्रस्तुत है उनके बीच हुई गुफ़्तगू का एक पूर्णतयाः परिकल्पित और बनावटी आख्यान.
निवेदन: युवा और संभावनाशील संवाद लेखक कृपया इसे न पढें क्योंकि इससे उनके रोज़गार पर असर पड सकता है.





रामपदारथ: आजकल आप ब्लॉग में बहुत समय देते हैं.
रामसनेही: यह मिलन केंद्र जो है?
रामपदारथ: मिलन केंद्र?
रामसनेही: अरे और क्या?
रामपदारथ: थोडा खोलकर बताइये.
रामसनेही: मतलब खुलासा?...हा..हा..हा..बात ये है कि ब्लॉग जनता का पक्ष छोड्कर भागनेवालों का मिलन केंद्र है.
रामपदारथ: अच्छा-अच्छा. आपको तो सही जगह मिल गई.
रामसनेही: अब यहां भी बुद्धिजीवी लोग बढ रहे हैं. अच्छा लगता है.
रामपदारथ: बुद्धिजीवी लोग? या आराम की ज़िंदगी बसर करने के प्रलोभनों को ठुकराने की शक्तियों का ह्रास हो रहा है?
रामसनेही: नहीं भाई!हमारा समय बडे-बडे कामों के लिये उपयुक्त नहीं है.
रामपदारथ: वैसे भाई!बुद्धिजीवी तो बार-बार अपने दायरे में लौट्ने का प्रयत्न करता है और उसकी कोशिश सिर्फ व्यक्ति की समस्याओं का समाधान खोजने की होती है, न कि समाज की समस्याओं का.
रामसनेही: यहां हर व्यक्ति 'मैं'पन को मनवाने की भयंकर ज्वाला में दहक रहा है.अपने पडोसी के संपर्क में आना हर बार ही एक असह्य यातना का कारण बन जाता है.आत्मपूर्णता का प्रयत्न एक प्रकार के नैतिक राक्षसपन में बदल गया है.
रामपदारथ: यह सब तो आपको हमेशा ही भाता रहा है?
रामसनेही: निःसंदेह!
रामपदारथ: तब तो एक नया नैतिक विधान लागू करने के लिये तत्पर ये बुद्धिजीवी एक दूसरे की बोटी-बोटी काटने को तत्पर होंगे?
रामसनेही: तो और क्या! अपने अहं की तीव्र चेतना इनमें से हरेक के अंदर तब एक उंन्मादी क्रोध जगा देती है जब वह किसी दूसरे में अहं भावना का अपने से अधिक प्रचंड रूप देखता है.
रामपदारथ: और आपस के रिश्ते?
रामसनेही: आपस के रिश्तों का तो ये हाल है कि हर आदमी अपने साथियों पर एक तेज़ और ईर्ष्या भरी नज़र रखता है. इन रिश्तों में एक बीमार संदेह भावना और मध्ययुगीन छ्ल-कपट है.
रामपदारथ: तो अब तक का आपका अनुभव क्या रहा?
रामसनेही: यही समझ लीजिये कि कुछ ही महीनों में स्वस्थ व्यक्ति तक आनंद से न रह सके.
रामपदारथ: वो तो होना ही था.
रामसनेही: और तो और...वे स्नायु रोगों से पीडित हो गये और एक खंडित आत्मा लेकर और अपने अब तक के साथियों के प्रति घृणा व्यक्त करते हुए इन बस्तियों को छोड्कर चले गये.
रामपदरथ: चलिये अब हम लोग भी चला जाए...ए...लड्का!..पैसा कितना हुआ रे?

Friday, June 1, 2007

आओ धार्मिक बनें !



विवेक यानी रीज़निंग इस बात की पुष्टि करता है कि सब मनुष्य बराबर हैं. विवेकशक्ति का आह्वान करके साधारण जनता बार-बार और, ज़्यादा मज़बूती से इस बात की मांग कर सकती है कि उसे खाने-कमानेवालों के बराबर के राजनीतिक अधिकार मिलें और वो आर्थिक समानता प्राप्त करने की ओर बढ सकती है. इस तरह विवेक (रीज़न) यथास्थितिवादियों के स्वार्थों के प्रतिकूल पड्ता है इसलिये वे इस दुरात्मा दुश्मन यानी विवेक के प्रेत को झाड्फूंक कर हटाने में लगे रहते हैं. वे इसकी जगह धार्मिक आस्था को प्रतिष्ठित करने में लगे दिखते हैं क्योंकि धार्मिक आस्था न्यस्त स्वार्थों और सत्ता का हमेशा समर्थन करती है.
ग़ौर से देखिये-वे यह सिद्ध करने में नहीं लगे हैं कि प्रकृति का विश्वविधान ही असंगत और विवेकहीन है, ताकि सामाजिक विधान की असंगतियों और विवेकहीनता पर से लोगों की नज़र हटी रहे?

Wednesday, May 30, 2007

मैं दलगत स्वार्थ से ऊपर हूं


मारे लेखक शायद इस बात से इनकार न करें कि उनके लिये मातृभूमि का विचार एक गौण वस्तु है, कि सामजिक समस्याएं उनके अन्दर उतनी तीव्र सृजनात्मक प्रेरणाएं नहीं जगातीं, जितनी प्रेरणा व्यक्ति के अस्तित्व की पहेलियां; कि उनके लिये कला ही मुख्य चीज़ है--मुक्त और यथार्थपरक कला, जो देश की नियति, राजनीति और दलों से ऊपर है और दिन, वर्ष या युग के प्रश्नों में कोई रुचि नहीं रखती.ऐसी भी कला हो सकती है, क्योंकि ये सोचना कठिन है कि कोई विवकशील प्राणी , जिसका इस पृथ्वी पर अस्तित्व है, चेतन या अचेतन रूप से किसी भी सामाजिक समूह से सम्बद्ध होने से इनकार करेगा,और अगर वे हित उसकी आकांक्षाओं से मेल नहीं खाते हैं तो उनकी रक्षा नहीं करेगा.

खुले दिमाग़ से सोचता है-- वो !


वो सिवाय अपने और अपने सामने खडी मौत के, इस व्यापक जगत में होनेवाली किसी अन्य चीज़ के बारे में सोचने या समझने की क्षमता खो बैठा है। वो अगर कभी सारे संसार के लोगों की पीडा-यातनाओं का ज़िक्र करता भी है, तो इस ओर ध्यान भी नहीं देता कि लोग इन पीडाओं से मुक्ति पाने के लिये संघर्ष कर रहे हैं. और अगर यह विचार कभी उसके मन में उठता भी है तो वो सिर्फ इतना ही कह सकता है कि दुख-पीडाएं सनातन हैं. वो इससे ज़्यादा कह भी नहीं सकता, क्योंकि जिस आत्मा को अकेलेपन के घुन ने खोखला बना दिया है, उसकी दृष्टि सीमित हो जाती है, वह समष्टि के इनर डायनमिज़्म को देख ही नहीं सकती और संघर्ष में जीतने का विचार ही उसकी भावना के प्रतिकूल होता है. 'मैं' के लिये, ऎसी स्थिति में पहुंचकर, आनंद का केवल एक स्रोत बाक़ी रह जाता है--- कि वह निरंतर अपनी बीमारी और अपने निकट आती हुई दुर्निवार मृत्यु का रोना रोती रहे और इसके लॉजिकल कल्मिनेशन के रूप में मोक्ष की कामना करती रहे. शायद इसी 'मैं' और उसके जैसे अन्य अकेले और क्षुद्र व्यक्तियों के मर्सिये आपको निर्मल वर्मा ऎंड पार्टी के यहां मिलते हैं.

Monday, May 28, 2007

मेहनतकश लोगों के अलावा



का आदमी, अलग अकेला होने के लिये प्रयत्नशील और बेगाना, एक ऐसा प्राणी है जिसका दुख ही सबसे बडा साथी है. सच्चाई ये है कि न तो उसका कोई है जिसके पास वो आसरे के लिये जा सके और न किसी को उसकी ज़रूरत ही है. वह अपनी कमज़ोरी के एहसास से बौखलाया हुआ है, आसन्न विनाश के भय से संत्रस्त है. उसके जीवन-मूल्य क्या हैं? उसका सौंदर्य किस चीज़ में निहित है? इस अधमरे प्राणी में जिसका स्नायविक सिस्टम विश्रृंखल हो चुका है, जिसका मस्तिष्क विक्षिप्ति से असमर्थ हो गया है, भावना और संकल्प की बीमारियों से भरे इस क्षुद्र पात्र में मानवीय करुणा क्या बाक़ी रह गयी है?

स्नायविक जल्दबाज़ी


लोग किताबें पढ्कर बडी हड्बडी में अपने लिये विचारों का संचय कर लेते हैं और परस्पर विरोधी दलों में बंट जाते हैं.तेज़ी से बदलते मतों और जड खेमेबाज़ियों को ग़ौर से देखने की ज़रूरत है. दरअस्ल यह प्रक्रिया 'कमज़ोर' और 'अकेलेपन से त्रस्त' बुद्धिजीवी की स्नायविक जल्दबाज़ी को स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित करती है. वह अस्तित्व रक्षा के संघर्ष में जो भी हथियार सामने आ जाता है उसको पकड लेता है, बिना ये सोचे-समझे कि उसका प्रयोग करने की उसमें शक्ति है या नहीं.