मेरी आवाज़ ही पर्दा है मेरे चहरे का,
मैं हूँ खामोश जहां मुझको वहां से सुनिए
Duration: 23Sec
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Saturday, April 3, 2010
Monday, March 22, 2010
जाने कहां गये वो गीत!
मोहल्ला से एक पुरानी पोस्ट का पुनर्प्रकाशन
इरफान भाई दोस्त हैं। उनकी शख्सीयत का एक पहलू नहीं है। वो आंदोलनी रोज़मर्रे से शुरू होकर आज हर उस फ़न के माहिर हैं, जो सामने वाले को चमत्कार लग सकता है। अच्छी पेंटिंग, अच्छे विचार, अच्छी आवाज़ और उम्दा ज़बान- सब कुछ है उनके पास। रेडियो रेड नाम के एक प्रोडक्शन हाउस की नींव उन्होंने रखी और एक समानांतर प्रसारण की मुहिम में आज दिन-रात लगे रहते हैं। काम के दरम्यान ही उन्होंने पुराने हिंदी फिल्मी गानों के ख़ज़ाने से कुछ फुटकर नोट्स लिये। यह काम उन्होंने एक स्मारिका के लिए किया, जो इस साल गोरखपुर में होने वाले फिल्म महोत्सव में छपना था। दंगों ने इस महोत्सव की तय तारीख़ को जला कर राख़ कर दिया। अब जब कभी ये महोत्सव गोरखपुर में होगा, तब स्मारिका छपेगी और तब ये आलेख भी छपेगा। लेकिन हमारे आग्रह पर इरफान भाई और संजय जोशी ने ये नोट्स मोहल्ले पर जारी करने के लिए उपलब्ध करा दिया। फिलहाल तो हम उन्हें शुक्रिया ही कह सकते हैं।
-मोहल्ला सम्पादक की टिप्पणी
पुराने फिल्मी गाने: महज़ मनोरंजन या रोशनी का ज़रिया
कहते हैं कि फिल्मी गाने आधुनिक जीवन का लोक संगीत हैं। बीसवीं सदी की एक अद्भुत ईजाद यानी फिल्मों ने हमें फिल्मी गाने दिये हैं। इनका वुजूद बदलते हुए समाज के साथ ही रूप लेता रहा है और अब भी ले रहा है। कह सकते हैं कि जो काम लोकगीत-मुहावरे और लोकोक्तियां किया करती थीं, वही काम ये गाने पिछले सत्तर सालों से कर रहे हैं। किसी भी समाज में सत्तर साल कोई बड़ा अरसा नहीं होते। फिर हमारे जैसे प्राचीन समाज में इतने थोड़े से वर्षों की गिनती ही क्या है? लेकिन कभी बैठ कर सोचिए कि कैसा जादू है इन फिल्मी गानों में, तो सचमुच हैरत होती है। मधुर संगीत और फिल्म में प्लेसिंग के बाद तो इनके जादू का असर दिखता ही है- इसके बगैर भी इनका स्वतंत्र व्यक्तित्व नकारा नहीं जा सकता। खासतौर पर जिन्हें हम ‘पुराने गाने’ कहते हैं, वो पुराने होकर भी पुराने नहीं पड़ते। इन गानों में जो शायरी है, वह अपने समाज के हर दुख-दर्द, शिकायत और प्रतिरोध को स्वर देती है। यह शायरी सताने वालों का पक्ष नहीं लेती, इसमें सताये हुए लोगों की भरपूर तरफदारी है। इसमें शोख निडर, बेबाक मोब्बत का इजहार है, असहाय और बेसहारा लोगों की तकलीफों और उमंगें हैं, मेहनतकश लोगों के ख्वाब और उम्मीदें हैं। बच्चों की लोरिया हैं, जमाने से टकराने और कुरीतियों को चुनौती देने की बाते हैं, सकारात्मक मूल्यों की पक्षधरता है, परम्परा और यथास्थिति की ग़ुलामी का प्रतिकार है, प्रकृति और मनुष्य के संबंधों का बेलगाम वर्णन है, सेल्फरेस्पेक्ट और व्यक्तिपरकता की गूंज है। ये शायरी इंसान में जीने के हौसले को तो दो कदम आगे बढ़ाती ही है, इंसान से इंसान के रिश्ते और भरोसे को मज़बूत करती है। रोमांटिक से लेकर यथार्थपरक गीतों की इंद्रधनुषी छटा को देखते हुए विष्णु खरे के शब्दों में हम कहेंगे कि ऐसा कोई विषय, ऐसा कोई भाव, ऐसी कोई जीवन स्थिति नहीं है, जिस पर गाने न लिखे गये हों। और यह भी कि अगर इस दौर के समूचे भारतीय समाज को सिरे से नष्ट कर दिया जाए, तो भी इन गीतों के माध्यम से उस काल को पुनःनिर्मित (reconstruct) किया जा सकता है कि वह कैसा समाज था, लोगों के सुख-दुख, सपने, संस्कृति, परम्परा और सामाजिक-आर्थिक रिश्ते कैसे थे।
आज फिल्मी गीतों में मौजूद कविता या कहें शायरी की पड़ताल करते हुए जज़्बाती तौर पर मेरे सामने कई मंज़र उभरते हैं, कई बातें ताज़ा हो जाती हैं। मेरे घर में जो रेडियो था, उस पर सुबह से ही रेडियो सीलोन और विविध भारती पर गाने खनक उठते थे। मेरी दादी को पुराने गानों का शौक़ था और पिता भी कला-साहित्य-संगीत के कम प्रेमी नहीं थे। सुबह सवा सात से साढ़े सात बजे तक रेडियो सीलोन से ताज़ा रिलीज़ हुई फिल्मों के गाने बजते थे और साढ़े सात से आठ तक पुराने गाने बजते थे। इस कार्यक्रम का समापन नियम से सहगल के गाये किसी गीत से होता था। ‘चाह बरबाद करेगी हमें मालूम न था’, ‘दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं’, ‘एक बंगला बने न्यारा’ और ‘सो जा राजकुमारी सो जा’ जैसे गाने आज भी यादों में इस तरह ताज़ा हैं कि जैसे कल की बात हो। गाने वालों की आवाज़ और संगीत का जादू हमें mesmerized कर दिया करता था। इस सबके बीच एक और दिलचस्प बात ये होती थी कि शब्दों का एक लय संसार हमारे जीवन में प्रवेश कर जाया करता था। ज्यादातर प्रेम और विरह के गीत हमारी ज़िन्दगी को उतना प्रभावित नहीं करते थे, जितना उन्हें प्रभावित करते होंगे, जिन्होंने प्रेम और विरह के मर्म को समझा होगा। हम बच्चे थे और ‘मार कटारी मर जाना रे अंखियां किसी से मिलाना ना’, या ‘आवाज़ दे कहां है- दुनिया मेरी जवां है’ की गहराई तक नहीं पहुंच सकते थे।
यादों का सिलसिला आगे बढ़ता है और उनमें एक दूसरे को काटते और एक दूसरे को अपदस्थ करने की कोशिश में लगे गाने जुड़ते हैं। ‘वहां कौन है तेरा मुसाफिर जाएगा कहां’, ‘गोरे रंग पे न इतना गुमान कर गोरा रंग दो दिन में ढल जाएगा’, ‘दिल को देखो- चेहरा ना देखो चेहरे ने लाखों को लूटा’, ‘दो जासूस करें महसूस कि दुनिया बड़ी खराब है’, ‘मेरा जीवन कोरा काग़ज़ कोरा ही रह गया’, ‘घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूं मैं’, ‘न मुंह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो, ग़मों को दौर भी आए तो मुस्कुरा के जियो’, ‘बाज़ार में गुज़रा हूं खरीदार नहीं हूं’, ‘कुछ लोग जो ज्यादा जानते हैं इंसान को कम पहचानते हैं’, ‘एक अकेला थक जाएगा मिलकर बोझ उठाना’, ‘ग़म और खुशी में फर्क न महसूस हो जहां- मैं दिल को उस मुकाम पे लाता चला गया’ और इस तरह की सैकड़ों लाइनें हमारी भाषा और साहित्य शिक्षण का हिस्सा बनती गयीं। ऐसा नहीं था कि हम इन पंक्तियों को सायास subscribe कर रहे थे क्योंकि हमारे लिए prescribed syllebus था और हमारे शिक्षक-अभिभावक आश्वस्त थे कि हम नीति और बोध की अच्छी-अच्छी बातें पढ़ कर सभ्य-सुसंस्कृत नागरिक बन रहे हैं। हालांकि सच्चाई ये थी कि हमें पढ़ायी-बतायी जाने वाली बातों में एक बासीपन था और एक किस्म की जड़ता, जो हमें पूरी तरह आश्वस्त नहीं कर पाती थी कि हम अपने समय की फ़रेबी हक़ीक़तों को कभी पकड़ पाएंगे। शायर इसी खालीपन और बेबसी में हर बार एक फिल्मी गाना हमारे कानों से होता दिल में उतरता था और हमें एक साथी मिल जाता था। ग़ौर कीजिए कि जब बात समझी-समझी सी लग रही हो लेकिन उसे कहने का ढंग न आ रहा हो तो चंद आसान, आम फ़हम, रोज़ इस्तेमाल में आने वाले लफ़्जों के बेहद सरल ताने-बाने में उसे कसकर पेश कर दिया जाए, तो आंखें कैसी खुशी से चमक उठती हैं? ‘चांदी की दीवार न तोड़ी प्यार भरा दिल तोड़ दिया’, ‘प्यार किया कोई चोरी नहीं की’, ‘हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा’ जैसे गानों ने हमें ये सलीक़ा सिखाया है कि हम ज़िन्दगी को काले-सफेद रंगों में देखना बंद कर दें और उन रंगों को भी पहचानें जो इन दो रंगों के बीच हमेशा मौजूद रहते हैं।
इन फुटकर विचारों और स्मृतियों की खंगाल के पीछे मेरे उस पेशे का भी हाथ है, जिसे मैंने शौक़ और व्यावहारिक ज़रूरतें पूरी करने के लिए अपनाया है। आप शायद जानते हैं कि मैं दिल्ली में एफएम गोल्ड पर रेडियो प्रेज़ेंटेटर हूं, जिसे फैशन और सुविधा के लिए रेडियो जॉकी कहा जाता है। प्रोग्राम में आने वाले पत्रों और फोन कॉल्स से मुझे हर शो में ये एहसास होता है कि गाने सिर्फ मेरे लिए नहीं बल्कि करोड़ों श्रोताओं के लिए एक ऐसा सरमाया है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आठवें दशक में ग़जलों और गैर फिल्मी गानों ने भी इस श्रव्य संसार में एक नया आयाम जोड़ा है जो क्रम आज भी चलता चला जाता है। यहां जगजीत सिंह और मन्ना डे के अलावा बेगम अख्तर का नाम उन लोगों की सूची में सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए, जिन्होंने समय की धड़कनों से गूंजती शायरी से हमारा परिचय कराया।
एक शो में एक दिन किसी कॉलर को लाइन पर लिया, तो उसने बताया कि उसे ‘जाने वालों ज़रा मुड़ के देखो मुझे, एक इंसान हूं मैं तुम्हारी तरह...’ में आने वाली लाइन ‘फिर रहा हूं भटकता मैं यहां से वहां’ और ‘परेशान हूं मैं तुम्हारी तरह’... ‘तूफान तो आना है, आकर चले जाना है, बादल है ये कुछ पल का, छाकर ढल जाना है... परछाइयां रह जातीं, रह जाती निशानी है... ज़िन्दगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है’... ‘हो गयी है किसी से जो अनबन, थाम ले दूसरा कोई दामन, ज़िन्दगानी की राहें अजब हैं हो अकेला तो लाखों हैं दुश्मन’... ‘इतनी सी बात ना समझा ज़माना, आदमी जो चलता रहे तो मिल जाए हर खज़ाना’... ‘कभी मैं न सोया, कहीं मुझसे खोया, हुआ सुख मेरा ऐसे, पता नाम लिखकर कहीं यूं ही रखकर भूले कोई कैसे, अजब दुख भरी है ये बेबसी बेबसी’... ‘जाकर कहीं खो जाऊं मैं, नींद आये और सो जाऊं मैं, दुनिया मुझे ढूंढे मगर मेरा निशां कोई न हो’... ‘मिलकर रोएं फरियाद करें उन बीते दिनों की याद करें, ऐ काश कहीं मिल जाए कोई वो मीत पुराना बचपन का’... ये वो लाइनें हैं जो उसे अक्सर याद आती हैं और बेचैन कर जाती हैं।
जिस कॉलर ने इन सबकी फरमाइश की थी, वो एक कॉल सेंटर में सीईओ था और कोई तीन लाख रुपये प्रति माह उसकी सैलरी थी। बातचीत के दौरान वह सहज रूप से किसी फिल्मी गाने की लाइन का सहारा लेकर अपनी बात कहता। इस बार अपने बचपन और बीते दिनों की यादों की अक्कासी में उसने जो लाइनें कहीं वो शैलेंन्द्र की थीं- ‘मैं अकेला तो न था, थे मेरे साथी कई, एक आंधी सी उठी, जो भी था ले के गई, आज मैं ढूंढू कहां खो गए जाने किधर, बीते हुए दिन वो हाए प्यारे पल छिन।‘
मैं हैरान हूं और सोचने को मजबूर कि फिल्मी गानों को महज़ मनोरंजन का सामान समझा जाए या उन्हें रोशनी का एक ज़रिया भी, जो करोड़ों अनाम लोगों को हर पल सहारा देते हैं, उनकी आवाज़ बनते हैं। क्या इन्हें गंभीर विमर्श और विचार योग्य विषय नहीं बनाया जाना चाहिए?
इरफान भाई दोस्त हैं। उनकी शख्सीयत का एक पहलू नहीं है। वो आंदोलनी रोज़मर्रे से शुरू होकर आज हर उस फ़न के माहिर हैं, जो सामने वाले को चमत्कार लग सकता है। अच्छी पेंटिंग, अच्छे विचार, अच्छी आवाज़ और उम्दा ज़बान- सब कुछ है उनके पास। रेडियो रेड नाम के एक प्रोडक्शन हाउस की नींव उन्होंने रखी और एक समानांतर प्रसारण की मुहिम में आज दिन-रात लगे रहते हैं। काम के दरम्यान ही उन्होंने पुराने हिंदी फिल्मी गानों के ख़ज़ाने से कुछ फुटकर नोट्स लिये। यह काम उन्होंने एक स्मारिका के लिए किया, जो इस साल गोरखपुर में होने वाले फिल्म महोत्सव में छपना था। दंगों ने इस महोत्सव की तय तारीख़ को जला कर राख़ कर दिया। अब जब कभी ये महोत्सव गोरखपुर में होगा, तब स्मारिका छपेगी और तब ये आलेख भी छपेगा। लेकिन हमारे आग्रह पर इरफान भाई और संजय जोशी ने ये नोट्स मोहल्ले पर जारी करने के लिए उपलब्ध करा दिया। फिलहाल तो हम उन्हें शुक्रिया ही कह सकते हैं।-मोहल्ला सम्पादक की टिप्पणी
पुराने फिल्मी गाने: महज़ मनोरंजन या रोशनी का ज़रिया
कहते हैं कि फिल्मी गाने आधुनिक जीवन का लोक संगीत हैं। बीसवीं सदी की एक अद्भुत ईजाद यानी फिल्मों ने हमें फिल्मी गाने दिये हैं। इनका वुजूद बदलते हुए समाज के साथ ही रूप लेता रहा है और अब भी ले रहा है। कह सकते हैं कि जो काम लोकगीत-मुहावरे और लोकोक्तियां किया करती थीं, वही काम ये गाने पिछले सत्तर सालों से कर रहे हैं। किसी भी समाज में सत्तर साल कोई बड़ा अरसा नहीं होते। फिर हमारे जैसे प्राचीन समाज में इतने थोड़े से वर्षों की गिनती ही क्या है? लेकिन कभी बैठ कर सोचिए कि कैसा जादू है इन फिल्मी गानों में, तो सचमुच हैरत होती है। मधुर संगीत और फिल्म में प्लेसिंग के बाद तो इनके जादू का असर दिखता ही है- इसके बगैर भी इनका स्वतंत्र व्यक्तित्व नकारा नहीं जा सकता। खासतौर पर जिन्हें हम ‘पुराने गाने’ कहते हैं, वो पुराने होकर भी पुराने नहीं पड़ते। इन गानों में जो शायरी है, वह अपने समाज के हर दुख-दर्द, शिकायत और प्रतिरोध को स्वर देती है। यह शायरी सताने वालों का पक्ष नहीं लेती, इसमें सताये हुए लोगों की भरपूर तरफदारी है। इसमें शोख निडर, बेबाक मोब्बत का इजहार है, असहाय और बेसहारा लोगों की तकलीफों और उमंगें हैं, मेहनतकश लोगों के ख्वाब और उम्मीदें हैं। बच्चों की लोरिया हैं, जमाने से टकराने और कुरीतियों को चुनौती देने की बाते हैं, सकारात्मक मूल्यों की पक्षधरता है, परम्परा और यथास्थिति की ग़ुलामी का प्रतिकार है, प्रकृति और मनुष्य के संबंधों का बेलगाम वर्णन है, सेल्फरेस्पेक्ट और व्यक्तिपरकता की गूंज है। ये शायरी इंसान में जीने के हौसले को तो दो कदम आगे बढ़ाती ही है, इंसान से इंसान के रिश्ते और भरोसे को मज़बूत करती है। रोमांटिक से लेकर यथार्थपरक गीतों की इंद्रधनुषी छटा को देखते हुए विष्णु खरे के शब्दों में हम कहेंगे कि ऐसा कोई विषय, ऐसा कोई भाव, ऐसी कोई जीवन स्थिति नहीं है, जिस पर गाने न लिखे गये हों। और यह भी कि अगर इस दौर के समूचे भारतीय समाज को सिरे से नष्ट कर दिया जाए, तो भी इन गीतों के माध्यम से उस काल को पुनःनिर्मित (reconstruct) किया जा सकता है कि वह कैसा समाज था, लोगों के सुख-दुख, सपने, संस्कृति, परम्परा और सामाजिक-आर्थिक रिश्ते कैसे थे।
आज फिल्मी गीतों में मौजूद कविता या कहें शायरी की पड़ताल करते हुए जज़्बाती तौर पर मेरे सामने कई मंज़र उभरते हैं, कई बातें ताज़ा हो जाती हैं। मेरे घर में जो रेडियो था, उस पर सुबह से ही रेडियो सीलोन और विविध भारती पर गाने खनक उठते थे। मेरी दादी को पुराने गानों का शौक़ था और पिता भी कला-साहित्य-संगीत के कम प्रेमी नहीं थे। सुबह सवा सात से साढ़े सात बजे तक रेडियो सीलोन से ताज़ा रिलीज़ हुई फिल्मों के गाने बजते थे और साढ़े सात से आठ तक पुराने गाने बजते थे। इस कार्यक्रम का समापन नियम से सहगल के गाये किसी गीत से होता था। ‘चाह बरबाद करेगी हमें मालूम न था’, ‘दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं’, ‘एक बंगला बने न्यारा’ और ‘सो जा राजकुमारी सो जा’ जैसे गाने आज भी यादों में इस तरह ताज़ा हैं कि जैसे कल की बात हो। गाने वालों की आवाज़ और संगीत का जादू हमें mesmerized कर दिया करता था। इस सबके बीच एक और दिलचस्प बात ये होती थी कि शब्दों का एक लय संसार हमारे जीवन में प्रवेश कर जाया करता था। ज्यादातर प्रेम और विरह के गीत हमारी ज़िन्दगी को उतना प्रभावित नहीं करते थे, जितना उन्हें प्रभावित करते होंगे, जिन्होंने प्रेम और विरह के मर्म को समझा होगा। हम बच्चे थे और ‘मार कटारी मर जाना रे अंखियां किसी से मिलाना ना’, या ‘आवाज़ दे कहां है- दुनिया मेरी जवां है’ की गहराई तक नहीं पहुंच सकते थे।
यादों का सिलसिला आगे बढ़ता है और उनमें एक दूसरे को काटते और एक दूसरे को अपदस्थ करने की कोशिश में लगे गाने जुड़ते हैं। ‘वहां कौन है तेरा मुसाफिर जाएगा कहां’, ‘गोरे रंग पे न इतना गुमान कर गोरा रंग दो दिन में ढल जाएगा’, ‘दिल को देखो- चेहरा ना देखो चेहरे ने लाखों को लूटा’, ‘दो जासूस करें महसूस कि दुनिया बड़ी खराब है’, ‘मेरा जीवन कोरा काग़ज़ कोरा ही रह गया’, ‘घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूं मैं’, ‘न मुंह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो, ग़मों को दौर भी आए तो मुस्कुरा के जियो’, ‘बाज़ार में गुज़रा हूं खरीदार नहीं हूं’, ‘कुछ लोग जो ज्यादा जानते हैं इंसान को कम पहचानते हैं’, ‘एक अकेला थक जाएगा मिलकर बोझ उठाना’, ‘ग़म और खुशी में फर्क न महसूस हो जहां- मैं दिल को उस मुकाम पे लाता चला गया’ और इस तरह की सैकड़ों लाइनें हमारी भाषा और साहित्य शिक्षण का हिस्सा बनती गयीं। ऐसा नहीं था कि हम इन पंक्तियों को सायास subscribe कर रहे थे क्योंकि हमारे लिए prescribed syllebus था और हमारे शिक्षक-अभिभावक आश्वस्त थे कि हम नीति और बोध की अच्छी-अच्छी बातें पढ़ कर सभ्य-सुसंस्कृत नागरिक बन रहे हैं। हालांकि सच्चाई ये थी कि हमें पढ़ायी-बतायी जाने वाली बातों में एक बासीपन था और एक किस्म की जड़ता, जो हमें पूरी तरह आश्वस्त नहीं कर पाती थी कि हम अपने समय की फ़रेबी हक़ीक़तों को कभी पकड़ पाएंगे। शायर इसी खालीपन और बेबसी में हर बार एक फिल्मी गाना हमारे कानों से होता दिल में उतरता था और हमें एक साथी मिल जाता था। ग़ौर कीजिए कि जब बात समझी-समझी सी लग रही हो लेकिन उसे कहने का ढंग न आ रहा हो तो चंद आसान, आम फ़हम, रोज़ इस्तेमाल में आने वाले लफ़्जों के बेहद सरल ताने-बाने में उसे कसकर पेश कर दिया जाए, तो आंखें कैसी खुशी से चमक उठती हैं? ‘चांदी की दीवार न तोड़ी प्यार भरा दिल तोड़ दिया’, ‘प्यार किया कोई चोरी नहीं की’, ‘हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा’ जैसे गानों ने हमें ये सलीक़ा सिखाया है कि हम ज़िन्दगी को काले-सफेद रंगों में देखना बंद कर दें और उन रंगों को भी पहचानें जो इन दो रंगों के बीच हमेशा मौजूद रहते हैं।इन फुटकर विचारों और स्मृतियों की खंगाल के पीछे मेरे उस पेशे का भी हाथ है, जिसे मैंने शौक़ और व्यावहारिक ज़रूरतें पूरी करने के लिए अपनाया है। आप शायद जानते हैं कि मैं दिल्ली में एफएम गोल्ड पर रेडियो प्रेज़ेंटेटर हूं, जिसे फैशन और सुविधा के लिए रेडियो जॉकी कहा जाता है। प्रोग्राम में आने वाले पत्रों और फोन कॉल्स से मुझे हर शो में ये एहसास होता है कि गाने सिर्फ मेरे लिए नहीं बल्कि करोड़ों श्रोताओं के लिए एक ऐसा सरमाया है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आठवें दशक में ग़जलों और गैर फिल्मी गानों ने भी इस श्रव्य संसार में एक नया आयाम जोड़ा है जो क्रम आज भी चलता चला जाता है। यहां जगजीत सिंह और मन्ना डे के अलावा बेगम अख्तर का नाम उन लोगों की सूची में सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए, जिन्होंने समय की धड़कनों से गूंजती शायरी से हमारा परिचय कराया।
एक शो में एक दिन किसी कॉलर को लाइन पर लिया, तो उसने बताया कि उसे ‘जाने वालों ज़रा मुड़ के देखो मुझे, एक इंसान हूं मैं तुम्हारी तरह...’ में आने वाली लाइन ‘फिर रहा हूं भटकता मैं यहां से वहां’ और ‘परेशान हूं मैं तुम्हारी तरह’... ‘तूफान तो आना है, आकर चले जाना है, बादल है ये कुछ पल का, छाकर ढल जाना है... परछाइयां रह जातीं, रह जाती निशानी है... ज़िन्दगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है’... ‘हो गयी है किसी से जो अनबन, थाम ले दूसरा कोई दामन, ज़िन्दगानी की राहें अजब हैं हो अकेला तो लाखों हैं दुश्मन’... ‘इतनी सी बात ना समझा ज़माना, आदमी जो चलता रहे तो मिल जाए हर खज़ाना’... ‘कभी मैं न सोया, कहीं मुझसे खोया, हुआ सुख मेरा ऐसे, पता नाम लिखकर कहीं यूं ही रखकर भूले कोई कैसे, अजब दुख भरी है ये बेबसी बेबसी’... ‘जाकर कहीं खो जाऊं मैं, नींद आये और सो जाऊं मैं, दुनिया मुझे ढूंढे मगर मेरा निशां कोई न हो’... ‘मिलकर रोएं फरियाद करें उन बीते दिनों की याद करें, ऐ काश कहीं मिल जाए कोई वो मीत पुराना बचपन का’... ये वो लाइनें हैं जो उसे अक्सर याद आती हैं और बेचैन कर जाती हैं।
जिस कॉलर ने इन सबकी फरमाइश की थी, वो एक कॉल सेंटर में सीईओ था और कोई तीन लाख रुपये प्रति माह उसकी सैलरी थी। बातचीत के दौरान वह सहज रूप से किसी फिल्मी गाने की लाइन का सहारा लेकर अपनी बात कहता। इस बार अपने बचपन और बीते दिनों की यादों की अक्कासी में उसने जो लाइनें कहीं वो शैलेंन्द्र की थीं- ‘मैं अकेला तो न था, थे मेरे साथी कई, एक आंधी सी उठी, जो भी था ले के गई, आज मैं ढूंढू कहां खो गए जाने किधर, बीते हुए दिन वो हाए प्यारे पल छिन।‘
मैं हैरान हूं और सोचने को मजबूर कि फिल्मी गानों को महज़ मनोरंजन का सामान समझा जाए या उन्हें रोशनी का एक ज़रिया भी, जो करोड़ों अनाम लोगों को हर पल सहारा देते हैं, उनकी आवाज़ बनते हैं। क्या इन्हें गंभीर विमर्श और विचार योग्य विषय नहीं बनाया जाना चाहिए?
Sunday, November 25, 2007
अविनाश जी ने ग़ज़ल क्यों छेड़ी ? सुनिये तो सही

परत-दर-परत रात खुल रही है
एक तारा कुछ तारों से
आंख मिचोली खेल रहा है
चिडिया का एक बच्चा
घोंसले में चोंच मार रहा है
दरख़्त का एक पत्ता
हवा से ठिठोली कर रहा है
एक चूहा रोशनी के क़तरे कुतर रहा है
झील में एक लहर किनारा छू रही है
आसमान से उतरती हुई ठंडक
शबनम का रूप ले रही है
परत-दर-परत रात खुल रही है
एक हर्फ़ दूसरे हर्फ़ की बांह पकड़ रहा है
एक लम्हा दूसरे में घुल रहा है
एक ख़याल जुंबिश ले रहा है
एक ख़्वाब कपड़े पहन रहा है
एक आवाज़ लफ़्ज़ बन रही है
एक धड़कन नग़मा बुन रही है
परत-दर-परत रात खुल रही है.
मेंहदी हसन ..........Dur.5Min.13Sec.
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Wednesday, November 14, 2007
रेडियो रेड और क़िस्सागोई: सुनिये इब्ने इंशा की 'उर्दू की आख़िरी किताब' से कुछ हिस्से...

इब्ने इंशा १९२७ में पंजाब के लुधियाना में पैदा हुए थे. शुरुआती पढ़ाई भी उन्होंने यहीं से की लेकिन जब पाकिस्तान बंटा तो वो उधर चले गये और फिर उधर ही रहे.
मां बाप ने उन्हें शेर मोहम्मद ख़ां नाम दिया था लेकिन वो जाने गये इब्ने इंशा के नाम से.
उर्दू के मशहूर शायर और व्यंग्यकार.
लहजे में मीर की ख़स्तगी और नज़ीर की फ़क़ीरी पाई जाती थी. हिंदी और उर्दू पर उनको बराबर की महारत हासिल थी. ज़बान की इसी खासियत के बल पर उन्हें ऒल इंडिया रेडियो में काम मिला था. बाद में वो क़ौमी किताबघर के डायरेक्टर रहे फिर पाकिस्तानी दूतावास में सांस्कृतिक मंत्री रहे और पाकिस्तान में यूनेस्को के प्रतिनिधि रहे.
११ जनवरी १९७८ को वो लंदन में कैंसर से मरे.
चांदनगर, इस बस्ती के इक कूचे में, आवारागर्द की डायरी, बिल्लू का बस्ता, दिल-ए-वहशी, चलते हो तो चीन को चलिये, नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर, ख़ुमार-ए-गंदुम,यह बच्चा किसका बच्चा है और उर्दू की आख़िरी किताब उनकी हरदिल अज़ीज़ किताबें हैं.
आइये आपको सुनाते हैं- उर्दू की आख़िरी किताब से कुछ हिस्से.
इत्तेफ़ाक़ में बरकत है
-----------------------------------------------------------------------मुनीश
चिड़ा और चिड़िया
-----------------------------------------------------------------------मुनीश
कछुआ और ख़रगोश
-----------------------------------------------------------------------मुनीश
प्यासा कौआ
-----------------------------------------------------------------------मुनीश
भैंस
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान
बकरी
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान
ऊंट
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान
आदमी
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान
इल्म बड़ी दौलत है
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान
अख़बार
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान
कपड़ेवाले के यहां
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान
जूतेवाले के यहां
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान
खाने की चीज़ें
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान
मक्खन
----------------------------------------------------------------------इरफ़ान
फ़्लैग्स
Radio Red,
storytellers,
इब्ने इंशा,
इरफ़ान,
कथावाचन,
पॉडकास्ट,
रेडियो रेड
Saturday, October 20, 2007
धरती माता जागो

सुनिये दिनेश कुमार शुक्ल की एक और छंद सघन रचना खुद उनकी ही आवाज़ में.
दिनेश जी की तिलस्म और मालगाड़ी और बंदर चढ़ा है पेड़ पर भी यहां आप सुन चुके हैं.
फ़्लैग्स
इरफ़ान,
कविगण,
कविता,
दिनेश कुमार शुक्ल,
पॊडकास्ट,
पॊडकास्टिंग
Friday, September 28, 2007
राजधानी एक्सप्रेस, सिगरेट और माट्साब की बेहोशी

आगरा रेलवे स्टेशन. 27 सितंबर 2007 की शाम. ट्रेन के इंतज़ार में हूं. ट्रेन के आने का वक़्त हो चुका है. राजधानी धड़धड़ाती हुई फ़ौरन अभी गुज़री है. महसूस करता हूं कि इस रफ़्तार को लेकर शिकायती स्वर कहीं भीतर से सिर उठा रहा है. ग़ौर करता हूं कि सिगरेट सुलगाये हुए कितनी देर हुई. एक घंटा पहले सुलगाई थी पिछली सिगरेट. हाथ अनायास ही जेब तक पहुंचता है और मैं सिगरेट जलाता हूं.
दरअस्ल सिगरेट के लिये मैंने जो जगह चुनी थी वो एक नीम अंधेरे में पड़ा कोना था. रेलवे स्टेशन एक सार्वजनिक स्थान है और आपकी ही तरह मुझे भी सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट का पिया जाना उतना अच्छा नहीं लगता है. बहरहाल मैंने सिगरेट जैसे ही सुलगाई मेरे चेहरे पर एक खिलौना टाइप टॉर्च से आती रोशनी पड़ी. एक क्षण को तो ये हरकत मुझे क़ाबिल-ए-ऐतराज़ लगी लेकिन दूसरे ही पल मैंने खुद को संयत बनाया. मेरे सामने पड़ी बेंच पर एक लड़का बैठा था, जो अब मुझसे इशारे से माचिस मांग रहा था. बीड़ी उसके हाथ में थी. अब समझ में आया कि टॉर्च वो माचिस के लिये ही चमका रहा था.
"क्या नाम है तुम्हारा?"
"रजनीकांत"
"बीड़ी कब से पीते हो?"
"छः-सात दिन हुए"
"क्या करते हो?"
"कुछ नहीं"
"क्या खाया"
"भूखा हूं"
"सुबह क्या खाया था?"
"पूड़ी-सब्जी"
"पैसा कहां से आया?"
"ट्रेन में झाड़ू लगाई थी तो चार रुपये मिल गये थे"
"दिन में पैसा नहीं मिला?"
"कोई देता नहीं...बोलते हैं भाग जाओ."
"कहां जाओगे?"
"टूंडला...वहां मेरा घर है"
"कहां से आ रहे हो?"
"दिल्ली से...रास्ते में टीटी ने उतार दिया...जंगल में...मैंने बोला जंगल में मै क्या करूंगा? बोला उतर जाओ. उतर गया फिर कोई गाड़ी आई तो उसमें लटक गया और यहां आ गया."
"दिल्ली क्या करने गये थे?"
"भाग गये थे"
"क्यों?"
"माट्साब ने मारा और मैं भाग आया."
???
"बहुत जोर से मारा. मेरी ये उंगली कट गयी"
मैंने देखा उसकी उंगली पर अब भी घाव था.मैंने पूछा-
"क्यों मारा?"
मैं पांच मे पढ़ता था. माट्साब एक अच्छर पूछने लगे.नहीं बता पाया तो मारने लगे. मैं रोने लगा फिर भी वो मारते रहे. मैने उनका फोता पकड़ कर इतनी जोर से दबाया कि वो चिल्लाने लगे और बेहोस हो गये. सब मास्टर आ गये और मैं भागा. भागते-भागते मैं नदिया पर पहुंचा अपने ये उंगली धोई. बांधने के लिये कपड़ा भी नहीं था. पता नहीं ये उंगली टूट गयी है या बची है?"
मुझे हंसी आ गयी. अब वो मुझसे खुल चुका था और शायद उसे लग गया था कि मैं उसे कोई नैतिक उपदेश नहीं दूंगा.हंसते-हंसते मैं पंजों के बल वहीं बैठ गया. और समझने लगा कि लड़का बेसिकली भगोड़ा और आवारा नहीं हैं. यह स्कूल मुक्त दुनिया में उसका छठा-सातवां दिन था और वो अपनी दोपहर की भूख के बावजूद हंस सकता था.
"अब क्या करोगे?"
"जो राम चाहेगा वही करूंगा."
"राम क्या चाहता है?"
"अभी तो राम चाहता है कि मै रेल में झाड़ू लगाऊं"
"लेकिन रेल में झाड़ू लगाने से तो तुम्हें खाने को नहीं मिलेगा?"
"लेकिन घर पर रहने से तो मास्टर वहां भी आ जाएगा ढूंढते हुए?"
????
लड़का मुस्कुराते हुए अपने पैंट की जेब में हाथ डालने के लिये टेढ़ा होता है.इस बीच उसकी बीड़ी कई बार बुझती है जिसे जलाने के लिये मैं हर बार उसे माचिस देता हूं.
"मुझे रेल में एक चीज मिली है...गंदी चीज" कहते हुए उसके चेहरे पर जुगुप्सा स्पष्ट है.
लड़का एक काग़ज़ की कतरन निकालता है. अंधेरे में कुछ स्पष्ट नहीं है लेकिन अनुमान सही निकलता है.मैं इस ढाई इंच चौड़ी और कोई चार इंच लबी कागज़ की रंगीन कतरन को देखने के लिये रोशनी तलाशता हूं.लड़का मुझे आवाज़ देता है क्योंकि रोशनी का बंदोबस्त है उसके पास. लड़का अपनी टॉर्च की रोशनी में मुझे वह कतरन दिखाता है. इसमें संभोग की तीन मुद्राएं छपी हैं.
"क्या करोगे इसका?"
"फाड़कर फेंक दूंगा, जला दूंगा"
"तुम कहां जा रहे हो?"
"दिल्ली"
"तुम्हारी गाड़ी आ रही है."
"टूडला में किस स्कूल में पढ़ते थे?"
"रामदास पब्लिक स्कूल"
"फ़ीस कितनी थी?"
"तीन सौ रुपये"
"तुम्हारे बाप क्या करते हैं?"
"रिक्शा चलाते हैं. अब क्या होगा. अब न तो तीन सौ रुपये जायेंगे न मार पड़ेगी"
"टूंडला क्यों जा रहे हो?"
"देखूंगा सब ठीक तो है? वहां कुछ नहीं कर सकता क्यों कि वहां मास्टर लोग ढूंढ लेंगे.सोचता हूं किसी होटल में लग जाऊं."
"होटल की ज़िंदगी बेकार है.तुम किसी मोटर मैकेनिक के साथ लग जाओ"
"कहा?"
"तुम अपनी नानी के यहां चले जाओ"
"नानी तो दादरी में रहती हैं वो तो बहुत दूर है"
"दूर नहीं है तुम अभी घर से वहां का पता लेलेना और चले जाना. रेल में झाड़ू लगा कर कुछ नहीं होगा."
तब तक ट्रेन आजाती है मैं उसे दस का एक नोट थमाता हूं जिसे वो मुट्ठी में पकड़े हुए मुझे जाते देखता है.
"ए तुम क्या करते हो"
मैं उसे बताता हूं और यह भी कि मेरा नाम इरफ़ान है."
"इरफ़ान तो मेरे पिताजी का भी नाम है. तुम मेरे बाबू तो नहीं हो?"
Sunday, September 23, 2007
चांद और लुच्चे
ये एक संकरा रास्ता था
जहां पहुंचने के
लिये कहीं से चलना
नहीं पड़ता था
या ये एक मंज़िल थी
समझो
आ जाती थी बस
फिर रात गहराती थी
और चांद की याद भी किसी को नहीं आती थी
एक दिन
जब धूल के बगूलों पर सवार
कुछ लुच्चे आये
(वो ऐसे ही आते-जाते हैं सब जगह बगूलों पर ही सवार)
बाल बिखरे हुए थे उनके
बोले-
नींद खुलने से पहले ही जागा करो...
और ऐसी ही कई बातें.
चांद उत्तर के थोड़ा पूरब होकर लटका हुआ था
किसी को परवाह भी न थी
उन्हें भी नहीं
छटनी में छांटे गये ये लुच्चे
बस छांद की थिगलियां
जोड़ते रहते हैं
रातों में.
---------------------
इरफ़ान
12 जनवरी 1994
जहां पहुंचने के
लिये कहीं से चलना
नहीं पड़ता था
या ये एक मंज़िल थी
समझो
आ जाती थी बस
फिर रात गहराती थी
और चांद की याद भी किसी को नहीं आती थी
एक दिन
जब धूल के बगूलों पर सवार
कुछ लुच्चे आये
(वो ऐसे ही आते-जाते हैं सब जगह बगूलों पर ही सवार)
बाल बिखरे हुए थे उनके
बोले-
नींद खुलने से पहले ही जागा करो...
और ऐसी ही कई बातें.
चांद उत्तर के थोड़ा पूरब होकर लटका हुआ था
किसी को परवाह भी न थी
उन्हें भी नहीं
छटनी में छांटे गये ये लुच्चे
बस छांद की थिगलियां
जोड़ते रहते हैं
रातों में.
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इरफ़ान
12 जनवरी 1994
कांटे और शहद
जब रात हुई
तो कुछ बात हुई
और बात भी कैसी
थोड़ी कंपकंपी थी
और उस जंगली घास
के असंख्य कांटों की बूदों
पर ठहरी ओस जैसी
और जैसे-जैसे हम
उंगलियों से
घास को छूते
गहरा और गाढ़ा शहद हमारे प्यालों में
टपकता जाता
क्या चखकर ही मिठास
जानी जा सकती है?
---------------
इरफ़ान
3 जनवरी 1994
तो कुछ बात हुई
और बात भी कैसी
थोड़ी कंपकंपी थी
और उस जंगली घास
के असंख्य कांटों की बूदों
पर ठहरी ओस जैसी
और जैसे-जैसे हम
उंगलियों से
घास को छूते
गहरा और गाढ़ा शहद हमारे प्यालों में
टपकता जाता
क्या चखकर ही मिठास
जानी जा सकती है?
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इरफ़ान
3 जनवरी 1994
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