
सुबह जब यूं ही नेट पर भटक रहा था तो नज़र पडी- काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाय...
कहा जाता है कि फ़िल्मी गाने आधुनिक जीवन के लोक गीत हैं. इस कथन को पुष्ट करती यह पोस्ट देखें. १९४८ में महबूब की फ़िल्म अनोखी अदा ने कामयाबी के झंडे गाडे. सुरेन्द्र, नसीम बानो, प्रेम अदीब, कुक्कू, अडवाणी और नवाब इसमें प्रमुख भूमिकाओं मे थे. यह एक प्रेम कहानी थी. नौशाद के संगीत से सजी इस फ़िल्म के गाने बहुत मक़बूल हुए. इतने कि आज किन्हीं ब्लॊगर फ़ुरसतिया के मुताबिक़ लोकगीत बन गये. इसी पोस्ट में उन्होंने काहे जिया डोले के बोल थोडी अशुद्धियों के साथ जारी भी किये हैं और रचनाकार अज्ञात बताया है.
आप जानते हैं कि शकील बदायूनी कोई अज्ञात शायर नहीं हैं लेकिन कई बार स्मृतियों में कोई चीज़ ऐसी जगह बना लेती है जिसे तथ्य के बजाय मिथक मानना अच्छा लगता है.
अनोखी अदा में कुल बारह गाने थे जिनमें से कुछ अंजुम पीलीभीती ने लिखे थे. सुरेंद्र, मुकेश और शमशाद बेगम के अलावा इस फ़िल्म में उस ज़माने की उभरती हुई गायिका उमा देवी ने गाने गाये थे. यह काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाय... गाना भी उमा देवी का गाया है जिन्होंने १९४७ की फ़िल्म वामक़-अज़रा से अपनी फ़िल्मी पारी शुरू की थी और बाद में आप उन्हें टुनटुन की शक्ल में हास्य भूमिकाएं करते हुए देखते हैं.
यहां आप सुनेंगे उमा देवी का गाया वामक़ अज़रा का वह गीत, जिससे उन्होंने शुरुआत की. आप वह गाना भी सुनिये जिससे मुझे यह पोस्ट लिखने की ज़रूरत जान पडी.एक और गीत जिसका ज़िक्र श्री फ़ुरसतिया ने किया है - यानी छापक पेड... उसे मैं यहां पहले जारी कर चुका हूं.
दुनिया से मिटाएं मुझे या दिल से भुलाएं...फ़िल्म: वामक़ अज़रा
काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाय...फ़िल्म : अनोखी अदा