
क्रिस रामखेलावन का नाम आपने ज़रूर सुना होगा. पांच-छः साल पहले वो दिल्ली में अपना ग्रुप "चटनी" लेकर आए थे और एक जीवंत शाम में हम सब को अपनी गायकी से रूबरू कराया था. मैं उस अनुभव की कुछ बानगी जनसत्ता के रविवारी में तब लिख चुका हूं. मेरा मानना है कि क्रिस रामखेलावन ने उत्तर भारतीय पारंपरिक लोक गायकी को जिस तरह ज़िंदा रखा है उसकी मिसाल ढूंढना मुश्किल है. भारत में सक्रिय लोक गायन संग्राहकों को उनसे सीखना चाहिये. मैंने उनके परफ़ॊर्मेंस के बाद उनसे बातचीत की, पेश है उस बातचीत का एक अंश. अगर आपको यह बातचीत कुछ दिलचस्प लगी और आपकी इच्छा क्रिस का गायन सुनने की हुई तो अपने लिये आदेश चाहूंगा.