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Saturday, March 28, 2015
Sunday, August 24, 2008
सभी लोग और बाक़ी लोग
पेशे से चिकित्सक डॉ. संजय चतुर्वेदी हिंदी कविता में आए और जल्द ही चले गये. संक्षिप्त उपस्थिति में ही उन्होंने अपनी काव्य प्रतिभा का परिचय दिया. क्यों अब वे कविता की दुनिया में सक्रिय नहीं हैं, बहुत दिनों से उनसे मुलाक़ात नहीं हुई कि जान सकूँ. बहरहाल उनकी एक कविता पढिये-

सभी लोग बराबर हैं
सभी लोग स्वतंत्र हैं
सभी लोग हैं न्याय के हक़दार
सभी लोग इस धरती के हिस्सेदार हैं
बाक़ी लोग अपने घर जाएँ
सभी लोगों को आज़ादी है
दिन में, रात में आगे बढने की
ऐश में रहने की
तैश में आने की
सभी लोग रहते हैं सभी जगह
सभी लोग, सभी लोगों की मदद करते हैं
सभी लोगों को मिलता है सभी कुछ
सभी लोग अपने-अपने घरों में सुखी हैं
बाक़ी लोग दुखी हैं तो क्या सभी लोग मर जाएँ
ये देश सभी लोगों के लिये है
ये दुनिया सभी लोगों के लिये है
हम क्या करें अगर बाक़ी लोग हैं सभी लोगों से ज़्यादा
बाक़ी लोग अपने घर जाएँ.
संजय चतुर्वेदी
प्रकाशवर्ष संग्रह की पहली कविता

सभी लोग बराबर हैं
सभी लोग स्वतंत्र हैं
सभी लोग हैं न्याय के हक़दार
सभी लोग इस धरती के हिस्सेदार हैं
बाक़ी लोग अपने घर जाएँ
सभी लोगों को आज़ादी है
दिन में, रात में आगे बढने की
ऐश में रहने की
तैश में आने की
सभी लोग रहते हैं सभी जगह
सभी लोग, सभी लोगों की मदद करते हैं
सभी लोगों को मिलता है सभी कुछ
सभी लोग अपने-अपने घरों में सुखी हैं
बाक़ी लोग दुखी हैं तो क्या सभी लोग मर जाएँ
ये देश सभी लोगों के लिये है
ये दुनिया सभी लोगों के लिये है
हम क्या करें अगर बाक़ी लोग हैं सभी लोगों से ज़्यादा
बाक़ी लोग अपने घर जाएँ.
संजय चतुर्वेदी
प्रकाशवर्ष संग्रह की पहली कविता
Tuesday, May 27, 2008
सुनिये कुबेर दत्त की दो कविताएं
दूरदर्शन के कुछ चुनिंदा प्रोड्यूसरों में अपनी मौलिक सूझबूझ, लेखन और गंभीर आवाज़ की वजह से कुबेर दत्त अलग से पहचाने जाते हैं. टेलीविज़न पर कई कार्यक्रमों की देसी आवश्यकताओं के अनुरूप प्रस्तुति ने उन्हें लोकप्रियता की ऊँचाइयों पर रखा है. आप और हम, जन अदालत, पत्रिका, फलक और कई विशेष आयोजनों में उन्होंने समय और उसके प्रश्नों को हमेशा ध्यान में रखा. कवि, कथाकार, पटकथा लेखक, फ़िल्मकार और अब चित्रकार कुबेर दत्त इन दिनों दूरदर्शन के मंडी हाउस में चीफ़ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं. पेश है कोई आठ साल पहले उनके घर पर रिकॉर्ड की हुई उनकी दो कविताएं "एशिया के नाम" और "समय जुलाहा" उनके ही स्वर में.
एशिया के नाम समय जुलाहा
Monday, May 19, 2008
हल
सत्रह जून के बलवे के बाद
लेखक संघ के सचिव ने
स्तालिन मार्ग पर पर्चे बंटवाए
जिनमें कहा गया था कि
जनता ने सरकार का विश्वास खो दिया है
और अब दुगने प्रयत्नों से ही
उसे पा सकती है. ऐसी हालत में
क्या सरकार के लिये ज़्यादा आसान नहीं होगा
कि वह इस जनता को भंग कर दे
और दूसरी चुन ले?
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बर्तोल्त ब्रेख़्त
लेखक संघ के सचिव ने
स्तालिन मार्ग पर पर्चे बंटवाए
जिनमें कहा गया था कि
जनता ने सरकार का विश्वास खो दिया है
और अब दुगने प्रयत्नों से ही
उसे पा सकती है. ऐसी हालत में
क्या सरकार के लिये ज़्यादा आसान नहीं होगा
कि वह इस जनता को भंग कर दे
और दूसरी चुन ले?
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बर्तोल्त ब्रेख़्त
Sunday, February 24, 2008
सुनिये रघुवीर सहाय की कविता , किताब पढकर रोना
रोया हूं मैं भी किताब पढकर के
पर अब याद नहीं कौन-सी
शायद वह कोई वृत्तांत था
पात्र जिसके अनेक
बनते थे चारों तरफ से मंडराते हुए आते थे
पढता जाता और रोता जाता था मैं
क्षण भर में सहसा पहचाना
यह पढ्ता कुछ और हूं
रोता कुछ और हूं
दोनों जुड गये हैं पढना किताब का
और रोना मेरे व्यक्ति का
लेकिन मैने जो पढा था
उसे नहीं रोया था
पढने ने तो मुझमें रोने का बल दिया
दुख मैने पाया था बाहर किताब के जीवन से
पढ्ता जाता और रोता जाता था मैं
जो पढ्ता हूं उस पर मैं नही रोता हूं
बाहर किताब के जीवन से पाता हूं
रोने का कारण मैं
पर किताब रोना संभव बनाती है.
रघुवीर सहाय
आवाज़: इरफ़ान........अवधि: लगभग डेढ मिनट
पर अब याद नहीं कौन-सी
शायद वह कोई वृत्तांत था
पात्र जिसके अनेक
बनते थे चारों तरफ से मंडराते हुए आते थे
पढता जाता और रोता जाता था मैं
क्षण भर में सहसा पहचाना
यह पढ्ता कुछ और हूं
रोता कुछ और हूं
दोनों जुड गये हैं पढना किताब का
और रोना मेरे व्यक्ति का
लेकिन मैने जो पढा था
उसे नहीं रोया था
पढने ने तो मुझमें रोने का बल दिया
दुख मैने पाया था बाहर किताब के जीवन से

पढ्ता जाता और रोता जाता था मैं
जो पढ्ता हूं उस पर मैं नही रोता हूं
बाहर किताब के जीवन से पाता हूं
रोने का कारण मैं
पर किताब रोना संभव बनाती है.
रघुवीर सहाय
आवाज़: इरफ़ान........अवधि: लगभग डेढ मिनट
Tuesday, February 12, 2008
इरफ़ानियत एक कविता है
Friday, November 16, 2007
रेडियो रेड और ऑडियो बुक्स: सुनिये गोरख पांडेय की कविता ''बंद खिड़कियों से टकराकर"

सुनिये गोरखजी की यह कविता. इसे मार्च 2007 में जारी आएंगे अच्छे दिन नाम की ऒडियो बुक से उनकी 16 अन्य कविताओं के साथ सुना जा सकता है. प्राप्त करने के लिये नीचे कमेंट बॊक्स में लिखें या- gorakhpurkafilmfestival@gmail.com पर ईमेल करें. फ़ोन करना चाहें तो करें संजय जोशी को- 09811577426 पर. इस सीडी से एक कविता यहां पहले भी सुनाई जा चुकी है. इसमें गोरखजी की बोलती और महेश्वरजी की गाती आवाज़ें भी सुनी जा सकती हैं.

बंद खिड़कियों से टकराकर
------------------------------------पूनम श्रीवास्तव----Dur.2min43sec
फ़्लैग्स
Radio Red,
कविता,
गोरख पांडेय,
जसम,
पूनम श्रीवास्तव,
पॉडकास्ट,
रेडियो रेड
Thursday, November 1, 2007
Wednesday, October 31, 2007
त्रिलोचन के साथ सुबह के कुछ घंटे और कुछ ब्लॉग्स पर मौजूद उनकी कविताएं
आज सुबह सीपीआईएमएल के महासचिव कॉमरेड दीपंकर भट्टाचार्य और साथियों के साथ हम त्रिलोचन से मिलने पहुंचे. वे इन दिनों वैशाली,ग़ाज़ियाबाद (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र,दिल्ली)में अपने बेटे के साथ रहते हैं.अभी कुछ दिनों पहले से ही यहां के एक स्थानीय यशोदा अस्पताल में इलाज कराते हुए वे अपने बेटे के साथ रह रहे हैं.स्मृति कुछ कम ही साथ दे रही है और दवाओं के असर में उनके हाथ और पैर सूजन से घिरे हैं लेकिन शब्द-चर्चा के दौरान उनके चेहरे पर अब भी वही उत्साह देखा जा सकता है. बनारस का ज़िक्र बार-बार आ जाता है और बनारस पहुंचने को उनका मन हुलसता है.नागार्जुन को याद करते हुए उन्होंने याद किया कि नागार्जुन को ज़िंदगी के आख़िरी बरसों में मछली खाने का जुनून सा था. यह भी कि नागार्जुन को जितनी मछलियों के नाम मालूम थे उतने शायद ही किसी को मालूम होंगे.
त्रिलोचन थके और बीमार तो थे लेकिन हमारी उपस्थिति के दौरान उन्होंने लेटना गवारा नहीं किया. उनके बेटे अमित का मानना था कि हमारे पहुंचने और हमारी बातों ने उन्हें थोड़ी ताज़गी दे दी है.यहां जो तस्वीरें हैं वो उनकी पोती पंखुड़ी की खींची हुई हैं.

बाएं से अज़दक, इरफ़ान, कॉ.दीपंकर भट्टाचार्य ,कवि त्रिलोचन,रामजी राय, सुवाचन यादव और प्रभात जी

बाएं से सत्या भाई, इरफ़ान, कॉ.दीपंकर भट्टाचार्य और कवि त्रिलोचन

पृष्ठभूमि में कॉ.दीपंकर,इरफ़ान,अज़दक और सामने की तरफ़ त्रिलोचन जी और इंडिया टुडे की कला संपादक सुवाचन यादव

बाएं से कॉ.दीपंकर भट्टाचार्य, त्रिलोचनजी और रामजी राय

बाएं से इरफ़ान, कॉ.दीपंकर भट्टाचार्य और कवि त्रिलोचन
त्रिलोचन
प्रियंकर के ब्लॉग से साभार
आज की हिंदी के शिखर कवि त्रिलोचन का जन्म 20 अगस्त 1917 को चिरानीपट्टी, कटघरापट्टी, सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। अंग्रेजी में एम.ए.पूर्वार्ध तक की पढ़ाई बीएचयू से । इनकी दर्जनों कृतियाँ प्रकाशित हैं जिनमें धरती(1945), गुलाब और बुलबुल(1956), दिगंत(1957), ताप के ताए हुए दिन(1980), शव्द(1980), उस जनपद का कवि हूँ (1981) अरधान (1984), तुम्हें सौंपता हूँ( 1985) काफी महत्व रखती हैं। इनका अमोला नाम का एक और महत्वपूर्ण संग्रह है। त्रिलोचन की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह राजकमल प्रकाशन से छप चुका है। वरिष्ठ कवि केदार नाथ सिंह के शव्दों में “उनका जितना प्रकाशित है उतना या कदाचित उससे अधिक ही अप्रकाशित है”।हिंदी में सॉनेट जैसी काव्य विधा को स्थापित करने का श्रेय मात्र त्रिलोचन को ही जाता है। आप त्रिलोचन को आत्मपरकता कवि भी मान सकते हैं। ‘भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कल’ जैसी आत्मपरक पंक्तियाँ त्रिलोचन ही लिख सकते हैं। परंतु ऐसा नहीं है कि त्रिलोचन का काव्य संसार केवल आत्मपरकता तक ही सीमित है। शब्दों का सजग प्रयोग त्रिलोचन की भाषा का प्राण है ।
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त्रिलोचन जी की कुछ कविताएं
अस्वस्थ होने पर
मित्रों से बात करना अच्छा है
और यदि मुँह से बात ही न निकले तो
उतनी देर साथ रहना अच्छा है
जितनी देर मित्रों को
यह चुप्पी न खले।
बिस्तरा है न चारपाई है
बिस्तरा है न चारपाई है
जिन्दगी खूब हमने पाई है ।
अँधेरे में जिसने सर काटा
नाम मत लो हमारा भाई है ।
ठोकरें दर -ब -दर की थीं हम थे ,
कम नहीं हमने मुँह की खाई है ।
कब तलक तीर वे नही छूते ,
अब इसी बात पर लडाई है ।
आदमी जी रहा है मरने को
सबसे ऊपर यहीं सचाई है ।
कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम
धुन कहां वह संभल के आई है ।
कोइलिया न बोली
मंजर गए आम
कोइलिया न बोली
बाटो के अपने
हाथ उठाये
धरती
वसंती -सखी को बुलाये
पडे हैं सब काम
कोइलिया न बोली
पाकर नीम ने
पात गिराए
बात अपत की
हवा फैलाये
कहां गए श्याम
कोइलिया न बोली ।
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हमारा देश तुम्हारा देश से साभार
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त्रिलोचन के कुछ सॉनेट
जनपद का कवि
उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है,नंगा है,
अनजान है, कला–नहीं जानता कैसी होती है क्या है,
वह नहीं मानता कविता कुछ भी दे सकती है।
कब सूखा है उसके जीवन का सोता, इतिहास ही बता सकता है।
वह उदासीन बिलकुल अपने से,अपने समाज से है;
दुनिया को सपने सेअलग नहीं मानता,
उसे कुछ भी नहीं पता दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँची;
अब समाज में वे विचार रह गये नही हैं
जिन को ढोता चला जा रहा है वह,
अपने आँसू बोता विफल मनोरथ होने पर अथवा अकाज में।
धरम कमाता है वह तुलसीकृत रामायण सुन पढ़ कर,
जपता है नारायण नारायण।
भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल
भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल
जिस को समझे था है तो है यह फ़ौलादी
ठेस-सी लगी मुझे, क्योंकि यह मन था आदी नहीं;
झेल जाता श्रद्धा की चोट अचंचल,
नहीं संभाल सका अपने को ।
जाकर पूछा ‘भिक्षा से क्या मिलता है। ‘जीवन।’
‘क्या इसको अच्छा आप समझते हैं ।’
‘दुनिया में जिसको अच्छा नहीं समझते हैं करते हैं,
छूछा पेट काम तो नहीं करेगा ।’
'मुझे आप से ऎसी आशा न थी ।’
‘आप ही कहें, क्या करूं, खाली पेट भरूं,
कुछ काम करूं कि चुप मरूं, क्या अच्छा है ।’ जीवन जीवन है प्रताप से, स्वाभिमान ज्योतिष्क लोचनों में उतरा था, यह मनुष्य था, इतने पर भी नहीं मरा था ।
कुछ अन्य कवितायें
आत्मालोचन
शब्द मालूम है व्यर्थ नहीं जाते हैं
पहले मैं सोचता था उत्तर यदि नहीं मिले
तो फिर क्या लिखा जाए
किन्तु मेरे अन्तर निवासी ने मुझसे कहा- लिखा कर
तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे
एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए
अब मैं लिखा करता हूँ अपने अन्तर की अनुभूति
बिना रँगे चुने कागज पर बस उतार देता हूँ ।
आछी के फूल
मग्घू चुपचाप सगरा के तीर बैठा था
बैलों की सानी-पानी कर चुका था
मैंने, बैठा देखकर पूछा,बैठे हो, काम कौन करेगा.
मग्घू ने कहा, काम कर चुका हूं नहीं तो यहां बैठता कैसे,
मग्घू ने मुझसे कहा,लंबी लंबी सांस लो,
सांस ले ले कर मैंने कहा,सांस भी ले ली,बात क्या है,
आछी में फूल आ रहे हैं,मग्घू ने कहा,
अब ध्यान दो,सांस लो,कैसी महक है.
मग्घू से मैंने कहा,बड़ी प्यारी मंहक है
मग्घू ने पूछा ,पेड़ मैं दिखा दूंगा,
फूल भी दिखा दूंगा.आछी के पेड़ पर जच्छ रहा करते हैं
जो इसके पास रात होने पर जाता है,
उसको लग जाते हैं,सताते हैं,वह किसी काम का नहीं रहता.
इसीलिये इससे बचने के लिये हम लोग इससे दूर दूर रहते हैं
पीपल
मिट्टी की ओदाई ने पीपल के पात की
हरीतिमा को पूरी तरह से सोख लिया था
मूल रूप में नकशापात का,बाकी था,
छोटी बड़ी नसें,वृंत्त की पकड़ लगाव दिखा रही थी
पात का मानचित्र फैला था
दाईं तर्जनी के नखपृष्ठ की चोट दे दे कर
मैंने पात को परिमार्जित कर दिया
पीपल के पात में आदिम रूप अब न था
मूल रूप रक्षित था मूल को विकास देनेवाले हाथ
आंखों से ओझल थे पात का कंकाल भई मनोरम था,
उसका फैलाव क्रीड़ा-स्थल था समीरण का
जो मंदगामी था पात के प्रसार को कोमल कोमल परस से छूता हुआ.
काकेश के ब्लॉग से साभार
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चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती
चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है
खड़ी खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है:
इन काले चिन्हों से
कैसे ये सब स्वर निकला करते हैं.
चम्पा सुन्दर की लड़की है
सुन्दर ग्वाला है : गाय भैसे रखता है
चम्पा चौपायों को लेकर
चरवाही करने जाती है
चम्पा अच्छी है चंचल है
न ट ख ट भी है
कभी कभी ऊधम करती है
कभी कभी वह कलम चुरा देती है
जैसे तैसे उसे ढूंढ कर जब लाता हूँ
पाता हूँ - अब कागज गायब
परेशान फिर हो जाता हूँ
चम्पा कहती है:
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुनकर मैं हँस देता हूँ
फिर चम्पा चुप हो जाती है
उस दिन चम्पा आई , मैने कहा कि
चम्पा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है -
सब जन पढ़ना लिखना सीखें
चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ूंगी तुम तो कहते थे
गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ूंगी
मैने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा , तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम सँग साथ रह चला जायेगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!
चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो ,
देखा ,हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता मैं कभी न जाने दूंगी
कलकत्ता पर बजर गिरे।
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काकेश के ब्लॉग से साभार
धरती से 1945
त्रिलोचन थके और बीमार तो थे लेकिन हमारी उपस्थिति के दौरान उन्होंने लेटना गवारा नहीं किया. उनके बेटे अमित का मानना था कि हमारे पहुंचने और हमारी बातों ने उन्हें थोड़ी ताज़गी दे दी है.यहां जो तस्वीरें हैं वो उनकी पोती पंखुड़ी की खींची हुई हैं.

बाएं से अज़दक, इरफ़ान, कॉ.दीपंकर भट्टाचार्य ,कवि त्रिलोचन,रामजी राय, सुवाचन यादव और प्रभात जी

बाएं से सत्या भाई, इरफ़ान, कॉ.दीपंकर भट्टाचार्य और कवि त्रिलोचन

पृष्ठभूमि में कॉ.दीपंकर,इरफ़ान,अज़दक और सामने की तरफ़ त्रिलोचन जी और इंडिया टुडे की कला संपादक सुवाचन यादव

बाएं से कॉ.दीपंकर भट्टाचार्य, त्रिलोचनजी और रामजी राय

बाएं से इरफ़ान, कॉ.दीपंकर भट्टाचार्य और कवि त्रिलोचन
त्रिलोचन
प्रियंकर के ब्लॉग से साभार
आज की हिंदी के शिखर कवि त्रिलोचन का जन्म 20 अगस्त 1917 को चिरानीपट्टी, कटघरापट्टी, सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। अंग्रेजी में एम.ए.पूर्वार्ध तक की पढ़ाई बीएचयू से । इनकी दर्जनों कृतियाँ प्रकाशित हैं जिनमें धरती(1945), गुलाब और बुलबुल(1956), दिगंत(1957), ताप के ताए हुए दिन(1980), शव्द(1980), उस जनपद का कवि हूँ (1981) अरधान (1984), तुम्हें सौंपता हूँ( 1985) काफी महत्व रखती हैं। इनका अमोला नाम का एक और महत्वपूर्ण संग्रह है। त्रिलोचन की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह राजकमल प्रकाशन से छप चुका है। वरिष्ठ कवि केदार नाथ सिंह के शव्दों में “उनका जितना प्रकाशित है उतना या कदाचित उससे अधिक ही अप्रकाशित है”।हिंदी में सॉनेट जैसी काव्य विधा को स्थापित करने का श्रेय मात्र त्रिलोचन को ही जाता है। आप त्रिलोचन को आत्मपरकता कवि भी मान सकते हैं। ‘भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कल’ जैसी आत्मपरक पंक्तियाँ त्रिलोचन ही लिख सकते हैं। परंतु ऐसा नहीं है कि त्रिलोचन का काव्य संसार केवल आत्मपरकता तक ही सीमित है। शब्दों का सजग प्रयोग त्रिलोचन की भाषा का प्राण है ।
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त्रिलोचन जी की कुछ कविताएं
अस्वस्थ होने पर
मित्रों से बात करना अच्छा है
और यदि मुँह से बात ही न निकले तो
उतनी देर साथ रहना अच्छा है
जितनी देर मित्रों को
यह चुप्पी न खले।
बिस्तरा है न चारपाई है
बिस्तरा है न चारपाई है
जिन्दगी खूब हमने पाई है ।
अँधेरे में जिसने सर काटा
नाम मत लो हमारा भाई है ।
ठोकरें दर -ब -दर की थीं हम थे ,
कम नहीं हमने मुँह की खाई है ।
कब तलक तीर वे नही छूते ,
अब इसी बात पर लडाई है ।
आदमी जी रहा है मरने को
सबसे ऊपर यहीं सचाई है ।
कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम
धुन कहां वह संभल के आई है ।
कोइलिया न बोली
मंजर गए आम
कोइलिया न बोली
बाटो के अपने
हाथ उठाये
धरती
वसंती -सखी को बुलाये
पडे हैं सब काम
कोइलिया न बोली
पाकर नीम ने
पात गिराए
बात अपत की
हवा फैलाये
कहां गए श्याम
कोइलिया न बोली ।
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हमारा देश तुम्हारा देश से साभार
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त्रिलोचन के कुछ सॉनेट
जनपद का कवि
उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है,नंगा है,
अनजान है, कला–नहीं जानता कैसी होती है क्या है,
वह नहीं मानता कविता कुछ भी दे सकती है।
कब सूखा है उसके जीवन का सोता, इतिहास ही बता सकता है।
वह उदासीन बिलकुल अपने से,अपने समाज से है;
दुनिया को सपने सेअलग नहीं मानता,
उसे कुछ भी नहीं पता दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँची;
अब समाज में वे विचार रह गये नही हैं
जिन को ढोता चला जा रहा है वह,
अपने आँसू बोता विफल मनोरथ होने पर अथवा अकाज में।
धरम कमाता है वह तुलसीकृत रामायण सुन पढ़ कर,
जपता है नारायण नारायण।
भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल
भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल
जिस को समझे था है तो है यह फ़ौलादी
ठेस-सी लगी मुझे, क्योंकि यह मन था आदी नहीं;
झेल जाता श्रद्धा की चोट अचंचल,
नहीं संभाल सका अपने को ।
जाकर पूछा ‘भिक्षा से क्या मिलता है। ‘जीवन।’
‘क्या इसको अच्छा आप समझते हैं ।’
‘दुनिया में जिसको अच्छा नहीं समझते हैं करते हैं,
छूछा पेट काम तो नहीं करेगा ।’
'मुझे आप से ऎसी आशा न थी ।’
‘आप ही कहें, क्या करूं, खाली पेट भरूं,
कुछ काम करूं कि चुप मरूं, क्या अच्छा है ।’ जीवन जीवन है प्रताप से, स्वाभिमान ज्योतिष्क लोचनों में उतरा था, यह मनुष्य था, इतने पर भी नहीं मरा था ।
कुछ अन्य कवितायें
आत्मालोचन
शब्द मालूम है व्यर्थ नहीं जाते हैं
पहले मैं सोचता था उत्तर यदि नहीं मिले
तो फिर क्या लिखा जाए
किन्तु मेरे अन्तर निवासी ने मुझसे कहा- लिखा कर
तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे
एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए
अब मैं लिखा करता हूँ अपने अन्तर की अनुभूति
बिना रँगे चुने कागज पर बस उतार देता हूँ ।
आछी के फूल
मग्घू चुपचाप सगरा के तीर बैठा था
बैलों की सानी-पानी कर चुका था
मैंने, बैठा देखकर पूछा,बैठे हो, काम कौन करेगा.
मग्घू ने कहा, काम कर चुका हूं नहीं तो यहां बैठता कैसे,
मग्घू ने मुझसे कहा,लंबी लंबी सांस लो,
सांस ले ले कर मैंने कहा,सांस भी ले ली,बात क्या है,
आछी में फूल आ रहे हैं,मग्घू ने कहा,
अब ध्यान दो,सांस लो,कैसी महक है.
मग्घू से मैंने कहा,बड़ी प्यारी मंहक है
मग्घू ने पूछा ,पेड़ मैं दिखा दूंगा,
फूल भी दिखा दूंगा.आछी के पेड़ पर जच्छ रहा करते हैं
जो इसके पास रात होने पर जाता है,
उसको लग जाते हैं,सताते हैं,वह किसी काम का नहीं रहता.
इसीलिये इससे बचने के लिये हम लोग इससे दूर दूर रहते हैं
पीपल
मिट्टी की ओदाई ने पीपल के पात की
हरीतिमा को पूरी तरह से सोख लिया था
मूल रूप में नकशापात का,बाकी था,
छोटी बड़ी नसें,वृंत्त की पकड़ लगाव दिखा रही थी
पात का मानचित्र फैला था
दाईं तर्जनी के नखपृष्ठ की चोट दे दे कर
मैंने पात को परिमार्जित कर दिया
पीपल के पात में आदिम रूप अब न था
मूल रूप रक्षित था मूल को विकास देनेवाले हाथ
आंखों से ओझल थे पात का कंकाल भई मनोरम था,
उसका फैलाव क्रीड़ा-स्थल था समीरण का
जो मंदगामी था पात के प्रसार को कोमल कोमल परस से छूता हुआ.
काकेश के ब्लॉग से साभार
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चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती
चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है
खड़ी खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है:
इन काले चिन्हों से
कैसे ये सब स्वर निकला करते हैं.
चम्पा सुन्दर की लड़की है
सुन्दर ग्वाला है : गाय भैसे रखता है
चम्पा चौपायों को लेकर
चरवाही करने जाती है
चम्पा अच्छी है चंचल है
न ट ख ट भी है
कभी कभी ऊधम करती है
कभी कभी वह कलम चुरा देती है
जैसे तैसे उसे ढूंढ कर जब लाता हूँ
पाता हूँ - अब कागज गायब
परेशान फिर हो जाता हूँ
चम्पा कहती है:
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुनकर मैं हँस देता हूँ
फिर चम्पा चुप हो जाती है
उस दिन चम्पा आई , मैने कहा कि
चम्पा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है -
सब जन पढ़ना लिखना सीखें
चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ूंगी तुम तो कहते थे
गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ूंगी
मैने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा , तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम सँग साथ रह चला जायेगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!
चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो ,
देखा ,हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता मैं कभी न जाने दूंगी
कलकत्ता पर बजर गिरे।
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काकेश के ब्लॉग से साभार
धरती से 1945
Saturday, October 20, 2007
धरती माता जागो

सुनिये दिनेश कुमार शुक्ल की एक और छंद सघन रचना खुद उनकी ही आवाज़ में.
दिनेश जी की तिलस्म और मालगाड़ी और बंदर चढ़ा है पेड़ पर भी यहां आप सुन चुके हैं.
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Wednesday, October 3, 2007
बंदर चढ़ा है पेड़ पर करता टिली-लिली...

सुनिये दिनेश कुमार शुक्ल की एक और कविता. दिनेश जी की एक कविता आप यहां पहले भी सुन चुके हैं।
बंदर चढ़ा है पेड़ पर करता टिली-लिली...
यहां प्ले को चटकाएं और कविता सुनें.
Tuesday, September 25, 2007
कविता निजी मामला नहीं है
कविता आदमी का
निजी मामला नहीं है
एक दूसरे तक पहुंचने का पुल है
अब वही आदमी पुल बनाएगा
जो पुल पर चलते आदमी की
सुरक्षा कर सकेगा.
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कुमार विकल
एक छोटी सी लड़ाई
निजी मामला नहीं है
एक दूसरे तक पहुंचने का पुल है
अब वही आदमी पुल बनाएगा
जो पुल पर चलते आदमी की
सुरक्षा कर सकेगा.
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कुमार विकल
एक छोटी सी लड़ाई
Sunday, September 23, 2007
चांद और लुच्चे
ये एक संकरा रास्ता था
जहां पहुंचने के
लिये कहीं से चलना
नहीं पड़ता था
या ये एक मंज़िल थी
समझो
आ जाती थी बस
फिर रात गहराती थी
और चांद की याद भी किसी को नहीं आती थी
एक दिन
जब धूल के बगूलों पर सवार
कुछ लुच्चे आये
(वो ऐसे ही आते-जाते हैं सब जगह बगूलों पर ही सवार)
बाल बिखरे हुए थे उनके
बोले-
नींद खुलने से पहले ही जागा करो...
और ऐसी ही कई बातें.
चांद उत्तर के थोड़ा पूरब होकर लटका हुआ था
किसी को परवाह भी न थी
उन्हें भी नहीं
छटनी में छांटे गये ये लुच्चे
बस छांद की थिगलियां
जोड़ते रहते हैं
रातों में.
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इरफ़ान
12 जनवरी 1994
जहां पहुंचने के
लिये कहीं से चलना
नहीं पड़ता था
या ये एक मंज़िल थी
समझो
आ जाती थी बस
फिर रात गहराती थी
और चांद की याद भी किसी को नहीं आती थी
एक दिन
जब धूल के बगूलों पर सवार
कुछ लुच्चे आये
(वो ऐसे ही आते-जाते हैं सब जगह बगूलों पर ही सवार)
बाल बिखरे हुए थे उनके
बोले-
नींद खुलने से पहले ही जागा करो...
और ऐसी ही कई बातें.
चांद उत्तर के थोड़ा पूरब होकर लटका हुआ था
किसी को परवाह भी न थी
उन्हें भी नहीं
छटनी में छांटे गये ये लुच्चे
बस छांद की थिगलियां
जोड़ते रहते हैं
रातों में.
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इरफ़ान
12 जनवरी 1994
कांटे और शहद
जब रात हुई
तो कुछ बात हुई
और बात भी कैसी
थोड़ी कंपकंपी थी
और उस जंगली घास
के असंख्य कांटों की बूदों
पर ठहरी ओस जैसी
और जैसे-जैसे हम
उंगलियों से
घास को छूते
गहरा और गाढ़ा शहद हमारे प्यालों में
टपकता जाता
क्या चखकर ही मिठास
जानी जा सकती है?
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इरफ़ान
3 जनवरी 1994
तो कुछ बात हुई
और बात भी कैसी
थोड़ी कंपकंपी थी
और उस जंगली घास
के असंख्य कांटों की बूदों
पर ठहरी ओस जैसी
और जैसे-जैसे हम
उंगलियों से
घास को छूते
गहरा और गाढ़ा शहद हमारे प्यालों में
टपकता जाता
क्या चखकर ही मिठास
जानी जा सकती है?
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इरफ़ान
3 जनवरी 1994
इरफ़ान के जन्मदिन पर
भाई चंद्रभूषण ने 13 मई 1994 को मेरे जन्मदिन पर यह कविता मेरे लिये लिखी
आओ आज रात
मारें धरती को एक लात
निकाल बाहर करें
इसे चकराते रहने की नियति से
आओ पकड़ें आज
एक किनारे से आसमान की चादर
लपेट लें उस पर लेटे ईश्वर को
ढकेल दें उसे छत के नीचे
आओ खड़ा करें
इस चुप-चुप दुनिया में
आज इतना भारी विवाद
कि कोई विवाद न रह जाए
आज के बाद.
आओ आज रात
मारें धरती को एक लात
निकाल बाहर करें
इसे चकराते रहने की नियति से
आओ पकड़ें आज
एक किनारे से आसमान की चादर
लपेट लें उस पर लेटे ईश्वर को
ढकेल दें उसे छत के नीचे
आओ खड़ा करें
इस चुप-चुप दुनिया में
आज इतना भारी विवाद
कि कोई विवाद न रह जाए
आज के बाद.
आपस में बातें क्यों नहीं करनी चाहिये?
दो अजनबी
राजमार्ग पर
आमने-सामने से गुज़र रहे हैं
उन्हें आपस में बातें क्यों नहीं करनी चाहिये?
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वाल्ट ह्विट्मैन
राजमार्ग पर
आमने-सामने से गुज़र रहे हैं
उन्हें आपस में बातें क्यों नहीं करनी चाहिये?
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वाल्ट ह्विट्मैन
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