दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Sunday, August 19, 2007

अब आप देवकीनंदन पांडे से समाचार सुनिये


मैं उन सौभाग्यशालियों में हूं जिन्होंने देवकीनंदन पांडे के साथ काम किया. ये उनके जीवन के आख़िरी वर्ष थे और एक दिन स्टेट्समैन के बस स्टैंड पर मैंने उन्हें बस का इंतज़ार करते देखा. वो थोड़े असहज दिखाई दे रहे थे क्योंकि शायद जिस बस की राह वो देख रहे थे उसका नंबर पढ़्ने में उन्हें दिक़्क़त हो रही थी. आंखों के ऒपरेशन की बात वो हमें तब बता चुके थे जब हम यानी मैं, मेरे मित्र संजय जोशी और मित्राधिमित्र मेजर संजय चतुर्वेदी उनसे अपने एक कार्यक्रम में समाचार वाचन करने का आग्रह करने उनके पटपड़्गंज स्थित घर पर पहुंचे थे. वो दोपहर हम सब के लिये कभी न भूल पाने वाली अनमोल दोपहर थी. हम समाचारवाचन के पितामह के साथ बैठे थे. कहिये कोई है जो देवकीनंदन पांडे को न जानता हो? "ये आकाशवाणी है, अब आप देवकीनंदन पांडे से समाचार सुनिये" या "ये देवकीनंदन पांडे है, अब आप आकाशवाणी से समाचार सुनिये"---तीन दशकों से अधिक समय तक आकाशवाणी का पर्याय रहे देवकीनंदन पांडे जिस ज़िंदादिली का दूसरा नाम थे, उसकी गूंजें आज भी आकाशवाणी की इस ऐतिहासिक इमारत के गलियारों में मौजूद है. हम भी स्टूडियो के उन्हीं दरवाज़ों को धकेलते हुए अंदर घुसते हैं जिनके हत्थों पर से देवकीनंदन पांडे की मज़बूत हथेलियों के निशान वक़्त की सारी सितमगरी न मिटा सकी है और न मिटा सकेगी. आकाशवाणी की सामनेवाली दीवार से लगी जहां आज कारें ही कारें खड़ी होती है, मैंने आज से दस साल पहले दो बार देवकीनंदन पांडे को गुज़रते देखा है. वो शेरवानी और चौड़े पांयचे का पायजामा पहनते थे. एक क़द्दावर इंसान जिन्होंने रेडियो का क़द भी ऊंचा किया. उस दोपहर हम इतने डिलाइटेड लौटे कि हम भी कुछ है. असल में कसौटी भी यही बताई गयी है कि बड़ा आदमी वही है जिससे मिलकर आप भी बड़ा महसूस करने लगें.
सोचिये कि जिस आदमी ने इतना लंबा समय रेडियो में गुज़ारा हो उसकी आवाज़ का कोई रेफ़रेंस कहीं मौजूद नहीं है. आइये सुनिये कि समाचार पढ़्ने को एक कला और ब्रांड बनानेवाले देवकीनंदन पांडे की न्यूज़ रीडिंग कैसी थी.
इस रिकॊर्डिंग में पहुंचने के लिये उन्होंने हमसे सिर्फ़ गाड़ी मांगी थी और तयशुदा समय से बीस मिनट पहले पहुंच गये थे.



नवंबर,1998 को रिकॊर्ड किया गया.

10 comments:

Sanjeet Tripathi said...

शानदार!!
और समाचार तो आप लोगों ने गज़ब गज़ब चुने हैं सरकार!!

अभय तिवारी said...

सही है.. इसी बहाने आप ने मेजर को भी याद किया..

ravish said...

मज़ा आ गया। मेरे भी प्रिय वाचक रहे हैं। काश मिलने का मौका मिला होता। अच्छा किया उन्हें ब्लाग जगत में ला कर। स्वागत है।

Gyandutt Pandey said...

देवकीनन्दन पाण्डे की गम्भीर आवाज अब भी यादों में है. बचपन से उन्ही के समाचार सुन कर बड़े हुये हैं.

surjan said...

kamal kar diya bhai sahab..aaj achanak itne dino baad devkiji ki aawaz sun kar mujhe sabut masoor(ghee mein ofcourse)aur chawal ki yaad aa gayi..kyonki shayad dopahar ke usi waqt maine unhe zyzda suna.....thank u

surjan said...

kamal kar diya irfan bhai..itne dino baad devkiji ki aawaz sun kar mujhe dopahar ki sabut massoor ki daal(zahir hai ghee mein) aur chawal yaad aa gaye..shayad usi waqt maine unhein zyaada suna...thanx

मीनाक्षी said...

पाण्डे जी को सुनने की बहुत कोशिश की लेकिन सुन नही पाए...:(

Sharad said...

pande ji per ye samagri bahut aham aur upyogi lagi.sunne ki koshish ki per sun nahin paya magar bahut pahle sanjay joshi ke saujanya se jo suna tha shayad wahi ismein hoga.net per khojne per pande ji ke bare mein koi khaas jankari kahin aur mujhe ab tak nahin mili isliye ye jankari dekh kar khaas khushi hui.sevanivritti ke kai varshon baad pande ji kabhi kabhi hanste hue kahte the radio wale to ab sudh lete nahin albatta doordarshan wale kabhi zaroor poochch lete hain.khair aapne unhein khoob yaad kiya.

अजित वडनेरकर said...

पांडे जी के बारे में यही कहा जा सकता है-न भूतो न भविष्यति ....

Kajal Kumar said...

बहुत पहले जब आकाशवाणी पर कुछ समय के लिए कैज़ुअल न्यूज़रीडर का काम करना शुरू किया था तो पांडे जी वह इंदु वाही जी ने हमें संयुक्त रूप से बहुत कुछ सिखाया था. पांडे जी तब रिटायर हो चुके थे पर फिर भी कभी कभी शाम को, दो-एक बुलेटिन पढ़ने आते थे. ग़ज़ब की आवाज़ थी. बचपन में जिस आवाज़ को सुनते हुए बड़े हुए थे, उस शख्सियत को यूं रूबरू देखना ही रोमांच भर देता था ...