दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Friday, August 17, 2007

मातृभूमि की व्यथा


फ़ोटो साभार


सारा की इस साल की पढाई में संस्कृत भी शामिल हो गई है. पठति-पठत:-पठंति.....पठामि-पठाव:-पठाम:....रटो और रटते रहो. हमने-आपने भी रटा है और ये लोग भी रट रहे हैं. मेरे जीवन में संस्कृत ने नया क्या जोड़ा अभी तक जान नहीं पाया हूं. आपके जीवन में जुडे किसी नये आयाम पर अगर आप रोशनी डाल सकें तो मेरा अंधेरा छंटे.
हमारे आपके दौर तक देशप्रेम और बलिदान कुछ अर्थ रखते थे. इसी संस्कृत में कुछ श्लोकों का अनुवाद पढ़्ते हुए वह मुझसे पूछ रही है पापा व्यथा क्या है? लाइन है- "मैं अपनी मातृभूमि की व्यथा का वरण करता हूं". जब मैंने अपनी समझ के मुताबिक़ उसे समझाया तो सब सुनने के बाद उसने पीठ मोड़ी और मैंने एक बुदबुदाहट सुनी-"सब कहने की बातें हैं".
अपनी बेटी के मुंह से ऐसे नकार सुनकर अक्सर मेरा मन आहत होता है लेकिन आप ही कहिये कि क्या हम अपने बच्चों को मातृभूमि की व्यथा का वरण करने के संकल्प के आसपास भी पहुंचा सकते हैं?

4 comments:

अफ़लातून said...

'सब कहने की बाते हैं'-बच्ची का यह बुदबुदाना उसकी गहरी संवेदना का द्योतक है।वह आस-पास की संवेदनहीनता पर रंज है।

अभय तिवारी said...

वो तो जो बात है सो बात है..लेकिन ये डायलॉगबाजी तो बड़ी ड्रैमेटिक है.. हम तो इम्प्रेस हो गए हैं सारा से.. इरफ़ान भाई को चित कर दे ऐसे डायलॉग मार रही है.. बहुत सही.. खूब आसीर्बाद बिटिया..

बोधिसत्व said...

बच्ची के नकार से खुश होना सीखिए । यह तो अच्छा लक्षण है। सारा को स्नेह दें।

प्रियंकर said...

आप आदर्श के लिए उद्धत हैं इसलिए आपका मन आहत होता है .

सारा रोज़-ब-रोज़ समय के संकेत देख-सुन रही है और उनकी तपिश से हर कदम पर दो-चार होती है,वह अपने अनुभव से सीख रही है . उसका अपना बोध है . आपने रटंत की व्यर्थता समझने के बावजूद अपने को उस श्लोक के आदर्श के साथ बांध रखा है, पर सारा के सामने 'वास्तव की विस्फारित प्रतिमा' रोज़ कुछ नकार छोड़ जाती है,वह क्या करे ?

क्या उसे बरनम वन/किंग लियर की कॉर्डीलिया बन जाना चाहिए?