दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Tuesday, August 14, 2007

धीरे-धीरे कलाई लगे थामने

भाई अभय को धन्यवाद दीजिये और सुनिये पुतलीबाई की वो क़्व्वाली जो मैंने पिछले हफ़़्ते टेक्स्ट की शक्ल में आपको भेजी थी.





7 comments:

जगदीश भाटिया said...

धन्यवाद इरफान भाई इस कव्वाली के लिये। कुछ इसके बारे में लिखते तो और भी अच्छा रहता।

जब हम बच्चे थे तो विविधभारती पर तो सुनते ही थ्रे, गली मोहल्ले में होने वाले शादी ब्याह और मेलों में यह रिकार्ड बहुत बजा करता था।

Nasiruddin said...

ऐसे बेशर्म आशिक है ये आज के
इनको अपना बनाना गज़ब हो गया
हमारे घर के पास एक साउंड सिस्‍टम की दुकान थी। अक्‍सर सुबह-सुबह यह कव्‍वाली उसके लाउडस्‍पीकर से सुनने को मिलती थी। आपने बचपन के वो दिन याद दिला दिये। क्‍या अल्‍फाज़ हैं। पहली बार इतना ध्‍यान से सुना। इरफान भाई बधाई। अभी दो बार सुन चुका हूं। डाउनलोड करने का जुगाड़ बताइये।
नासिरूद्दीन

चंद्रभूषण said...

आपका भेजा कुछ सुन तो पाते नहीं हैं। लड़कियों की कहानियां अलबत्ता बड़ी जानदार लगीं।

mamta said...

भाई हमे तो बहुत मजा आया इसे सुनकर। शायद २५-३० साल बाद सुन रहे है। लगता है आज के संगीतकारों ने इसे सुना नही है वरना उन्हें समझ आता कि असली कव्वाली किसी कहते है।

Udan Tashtari said...

अह्हा!!! अर्सों बाद सुनी. दिन बन गया. बहुत बहुत आभार.

Pratyaksha said...

वाह ! मज़ा आ गया ।

मीनाक्षी said...

आपको और अभय जी दोनो का ही शुक्रिया ! आज हम बस टूटी बिखरी यादों और सुरों में खो गए...!