दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Sunday, October 7, 2007

इंतज़ार ख़त्म : अब अज़दक हैं आपके साथ, आज की फ़िल्मों से आपकी बेज़ारी बढाते हुए

हिंदी फ़िल्मों को लेकर अज़दक के पास कहने को बहुत कुछ है. परसों हमने उनकी बातों को रिकॉर्ड करके कोशिश की है कि उनकी राय आप तक उनकी आवाज़ में पहुंचे जिसमें उनका ख़ास अंदाज़ भी शामिल हो. तो वादे के मुताबिक़ पेश है सात छोटे-छोटे हिस्सो में पूरी बातचीत, इनमें से जिन दो छोटे हिस्सों को कल-परसों में मैं बतौर टीज़र सुना चुका हूं उन्हें सुनते हुए आप दोहराव के लिये मुझे माफ़ करेंगे. बातचीत की शुरुआत मुनीश ने की है जिसके आरंभ में मैं कुछ अदाकारी दिखा रहा हूं.
मुनीश external services division की हिंदी सेवा के एक युवा ब्रॉड्कास्टर हैं और दिल्ली में रहते हैं.देशी-विदेशी फ़िल्मों और साहित्य के अलावा उन्हें सैर और शराब का ख़ासा शौक़ है.अभिनय वे स्वाभाविक रूप से करते हैं-मंच पर और मंच से परे भी.हमारी दोस्ती की वजह यह सहमति है कि आजकल-
शान के लोग दुनिया में कम रह गये,
एक तुम रह गये एक हम रह गये.

अज़दक के बारे में आप जो जानते हैं, उससे अलग बस इतना कहूंगा कि तेइस साल पहले मेरी उनसे मुलाक़ात हुई थी.( उसी दौर की उनकी एक तस्वीर यहां पेश कर रहा हूं) इलाहाबाद की सांस्कृतिक हलचलों के बीच मैंने उनसे बहुत कुछ सीखने की कोशिश की है और आज भी कर रहा हूं. लंबे समय तक विमलभाई और प्रमोदभाई(पढ़ें अज़दक) का इलाहाबाद के सोहबतिया बाग़ का कमरा मेरा दूसरा घर रहा. गर्मियों की कई ख़ामोश दोपहरें याद करूं तो याद आता है साइकिल चलाते हुए मेरा सोबतिया बाग़ पहुंचना. आज सोचूं तो लगता है कि कोई और जगह थी, कोई और जनम थाजहां मैं इतना चार्ज्ड माहौल पाया करता था. और सोचूं कि क्या मुझे विमलभाई-प्रमोदभाई के डेरे पहुंचने में कोई प्रयास करना होता था? क्या मैं आंख मूंदकर भी साइकिल चलाऊं तो सोबतिया बाग़ नहीं पहुंच सकता था? विमलभाई-प्रमोदभाई नाम युग्म कुछ अब्दुलभाई-सत्तारभाई इतरवाले या राजन-साजन मिश्र जैसा लगता है.इस बातचीत के दौरान मुझे कई बार इलाहाबाद फ़िल्म सोसायटी में साथ-साथ फ़िल्में देखने के बाद यूनिवर्सिटी रोड पर चाय टकराते हुए हुई सरगर्म चर्चाएं याद हो आई.
बहरहाल, आपको अपनी भावुकता(ऐसा ही प्रमोदभाई कहते हैं)से बोर नहीं करते हुए छोड़ता हूं इस बातचीत के साथ.
Recorded on 5th October 2007, 7:30PM, New Delhi







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8 comments:

parul k said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति………मुझे लगता था कि शायद मै अकेली ही न्यूज़ चैनलस से irritate होती हूं……आगे भी ऐसी बेह्तरीन पोस्ट्स का इन्तज़ार रहेगा

अफ़लातून said...

इरफ़ान , मुनीश और प्रमोदजी को एक अच्छी चर्चा पेश करने के लिए बधाई ।

vimal verma said...

भाई इरफ़ानजी, ये जो ऑडियो वाला माध्यम अच्छा लग रहा है मुनीष, और आपकी आवाज़ बड़ी साफ़ और शब्द वाकई मोती की तरह है,इसीलिये कर्णप्रिय भी लग रहे हैं, इलाहाबाद और उससे भी ज़्यादा सोहबतियाबाग के सुहाने दिनो को याद वर्णन भी अच्छा लगा,ऑडियो वाला माध्यम भा रहा है, आप कयम रहें, शुक्रिया.

munish said...

Shukriya dosto,sara shreya Irfan ko jata hai. Main to yun hi Azdak saab ki sohbat enjoy kar raha tha ki Irfu ne record kar liya.Mere liye ye podcasting ek hairatangez anubhav hai chunki radio pe bolta hun to usse rewind nahi kiya jaata. ye to maza hi alag hai.ap bhi irfan ko uksaate rahena aisi nakshe baazi ke liye.

anil singh said...

dear irfanji,sabase pahale ed mubarak ho.apke blog ko dekhata rahata hoon.is tarah apko bhi dekhata rahata hoon aur apke madhyam se allahabadi mitron ko bhi.farjana bhabhi ko namaste.betiyon ko dular.

अभय तिवारी said...

आजकल जबकि प्रमोद भाई यहाँ नहीं है.. आप के ब्लॉग पर उनके साथ इस लम्बी बातचीत को सुनकर उनकी ग़ैर मौजूदगी से उत्पन्न खालीपन को कुछ भरा गया.. शुक्रिया..

अभय तिवारी said...

वैसे उनसे 'दुनिया ए दुनिया! तेरा जवाब नहीं' भी गवा लेना था..

Anonymous said...

Enlightening conversations.
Keep up the good work.