दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Friday, December 7, 2007

सुनिये एक रंगकर्मी का बयान


ये बयान है एक दौर का. एक दौर जो हर संस्कृतिकर्मी की ज़िंदगी में आता है. आप मुख़ातिब हैं विमल वर्मा से जिन्हें आपमें से ज़्यादातर लोग ठुमरीवाले विमल के रूप में जानते हैं. आपमें से थोडे से लोग उनके बारे ये भी जानते हैं कि उनकी ज़िंदगी के तार आज़मगढ, बलिया, दिल्ली और अब बंबई से जुडे होने के अलावा अपनी सांस्कृतिक सरगर्मियों के ज़माने से समूचे देश से जुडे हुए हैं. भौगोलिक विस्तारों से कहीं अधिक उनकी पहुंच इंसानी दिलों और धडकनों तक है. जो भी उनसे कभी भी, कहीं भी और कितना भी मिला है - उन्हें भूल नहीं सका है. उम्मीद करता हूँ कि यह ख़ासियत उनमें अब भी बरक़रार है. मेरे और उनके रिश्तों की दिलकश यादों पर वक़्त की धूल अभी इतनी भारी नहीं पडी है कि मैं यह पोस्ट जारी करने से पहले इसे भावुकता आदि के ख़तरों से बचाऊँ. ये डर मुझे खाये जाता है कि मैं इस वक़्त उनकी तारीफ़ में जो भी लिख रहा हूं वो कहीं मेरे अहसास की अक्कासी कर भी पा रहा है या नहीं. वक़्त के साथ-साथ हर इंसान समझदार और प्रैक्टिकल बनता जाता है, लेकिन विमल भाई के सिलसिले में वैसा ही मिट्टी का माधो रहना चाहता हूं जैसा कि मैं आज से तेईस साल पहले था जब गर्मियों की एक दोपहर, मेरी मुलाक़ात प्रमोद भाई और विमल भाई से हुई थी. वो वक़्त और वो तजुर्बे मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा हैं और मेरी शानदार नाकामी जैसी कामयाबी की नींव हैं. प्रमोद भाई के साथ गुज़रे वक्त को मैं इस और इस तरह पहले यहां दर्ज कर चुका हूं.
एक मज़ेदार यारबाश आदमी का अगर कोई जीता-जागता नमूना हो सकता है तो वो विमल भाई हैं जो आपको हँसाते-हँसाते रुला देने और अगर आप रो रहे हों तो आपको फौरन एक नयी दुनिया में पहुँचाने का माद्दा रखते हैं. मेरे लिये वो एक समर्थ अभिनेता और संगठक के अलावा एक ऐसे इंसान भी हैं जिसका कोई तीसर नेत्र होता है. लेकिन ठहरिये... कुछ लोग जो इन लाइनों को पढते हुए "हद हो गयी"... "अरे बहुत फेंका अब लपेटो" "अतिरंजना" आदि कह रहे हैं उन्हें मैं पहले एक गाली लिख दूँ - #)ं&()%$$$#@।+!


तो हाँ...विमल भाई का जीवन संघर्षों से भरा है और इसमें न तो उन्हें और न हमें आपको कोई उल्लेखनीय बात लगनी चाहिये. एक बातूनी आदमी, जिसके पास अनुभवों का महासागर है, यही सोच कर यह बातचीत कोई पद्रह साल पहले दिल्ली में तब रिकॉर्ड कर ली गयी थी जब हमारे दोस्त संजय जोशी को अपने एमसीआरसी का एक ऑडियो रिकॉर्डर हाथ लगा था. बातचीत महज़ एक सवाल के इर्द गिर्द थी कि आपकी ज़िंदगी का कोई अधूरा ख्वाब है तो वो क्या है?
बातचीत आपको सुनवाऊंगा लेकिन फिलहाल सुनिये इस बातचीत के आखिरी हिस्से में सुनाए उनके गीतों मेँ से पहला गीत- यह सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के लिखे उन गीतों में से एक है, जिन्हें हमनें आंदोलनों और नाटकों के आगे पीछे ख़ूब गाया.
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यहां मौजूद दोनों फ़ोटो नवीन चंद्र वर्मा ने कोई बीस साल पहले खींचे है‍, नवीन उर्फ़ गुड्डा विमलभाई के छोटे भाई और जानेमाने कैमरामैन हैं. ऊपर बाएं विमल और दाएं प्रमोद. तीसरा मैं तब था जब २३ साल पहले विमल भाई वगैरह से मिला.
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आग लगा दो, आग लगा दो राजाजी के प्याऊ को...

10 comments:

Ashok Pande said...

बहुत उदास कर देने वाला, बहुत नोस्टाल्जिया पैदा करने वाला। दिल बीस साल पहले पहुंच गया ... वो जज्बा, वो जोश, वो नुक्कड़, वो नाटक, वो चाय, वो ठहाके, और और पता नहीं क्या क्या ... ।

अभय तिवारी said...

विमल भाई इज़ ग्रेट.. पीरियड!

yunus said...

वाह भाई परम आनंद आया । हमें भी पिछले दिनों विमल जी का सान्निध्‍य प्राप्‍त हुआ है और उन्‍हें सुनने का मौका भी मिला है । क्‍या विमल जी की आवाज में आपके पास 'पहले दाल में काला था अब काले में दाल है' या फिर 'गर आपकी प्‍लेट खाली हो' में से कोई गीत हो तो जरूर चढ़ाईये ।

parul k said...

साफ़-सुथरी गूंजती आवाज़्……सुनवाने का आभार

mamta said...

एक बेहतरीन गीत सुनवाने के लिए शुक्रिया।

sanjay joshi said...

kamal hai Irfan, ki tumhe yeh recording haath lag gayi, main tab apni MCRC ke Radio Production ki padai ke liye ek feature " Log Kyon Gaate hain" bana raha tha, shayad isi ke liye Vimal bahi se baat ki thi.Kya tumahare paas us radio programme ki copy bhi hai, anyway shukriya, important recording ko sambhal kar rakhne ke liye.
sanjay joshi

Manish said...

इरफान भाई ये सुखद संयोग है कि आज ही मैंने विमल वर्मा जी से भेंट के दौरान दो रिकार्डेड गीतों को अपने चिट्ठे पर चढ़ाया है
उनसे दो दिनों की मुलाकात ने ही मुझे उनके व्यक्तित्व ने खासा प्रभावित किया है।
लाइफलॉगर के सर्वर में आज दिक्कत की वजह से फिलहाल चिट्ठे पर लगाया गीत आज सुन नहीं पा रहा हूँ। पर वापस आऊँगा यहाँ...

Manish said...

इरफान भाई ये सुखद संयोग है कि आज ही मैंने विमल वर्मा जी से भेंट के दौरान दो रिकार्डेड गीतों को अपने चिट्ठे पर चढ़ाया है उनसे दो दिनों की मुलाकात ने ही मुझे उनके व्यक्तित्व ने खासा प्रभावित किया है।
लाइफलॉगर के सर्वर में आज दिक्कत की वजह से फिलहाल चिट्ठे पर लगाया गीत आज सुन नहीं पा रहा हूँ। पर वापस आऊँगा यहाँ...

munish said...

IRFAN bhai apki post ko kosne valon ko gali dene ke liye hum baithe hain na, apko gali vali nahi deni hai, ap dharam ka ,nek kaam kar rahe hain blogging ki duniya mein.

vimal verma said...

इरफ़ानजी,आपने तो फिर से उन दिनों की याद दिला दी....कितनी दूरी पार कर ली है हमने,कमाल है इरफ़ान कि, आपने मेरे जैसे मित्रों से मुत्तालिक सामग्री अभी तक किस बक्से में डाल रखी थी जो आज तक आपके पास महफ़ूज पड़ी थी, लोगों को कितना मज़ा आया इसका अन्दाज़ा तो मैं लगा नही सकता, पर इतना ज़रूर कर दिया आपने कि, मुझे अपने बारे में फिर से सोचना पड़ेगा ,पर आप...... आप तो धन्य हैं.... आपकी एक आदत..... हमेशा याद रहेगी कि लोगों को आश्चर्यचकित कर देना और दूर से मज़ा लेना, इसको तो मै बयां भी नहीं कर सकता, पर मुझे भी सुनकर आनन्द आया, क्योकि इन गानो को आज भी मैं गाता तो हूं, पर उनकी धुन ये नहीं है जो आपने लगा रखी हैं,फिर भी मै आपका कायल हूं जो अपने मित्रों को इतना सम्मान देते हैं,और उनकॊ इतना गहरे समझते हैं, शुक्रिया