दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Tuesday, December 4, 2007

ख़्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त

घर से स्कूल उन दिनों बहुत दूर लगता था.

चलते-चलते नन्हें-नन्हें पाँव थक जाया करते थे.एक ख़ाब जो मैं अक्सर देखा करता था, वो ये था कि मेरे दोनों हाथों की जगह दो बडे-बडे पंख हैं और मैं उडता-उडता स्कूल पहुँच रहा हूँ.

एक लंबी कभी न ख़त्म होनेवाली पगडंडी मुझे ख़ूबसूरत पहाडों की तरफ़ ले जा रही है.रास्ते में ऊँचे घने पेड हैं, एक झरना वहाँ लगातार गिरता रहता है,चिडियों का एक झुंड अभी-अभी उडा है और एक चंचल हिरन कुलाँचे भरता हुआ सामने से गुज़र गया है. मैं हर रात ऐसे ही एक सपने में - घूमा किया - तब मैं बहुत छोटा था.


सपने में मैं बहुत अकेली होती हूँ और तभी एक जंगली भैंसा मुझे दौडाने लगता है, मैं भागने की कोशिश करती हूँ लेकिन मेरे पैर जैसे कहीं जम जाते हैं, मैं दौड नहीं पाती. Thanks God तभी मेरी आँख खुल जाती है - मैं पसीने से लथपत उठ बैठती हूँ.


मेरे तो exams हो रहे होते हैं और मैं अक्सर लेट पहुँचती हूँ. कभी-कभी ऐसा भी देखा कि पेपर कुछ और था और मैं तैयारी कुछ और करके आई...

बात जब ख़ाबों की शुरू हुई - और वो भी बचपन में आने वाले ख़ाबों की - तो कुछ इसी तरह से दोस्तों ने अपने सपनों को याद किया.


कुछ के लिये तो अब सपनों का ज़िक्र भी एक अटपटा प्रसंग है. यानी वर्तमान में इस तरह उलझा हुआ है मन कि लौटकर जाना और वो भी सपनों में, कठिन तो है ही, अप्रीतिकर भी है.


जो भी हो... ग़ौर किया तो पाया कि हर किसी की ज़िंदगी से जुडे हैं ख़्वाब - कभी रात की नींदों से आते हुए तो कभी दिन के उजालों में बुने जाते हुए.


कोई ख़ाब क्यों आया? उसकी ताबीर क्या है? मन कभी इस पर सोचता है, तो कभी इसके अहसास से घंटों, तो कभी हफ्तों लुत्फ़अंदोज़ होता रहता है.


अच्छा क्या था बुरा क्या? सही क्या था ग़लत क्या? ख़ाबों के नफ़े-नुक़सान की बातें - ये सब उम्र के एक पडाव पर ही तौले जाते हैं या कभी-कभी नहीं भी तौले जाते. बचपन से हम लडकपन में क़दम रखते हैं और फिर जवानी की सीढियाँ चढते हुए आज की ज़बान में कहें तो सीनियर सिटिज़ेन होते हैं - इस तरह ज़िंदगी का एक सफ़र:-

पाने की तमन्ना - पाने की कोशिश और पाए हुए की तफ्तीश करता हुआ अपने मक़ाम पर पहुँचता है.




इतवार का एक और दिन...

बहुत पीछे और बहुत आगे को खँगालने और explore करने का एक और अवकाश
एक मौक़ा ख़ुद से मुख़ातिब होने का...
कुछ लम्हे अपने लिये,


प्रोग्राम है रेडियो रविवार और मैं इरफ़ान
.


मेज़ पर ताश के पत्तों सी सजी है दुनिया
कोई खोने के लिये है कोई पाने के लिये
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बचपन के दिन - मस्ती और बेफ़िक्री के दिन.

हर रोज़ नए ख़ाब पलते हैं, दुनिया की सारी ख़ुशियाँ अपने दामन में समेट लेने का अहद होता है.


क्लासरूम में सबसे पूछा जा रहा था --

I want to become a great poet and writer.
मुँह से बेसाख़्ता निकला था.

मुझे ज़माने की भेडचाल पसंद नहीं. जिसे देखो वही डॉक्टर इंजीनियर, वकील, टीचर...


ठीक !


लेकिन अब सोचता हूँ तो poet and writer ठीक लेकिन ये great poet and writer? बात कुछ हज़म नहीं होती!

"बाप न मारे पेंडुकी बेटा तीरंदाज़" एक फ़िकरा कहीं से उडता हुआ आता है और टनाक से लगता है. सपने संकल्प का रूप लेते हैं.


क्या हुआ? क्या खोया? क्या पाया? - यानी ये सब जोड-गुणा के लिये भी एक उम्र की दरकार थी...और इस उम्र के ये ज़रूरी पडाव थे.

हर शै जैसे बिल्कुल नयी थी और जैसे हमने ही उसे पहली बार देखा था. किसी ने देखा भी था तो ये हमारे सरोकार का वैसा हिस्सा नहीं थी.


यानी ख्वाबों के चिराग़ दिल की परतों के नीचे रौशन हो रहे हों, पलकों पर सजे हर पल नयी रौशनियाँ बिखेर रहे हों या फिर ज़ाहिर होकर एक guiding force की तरह काम कर रहे हों --

हर रंग में और हर हाल में हमें इंसान होने का अहसास कराते हैं.

शायद यही हैं जो हमें थककर बैठने नहीं देते -
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एक ख़्वाब जो बहुत मेरा है, अज आपके साथ share करता हूँ.

इसमें एक बलखाती-मचलती नदी है, सर्दियों की गुनगुनी धूप है और मैं इस नदी की सतह पर पीठ किये लेटा हूँ. नदी जहाँ-जहाँ जा रही है मैं आसमान की तरफ मुँह किये हुए लेटा एक अनजाने सफर पर निकल पडा हूँ.

हक़ीक़त से कोसों दूर. कभी न पूरा हो सकने वाला ख़्वाब.

सवाल ये उठता है कि क्या ख़्वाब इसलिये होते हैं कि उन्हें पूरा होना है?

सवाल ये भी उठता है है कि क्या ख़्वाब देखना आपके बस में होता है? वग़ैरह-वग़ैरह.

सवाल समझदार लोग उठाते हैं. ये शायद उन्हीं की field है. फिर शायर उनसे हँस कर कह देता है -


दो और दो का जोड हमेशा चार कहाँ होता है
सोच समझ वालों को थोडी नादानी दे मौला.
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एक बात जो हमेशा दुहराई जाती है यानी जिसे हमने अभी या कभी ज़रूर सुन रखा है वो ये है कि यथार्थ की कठोर चट्टान से टकरा कर सपने टूट जाते हैं. बात ठीक है लेकिन इस बात का दिलचस्प पहलू ये है कि इसी यथार्थ को खरिज करते हुए, इसके घटाटोप से बाहर आने के किये स्वप्न एक ज़रूरी सामान रहे हैं और रहेंगे.

यथार्थ की एक ऐसी दुनिया में- जहाँ सब कुछ systematic और controlled है -- एक individual अपनी essential subjectivity assert करता है और इस तरह अपेक्षाओं और बने बनाए मानदंडों पर खरा न उतरने से बहिष्कृत कर दिये जाने से बच जाता है. इस तरह पराएपन के अहसास में जीने के बजाय वो अपनी एक निजी दुनिया चुन लेता है. जिसमें कुछ समय के लिये ही सही सुरक्षित और महफूज़ महसूस करता है.


शायद यही वजह है कि हम अक्सर कहीं पर होते हुए भी वहाँ नहीं होते हैं.
बहरहाल हम जहाँ भी होते हैं वहाँ हम वो तलाश कर रहे होते हैं जिसे हम दिल के बहुत नज़दीक पाते हैं.
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योजनाएँ बहुत देर तक बनती रहीं. उनमें से कुछ ज़मीन पर थीं तो कुछ हवा में.


आख़िर कब तक ख़ामोश रहते -- बालकनी में अख़बार से सिर जोड़कर बैठे दादाजी से रहा नहीं गया --

"तुम लोग बातें ज़्यादा करते हो, काम कम. कुछ करो तो समझ में आये कि हाँ कुछ हुआ. और याद रखो वक़्त से पहले और क़िस्मत से ज़्यादा किसी को नहीं मिलता.
"


बात ठीक होगी शायद क्योंकि बाल उन्होंने भी धूप में सफेद नहीं किये. सीख की बातें दे सकते हैं क्योंकि उन्होंने ज़माना देखा है.

लेकिन कोई इनसे पूछे कि यही बात जब आपके दादाजी कहते थे यानी जब आप हमारी उम्र के थे -- तो क्या आपने मानी थी.

ये शायद इंसानी फितरत है कि अनुभवों का एक ज़ख़ीरा उसमें वो आत्मविश्वास भरता है कि ख़ुद से पहले की पीढियों को वो बचकाना और कभी-कभी अहमक़ाना समझने लगती है.
हर चीज़ को, हर इंसान को उसके परिवेश में देखें तो हर बात समझ में आने लगती है लेकिन इस सबके बीच समय का फ़ासला निष्कर्षों को कभी ग़लत ठहराता है तो कभी सवाल छोड जाता है.

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जागती आँखों के ख़ाब एक लाइट हाउस की तरह होते हैं.
हर हार के बाद दिल को हौसला देते हुए. कभी-कभी ऐसा होता है कि हमारी इच्छाएं ही सपनों का रूप धारण कर लेती हैं.

हर इंसान की ज़िंदगी में उसकी युवावस्था उसकी सर्वाधिक ऊर्जा का और ड्राइव का समय होता है.

"अगर अब तक कुछ नहीं किया तो कब करोगे?" पूछा जाता है.
पैरों में एक रफ़्तार, दिल में एक उमंग और सब कुछ पा लेने का, समेट लेने का जज़्बा-

स्वामी विवेकानंद ने कहा -
"इच्छाओं का समुद्र अतृप्त रहता है. ज्यों-ज्यों उसकी मांगें पूरी की जाती हैं, त्यों-त्यों वो गर्जन करता है."
यानी एक बार फिर ज़िंदगी की जद्दोजहद का एक फ़लसफ़ाना निचोड़.

जो भी हो, जब तक दम-ख़म है, हारें क्यों?
बाद में क्या होगा, किसने जाना?
हर इंसान को एक ही जीवन मिला है और इसके सभी जौहर यहीं और इसी जीवन में सामने आने है‍-
सारी कोशिशों का निचोड़ यही है कि ख़ाब मुरझा न जाएं...कहीं रूठ न जाएं.
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जब हम छोटे होते हैं तो सपने देखते हैं
जब हम बड़े होते हैं तो सपने देखते हैं
सपनों का रूप बदलता रहता है और हम हर दौर में उन्हें अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं.
कहते हैं कि सपने हमारी अधूरी इच्छाओं को भी प्रतिबिंबित करते हैं.
फिर ऐसा पड़ाव भी आता है जब हम प्रौढ़ या कहें मैच्योर हो जाते हैं.
यानी सपनों की चीरफाड़ कर सकनेवाले.
लेकिन कोई दावे से नहीं कह सकता कि इस उम्र में सपने नहीं होते. वो तो होते हैं और उन्हें हम अपने जीते जी पूरा भले न कर पाएं - हम उन्हें सजा देते हैं - आनेवाली पीढ़ी की आंखों में --
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"मेरा नाम सृजित है. मेरा सपना था कि मैं एक बड़ा आदमी बनूं- जैसे कि पायलट, सायंटिस्ट या चित्रकार. असल में मेरे सायंस और ड्रॉइंग में अच्छे नम्बर आते थे. 12th में पता नहीं क्यों मेरे अच्छे नम्बर नहीं आए और कुछ बैड लक ऐसा रहा कि मेरा कोई सपना पूरा नहीं हो पाया.
आज मैं यहां दिल्ली में एक इंश्योरेंस एड्वाइज़र हूं यानी आप समझ लीजिये कि मेरी लाइन ही चेंज हो गयी. मेरा जो बचपन का सपना था वो तो अब मिट गया है.
मैं आज ज़्यादा प्रैक्टिकली सोचता हूं और अब जो मेरा सपना है मतलब अब जो मैं चाहता हूं वो ये कि मैं लाइफ़ को ठीक से फ़ेस करूं; कुछ पैसा कमाऊं. मेरी कुछ कमियां रही होंगी ज़रूर ही...लेकिन मुझे लगता है कि मुझमें कुछ अच्छाइयां भी हैं - अब उन्हीं अच्छाइयों को पहचानने में लगा हूं...और अब मैं कुछ स्पिरिचुअल भी हो रहा हूं."

ये शब्द हैं सत्ताइस वर्षीय सृजित के...जो उसने मुझसे कल रात कहे.

शायद इन शब्दों में आपको भी अपनी आवाज़ सुनाई दे -
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"ज़िंदगी में कोई दो ही मौक़े दुख से भरे होते हैं -
.....एक है इच्छाओं का पूर्ण हो जाना और
.....दूसरा इच्छाओं का अपूर्ण रहना."

ऐसा कहते हैं जॉर्ज बर्नाड शॉ .

सपनों को इच्छाओं का पर्यायवाची मान लें तो बर्नाड शॊ ने बड़ी असमंजस की स्थिति खड़ी कर दी है.

शायद इसी लिये एक जनाब का कहना है कि जिसे हम सपना कहते हैं उसे हमें जीवन के एक लक्ष्य के रूप में देखना चाहिये और जैसे ही ये लक्ष्य, ये मक़सद तय कर लिया जाएगा-- इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा कि वह पूरा हुआ या नहीं - उसको पूरा करने की कोशिश में लगे रहना, उसके लिये चलते रहना ही असली आनंद है...तो चलिये...चलते रहिये.
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6 comments:

मीनाक्षी said...

जब दर्द बिन झरोके की चारदीवारी में कैद कर लेता है तो मन तड़पता भटकता हुआ आपके ब्लॉग पर आकर कुछ देर के लिए सुकून पाता है.
मधुर गीत मन को सहारा देते हैं.
धन्यवाद

Mired Mirage said...

सबकुछ बहुत दिलचस्प लगा ।
घुघूती बासूती

Pratyaksha said...

रैंडम थॉट्स ! अच्छा लगा पढ़कर ।

vimal verma said...

कितना अच्छा ख्वाब देख लेते हैं पर आपका अन्दाज़े बयां क्या कहने !! साथी लिखते रहें, अच्छा लग रहा है.

yunus said...

इरफान भाई अच्‍छा लगा । रेडियो के सबसे पुराने और सिद्ध फारमेट को ब्‍लॉग जगत में इंट्रोड्यूस किया आपने । कहीं छायागीत के नाम पर कहीं बेला के फूल के नाम पर और कहीं गीतों भरी कहानी के नाम पर ये परंपरा जारी थी । या है भी । पर यहां इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए खुशी होगी । हम बच्‍चन की अदा में कह रहे हैं । और और ही रटन लगाता जाता है हर पीने वाला । समझ रहे हैं ना

अभय तिवारी said...

भाई माफ़ करना इसे फ़ुरसत मिलने पर आज देख सुन रहा हूँ.. वैसे इसे काम करते करते रेडियो पर आप की आवाज़ में सुनने का लुत्फ़ कुछ और ही होता.. बातें सब गहरी भावुक हैं.. क्या करें.. टूटी हुई बिखरी हुई.. !!