दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Saturday, May 26, 2007

बीस साल बाद

एक लड्का बग़ल में थैला लटकाये अपनी साइकिल पर किसी अनजानी मंज़िल की तरफ़ बढ रहा है. थैले में एक स्केच बुक भी है.वो थोडी देर में एक चाय की दुकान पर, सड्क के किनारे, किसी घास के टुकडे पर बैठ जायेगा और दिखाई देने वाली सच्चाइयों से अलग कुछ मन की परछाइयों की अक्कासी करेगा.दृश्य बीस साल पुराना है लेकिन जैसे कल की ही बात.आप भी एक नज़र डालें लड्के की स्केच बुक पर, जिसका आज सुपरिचित नाम है-अज़दक. नादानों नें जिसे किसी स्कूल का हेड्मास्टर कह कर जिसकी चिर युवा अवलोकन दृष्टि पर सवाल उठाया, ये उनके लिये भी है.

चेहरे अनाम



हुसेन के एक कोलाज से टुकडा



नाटक से बाहर कुछ क्षण



कुछ पकडी कुछ छूटी रेखायें



किसी एक गांव का नाम लो



दारागंज से फ़ैशन बाज़ार का फ़ासला



चेहरों की पहचानी लकीरें



तमस:एक अंधे कुएं का नाम



बदचेहरों का समाज



शब्द,रंग,नाम,शोर...प्रैक्टिकैलिटी..यहां से देखो



कुछ अपनी,कुछ जग की




ख़ूबसूरत लड्की की ज़िन्दगी का अस्पताल



तिशू: क्या, हासिल?



शहर का एक परित्यक्त कोना

6 comments:

विकास कुमार said...

तसवीरें मूक होकर भी कितना कुछ कह जाती हैं

बजार वाला said...

skeches publish karne ke liye bahut shukriya. badi tamanna thi inhe dekhne ki , abhi tak bas suna tha.. aage bhi ye jaari rahega , iski ummeed hai..

Vijendra S. Vij said...

वाह...कितने खूबसूरत स्केचेज है..क्या अजद्क जी के है..पता नहीँ था कि वह चित्रकार हैँ..वह भी हुसैन साब के समकालीन..क्या मै सही हूँ..सिलसिला जारी रखेँ..

irfan said...

विजेन्द्र जी, आपने स्केचेज़ की तारीफ़ की है. लेकिन इसे स्वीकारेगा कौन? स्केचेज़ अज़दक के हैं यानी प्रमोद भाई के.आपकी तरह हम भी इन्हें देखकर खुश होते है. चित्रकला में रुचि रखने वाला हर कलाकार एक या अनेक मौक़े पर हुसेन से प्रेरित आदि होता है, इसका यह अर्थ क्यों न लगाएं कि हुसेन पीढी दर पीढी हम सब के समकालीन बने चले आ रहे हैं.धन्यवाद.

vimal verma said...

भाई कमाल है इधर अज़दक जी ने २० आगे कॆ सफ़र का समापन ही किया था और आपने उनकी २०साल पहले की छवि दिखा दी. क्या कहने है आपके... आपमे सबसे गज़ब बात है कि इतनी पुरानी चीज़े आपके पास आज भी उतनी ही मह्फ़ूज़ है जितना कि आपके विचार. आपका ब्लोग भी टूटी बिखरी यादो को फिर से जोड्ने का काम करेगा.आपसे यही उम्मीद की जा सकती है. हमारी शुभकामनाए स्वीकार करे.

Vijendra S. Vij said...

सादर प्रणाम करते हुए तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ...वास्तव मे आपने सही कहा...कि इन स्केचेज को स्वीकरेगा कौन..?..
प्रमोद जी के इन चित्रो को देख और मन करता है देखूँ और जानूँ उन्हे...मैने इतने पावरफुल स्ट्रोक्स कभी नही देखे...सिवा
हुसैन साब के..आपसे गुजारिश है कि उनका और भी काम सामने लायेँ..सच ही कहा आपने कि "हुसेन पीढी दर पीढी हम सब
के समकालीन बने चले आ रहे हैं"..
पुन: धन्यवाद के साथ..
आपका-विज