दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Saturday, December 8, 2007

सुनिये विमल भाई से एक कविता और दो गीत

कल मैंने वादा किया था कि आपको विमल भाई से हुई बातचीत सुनवाऊंगा. अभी थोड़ा और इन्तज़ार कीजिये और इस बीच सुनिये उसी पंद्रह-सोलह साल पुरानी रिकार्डिंग से ये गीत.

सिविल लाइंस ,इलाहाबाद. एक चाय की दुकान पर बीस साल पहले ठहरे कुछ ठहाके


मेरा बाप अर्जुन नहीं था...

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समय का पहिया चले रे साथी...

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फूलों के रंग से दिल की क़लम से...

5 comments:

Ashok Pande said...

Fantastic, Irfan! You know what Anna Akhmatova said once:

"So much to do today
Kill memory, kill pain
Turn heart into stone
And yet prepare to live again"

But its a sweet pain that brings along a caravan of nostalgia in your blog. Thanks.

अभय तिवारी said...

विमल भाई को सुनना हमेशा आनन्ददायक होता है..

yunus said...

इरफान भाई इन गीतों को मैंने अपने पास संजो लिया है । वाक़ई आपने इन गीतों को रिकॉर्ड करके संभाल के इतने सालों तक जिंदा रखके जो काम किया है, उसका ऐवज़ हम कभी चुका नहीं पाएंगे । वो क्‍या जज्‍बा था जिसने आपसे इत्‍ता अच्‍छा काम करवाया, मुझे अहसास है कि इतनी पुरानी रिकॉर्डिंग को मौसम की मार से बचाना भी कितना मुष्किल है । मैं आपको सलाम करता हूं सरकार ।

munish said...

vimal bhai ko dilli bulaya jaye aur hame bhi unke deedar ka avsar mile to kya baat ho, baharhaal apki blogdharmi rachnasheelta yun hi parvaan chadhti rahe aise meri shubhkaamna hai.

parul k said...

मेरा बाप अर्जुन नहीं था...vimal jii kii avaaz me adbhut lagii....sunvaane ka bahut shukriya