दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Monday, January 7, 2008

द ग्रेट हिमालयन ब्लॉगर्स मीट


सत्रह ब्लॉगरों के सत्ताइस दुखडे सुनने-पढने के बाद यह बात आपको भले ही अच्छी न लगे कि तीन ब्लॉगर तेरह दुखडे भी न रो सके। लेकिन यह हुआ साल के आग़ाज़ के साथ, और कल ही वो यादगार ब्लॉगर मीट ख़त्म हुई है जो पिछले पाँच दिनों से चल रही थी। इसमें अशोक पांडे, मुनीश और मेरे अलावा चौथा ब्लॉगर हिमालय था. अशोक पांडे के दो पुराने दोस्त अपने बाल-बच्चों के साथ थे. दोनों कमांडर हैं : एक मिसाइल विशेषज्ञ है एक ध्वनि तरंगों पर काम करता है. और साथ थे मनोज भट्ट, जो हल्द्वानी में कम्प्य़ूटर का छोटा मोटा काम करते हैं और एक निवेदन पर मदद करने को आतुर और तत्पर रहते हैं.
उत्तरांचल की हरी-भरी वादियों में यह मिलन नये साल और दोस्ती की नई रस्में सेलीब्रेट करने का भी था. कोई कह नहीं सकता था कि यहाँ जुटे लोग एक दूसरे से पहली बार भी मिल रहे थे. समुद्र तल से कोई दो हज़ार मीटर ऊपर बने आशीष के सोनापानी रिसॉर्ट में सुविधाओं की तारीफ करने से ज़्यादा ज़रूरी यह पाया गया कि इन पाँच दिनों की पाँच रातों को जीने में सदियों के रंग घोल दिये जाएँ .
सुनसान वादी के गुलज़ार माहौल में एक हज़ार एक क़िस्सों से भरी ये ब्लॉगर मीट अपनी कुछ अविस्मरणीय यादें छोड गई. इसमें तारों से भरे आसमान के नीचे रात भर जलते अलाव हैं और रवींद्र संगीत के शाना-ब-शाना मीर-ग़ालिब और सस्तों के शेर हैं। शिवॉस रीगल रॉयल सैल्यूट की चुस्कियाँ और छोटी बडी बोतलों के ख़ाली कार्टन। और अशोक पांडे का कहना कि अपन की ओल्ड मांक अब भी सबसे शानदार. सेब, संतरो, आडुओं और माल्टों के बाग़ हैं. सुबह की चटख़ धूप में सामने खडा आवाज़ लगाता हिमालय और कान लगाए चीड, बाँझ और बुराँस के पेड हैं. एक पगडंडी है जिस पर रुक-रुक कर चलते टट्टू और सिर पर सूखी लकडियों के गठ्ठर उठाए ठिठकी औरतें हैं. ज़माने की नासाज़ियाँ और उन पर कभी हँसने और कभी गहरी फ़िक्रों की छापें हैं. लोग हैं जो अपनी ग़ैरमौजूदगी में भी हँसते-बोलते नज़र आते हैं. साधू और शैतान हैं जो अपने एकाकीपन में वक़्त की कभी वैसी भी पहचान देते हैं जैसी नानी-दादियों की कहानियों में होती थी. सने हुए नीबुओं के चटख़ारे और सतरंगी अचार हैं. नेरूदा, शिंबोर्स्का और हिटलर भी हैं. पनडुब्बियां हैं और उनमें काम करते फौजी हैं, जिन्हें इसलिये ख़ामोश बैठे रहना है ताकि वो ऑक्सीजन की खपत के ज़िम्मेदार न बनें. मान-अपमान की कहानियाँ और उन पर नवेली राय है. माल्टों की गेंद से खेलते बच्चे और पहाडी कुतिया से इश्क़ लडाता एक शहरी कुत्ता भी है. औरतें इस कडाके की सर्दी में इस बात से खुश हैं कि चलो अच्छा है दिल्ली की सर्दी में घरेलू कामों से आज़ादी है. और दूर बैठे आशीष अरोडा हैं जो हर पल यह ख़बर रख रहे हैं कि हमें कोई दिक़्क़त न हो. उदय प्रकाश, आलोकधन्वा और वीरेन डंगवाल के फ़ोन हैं जिन्हें इस पहाडी निस्तब्धता में बहुत साफ सुना जा सकता है. एक क्रिकेट मैच है जो घाटी में किन्हीं दो टीमों के बीच चल रहा है और लाउडस्पीकरों पर होने वाली कमेंटरी भी. अनजानी मंज़िलों की खडी चढाइयाँ हैं और गहरी खाइयों के बीच नमी में नहाए जंगली पौधे. अनदेखी चिडियाँ हैं और भालू के पंजे भी. पर्वतारोहण के लोमहर्षक क़िस्सों के बीच अशोक पांडे और उनकी ऑस्ट्रियाई पत्नी सबीने भी. इसमें मनोज भट्ट के पिता भी हैं जो गीज़र के पानी से नहाने के बजाय घर के बाहर आग जलाकर अपना पानी गरम करते हैं. फिर गप्पें हैं ...और सबसे ज़्यादा ज़िक्र अशोक पांडे की मेहमाननवाज़ी का क्यों किया जाना चाहिये.



चढाई से ठीक पहले



गहन दार्शनिक चर्चा में मशग़ूल मुनीश और अशोक पांडे




गहन दार्शनिक चर्चा जो ख़त्म ही नहीं होती


रानीखेत क्लब में एक ऐतिहासिक हस्ती बहादुर सिंह के साथ अशोक पांडे



रानीखेत का ऐतिहासिक होम फार्म



लौटते हुए नैनीताल


सोनापानी की एक नर्म धूप और मुनीश



माल्टे और मुनीश



सोनापानी के अपने कॉटेज के सामने मुनीश



इरफ़ान और मनोज भट्ट



इरफ़ान के पीछे गहरी घाटियाँ



सोनापानी के पीछे का हिस्सा



सोनापानी के कॉटेज



सोनापानी पुकारता है



हिमालय पर बादलों के छँटने का इंतज़ार



चाय की चुस्की के बीच हिमालय की चोटियाँ



जहाँ चार यार मिल जाएँ



रानीखेत क्लब में डेढ सौ साल पुराना फायर प्लेस



लौटते हुए पिलाट्टिक के शहर नैनीताल में मनोज भट्ट



जन्मदिन पर केक भी




...और एक वीडियो झलक अशोक पांडे के दार्शनिक अंदाज़ की

21 comments:

आशीष महर्षि said...

शानदार, आप लोगों के साथ हिमालय भी घूम लिया

अजित वडनेरकर said...

दिलकश , मनोरम तस्वीरें। हाय, हम न हुए। बाकी जो कुछ सायास आपके वृतांत से छूटा हुआ लग रहा है वो सब श्री अशोक पांडे से फुनियाते हुए जाना जा चुका है और वो भी दिलचस्प था। अशोक जी की राय से मै भी इत्तेफाक रखता हूं कि ओल्डमोंक बेस्ट है।
बढ़िया लगा। साधुवाद साधुवाद ....

मिहिरभोज said...

जो भी है बाकी आप ने हमें खूब जलाया है इरफान भाई ,

Kakesh said...

galat bat hai jee.aap hamare ghar bhee ghoom aaye aur bataya bhee nahee. chaliye agli bar sahee.

bhupen said...

इरफान भाई जलन हो रही है आप लोगों से.

parul k said...

दार्शनिक चर्चा मे पीछे फ़र्न के पेड़ बहुत सुंदर आये हैं…बाक़ी चित्र भी मनभावन हैं

Ashok Pande said...

बुजुर्ग, कुंवारे जामुनी बगू़ले की चोंच में दबी सलाइयां और उन पर बिना जा रहा गु़लाबी मोज़ा कहां गया इरफ़ान ... बहूत नाइन्साफी है कालिया!!!

Pramod Singh said...

ओहो, ओल्‍ड मॉंक्‍स!

महेंद्र मिश्रा said...

बहुत सुंदर अपने सचित्र ओर अच्छे ढंग से अपने कलम से रेखांकित किया है साधुवाद

Sanjeet Tripathi said...

शानदार!!

रश्क हो रहा है मुझे आप लोगों से!!

swapandarshi said...

आपका धन्यवाद, नैनिताल और सोना-पानी की याद ताज़ा करने के लिये.
कभी सोना पानी मे चाय के बगान भी हुया करते थे. अब पता नही क्य बचा है?

Amit said...

खूब मजे किए, ब्लॉगर मीट की ब्लॉगर मीट!! ;)

जगह का नाम तो मैंने भी सुना है, लगाएँगे कभी चक्क्कर। :)

Lavanyam - Antarman said...

What majestic viewing of the Mighty Himalayas ---

vimal verma said...

भाई वाह हिमालय पर ब्लॉगर मीट खूब मज़ा लिया आप लोगों ने तस्वीर से भी बयां हो रहा है कि आपलोगों खूब मज़े उड़ाए होंगे ज़रा ये भी बताइयेगा कि किन किन मुदों पर वहां बात हुई,एक बार फिर कि तस्वीरे बहुत अच्छी लग रही है, अफ़सोस है कि ऐसी वादियों में मै नही था ।

munish said...

agar tum mujhe bata dete ki tum ye fotuen blog pe daloge to main 8megapixel nikon le chalta chunki isme video jerky hai zara aur jacket bhi main dhang ki le chalta chunki isme main kafi mota sa dikh raha hoon aur ye blog to ladkiyen bhi kafi dekhti bataven irfan bhai!!shukar hai Rushali,Ketki aur Ranjana ka kissa tum kha gaye varna mushkil ho jati dadda.

Ashok Pande said...

मुनीष बाबू, कहकशां का नाम आपने रुशाली लिख दिया ... हद है. मोटा दिखने की फ़िक़्र से बैटर है आप अपनी याददाश्त चैक कराएं. बड़े अफ़सोस की बात है. जामुनी बग़ूले की बांई कांख के नीचे तीसरी पसली के कोने पर उगे इकलौते सफ़ेद रोएं को सांप के दांए कान के नीचे की खाल के साथ बांध कर दोनों घुटनों पर बारी बारी पहनें ... पहाड़ी इलाज है और कारगर भी. जय बोर्ची.

munish said...

kya hai ke bhai sab pehli dafa chivas regal pi to ek aadh naam ho jata hai idhar-udhar or vaise bhi vo shayad apke(.maf karna ye bhi bhool ho sakti hai chunki main kuch suroor me tha.)ya irfan ke sath Apricot jam banana seekh rahi thi.mail vagaira ki kya usne?

Anonymous said...

nirash kiya ap logo ne. kya ap vahan jam, achar, chatni aur wine making ka course karane gaye the? hindi ka lekhak chahe blogger ho jaye ya kuch aur vo sura sundari, achar, badi, pappad se nahi ubar sakta.

munish said...

कुत्ते का कुत्ता बैरी,और लेखक का आलोचक /
हे नामवर के टट्टू अनाम, टिप्पणी करी है रोचक !!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मेरा तो सपना है, काश कभी पूरा हो!

Arvind Mishra said...

वाह क्या खूब !