दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Wednesday, January 16, 2008

...कौन सी दुनिया इंतज़ार कर रही है, उन दरवाज़ों के उस तरफ़ जिन्हें मैं कभी खोल नहीं पाया...

"कुछ नहीं, आज एक अजीब सी बात याद आई...मेरा स्कूल नदी के उस पार था. रोज़ एक छोटी सी नाव में उस पार जाना पडता था.जो नाव चलाता था उससे मेरी अच्छी दोस्ती थी. एक दिन हम नाव में स्कूल जा रहे थे, तभी हमने देखा कि मल्लाह नाव चलाने के बजाय अपने डंडे से एक चिडिया को उडा रहा है, पर चिडिया बार-बार उडकर वापस वहीं बैठ जाती है. मल्लाह का ग़ुस्सा बढता जा रहा था.हम सब डर गये क्यों कि नाव बुरी तरह हिल रही थी. मैंने कहा "अरे क्या कर रहे हो? नाव डुबोओगे क्या?" तो उसने कहा "अरे साहब इसे मुफ्त में नदी पार करने की आदत पड गई है." हम सब हँस दिये. इसके काफ़ी दिनों बाद हमने देखा, मल्लाह और चिडिया एक दूसरे से मुँह फेरकर बैठे हैं, मानो एक दूसरे से नाराज़ हों. फिर कुछ दिनों बाद देखा कि मल्लाह और चिडिया एक दूसरे से बात कर रहे हैं...मल्लाह लगातार कभी हँसता है कभी चिल्लाता है. सभी कहने लगे ये पागल हो गया है.मैंने उससे पूछ लिया "क्या कर रहे हो? पागल हो गये हो क्या? एक चिडिया से बात कर रहे हो?" तो वो कहने लगा-"मुझे तो लगता है आप सब लोग पागल हैं. अरे ये तो आप सब से बातें करना चाहती है.आप लोग इससे बात क्यों नहीं करते." हम उसे पागल समझ रहे थे और वो हम सबको. "

ये शब्द हैं उस नाटक के मुख्य पात्र भगवान के, जो भारत रंग महोत्सव, दिल्ली में कल शाम खेला जाएगा और आप में से ज़्यादातर लोग इस अभूतपूर्व नाटक को नहीं देख सकेंगे.नाटक है इल्हाम और इसे लेकर आया है बंबई का एक थियेटर ग्रुप. मानव कौल नाम के युवा अभिनेता और नाटककार की यह रचना कई मायनों में यह हक़ रखती है कि आप इसे देखें और उन बदक़िस्मत लोगों में न गिने जाएँ जिन्हें अपनी तीन-तिकडमों से फुर्सत नहीं मिलती.
हालाँकि दिल्ली का थियेटर सीन पिछ्ले कुछ बरसों से ऐसा नहीं रह गया हि कि कोई नाटक रिकमंड किया जाय. ख़ासकर एनएसडी ने जिस तरह संसाधनों और अपनी प्रिविलेज्ड पोज़ीशन का दुरुपयोग जारी रखा है उससे और भी मन खट्टा होता है.आपमें से जिन कई लोगों ने नाट्य सभागारों से मुँह फेर लिया है उसकी वजह भी यही सुनी जाती है कि स्कूल के नाटक संस्कृत और अंग्रेज़ी नाटकों के हज़ार बार फचीटे हुए एडैप्टेशंस हैं और उनमें समय के प्रश्न नहीं उठाए जाते.ये लोग जब इन बासी क्लासिकी प्रस्तुतियों से थक जाते हैं तो मदारी के करतब और गिमिक शुरू कर देते हैं. इस माहौल में इल्हाम एक बिल्कुल नई- समय के प्रश्नों और अद्यतन संवेदनाओं से पगी प्रस्तुति है.
यह एक मध्यवय के बैंक कर्मचारी की कहानी है. इसका नाम है-भगवान. भगवान उम्र के इस पडाव पर अपने होने के सवालों से जूझ रहा है. उसके इर्द-गिर्द मौजूद दुनिया, अपनी ही रफ़्तार में चली जा रही है जबकि उसे लगने लगता है कि वह उस रफ्तार में और अधिक अकेला होता जा रहा है.
"भीतर पानी साफ था...साफ़ ठंडा पानी...कुएँ की तरह. जब हम पैदा हुए थे...जैसे-जैसे हम बडे होते गये...हमने अपने कुएँ में खिलौने फेंके,शब्द फेंके, किताबें, लोगों की अपेक्षाओं जैसे भारी पत्थर और इंसान जैसा जीने के ढेरों खाँचे...और अब जब हमारे कुएँ में पानी की जगह नहीं बची है तो हम कहते हैं ये तो सामान्य बात है."
इस तरह भगवान सामान्य हो चली चीज़ों पर संदेह और यूँ होता तो क्या होता की एक सतत क़वायद में है. वह अपने बैंक में पेंशन लेने आनेवाली एक बूढी औरत को हर बार पाँच सौ रुपये ज़्यादा दे देता है क्योंकि उसने उसकी आह सुनी है. कहानी में हम भगवान को अक्सर देर से घर लौटते देखते हैं और बताया जाता है कि वह आजकल बैंक के पास ही एक पार्क में बैठता है, जहाँ बहुत से बच्चों को वो कहानियाँ सुनाता है, एक चाचा से बातें करता है और रोने जैसी धुनों पर नाचता है. इधर कई दिनों से वो घर नहीं लौटा है क्योंकि उसे डर है-
"...तृप्ति का डर...हाँ तृप्त हो जाने का डर...पापा कह रहे थे कि वो तृप्त हैं.जिस तृप्ति में सारी वजहें,इच्छाएँ ख़त्म हो जाती हैं.वो कह रहे थे -कोई भी वजह नहीं बची है...सिवाय एक वजह के कि मुझे वापस घर आना है...रोज़..."
भगवान अपने इर्द-गिर्द की ख़ूबसूरती पर भी हैरान है-
"...पर हम क्या करेंगे इतनी ख़ूबसूरती का...मैं कभी-कभी अपना सबसे ख़ूबसूरत सपना याद करता हूँ...मेरा सबसे ख़ूबसूरत सपना भी कभी बहुत ख़ूबसूरत नहीं था.मेरे सपने भी थोडी सी ख़ुशी में, बहुत सारे सुख चुगने जैसे हैं. जैसे कोई चिडिया अपना खाना चुगती है...पर जब उसे पूरी रोटी मिलती है तो भी वह उस पूरी रोटी को नहीं खाती...वो उस रोटी में से रोटी चुग रही होती है. बहुत बडे आकाश में हम अपने हिस्से का आकाश चुग लेते हैं...देखने के लिये हम बडा खूबसूरत आसमान देख सकते हैं पर जीने के लिये हम उतना ही आकाश जी पाएँगे जितने आकाश को हमने अपनी खिडकी से जीना सीखा है."
बदलते दौर में ये सब बातें तेज़ी से पागलपन की निशानी मानी जाने लगी हैं. अगर आप 'तृप्ति प्राप्त करने की होड' से बाहर हैं तो आपको विमहैंस का दरवाज़ा दिखाया जाएगा.

नाटक में कुमुद मिश्रा भगवान की भूमिका बडी ही सूझबूझ से निभा रहे हैं जबकि हर अभिनेता अपनी ख़ास उपस्थिति दर्ज कराता है. सेट्स बहुत सादा हैं और इसके सभी नाटकीय तत्व कथ्य को गरिमा देते हैं. जब तक मानव कौल जैसे लेखक-निर्देशक हैं तब तक हम जैसे लोग नाटक से निराश हो-होकर वापस आएँगे.
एक बेहद असहज करने वाला यह सर्वथा प्रासंगिक नाटक कल शाम देखा जा रहा होगा.

इल्हाम
एनएसडी का भारत रंग महोत्सव
17 जनवरी 2008
स्थान: बहुमुख, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भगवानदास रोड, मंडी हाउस, नई दिल्ली (मेट्रो स्टेशन भी है)
शाम: छः बजे

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...कौन सी दुनिया इंतज़ार कर रही है
उन दरवाज़ों के उस तरफ़ जिन्हें
मैं
कभी खोल नहीं पाया...
तभी
मैंने एक अजीब सी चीज़ देखी
मैंने देखा मेरे माथे पर कुछ रेखाएँ बढ गयी हैं..अचानक...
अब ये रेखाएँ क्या हैं...क्या इनकी भी कोई नियति है अपने दरवाज़े हैं?...
नहीं...इनका कुछ भी नहीं है ये मौन की रेखाएँ हैं
मौन उन रेखाओं का जो मेरे हाथों में उभरी थीं
पर
मैं उनके दरवाज़े कभी खोल ही नहीं पाया
सच ...मैने देखा है जब भी कोई रेखा मेरे हाथों से ग़ायब हुई है
मैने
उसका मौन अपने माथे पर महसूस किया है.
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-नाटक "इल्हाम "से

12 comments:

मीनाक्षी said...

नाटकों के बारे में पढ़ कर याद आ गया जब मम्मी डैडी मावलंकर हॉल अलग अलग राज्यों से आए चुने हुए नाटक देखने जाया करते थे और मुझे बहन और भाई की बेबी सिटिंग करनी पड़ती थी.

अभय तिवारी said...

प्रिय मानव को मेरी अनेको शुभकामनाएं..

Parul said...

मैने देखा है जब भी कोई रेखा मेरे हाथों से ग़ायब हुई है
मैने उसका मौन अपने माथे पर महसूस किया है.

panktiyaan acchi lagiin..natak bhi accha hogaa ..kash hum bhi dekh paatey....

vimal verma said...

जिस तरह आपने मुखड़ा लिखा है पढकर लगता है नाटक अच्छा ही होगा,भाई हमारी तरफ़ से मानव कौल को शुभकामनाएं दीजियेगा,

munish said...

ye ek abhootpoorva natak hai yaaro. shabon me irfaan ne achchi koshish ki hai magar asal anubhav dekh ke hi ho sakta hai. hai ap is se vanchit hain aur shok mujhe hai. kaash ap log dekh paate! ho sakta hai ye kisi videshi naatak se inspired ho magar gazab hai sahab!!

आशीष said...

....aap sab log kaash main dekh pata/pati jaisa kyon keh rahe hain......aap mein so log dilli mein hain woh kal 2.30 baje waala show dekh sakte hain.
.....umeed hai yeh natak META awards ke liye bhi nominate hoga (Mahindra excellence in theatre awards)....agar hua, to march 1st week mein phir dobara aayenge, dilli.

Mumbai waasi iske 7 shows dekh chuke hain or aage bhi umeed hai shows honge prithvi theatr mien.

aap mein se agar koi pehal kare to hum hindustan ke kissee bhi shahar mein 'ilhaam' ko laane ke liye taiyaar hain.
ashish


ashish

इरफ़ान said...

आशीष जी,
अगर मुनीश को छोड दें तो शेष सभी अलग राज्यो/देशों के हैं. शायद इसीलिये काश की बात हो रही है...

विकास कुमार said...

ये नाटक मेरा देखा हुआ है. ’कुमुद मिश्रा’ का अभिनय अद्भुत है. पूरी स्क्रिप्ट इतनी सशक्त है कि मजा आ जाता है. पूरे नाटक के दौरान तनिक भी हिलने की इच्छा नहीं होती. एक एक संवाद छूता है.

मानव कौल के दो नाटक देखे हैं मैने : ’इलहाम’ और ’शक्कर के पाँच दाने’ (दो बार देखी है)! दोनों मे इतनी सुंदर हिन्दी का प्रयोग हुआ है कि हिन्दी प्रेमियों के लिये नाच उठने जैसी बात है.

बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन यदा कदा नाटक देखता रहा हूँ, और जितना रोमांच मुझे इस नाटक को देखने में हुआ वो कभी महसूस नहीं कर पाया. मुझे लगता है कि यह नाटक इस काल के सर्वोत्तम नाटकों में जगह पाने योग्य है. मुम्बई में कभी आये तो मैं फिर से देखने का इच्छुक हूँ.

विकास कुमार said...

"जब तक मानव कौल जैसे लेखक-निर्देशक हैं तब तक हम जैसे लोग नाटक से निराश हो-होकर वापस आएँगे."

कहीं ’ना’ छूट तो नहीं गया...?

विकास कुमार said...
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इरफ़ान said...

प्रिय विकास आप ने ग़लती की तरफ़ मेरा ध्यानाकर्षित किया आभारी हूँ. मैं कहना ये चाह रहा था कि "नाटक की ओर वापस आएँगे" लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है, आप उसे "घर की ओर वापस आएँगे" पढ रहे हैं तो आप ही संप्रेषण की इस उल्झन की तरफ उँगली उठा सकते थे.

Manav said...

hi, main manav,i read the comment's..thanx irfan bhai..aap se shri ram center main mulakaat hui the..par aap ke saath ek poora din guzaarne ki aasha rakta hoon..
vikas,parul,manish,vimal thank you very much.. manav