दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Sunday, December 9, 2007

सुनहरी यादों का क़ाफ़िला: एक रंगकर्मी के रिफ़्लैक्शंस

इंटरव्यू को फ़ाइनली जारी करने से पहले मेरा फ़र्ज़ था कि विमलजी को उसे सुनवा देता ताकि इतने दिनों बाद सेकंड थॉट में कुछ बातों को अप्रासंगिक या संदर्भच्युत होने के कारण हटा देना चाहें. सो मैंने उन्हें भेज दिया. इन दिनों वो अपने घरेलू मोर्चों पर व्यस्त हैं इसलिये इस इंटरव्यू को सुनने का वक़्त मुश्किल से निकाल पाए.
रात उनका जो जवाब आया उसे यहाँ पेश कर रहा हूँ. ताकि बुनियादी तौर पर आदमी की पहचान हो सके. वो जैसे कल थे वैसी ही बिंदास मस्ती में उन्होंने इस पॉड्कास्ट को अप्रूव कर दिया है, यह कहते हुए कि यह विमल की विमल से मुलाकात है.

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भाई इरफ़ान,
अच्छा लग रहा है इसी बहाने पुराने दिन याद आ रहे हैं, मैने ऑडियो सुना सुखद है कि आपने इन सारी चीज़ों को बड़ा सम्हाल के रखा हुआ है,पर जो पोस्ट हो रहा है पता नहीं लोगों की कितनी दिलचस्पी है इन बातों में? क्योकि जिस विमल टुमरी वाले की आप बात कर रहे हैं, वो कोई असाधारण कार्य तो नहीं ही कर रहे हैं... और जो उन्होने पिछली ज़िन्दगी जी है..... उसका कुछ ज़्यादा महिमामंडन तो नही हो रहा ? फिर भी आपको लग रहा है चीज़ें सामने आनी चाहिये तो भला मैं कैसे एतराज़ कर सकता हूं.....
-विमल
पुनश्च : और एक बात तो रह गई....... कल रात मैने सुना जो पन्द्रह साल पहले विमल ने कहा था, इन पन्द्र्ह साल पुरानी बातों को सुनकर लगा आज जो विमल है आपके ठुमरी वाले वो इस विमल से एकदम अलहदा हैं, अरे इरफ़ान बहुत से शब्द भी ऐसे थे जिनका इस्तेमाल आज तो मैं करता ही नहीं हूं,
पर पन्द्रह साल पुराने विमल से सामना कराने के लिये वाकई आपका धन्यवाद जिसकी बहुत सी बातें तो ऐसी लग रही थी कि जैसे मै उन्हें पहली बार सुन रहा था विमल की विमल से मुलाकात के लिये शुक्रिया !!




ये एक रंगकर्मी है, जिसने अपनी ज़िंदगी के सबसे ज़्यादा ऊर्जावान वर्षों को एक ख़ास सरगर्मी के बीच गुज़ारा. कहने को इस सरगर्मी का नाम रंगकर्म था लेकिन अगर वो सिर्फ रंगकर्म होता तो बताने को इतनी बातें और सुलझाने को इतने सवाल न होते. ये एक मुकम्मल ज़िंदगी थी और जो समाज के ज्वलंत सवालों से मुँह न मोडती थी. अंग्रेज़ी के शब्द cultural squad की ध्वनि देता हुआ एक ग्रुप, जिसका नाम दस्ता था - लंबे समय तक ख़ास तौर पर उत्तर प्रदेश और आम तौर पर समूचे हिंदी भाषी इलाक़े की धडकन बना रहा. नुक्कड नाटकों और गीतों के अलावा पोस्टर प्रदर्शनियाँ, प्रकाशन और पठन-पाठन के विभिन्न सत्र इसके समूचे क्रियाकलाप का अभिन्न हिस्सा थे. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और इसके सभी कॉलेज इसकी गतिविधियों का केंद्र थे.
फिल्म-क्लब, प्रयाग संगीत समिति में होने वाले नाटकों के आयोजन और साहित्यिक जमावडों से इस ग्रुप की अनुपस्थिति प्राय: अकल्पनीय थी.इस तरह कोई भी सांस्कृतिक हलचल दस्ता की धमक से अछूती नहीं थी. इसमें कच्चे-पक्के सैद्धांतिक सवालों से लेकर एक युवावस्था की हुर्र-फुर्र और इश्क-मुश्क सब शामिल था. बीच-बीच में ऐसे मौक़े भी आते जब ग्रुप का अस्तित्व ही संकट में पड जाता. एक सक्रिय छात्र आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन की राजनीतिक हलचलें ऐसे में इसे एक नया जीवन देतीं.
सब स्टूडेंट्स थे और ये सभी लोग अलग-अलग सांस्कृतिक-सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से आते थे. मन को तरंगित करने और अपनी-अपनी भूमिकाओं से संतुष्टि के अलावा एक चीज़ जो अक्सर छूट जाया करती थी और जो चीज़ हज़ार आश्वस्तियों पर भारी होकर सामने आ खडी होती थी वो थी भविष्य की चिंता. अनेक प्रेम प्रसंगों और प्यार निभाने के तमाम वादों ने, भविष्य की इन्हीं अनसुलझी लटों में लिपटकर दम तोडा ही. साथ ही उनके उस प्यार को भी चौराहे पर ला खडा किया, जो सिर्फ़ थियेटर को अपना पहला और आख़िरी प्यार मानते थे. दूरगामी योजनाओं को अमली जामा पहनाने और काम को सस्टेनेबल बल्कि सेल्फ सस्टेनेबल एक्सरसाइज़ बनाने के भी कई कॉम्बीनेशन पर्म्यूटेशन आज़माए जाते लेकिन व्याहवारिक सवालों की सख़्त ज़मीन पर उन्हें देर तक सहारा न मिलता. शायद ऑब्ज़र्वर्स इस बात पर सहमत होंगे कि जितना समय भी यह प्रयोग चला उसमें इस ग्रुप की अपार सहनशीलता, ज़िद और तरुणाई का रोमैंटिसिज़्म प्रमुख तत्व रहे. जब तक संभव बना इस ग्रुप ने अपनी रचनाशीलता और सक्रियता के बल पर एक पूरे दौर को एक अद्भुत रसास्वाद से भरा. इन पंक्तियों के वे पाठक जो इतिहास गवाह है, राजा का बाजा, घेरा, जनता पागल हो गई है, कल भात आयेगा, बकरी, स्पार्टाकस, हत्यारे, इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर वग़ैरह नाटकों और गीतों के दर्शक भर रहे हैं वे भी इस बात को मानेंगे कि उनकी स्मृति में यह सब कुछ एक खुशनुमा याद की तरह अब भी ताज़ा है और यह भी कि उस अनुभव ने उन्हें समृद्ध किया है.
साइकिलों पर सवार कुछ लडके अभी किसी चाय की दुकान पर उतरे हैं. अभी कुछ और का इंतज़ार है. क्यों न चाय का एक दौर चले! आसपास की दुकानोंवाले और राह चलते लोग भी इनकी सूरतों से वाक़िफ़ हैं. एक सुगबुगाहट फैल गयी है कि नाटक होगा. हालाँकि नाटक जैसा कुछ दिख नहीं रहा है. कंधे पर लटके थैलों में क्या है यह किसको मालूम. चाय का दूसरा दौर भी चलता है क्योंकि जिन्हें आना था वो भी आ गये हैं.
तभी एक-एक डफ़ली लेकर उस चौराहे के दोनों तरफ दो लोग बढ चले हैं... सुनो...सुनो...सुनो... अभी थोडी ही देर में आप को यहां एक नाटक दिखाया जायेगा....सुनो...सुनो...सुनो
ये एजी ऑफिस चौराहा है, जहाँ लंच टाइम में इधर-उधर लोग बैठे हैं या टहल रहे हैं..धीरे-धीरे भीड बढने लगती है और थोडी ही देर में दो तीन गीतों के बाद नाटक शुरू हो जाता. एक गोल घेरे के बीच अभिनेता अपनी अपनी भूमिकाओं में...
नुक्कड से लेकर प्रोसीनियम तक वर्षों चले इस सिलसिले की निशानियाँ हम सब के साथ रहेंगी.

शुरुआती दस्ता के सदस्य विमल, अमरेश, उदय, उमेंद्र, प्रमोद और अनिल.

पिछली दो पोस्टों में मैने यहाँ इस ग्रुप के एक चहेते एक्टर विमल की कुछ रिकॉर्डिंग्स आपको सुनवाई थीं जो इस मूल इंटरव्यू का टीज़र थीं. आइये सुनें इस एक ही सिटिंग में हुई बातचीत को दो हिस्सों में.


इलाहाबाद पहुँचकर मुझे जीने का एक मक़सद मिला...



मैं बहुत से लोगों का दोस्त हूँ, मेरा कोई दोस्त नहीं...

Saturday, December 8, 2007

सुनिये विमल भाई से एक कविता और दो गीत

कल मैंने वादा किया था कि आपको विमल भाई से हुई बातचीत सुनवाऊंगा. अभी थोड़ा और इन्तज़ार कीजिये और इस बीच सुनिये उसी पंद्रह-सोलह साल पुरानी रिकार्डिंग से ये गीत.

सिविल लाइंस ,इलाहाबाद. एक चाय की दुकान पर बीस साल पहले ठहरे कुछ ठहाके


मेरा बाप अर्जुन नहीं था...

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समय का पहिया चले रे साथी...

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फूलों के रंग से दिल की क़लम से...

Friday, December 7, 2007

सुनिये एक रंगकर्मी का बयान


ये बयान है एक दौर का. एक दौर जो हर संस्कृतिकर्मी की ज़िंदगी में आता है. आप मुख़ातिब हैं विमल वर्मा से जिन्हें आपमें से ज़्यादातर लोग ठुमरीवाले विमल के रूप में जानते हैं. आपमें से थोडे से लोग उनके बारे ये भी जानते हैं कि उनकी ज़िंदगी के तार आज़मगढ, बलिया, दिल्ली और अब बंबई से जुडे होने के अलावा अपनी सांस्कृतिक सरगर्मियों के ज़माने से समूचे देश से जुडे हुए हैं. भौगोलिक विस्तारों से कहीं अधिक उनकी पहुंच इंसानी दिलों और धडकनों तक है. जो भी उनसे कभी भी, कहीं भी और कितना भी मिला है - उन्हें भूल नहीं सका है. उम्मीद करता हूँ कि यह ख़ासियत उनमें अब भी बरक़रार है. मेरे और उनके रिश्तों की दिलकश यादों पर वक़्त की धूल अभी इतनी भारी नहीं पडी है कि मैं यह पोस्ट जारी करने से पहले इसे भावुकता आदि के ख़तरों से बचाऊँ. ये डर मुझे खाये जाता है कि मैं इस वक़्त उनकी तारीफ़ में जो भी लिख रहा हूं वो कहीं मेरे अहसास की अक्कासी कर भी पा रहा है या नहीं. वक़्त के साथ-साथ हर इंसान समझदार और प्रैक्टिकल बनता जाता है, लेकिन विमल भाई के सिलसिले में वैसा ही मिट्टी का माधो रहना चाहता हूं जैसा कि मैं आज से तेईस साल पहले था जब गर्मियों की एक दोपहर, मेरी मुलाक़ात प्रमोद भाई और विमल भाई से हुई थी. वो वक़्त और वो तजुर्बे मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा हैं और मेरी शानदार नाकामी जैसी कामयाबी की नींव हैं. प्रमोद भाई के साथ गुज़रे वक्त को मैं इस और इस तरह पहले यहां दर्ज कर चुका हूं.
एक मज़ेदार यारबाश आदमी का अगर कोई जीता-जागता नमूना हो सकता है तो वो विमल भाई हैं जो आपको हँसाते-हँसाते रुला देने और अगर आप रो रहे हों तो आपको फौरन एक नयी दुनिया में पहुँचाने का माद्दा रखते हैं. मेरे लिये वो एक समर्थ अभिनेता और संगठक के अलावा एक ऐसे इंसान भी हैं जिसका कोई तीसर नेत्र होता है. लेकिन ठहरिये... कुछ लोग जो इन लाइनों को पढते हुए "हद हो गयी"... "अरे बहुत फेंका अब लपेटो" "अतिरंजना" आदि कह रहे हैं उन्हें मैं पहले एक गाली लिख दूँ - #)ं&()%$$$#@।+!


तो हाँ...विमल भाई का जीवन संघर्षों से भरा है और इसमें न तो उन्हें और न हमें आपको कोई उल्लेखनीय बात लगनी चाहिये. एक बातूनी आदमी, जिसके पास अनुभवों का महासागर है, यही सोच कर यह बातचीत कोई पद्रह साल पहले दिल्ली में तब रिकॉर्ड कर ली गयी थी जब हमारे दोस्त संजय जोशी को अपने एमसीआरसी का एक ऑडियो रिकॉर्डर हाथ लगा था. बातचीत महज़ एक सवाल के इर्द गिर्द थी कि आपकी ज़िंदगी का कोई अधूरा ख्वाब है तो वो क्या है?
बातचीत आपको सुनवाऊंगा लेकिन फिलहाल सुनिये इस बातचीत के आखिरी हिस्से में सुनाए उनके गीतों मेँ से पहला गीत- यह सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के लिखे उन गीतों में से एक है, जिन्हें हमनें आंदोलनों और नाटकों के आगे पीछे ख़ूब गाया.
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यहां मौजूद दोनों फ़ोटो नवीन चंद्र वर्मा ने कोई बीस साल पहले खींचे है‍, नवीन उर्फ़ गुड्डा विमलभाई के छोटे भाई और जानेमाने कैमरामैन हैं. ऊपर बाएं विमल और दाएं प्रमोद. तीसरा मैं तब था जब २३ साल पहले विमल भाई वगैरह से मिला.
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आग लगा दो, आग लगा दो राजाजी के प्याऊ को...

Wednesday, December 5, 2007

ख़्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त


"ख़्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त" नाम की इस पोस्ट में कल आपमें से जिन मित्रों ने यहाँ पाँच गानों तक प्रोग्राम का लुत्फ उठाया था उनके लिये आगे का हिस्सा चाहें तो वहीं पढें.
आप सभी का आभार जो कल यहाँ आए और मीनाक्षी का जो यहाँ सुकून पाती हैं.

Tuesday, December 4, 2007

ख़्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त

घर से स्कूल उन दिनों बहुत दूर लगता था.

चलते-चलते नन्हें-नन्हें पाँव थक जाया करते थे.एक ख़ाब जो मैं अक्सर देखा करता था, वो ये था कि मेरे दोनों हाथों की जगह दो बडे-बडे पंख हैं और मैं उडता-उडता स्कूल पहुँच रहा हूँ.

एक लंबी कभी न ख़त्म होनेवाली पगडंडी मुझे ख़ूबसूरत पहाडों की तरफ़ ले जा रही है.रास्ते में ऊँचे घने पेड हैं, एक झरना वहाँ लगातार गिरता रहता है,चिडियों का एक झुंड अभी-अभी उडा है और एक चंचल हिरन कुलाँचे भरता हुआ सामने से गुज़र गया है. मैं हर रात ऐसे ही एक सपने में - घूमा किया - तब मैं बहुत छोटा था.


सपने में मैं बहुत अकेली होती हूँ और तभी एक जंगली भैंसा मुझे दौडाने लगता है, मैं भागने की कोशिश करती हूँ लेकिन मेरे पैर जैसे कहीं जम जाते हैं, मैं दौड नहीं पाती. Thanks God तभी मेरी आँख खुल जाती है - मैं पसीने से लथपत उठ बैठती हूँ.


मेरे तो exams हो रहे होते हैं और मैं अक्सर लेट पहुँचती हूँ. कभी-कभी ऐसा भी देखा कि पेपर कुछ और था और मैं तैयारी कुछ और करके आई...

बात जब ख़ाबों की शुरू हुई - और वो भी बचपन में आने वाले ख़ाबों की - तो कुछ इसी तरह से दोस्तों ने अपने सपनों को याद किया.


कुछ के लिये तो अब सपनों का ज़िक्र भी एक अटपटा प्रसंग है. यानी वर्तमान में इस तरह उलझा हुआ है मन कि लौटकर जाना और वो भी सपनों में, कठिन तो है ही, अप्रीतिकर भी है.


जो भी हो... ग़ौर किया तो पाया कि हर किसी की ज़िंदगी से जुडे हैं ख़्वाब - कभी रात की नींदों से आते हुए तो कभी दिन के उजालों में बुने जाते हुए.


कोई ख़ाब क्यों आया? उसकी ताबीर क्या है? मन कभी इस पर सोचता है, तो कभी इसके अहसास से घंटों, तो कभी हफ्तों लुत्फ़अंदोज़ होता रहता है.


अच्छा क्या था बुरा क्या? सही क्या था ग़लत क्या? ख़ाबों के नफ़े-नुक़सान की बातें - ये सब उम्र के एक पडाव पर ही तौले जाते हैं या कभी-कभी नहीं भी तौले जाते. बचपन से हम लडकपन में क़दम रखते हैं और फिर जवानी की सीढियाँ चढते हुए आज की ज़बान में कहें तो सीनियर सिटिज़ेन होते हैं - इस तरह ज़िंदगी का एक सफ़र:-

पाने की तमन्ना - पाने की कोशिश और पाए हुए की तफ्तीश करता हुआ अपने मक़ाम पर पहुँचता है.




इतवार का एक और दिन...

बहुत पीछे और बहुत आगे को खँगालने और explore करने का एक और अवकाश
एक मौक़ा ख़ुद से मुख़ातिब होने का...
कुछ लम्हे अपने लिये,


प्रोग्राम है रेडियो रविवार और मैं इरफ़ान
.


मेज़ पर ताश के पत्तों सी सजी है दुनिया
कोई खोने के लिये है कोई पाने के लिये
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बचपन के दिन - मस्ती और बेफ़िक्री के दिन.

हर रोज़ नए ख़ाब पलते हैं, दुनिया की सारी ख़ुशियाँ अपने दामन में समेट लेने का अहद होता है.


क्लासरूम में सबसे पूछा जा रहा था --

I want to become a great poet and writer.
मुँह से बेसाख़्ता निकला था.

मुझे ज़माने की भेडचाल पसंद नहीं. जिसे देखो वही डॉक्टर इंजीनियर, वकील, टीचर...


ठीक !


लेकिन अब सोचता हूँ तो poet and writer ठीक लेकिन ये great poet and writer? बात कुछ हज़म नहीं होती!

"बाप न मारे पेंडुकी बेटा तीरंदाज़" एक फ़िकरा कहीं से उडता हुआ आता है और टनाक से लगता है. सपने संकल्प का रूप लेते हैं.


क्या हुआ? क्या खोया? क्या पाया? - यानी ये सब जोड-गुणा के लिये भी एक उम्र की दरकार थी...और इस उम्र के ये ज़रूरी पडाव थे.

हर शै जैसे बिल्कुल नयी थी और जैसे हमने ही उसे पहली बार देखा था. किसी ने देखा भी था तो ये हमारे सरोकार का वैसा हिस्सा नहीं थी.


यानी ख्वाबों के चिराग़ दिल की परतों के नीचे रौशन हो रहे हों, पलकों पर सजे हर पल नयी रौशनियाँ बिखेर रहे हों या फिर ज़ाहिर होकर एक guiding force की तरह काम कर रहे हों --

हर रंग में और हर हाल में हमें इंसान होने का अहसास कराते हैं.

शायद यही हैं जो हमें थककर बैठने नहीं देते -
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एक ख़्वाब जो बहुत मेरा है, अज आपके साथ share करता हूँ.

इसमें एक बलखाती-मचलती नदी है, सर्दियों की गुनगुनी धूप है और मैं इस नदी की सतह पर पीठ किये लेटा हूँ. नदी जहाँ-जहाँ जा रही है मैं आसमान की तरफ मुँह किये हुए लेटा एक अनजाने सफर पर निकल पडा हूँ.

हक़ीक़त से कोसों दूर. कभी न पूरा हो सकने वाला ख़्वाब.

सवाल ये उठता है कि क्या ख़्वाब इसलिये होते हैं कि उन्हें पूरा होना है?

सवाल ये भी उठता है है कि क्या ख़्वाब देखना आपके बस में होता है? वग़ैरह-वग़ैरह.

सवाल समझदार लोग उठाते हैं. ये शायद उन्हीं की field है. फिर शायर उनसे हँस कर कह देता है -


दो और दो का जोड हमेशा चार कहाँ होता है
सोच समझ वालों को थोडी नादानी दे मौला.
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एक बात जो हमेशा दुहराई जाती है यानी जिसे हमने अभी या कभी ज़रूर सुन रखा है वो ये है कि यथार्थ की कठोर चट्टान से टकरा कर सपने टूट जाते हैं. बात ठीक है लेकिन इस बात का दिलचस्प पहलू ये है कि इसी यथार्थ को खरिज करते हुए, इसके घटाटोप से बाहर आने के किये स्वप्न एक ज़रूरी सामान रहे हैं और रहेंगे.

यथार्थ की एक ऐसी दुनिया में- जहाँ सब कुछ systematic और controlled है -- एक individual अपनी essential subjectivity assert करता है और इस तरह अपेक्षाओं और बने बनाए मानदंडों पर खरा न उतरने से बहिष्कृत कर दिये जाने से बच जाता है. इस तरह पराएपन के अहसास में जीने के बजाय वो अपनी एक निजी दुनिया चुन लेता है. जिसमें कुछ समय के लिये ही सही सुरक्षित और महफूज़ महसूस करता है.


शायद यही वजह है कि हम अक्सर कहीं पर होते हुए भी वहाँ नहीं होते हैं.
बहरहाल हम जहाँ भी होते हैं वहाँ हम वो तलाश कर रहे होते हैं जिसे हम दिल के बहुत नज़दीक पाते हैं.
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योजनाएँ बहुत देर तक बनती रहीं. उनमें से कुछ ज़मीन पर थीं तो कुछ हवा में.


आख़िर कब तक ख़ामोश रहते -- बालकनी में अख़बार से सिर जोड़कर बैठे दादाजी से रहा नहीं गया --

"तुम लोग बातें ज़्यादा करते हो, काम कम. कुछ करो तो समझ में आये कि हाँ कुछ हुआ. और याद रखो वक़्त से पहले और क़िस्मत से ज़्यादा किसी को नहीं मिलता.
"


बात ठीक होगी शायद क्योंकि बाल उन्होंने भी धूप में सफेद नहीं किये. सीख की बातें दे सकते हैं क्योंकि उन्होंने ज़माना देखा है.

लेकिन कोई इनसे पूछे कि यही बात जब आपके दादाजी कहते थे यानी जब आप हमारी उम्र के थे -- तो क्या आपने मानी थी.

ये शायद इंसानी फितरत है कि अनुभवों का एक ज़ख़ीरा उसमें वो आत्मविश्वास भरता है कि ख़ुद से पहले की पीढियों को वो बचकाना और कभी-कभी अहमक़ाना समझने लगती है.
हर चीज़ को, हर इंसान को उसके परिवेश में देखें तो हर बात समझ में आने लगती है लेकिन इस सबके बीच समय का फ़ासला निष्कर्षों को कभी ग़लत ठहराता है तो कभी सवाल छोड जाता है.

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जागती आँखों के ख़ाब एक लाइट हाउस की तरह होते हैं.
हर हार के बाद दिल को हौसला देते हुए. कभी-कभी ऐसा होता है कि हमारी इच्छाएं ही सपनों का रूप धारण कर लेती हैं.

हर इंसान की ज़िंदगी में उसकी युवावस्था उसकी सर्वाधिक ऊर्जा का और ड्राइव का समय होता है.

"अगर अब तक कुछ नहीं किया तो कब करोगे?" पूछा जाता है.
पैरों में एक रफ़्तार, दिल में एक उमंग और सब कुछ पा लेने का, समेट लेने का जज़्बा-

स्वामी विवेकानंद ने कहा -
"इच्छाओं का समुद्र अतृप्त रहता है. ज्यों-ज्यों उसकी मांगें पूरी की जाती हैं, त्यों-त्यों वो गर्जन करता है."
यानी एक बार फिर ज़िंदगी की जद्दोजहद का एक फ़लसफ़ाना निचोड़.

जो भी हो, जब तक दम-ख़म है, हारें क्यों?
बाद में क्या होगा, किसने जाना?
हर इंसान को एक ही जीवन मिला है और इसके सभी जौहर यहीं और इसी जीवन में सामने आने है‍-
सारी कोशिशों का निचोड़ यही है कि ख़ाब मुरझा न जाएं...कहीं रूठ न जाएं.
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जब हम छोटे होते हैं तो सपने देखते हैं
जब हम बड़े होते हैं तो सपने देखते हैं
सपनों का रूप बदलता रहता है और हम हर दौर में उन्हें अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं.
कहते हैं कि सपने हमारी अधूरी इच्छाओं को भी प्रतिबिंबित करते हैं.
फिर ऐसा पड़ाव भी आता है जब हम प्रौढ़ या कहें मैच्योर हो जाते हैं.
यानी सपनों की चीरफाड़ कर सकनेवाले.
लेकिन कोई दावे से नहीं कह सकता कि इस उम्र में सपने नहीं होते. वो तो होते हैं और उन्हें हम अपने जीते जी पूरा भले न कर पाएं - हम उन्हें सजा देते हैं - आनेवाली पीढ़ी की आंखों में --
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"मेरा नाम सृजित है. मेरा सपना था कि मैं एक बड़ा आदमी बनूं- जैसे कि पायलट, सायंटिस्ट या चित्रकार. असल में मेरे सायंस और ड्रॉइंग में अच्छे नम्बर आते थे. 12th में पता नहीं क्यों मेरे अच्छे नम्बर नहीं आए और कुछ बैड लक ऐसा रहा कि मेरा कोई सपना पूरा नहीं हो पाया.
आज मैं यहां दिल्ली में एक इंश्योरेंस एड्वाइज़र हूं यानी आप समझ लीजिये कि मेरी लाइन ही चेंज हो गयी. मेरा जो बचपन का सपना था वो तो अब मिट गया है.
मैं आज ज़्यादा प्रैक्टिकली सोचता हूं और अब जो मेरा सपना है मतलब अब जो मैं चाहता हूं वो ये कि मैं लाइफ़ को ठीक से फ़ेस करूं; कुछ पैसा कमाऊं. मेरी कुछ कमियां रही होंगी ज़रूर ही...लेकिन मुझे लगता है कि मुझमें कुछ अच्छाइयां भी हैं - अब उन्हीं अच्छाइयों को पहचानने में लगा हूं...और अब मैं कुछ स्पिरिचुअल भी हो रहा हूं."

ये शब्द हैं सत्ताइस वर्षीय सृजित के...जो उसने मुझसे कल रात कहे.

शायद इन शब्दों में आपको भी अपनी आवाज़ सुनाई दे -
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"ज़िंदगी में कोई दो ही मौक़े दुख से भरे होते हैं -
.....एक है इच्छाओं का पूर्ण हो जाना और
.....दूसरा इच्छाओं का अपूर्ण रहना."

ऐसा कहते हैं जॉर्ज बर्नाड शॉ .

सपनों को इच्छाओं का पर्यायवाची मान लें तो बर्नाड शॊ ने बड़ी असमंजस की स्थिति खड़ी कर दी है.

शायद इसी लिये एक जनाब का कहना है कि जिसे हम सपना कहते हैं उसे हमें जीवन के एक लक्ष्य के रूप में देखना चाहिये और जैसे ही ये लक्ष्य, ये मक़सद तय कर लिया जाएगा-- इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा कि वह पूरा हुआ या नहीं - उसको पूरा करने की कोशिश में लगे रहना, उसके लिये चलते रहना ही असली आनंद है...तो चलिये...चलते रहिये.
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