भगवान दास 'एजाज़' से एक दोहा सुनिये-
Friday, January 18, 2008
Thursday, January 17, 2008
टिप्पणी भी बताती है आपकी शख़्सीयत
पहलू के संचालक चंद्रभूषण ने एक पोस्ट पर टिप्पणी की है. इसे पढकर मन एक बार फिर इस बात से सहमत हुआ कि-
बोलिये तो तब जब बोलिबै की जानि परै,
नहिं तो मौन गहि चुप ह्वै रहिये.
पोस्ट भले ही वैसी गूढ हो जैसी मार्तिनोव ने प्लेखानोव को सरल बनाने में बना दी थी लेकिन टिप्पणी यहाँ पेश की जाती है-

फिर से जुड़ना एक ख्वाहिश है फकत,
जिससे कि हर बार अपना होना होता है।
बकौल शमशेर (मोर ऑर लेस)-
लौट आ ओ धार
टूट मत ओ दर्द के पत्थर-
हृदय पर
लौट आ ओ फूल की पंखुड़ी
फिर फूल से लग जा...
(-चंद्रभूषण की टिप्पणी)
बोलिये तो तब जब बोलिबै की जानि परै,
नहिं तो मौन गहि चुप ह्वै रहिये.
पोस्ट भले ही वैसी गूढ हो जैसी मार्तिनोव ने प्लेखानोव को सरल बनाने में बना दी थी लेकिन टिप्पणी यहाँ पेश की जाती है-

फिर से जुड़ना एक ख्वाहिश है फकत,
जिससे कि हर बार अपना होना होता है।
बकौल शमशेर (मोर ऑर लेस)-
लौट आ ओ धार
टूट मत ओ दर्द के पत्थर-
हृदय पर
लौट आ ओ फूल की पंखुड़ी
फिर फूल से लग जा...
(-चंद्रभूषण की टिप्पणी)
Wednesday, January 16, 2008
...कौन सी दुनिया इंतज़ार कर रही है, उन दरवाज़ों के उस तरफ़ जिन्हें मैं कभी खोल नहीं पाया...
"कुछ नहीं, आज एक अजीब सी बात याद आई...मेरा स्कूल नदी के उस पार था. रोज़ एक छोटी सी नाव में उस पार जाना पडता था.जो नाव चलाता था उससे मेरी अच्छी दोस्ती थी. एक दिन हम नाव में स्कूल जा रहे थे, तभी हमने देखा कि मल्लाह नाव चलाने के बजाय अपने डंडे से एक चिडिया को उडा रहा है, पर चिडिया बार-बार उडकर वापस वहीं बैठ जाती है. मल्लाह का ग़ुस्सा बढता जा रहा था.हम सब डर गये क्यों कि नाव बुरी तरह हिल रही थी. मैंने कहा "अरे क्या कर रहे हो? नाव डुबोओगे क्या?" तो उसने कहा "अरे साहब इसे मुफ्त में नदी पार करने की आदत पड गई है." हम सब हँस दिये. इसके काफ़ी दिनों बाद हमने देखा, मल्लाह और चिडिया एक दूसरे से मुँह फेरकर बैठे हैं, मानो एक दूसरे से नाराज़ हों. फिर कुछ दिनों बाद देखा कि मल्लाह और चिडिया एक दूसरे से बात कर रहे हैं...मल्लाह लगातार कभी हँसता है कभी चिल्लाता है. सभी कहने लगे ये पागल हो गया है.मैंने उससे पूछ लिया "क्या कर रहे हो? पागल हो गये हो क्या? एक चिडिया से बात कर रहे हो?" तो वो कहने लगा-"मुझे तो लगता है आप सब लोग पागल हैं. अरे ये तो आप सब से बातें करना चाहती है.आप लोग इससे बात क्यों नहीं करते." हम उसे पागल समझ रहे थे और वो हम सबको. "
ये शब्द हैं उस नाटक के मुख्य पात्र भगवान के, जो भारत रंग महोत्सव, दिल्ली में कल शाम खेला जाएगा और आप में से ज़्यादातर लोग इस अभूतपूर्व नाटक को नहीं देख सकेंगे.नाटक है इल्हाम और इसे लेकर आया है बंबई का एक थियेटर ग्रुप. मानव कौल नाम के युवा अभिनेता और नाटककार की यह रचना कई मायनों में यह हक़ रखती है कि आप इसे देखें और उन बदक़िस्मत लोगों में न गिने जाएँ जिन्हें अपनी तीन-तिकडमों से फुर्सत नहीं मिलती.
हालाँकि दिल्ली का थियेटर सीन पिछ्ले कुछ बरसों से ऐसा नहीं रह गया हि कि कोई नाटक रिकमंड किया जाय. ख़ासकर एनएसडी ने जिस तरह संसाधनों और अपनी प्रिविलेज्ड पोज़ीशन का दुरुपयोग जारी रखा है उससे और भी मन खट्टा होता है.आपमें से जिन कई लोगों ने नाट्य सभागारों से मुँह फेर लिया है उसकी वजह भी यही सुनी जाती है कि स्कूल के नाटक संस्कृत और अंग्रेज़ी नाटकों के हज़ार बार फचीटे हुए एडैप्टेशंस हैं और उनमें समय के प्रश्न नहीं उठाए जाते.ये लोग जब इन बासी क्लासिकी प्रस्तुतियों से थक जाते हैं तो मदारी के करतब और गिमिक शुरू कर देते हैं. इस माहौल में इल्हाम एक बिल्कुल नई- समय के प्रश्नों और अद्यतन संवेदनाओं से पगी प्रस्तुति है.
यह एक मध्यवय के बैंक कर्मचारी की कहानी है. इसका नाम है-भगवान. भगवान उम्र के इस पडाव पर अपने होने के सवालों से जूझ रहा है. उसके इर्द-गिर्द मौजूद दुनिया, अपनी ही रफ़्तार में चली जा रही है जबकि उसे लगने लगता है कि वह उस रफ्तार में और अधिक अकेला होता जा रहा है.
"भीतर पानी साफ था...साफ़ ठंडा पानी...कुएँ की तरह. जब हम पैदा हुए थे...जैसे-जैसे हम बडे होते गये...हमने अपने कुएँ में खिलौने फेंके,शब्द फेंके, किताबें, लोगों की अपेक्षाओं जैसे भारी पत्थर और इंसान जैसा जीने के ढेरों खाँचे...और अब जब हमारे कुएँ में पानी की जगह नहीं बची है तो हम कहते हैं ये तो सामान्य बात है."
इस तरह भगवान सामान्य हो चली चीज़ों पर संदेह और यूँ होता तो क्या होता की एक सतत क़वायद में है. वह अपने बैंक में पेंशन लेने आनेवाली एक बूढी औरत को हर बार पाँच सौ रुपये ज़्यादा दे देता है क्योंकि उसने उसकी आह सुनी है. कहानी में हम भगवान को अक्सर देर से घर लौटते देखते हैं और बताया जाता है कि वह आजकल बैंक के पास ही एक पार्क में बैठता है, जहाँ बहुत से बच्चों को वो कहानियाँ सुनाता है, एक चाचा से बातें करता है और रोने जैसी धुनों पर नाचता है. इधर कई दिनों से वो घर नहीं लौटा है क्योंकि उसे डर है-
"...तृप्ति का डर...हाँ तृप्त हो जाने का डर...पापा कह रहे थे कि वो तृप्त हैं.जिस तृप्ति में सारी वजहें,इच्छाएँ ख़त्म हो जाती हैं.वो कह रहे थे -कोई भी वजह नहीं बची है...सिवाय एक वजह के कि मुझे वापस घर आना है...रोज़..."
भगवान अपने इर्द-गिर्द की ख़ूबसूरती पर भी हैरान है-
"...पर हम क्या करेंगे इतनी ख़ूबसूरती का...मैं कभी-कभी अपना सबसे ख़ूबसूरत सपना याद करता हूँ...मेरा सबसे ख़ूबसूरत सपना भी कभी बहुत ख़ूबसूरत नहीं था.मेरे सपने भी थोडी सी ख़ुशी में, बहुत सारे सुख चुगने जैसे हैं. जैसे कोई चिडिया अपना खाना चुगती है...पर जब उसे पूरी रोटी मिलती है तो भी वह उस पूरी रोटी को नहीं खाती...वो उस रोटी में से रोटी चुग रही होती है. बहुत बडे आकाश में हम अपने हिस्से का आकाश चुग लेते हैं...देखने के लिये हम बडा खूबसूरत आसमान देख सकते हैं पर जीने के लिये हम उतना ही आकाश जी पाएँगे जितने आकाश को हमने अपनी खिडकी से जीना सीखा है."
बदलते दौर में ये सब बातें तेज़ी से पागलपन की निशानी मानी जाने लगी हैं. अगर आप 'तृप्ति प्राप्त करने की होड' से बाहर हैं तो आपको विमहैंस का दरवाज़ा दिखाया जाएगा.
नाटक में कुमुद मिश्रा भगवान की भूमिका बडी ही सूझबूझ से निभा रहे हैं जबकि हर अभिनेता अपनी ख़ास उपस्थिति दर्ज कराता है. सेट्स बहुत सादा हैं और इसके सभी नाटकीय तत्व कथ्य को गरिमा देते हैं. जब तक मानव कौल जैसे लेखक-निर्देशक हैं तब तक हम जैसे लोग नाटक से निराश हो-होकर वापस आएँगे.
एक बेहद असहज करने वाला यह सर्वथा प्रासंगिक नाटक कल शाम देखा जा रहा होगा.
इल्हाम
एनएसडी का भारत रंग महोत्सव
17 जनवरी 2008
स्थान: बहुमुख, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भगवानदास रोड, मंडी हाउस, नई दिल्ली (मेट्रो स्टेशन भी है)
शाम: छः बजे
-----------------------------------------
...कौन सी दुनिया इंतज़ार कर रही है
उन दरवाज़ों के उस तरफ़ जिन्हें
मैं कभी खोल नहीं पाया...
तभी मैंने एक अजीब सी चीज़ देखी
मैंने देखा मेरे माथे पर कुछ रेखाएँ बढ गयी हैं..अचानक...
अब ये रेखाएँ क्या हैं...क्या इनकी भी कोई नियति है अपने दरवाज़े हैं?...
नहीं...इनका कुछ भी नहीं है ये मौन की रेखाएँ हैं
मौन उन रेखाओं का जो मेरे हाथों में उभरी थीं
पर मैं उनके दरवाज़े कभी खोल ही नहीं पाया
सच ...मैने देखा है जब भी कोई रेखा मेरे हाथों से ग़ायब हुई है
मैने उसका मौन अपने माथे पर महसूस किया है.
------------------------
-नाटक "इल्हाम "से
ये शब्द हैं उस नाटक के मुख्य पात्र भगवान के, जो भारत रंग महोत्सव, दिल्ली में कल शाम खेला जाएगा और आप में से ज़्यादातर लोग इस अभूतपूर्व नाटक को नहीं देख सकेंगे.नाटक है इल्हाम और इसे लेकर आया है बंबई का एक थियेटर ग्रुप. मानव कौल नाम के युवा अभिनेता और नाटककार की यह रचना कई मायनों में यह हक़ रखती है कि आप इसे देखें और उन बदक़िस्मत लोगों में न गिने जाएँ जिन्हें अपनी तीन-तिकडमों से फुर्सत नहीं मिलती.हालाँकि दिल्ली का थियेटर सीन पिछ्ले कुछ बरसों से ऐसा नहीं रह गया हि कि कोई नाटक रिकमंड किया जाय. ख़ासकर एनएसडी ने जिस तरह संसाधनों और अपनी प्रिविलेज्ड पोज़ीशन का दुरुपयोग जारी रखा है उससे और भी मन खट्टा होता है.आपमें से जिन कई लोगों ने नाट्य सभागारों से मुँह फेर लिया है उसकी वजह भी यही सुनी जाती है कि स्कूल के नाटक संस्कृत और अंग्रेज़ी नाटकों के हज़ार बार फचीटे हुए एडैप्टेशंस हैं और उनमें समय के प्रश्न नहीं उठाए जाते.ये लोग जब इन बासी क्लासिकी प्रस्तुतियों से थक जाते हैं तो मदारी के करतब और गिमिक शुरू कर देते हैं. इस माहौल में इल्हाम एक बिल्कुल नई- समय के प्रश्नों और अद्यतन संवेदनाओं से पगी प्रस्तुति है.
यह एक मध्यवय के बैंक कर्मचारी की कहानी है. इसका नाम है-भगवान. भगवान उम्र के इस पडाव पर अपने होने के सवालों से जूझ रहा है. उसके इर्द-गिर्द मौजूद दुनिया, अपनी ही रफ़्तार में चली जा रही है जबकि उसे लगने लगता है कि वह उस रफ्तार में और अधिक अकेला होता जा रहा है.
"भीतर पानी साफ था...साफ़ ठंडा पानी...कुएँ की तरह. जब हम पैदा हुए थे...जैसे-जैसे हम बडे होते गये...हमने अपने कुएँ में खिलौने फेंके,शब्द फेंके, किताबें, लोगों की अपेक्षाओं जैसे भारी पत्थर और इंसान जैसा जीने के ढेरों खाँचे...और अब जब हमारे कुएँ में पानी की जगह नहीं बची है तो हम कहते हैं ये तो सामान्य बात है."
इस तरह भगवान सामान्य हो चली चीज़ों पर संदेह और यूँ होता तो क्या होता की एक सतत क़वायद में है. वह अपने बैंक में पेंशन लेने आनेवाली एक बूढी औरत को हर बार पाँच सौ रुपये ज़्यादा दे देता है क्योंकि उसने उसकी आह सुनी है. कहानी में हम भगवान को अक्सर देर से घर लौटते देखते हैं और बताया जाता है कि वह आजकल बैंक के पास ही एक पार्क में बैठता है, जहाँ बहुत से बच्चों को वो कहानियाँ सुनाता है, एक चाचा से बातें करता है और रोने जैसी धुनों पर नाचता है. इधर कई दिनों से वो घर नहीं लौटा है क्योंकि उसे डर है-
"...तृप्ति का डर...हाँ तृप्त हो जाने का डर...पापा कह रहे थे कि वो तृप्त हैं.जिस तृप्ति में सारी वजहें,इच्छाएँ ख़त्म हो जाती हैं.वो कह रहे थे -कोई भी वजह नहीं बची है...सिवाय एक वजह के कि मुझे वापस घर आना है...रोज़..."
भगवान अपने इर्द-गिर्द की ख़ूबसूरती पर भी हैरान है-
"...पर हम क्या करेंगे इतनी ख़ूबसूरती का...मैं कभी-कभी अपना सबसे ख़ूबसूरत सपना याद करता हूँ...मेरा सबसे ख़ूबसूरत सपना भी कभी बहुत ख़ूबसूरत नहीं था.मेरे सपने भी थोडी सी ख़ुशी में, बहुत सारे सुख चुगने जैसे हैं. जैसे कोई चिडिया अपना खाना चुगती है...पर जब उसे पूरी रोटी मिलती है तो भी वह उस पूरी रोटी को नहीं खाती...वो उस रोटी में से रोटी चुग रही होती है. बहुत बडे आकाश में हम अपने हिस्से का आकाश चुग लेते हैं...देखने के लिये हम बडा खूबसूरत आसमान देख सकते हैं पर जीने के लिये हम उतना ही आकाश जी पाएँगे जितने आकाश को हमने अपनी खिडकी से जीना सीखा है."
बदलते दौर में ये सब बातें तेज़ी से पागलपन की निशानी मानी जाने लगी हैं. अगर आप 'तृप्ति प्राप्त करने की होड' से बाहर हैं तो आपको विमहैंस का दरवाज़ा दिखाया जाएगा.
नाटक में कुमुद मिश्रा भगवान की भूमिका बडी ही सूझबूझ से निभा रहे हैं जबकि हर अभिनेता अपनी ख़ास उपस्थिति दर्ज कराता है. सेट्स बहुत सादा हैं और इसके सभी नाटकीय तत्व कथ्य को गरिमा देते हैं. जब तक मानव कौल जैसे लेखक-निर्देशक हैं तब तक हम जैसे लोग नाटक से निराश हो-होकर वापस आएँगे.
एक बेहद असहज करने वाला यह सर्वथा प्रासंगिक नाटक कल शाम देखा जा रहा होगा.
इल्हाम
एनएसडी का भारत रंग महोत्सव
17 जनवरी 2008
स्थान: बहुमुख, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भगवानदास रोड, मंडी हाउस, नई दिल्ली (मेट्रो स्टेशन भी है)
शाम: छः बजे
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...कौन सी दुनिया इंतज़ार कर रही है
उन दरवाज़ों के उस तरफ़ जिन्हें
मैं कभी खोल नहीं पाया...
तभी मैंने एक अजीब सी चीज़ देखी
मैंने देखा मेरे माथे पर कुछ रेखाएँ बढ गयी हैं..अचानक...
अब ये रेखाएँ क्या हैं...क्या इनकी भी कोई नियति है अपने दरवाज़े हैं?...
नहीं...इनका कुछ भी नहीं है ये मौन की रेखाएँ हैं
मौन उन रेखाओं का जो मेरे हाथों में उभरी थीं
पर मैं उनके दरवाज़े कभी खोल ही नहीं पाया
सच ...मैने देखा है जब भी कोई रेखा मेरे हाथों से ग़ायब हुई है
मैने उसका मौन अपने माथे पर महसूस किया है.
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-नाटक "इल्हाम "से
Monday, January 14, 2008
नैनो पर इरफान की टिप्पणी
Monday, January 7, 2008
द ग्रेट हिमालयन ब्लॉगर्स मीट
सत्रह ब्लॉगरों के सत्ताइस दुखडे सुनने-पढने के बाद यह बात आपको भले ही अच्छी न लगे कि तीन ब्लॉगर तेरह दुखडे भी न रो सके। लेकिन यह हुआ साल के आग़ाज़ के साथ, और कल ही वो यादगार ब्लॉगर मीट ख़त्म हुई है जो पिछले पाँच दिनों से चल रही थी। इसमें अशोक पांडे, मुनीश और मेरे अलावा चौथा ब्लॉगर हिमालय था. अशोक पांडे के दो पुराने दोस्त अपने बाल-बच्चों के साथ थे. दोनों कमांडर हैं : एक मिसाइल विशेषज्ञ है एक ध्वनि तरंगों पर काम करता है. और साथ थे मनोज भट्ट, जो हल्द्वानी में कम्प्य़ूटर का छोटा मोटा काम करते हैं और एक निवेदन पर मदद करने को आतुर और तत्पर रहते हैं.
उत्तरांचल की हरी-भरी वादियों में यह मिलन नये साल और दोस्ती की नई रस्में सेलीब्रेट करने का भी था. कोई कह नहीं सकता था कि यहाँ जुटे लोग एक दूसरे से पहली बार भी मिल रहे थे. समुद्र तल से कोई दो हज़ार मीटर ऊपर बने आशीष के सोनापानी रिसॉर्ट में सुविधाओं की तारीफ करने से ज़्यादा ज़रूरी यह पाया गया कि इन पाँच दिनों की पाँच रातों को जीने में सदियों के रंग घोल दिये जाएँ .
सुनसान वादी के गुलज़ार माहौल में एक हज़ार एक क़िस्सों से भरी ये ब्लॉगर मीट अपनी कुछ अविस्मरणीय यादें छोड गई. इसमें तारों से भरे आसमान के नीचे रात भर जलते अलाव हैं और रवींद्र संगीत के शाना-ब-शाना मीर-ग़ालिब और सस्तों के शेर हैं। शिवॉस रीगल रॉयल सैल्यूट की चुस्कियाँ और छोटी बडी बोतलों के ख़ाली कार्टन। और अशोक पांडे का कहना कि अपन की ओल्ड मांक अब भी सबसे शानदार. सेब, संतरो, आडुओं और माल्टों के बाग़ हैं. सुबह की चटख़ धूप में सामने खडा आवाज़ लगाता हिमालय और कान लगाए चीड, बाँझ और बुराँस के पेड हैं. एक पगडंडी है जिस पर रुक-रुक कर चलते टट्टू और सिर पर सूखी लकडियों के गठ्ठर उठाए ठिठकी औरतें हैं. ज़माने की नासाज़ियाँ और उन पर कभी हँसने और कभी गहरी फ़िक्रों की छापें हैं. लोग हैं जो अपनी ग़ैरमौजूदगी में भी हँसते-बोलते नज़र आते हैं. साधू और शैतान हैं जो अपने एकाकीपन में वक़्त की कभी वैसी भी पहचान देते हैं जैसी नानी-दादियों की कहानियों में होती थी. सने हुए नीबुओं के चटख़ारे और सतरंगी अचार हैं. नेरूदा, शिंबोर्स्का और हिटलर भी हैं. पनडुब्बियां हैं और उनमें काम करते फौजी हैं, जिन्हें इसलिये ख़ामोश बैठे रहना है ताकि वो ऑक्सीजन की खपत के ज़िम्मेदार न बनें. मान-अपमान की कहानियाँ और उन पर नवेली राय है. माल्टों की गेंद से खेलते बच्चे और पहाडी कुतिया से इश्क़ लडाता एक शहरी कुत्ता भी है. औरतें इस कडाके की सर्दी में इस बात से खुश हैं कि चलो अच्छा है दिल्ली की सर्दी में घरेलू कामों से आज़ादी है. और दूर बैठे आशीष अरोडा हैं जो हर पल यह ख़बर रख रहे हैं कि हमें कोई दिक़्क़त न हो. उदय प्रकाश, आलोकधन्वा और वीरेन डंगवाल के फ़ोन हैं जिन्हें इस पहाडी निस्तब्धता में बहुत साफ सुना जा सकता है. एक क्रिकेट मैच है जो घाटी में किन्हीं दो टीमों के बीच चल रहा है और लाउडस्पीकरों पर होने वाली कमेंटरी भी. अनजानी मंज़िलों की खडी चढाइयाँ हैं और गहरी खाइयों के बीच नमी में नहाए जंगली पौधे. अनदेखी चिडियाँ हैं और भालू के पंजे भी. पर्वतारोहण के लोमहर्षक क़िस्सों के बीच अशोक पांडे और उनकी ऑस्ट्रियाई पत्नी सबीने भी. इसमें मनोज भट्ट के पिता भी हैं जो गीज़र के पानी से नहाने के बजाय घर के बाहर आग जलाकर अपना पानी गरम करते हैं. फिर गप्पें हैं ...और सबसे ज़्यादा ज़िक्र अशोक पांडे की मेहमाननवाज़ी का क्यों किया जाना चाहिये.
चढाई से ठीक पहले
गहन दार्शनिक चर्चा में मशग़ूल मुनीश और अशोक पांडे
गहन दार्शनिक चर्चा जो ख़त्म ही नहीं होती
रानीखेत क्लब में एक ऐतिहासिक हस्ती बहादुर सिंह के साथ अशोक पांडे
रानीखेत का ऐतिहासिक होम फार्म
लौटते हुए नैनीताल
सोनापानी की एक नर्म धूप और मुनीश
माल्टे और मुनीश
सोनापानी के अपने कॉटेज के सामने मुनीश
इरफ़ान और मनोज भट्ट
इरफ़ान के पीछे गहरी घाटियाँ
सोनापानी के पीछे का हिस्सा

सोनापानी के कॉटेज
सोनापानी पुकारता है
हिमालय पर बादलों के छँटने का इंतज़ार
चाय की चुस्की के बीच हिमालय की चोटियाँ
जहाँ चार यार मिल जाएँ
रानीखेत क्लब में डेढ सौ साल पुराना फायर प्लेस
लौटते हुए पिलाट्टिक के शहर नैनीताल में मनोज भट्ट
जन्मदिन पर केक भी
...और एक वीडियो झलक अशोक पांडे के दार्शनिक अंदाज़ की
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