दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Friday, February 19, 2010

कुंदन शाह से एक मुलाक़ात


गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में इस बार कुंदन शाह और सईद अख्तर मिर्ज़ा भी आये थे। भाई भूपेन वहां थे और उन्होंने दोनों से बातचीत की।


8 comments:

Pramod Singh said...

ऐसे पैर-खिंचाई वाले इंट्रो से यूं भी लोग पहले से ही मानकर कि बातचीत रोचक नहीं ही होगी ऑडियो सुनने से बाज आयेंगे. तो शायद पहला काम तो यही है कि इंट्रो से सुलझे सवालों की ज़हीनी मांग की बात हटा ली जाए. यह अलग बात है कि बाबू भूपेन बिना तैयारी के अपनी ही लै में बेलय-ताल सवाल दागे जाते रहे, मगर कुंदन के जवाब तो असल कुंदनमय ही हैं, उसे सुनकर तो मन लाजवाब होता ही है. जीओ, भूपेन कि तुम्‍हारी चिल्‍लरगिरी के ही बहाने सही, यह बतकही कहीं एक जगह संकलित हुई..

KAVITA RAWAT said...

bahut sukriya...
Shubhkamnayne

Rajendra said...

भेंट वार्ता सुनकर बड़ा अच्छा लगा. राहत होती है यह जान कर कि सामजिक सरोकारों वाले फिल्मकार अभी सक्रिय हैं. उनसे इस तरह की भेंट वार्ताएं "मुख्य धारा" वाले मीडिया पर तो उपलब्ध नहीं होती. आपने हमें इन फिल्मकारों तक पहुचाया और उनके विचार सुनवाए इसके लिए आपको साधुवाद.

मनीषा पांडे said...

ये अधूरा है क्‍या? बस बात करते करते अचानक ही बीच में खत्‍म हो गया।
भूपेन, लग रहा है कि प्रतिरोध के सिनेमा में तुम्‍हारी शिरकत सार्थक रही।

मुनीश ( munish ) said...

Very informative, but had he concentrated on ' Jaane bhi do...' , it could have been a historic recording . Very nice anyway !

मुनीश ( munish ) said...

he sounds like Mirza , no?

मैथिली गुप्त said...

धन्यवाद इरफान भाई, एक बहुत बेहतर बातचीत सुनने को मिली.

sanjay joshi said...

Thanx a lot for providing such an interesting conversations.