
सहगल साहब को सलाम और आरज़ू लखनवी को भी। नौशाद साहब जिन आरज़ू को अल्लामा आरज़ू कहकर कान पकड़ते थे , उनके लिखे को न्यू थियेटर के बी एन सरकार पत्थर की लकीर समझते थे ।
सुनिए ये ग़ज़ल -
Friday, February 12, 2010
आरज़ू लखनवी को क्यूँ भूलें ?
छापक इरफ़ान at 4:24 PM
फ़्लैग्स आरज़ू लखनवी, कुंदनलाल सहगल
Subscribe to:
Post Comments (Atom)




1 टिप्पणियां:
अरे, खोजते हुए यहां आये तो यहां भी गज़ल नदारद है!
Post a Comment